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खाड़ी के इस्लामिक देशों में भारतीय कामगार किन हालात में रह रहे हैं?
- Author, इमरान कुरैशी
- पदनाम, पटनमतिट्टा, केरल से, बीबीसी हिन्दी के लिए
कुवैत के मंगाफ़ शहर में लगी आग में झुलसकर मारे गए सभी भारतीय मज़दूरों में वे हुनर थे जो भारत के किसी भी कोने में इस्तेमाल में आ सकते थे.
लेकिन फिर भी उन मज़दूरों ने खाड़ी के देशों में जाकर नौकरी करने का फ़ैसला किया और ज़्यादा पैसा कमाने के लिए समझौते भी किए.
एक मृतक के रिश्तेदार के मुताबिक, ''अपने और परिवारवालों के लिए आरामदायक जीवन'' बनाने के लिए उन्होंने खाड़ी जाने का फ़ैसला किया था.
इनमें से हरेक की कहानी महत्वाकांक्षा की है. कोई वहाँ पर अपने गाँव में घर बनाने के लिए काम कर रहा था तो किसी ने अपनी बेटी के पोस्ट ग्रैजुएशन के लिए पैसे जुटाने के लिए अपना रिटायरमेंट तीन साल आगे बढ़ा दिया था.
कोई अपनी बेटी को नर्सिंग कोर्स में एडमिशन दिलाने के लिए प्लान कर रहा था तो कोई जल्द अपने घर वापस आने की तैयारी में था, जहां उसने मेहनत की कमाई से घर बनाया था.
इन सबकी उम्र 26 से 68 के बीच थी जो आपको सिर्फ़ आंकड़े लग सकते हैं लेकिन ये सब अपने सपनों को पूरा करने के लिए जीतोड़ काम कर रहे थे.
बीबीसी हिंदी से बात करते हुए एक मृतक के रिश्तेदार मुरलीधरन पिल्लई ने कहा, ''देश से बाहर जाकर और नौकरी कर वो ज्यादा पैसा कमा रहे थे. उन्होंने डिप्लोमा किया था. अगर वो भारत में रहते तो 20 से 25 हज़ार रुपये कमा पाते. इस हुनर का इस्तेमाल भारत में कहाँ होता? यहाँ तक की मैंने भी दुबई में 18 साल काम किया है.''
मुश्किल वक़्त
मुरलीधरन पिल्लई, आकाश शशिधरन नायर (31) के चाचा हैं. दो महीनों में आकाश की शादी होने वाली थी, जिसके लिए वो ओणम से पहले केरल के पथानमथिट्टा के अपने गांव पांडलम वापस आने वाले थे.
आकाश और उनकी बहन की परवरिश उनकी मां ने की थी. कैंसर से पिता की मौत हो जाने के बाद मां ने एक मेडिकल स्टोर में नौकरी की और घर चलाया.
बातचीत के दौरान मुरलीधरन एक घर की तरफ़ इशारा करते हुए बताते हैं कि ये एक छोटा सा ही घर था जब 8 साल पहले आकाश कुवैत गया था.
मुरलीधरन ने बताया, ''उसकी (आकाश की) कमाई से ही घर का ग्राउंड फ़्लोर बड़ा बनाया गया और फिर उसी ने फ़र्स्ट फ़्लोर भी बनाया था ताकि शादी के बाद वो वहाँ रह सके. यहां रहकर वो ये सब नहीं कर सकता था.''
कुवैत अग्निकांड में जान गँवाने वाले 51 वर्षीय मैथ्यू थॉमस की कहानी भी ज़्यादा अलग नहीं है. अलपुझा ज़िले के चेंगान्नुर के रहने वाले मैथ्यू ने एनबीटीसी की सेल्स टीम जॉइन की थी.
बीबीसी हिंदी से बात करते हुए मैथ्यू थॉमस के चाचा थॉमस अब्राहम ने बताया, ''मैथ्यू अपने परिवार से बहुत प्यार करते थे. उन्होंने अपने दो भतीजों को भी उसी कंपनी में नौकरी दिलाई थी. लेकिन 20 और लोगों को भी उन्होंने उसी कंपनी में नौकरी दिलाई थी. इसी कारण सब उन्हें प्यार से बिजू मामा बुलाने लगे थे.''
मैथ्यू रिटायर होना चाहते थे लेकिन उनकी बेटी ने बेंगलुरु में एमबीए में एडमिशन ले लिया था. थॉमस ने बताया, ''उन्होंने (मैथ्यू थॉमस) अपना रिटायरमेंट तीन साल आगे बढ़ा दिया. उनकी बेटियों ने वापस जाने से मना भी किया था लेकिन वो माने नहीं.''
थॉमस अब्राहम ने बताया, ''ये इसलिए था क्योंकि मैथ्यू को कुवैत में कंपनी की तरफ़ से आर्थिक स्थिरता मिली हुई थी जिसकी वजह से वो अपना घर बना सके थे. नहीं तो उनके पास कोई आर्थिक मज़बूती नहीं होती.''
साजन जॉर्ज (एमटेक) या सुमेश पिल्लई (एक्स-रे वेल्डर) या शमीर उमरुद्दीन (ड्राइवर) की कहानियां भी इन लोगों से ज़्यादा अलग नहीं हैं.
