हरिद्वारः कुंभ क्षेत्र में क्या गैर-हिंदुओं के प्रवेश को रोक देगी धामी सरकार?

हरिद्वार कुंभ के दौरान शाही स्नान करते साधु

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इमेज कैप्शन, हरिद्वार कुंभ के दौरान शाही स्नान करते साधु (फ़ाइल फ़ोटो)
    • Author, आसिफ़ अली
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

हरिद्वार में प्रस्तावित कुंभ मेला क्षेत्र में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर प्रतिबंध की मांग ने उत्तराखंड की राजनीति और धार्मिक हलकों में नई बहस छेड़ दी है.

यह मांग गंगा सभा और कुछ संतों की ओर से उठाई गई है. गंगा सभा हर-की-पौड़ी घाट के रखरखाव की ज़िम्मेदारी संभालती है.

इस मांग के सामने आने के बाद मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा है कि सरकार इस पर गंभीरता से विचार कर रही है और इस दिशा में काम किया जाएगा.

हरिद्वार को सनातन परंपरा में एक प्रमुख तीर्थ माना जाता है. यहां उठी इस मांग को लेकर संत समाज, धार्मिक संस्थाएं और राजनीतिक दल अलग-अलग प्रतिक्रियाएं दे रहे हैं.

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संत समाज इसे आस्था, और धार्मिक पहचान से जोड़कर देख रहा है, वहीं विपक्षी नेता इसे सरकार द्वारा ध्यान भटकाने की राजनीति बता रहे हैं.

'1916 का कानून आज भी प्रभावी हैं'

हरिद्वार में कुंभ के दौरान भी कई विदेशी आते हैं जो भारतीय संस्कृति को देखना समझना चाहते हैं

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इमेज कैप्शन, हरिद्वार में कुंभ के दौरान भी कई विदेशी आते हैं जो भारतीय संस्कृति को देखना समझना चाहते हैं

हर-की-पौड़ी में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने वाले उपविधानों (बायलॉज) का हवाला देते हुए गंगा सभा के अध्यक्ष नितिन गौतम ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''गंगा के प्रति सनातनियों की आस्था और विश्वास को देखते हुए सभी घाटों पर गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर उत्तराखंड सरकार को पाबंदी लगानी चाहिए.''

नितिन गौतम के मुताबिक़, वर्ष 1916 में गंगा सभा और तीर्थ पुरोहितों की मांग पर तत्कालीन ब्रिटिश सरकार ने पंडित मदन मोहन मालवीय के नेतृत्व में म्युनिसिपल बायलॉज का बनाए थे, जो आज भी प्रभावी हैं.

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उन्होंने बताया कि इन बायलॉज के तहत एक बड़े क्षेत्र को गैर-हिंदू निवास के लिए वर्जित किया गया था. उनके अनुसार, हरिद्वार के एक बड़े हिस्से में आज भी केवल हिंदू आबादी निवास करती है.

गौतम ने कहा कि 1916 से पहले हरिद्वार के इन इलाकों में गैर-हिंदू भी रहते थे, लेकिन एक्ट बनने के बाद वहां से पलायन हुआ.

उनका कहना है, ''उस समय श्रद्धालुओं की संख्या सीमित होती थी इसलिए छोटे क्षेत्र में व्यवस्थाएं संभाली जा सकती थीं. लेकिन अब हालात बदल चुके हैं और बड़ी संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार पहुंचते हैं, ऐसे में बड़े क्षेत्र की आवश्यकता है.''

उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने भी एक बड़े क्षेत्र को कुंभ क्षेत्र घोषित किया है.

गौतम कहते हैं, "अगर वह कुंभ क्षेत्र है तो उसे हिंदू क्षेत्र घोषित करने में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. इसके अलावा उन क्षेत्रों में पड़ने वाले धार्मिक स्थलों और गंगा घाटों पर गैर-हिंदुओं का प्रवेश निषेध होना चाहिए."

नितिन गौतम का कहना है, ''पहले जो नियम और कानून बनाए गए थे, उन्हें सौ वर्षों बाद नए रूप में पुनर्जीवित करके प्रस्तुत करने की आवश्यकता है.''

उनके मुताबिक़ यह मांग किसी के ख़िलाफ़ नहीं बल्कि अपनी 'सुरक्षा और पवित्रता' को बनाए रखने को लेकर है.

उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान उन्होंने सुना है, जिसमें उन्होंने कहा कि वे हरिद्वार के म्युनिसिपल बायलॉज का अध्ययन कर रहे हैं और इस दिशा में आगे बढ़ेंगे.

संत समाज की दलील

हरिद्वार में गंगा किनारे खड़े भगवाधारी

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गंगा सभा की इस मांग को संत समाज का भी समर्थन मिल रहा है.

संत समाज से जुड़े महंत रूपेंद्र ने कहा, "सरकार पहले से ही धार्मिक स्थलों की शुद्धता और पहचान बनाए रखने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है. ऐसे में यदि कुंभ नगरी में गैर-हिंदुओं की एंट्री पर रोक लगाई जाती है, तो संत समाज इसका पूरी मज़बूती से समर्थन करेगा."

महंत रूपेंद्र ने कहा कि जिस तरह मक्का-मदीना में गैर-मुस्लिमों का प्रवेश वर्जित है उसी तरह कुंभ नगरी जैसे पवित्र तीर्थ क्षेत्र में भी गैर-हिंदुओं का प्रवेश वर्जित होना चाहिए.

उनका कहना है कि यह मामला केवल धार्मिक नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान से भी जुड़ा हुआ है.

मुख्यमंत्री पुष्कर धामी ने क्या कहा

मुख्यमंत्री पुष्कर धामी

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इमेज कैप्शन, उत्तराखंड सरकार कुंभ क्षेत्र में ग़ैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी लगाने की मांग पर विचार कर रही है.

इस पूरे मामले के बीच मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी का बयान भी सामने आया है.

एक समाचार चैनल के साथ बातचीत के दौरान मुख्यमंत्री ने कहा कि हरिद्वार एक पूज्य स्थान है और ऋषि-मुनियों की भूमि रही है. उन्होंने कहा कि जब वहां से यह मांग उठी है तो सरकार इस पर गंभीरता से विचार कर रही है.

मुख्यमंत्री धामी ने कहा, "हम चाहते हैं कि वहां की पवित्रता बनी रहे और जो गंगा की पौराणिक और धार्मिक मान्यताएं हैं, वे भी स्थापित रहें. उस स्थल का नाम और महत्व खराब न हो. इसके लिए सभी पहलुओं का अध्ययन कर रहे हैं."

उन्होंने यह भी कहा कि हरिद्वार के पहले जो एक्ट बने हैं, उन्हें भी देखा जा रहा है और वह इस दिशा में काम करेंगे.

'ध्यान भटकाने के लिए पुराना कार्ड खेला गया'

कांवड़ यात्री हरिद्वार में प्रवेश के दौरान

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इमेज कैप्शन, कांवड़ यात्री हरिद्वार में प्रवेश के दौरान

इस मुद्दे पर राजनीतिक प्रतिक्रियाएं भी तेज़ हैं. हरिद्वार लोकसभा क्षेत्र की मंगलौर विधानसभा से कांग्रेस विधायक काज़ी निज़ामुद्दीन ने बीबीसी हिन्दी से कहा कि हर-की-पौड़ी को लेकर पहले से ही बायलॉज मौजूद हैं और सभी लोग उनका सम्मान करते हैं.

उन्होंने बताया कि पिछले साल वहां एक बैठक आयोजित की गई थी, जिसमें उन्हें भी बुलाया गया था, लेकिन बायलॉज की जानकारी होने के कारण उन्होंने वहां जाने से इनकार कर दिया था.

उनके अनुसार, मौजूदा व्यवस्था का सभी सम्मान करते हैं और इसमें किसी तरह का विवाद नहीं है.

काज़ी निज़ामुद्दीन कहते हैं, "मौजूदा समय में सरकार अंकिता भंडारी जैसे मुद्दे पर चारों तरफ से घिरी हुई है. इसके अलावा बेरोज़गारी, पेपर लीक और ऋषिकेश अतिक्रमण जैसे मुद्दे भी जनता के सामने हैं, जिनसे सरकार जूझ रही है."

उन्होंने कहा, "इन सभी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए इनके पास यह पुराना कार्ड है, जो खेला गया है."

काज़ी निज़ामुद्दीन

कुंभ क्षेत्र में गैर हिंदुओं के प्रवेश से जुड़े नियम क्या हैं

हरिद्वार पालिका समिति के बायलॉज की पुस्तिका

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हरिद्वार पालिका समिति के बायलॉज में स्पष्ट लिखा है कि हर की पौड़ी सहित अन्य गंगा घाटों में अ-हिंदू (गैर हिंदुओं) का आना-जाना प्रतिबंधित है.

हरिद्वार पालिका बायलॉज में ये भी दर्ज़ है कि यदि कोई अहिंदू (गैर हिंदू) पावन घाटों में जाकर इस नियम का उल्लंघन करता है तो उस पर दस रुपये का जुर्माना लगाया जाएगा.

दस्तावेज़ में सार्वजनिक आचरण, प्रवेश, निषेध और उल्लंघन की स्थिति में दंड का विस्तार से ज़िक्र है.

नियमों की भाषा यह संकेत देती है कि ये प्रावधान सामाजिक या धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि कानूनी रूप से लागू नगरपालिका नियम थे, जिन्हें तत्कालीन प्रांतीय सरकार की स्वीकृति प्राप्त थी.

नियमावली

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इन बायलॉज में घाटों और पूजा स्थलों की पवित्रता बनाए रखने को प्राथमिकता दी गई है और उल्लंघन की स्थिति में जुर्माने का प्रावधान भी दर्ज है.

हरिद्वार के सहायक नगर आयुक्त महेंद्र कुमार यादव के अनुसार, ''हर नगर निकाय की स्थानीय परिस्थितियों को देखते हुए एक्ट की धारा के अधीन उप विधियां (बायलॉज) बनाई जाती हैं. नगर पालिका हरिद्वार की उप विधि के अनुसार घाटों पर कपड़े धोना, साबुन लगाना और हर की पौड़ी क्षेत्र में अ-हिंदू प्रवेश वर्जित है.'

उन्होंने बताया कि इसके अपवाद में लिखा है कि अ-हिंदू सरकारी अधिकारी हरिद्वार जा सकता है.

फ़िलहाल यह मुद्दा हरिद्वार और पूरे उत्तराखंड में चर्चा का विषय बना हुआ है.

कुंभ मेला 2027 में प्रस्तावित है. कुंभ जैसे बड़े धार्मिक आयोजन से पहले इस तरह की मांग और उस पर सरकार का रुख आने वाले समय में राज्य की राजनीति और सामाजिक माहौल को किस दिशा में ले जाएगा, इस पर सबकी निगाहें टिकी हुई हैं.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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