सुमेश पिल्लई के अंतिम संस्कार में शिरकत हुए प्रशांत चंद्रशेखरन नायर ने बीबीसी से कहा, ''छोटे से काम के लिए भी बाहर आप ज़्यादा कमाते हैं. केरल में नौकरी के मौके भी कम हैं. चाहे घर बनाना हो या बच्चों को पढ़ाना हो, इससे मदद मिल जाती है.''
रहन सहन की स्थितियों पर सवाल
लेकिन अपने परिवार के लिए आरामदायक जीवन जीने के लिए कमाई की भी भारी क़ीमत चुकानी पड़ती है.
अपार्टमेंट बिल्डिंग का ताज़ा मामला, जहाँ सिक्यॉरिटी रूम में कथित तौर पर शॉर्ट सर्किट के कारण लगी आग में कम से कम 45 भारतीयों की मौत हो गई. भारतीय श्रमिकों की जीवन स्थितियों का मूल्यांकन करने के लिए एक दिलचस्प केस स्टडी है.
यह एक ऐसी इमारत थी, जिसे कुछ ही समय पहले तत्कालीन विदेश राज्य मंत्री वी. मुरलीधरन ने भारतीय मज़दूरों को दी जाने वाली सबसे अच्छी सुविधा के रूप में बताया था.
केरल में एक मज़दूर के शोक संतप्त रिश्तेदार ने नाम न ज़ाहिर करते हुए बीबीसी हिंदी को बताया, "समस्या इमारत की नहीं, बल्कि रखरखाव की थी. जो कहीं न कहीं ख़राब हो गया था, वरना इतनी बड़ी दुर्घटना नहीं होती."
पास की इमारत में रहने वाले भारतीयों में से एक ने नाम न छापने की शर्त पर बीबीसी हिंदी को बताया, "यह सच है कि इमारत अच्छी है. हालांकि, कुछ समय तक रखरखाव में दिक्क़त आई थी. वहां बहुत सारा सामान बाहर रखा हुआ था, जिससे मज़दूरों को बाहर निकलने में अड़चन पैदा हुई होगी."
इस मज़दूर ने यह भी कहा, "सीढ़ियों और कॉमन एरिया में कबाड़ और अन्य चीजों को ये मानकर रखना कोई अचरज वाली बात नहीं क्योंकि वहां रहने वाले लोग लिफ्ट का उपयोग करते हैं. मूल रूप से, मानक उपायों को अहमियत नहीं दी जाती है. इस अग्निकांड के बाद हम इसी बात पर चर्चा कर रहे थे."
लेकिन एक अन्य मज़दूर ने बताया कि ऑयल सेक्टर में काम करने वालों की रहने की स्थिति अन्य सेक्टर के मुकाबले कहीं बेहतर थी, "इस सेक्टर में नियमित ऑडिट होता है. लेकिन अन्य सेक्टर में मानदंडों का सख़्ती से पालन नहीं किया जाता है."
हालांकि, अन्य सेक्टरों में रुचि रखने वाले एनबीटीसी के समूह प्रमुख केजी अब्राहम ने शुक्रवार को कोच्चि में मीडिया को बताया कि बिल्डिंग परमिट में भीड़भाड़ का कोई मामला या कोई अन्य अनियमितता नहीं थी.
उन्होंने कहा, "हमने कुछ भी ग़लत नहीं किया है. इमारत में 24 अपार्टमेंट (हर मंजिल पर चार) थे. प्रत्येक अपार्टमेंट में तीन कमरे थे. मैनेजरों को एक कमरे में और दो इंजीनियर अलग कमरे में रहने की व्यवस्था है."
अब्राहम ने पीड़ितों के परिवारों के लिए आठ लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की और उन्हें भरोसा दिया कि पीड़ितों के परिवारों को अगले चार वर्षों तक वेतन दिया जाएगा. यह परिवारों को मिलने वाली बीमा राशि से अलग है.
क़ुर्बान कर दी ज़िंदगी
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ माइग्रेशन एंड डेवलपमेंट के चेयरमैन प्रोफ़ेसर इरुदया राजन ने बीबीसी से कहा, ''ज़्यादातर लोग वहां पर पैसा कमाने गए थे. जब वो अच्छा कमाते तो केवल बचत करते थे. वो अपने रहन-सहन और खान-पान पर खर्च नहीं करते थे ताकि उनके परिवार को फ़ायदा हो. अपने परिवार के लिए वो अपनी ज़िंदगी क़ुर्बान कर रहे हैं.''
प्रोफ़ेसर राजन विदेशों में विस्थापन पर गहरी नज़र रखते हैं. प्रोफ़ेसर राजन का ताज़ा काम 'केरल माइग्रेशन स्टडी 2023' रिपोर्ट है, जिसे उन्होंने गुलाटी इंस्टीट्यूट ऑफ़ फ़ाइनेंस के साथ मिलकर तैयार किया है. ये रिपोर्ट दो दिन पहले ही जारी हुई है.
इस स्टडी में पाया गया है कि कैसे पलायन बढ़ रहा है और इलाक़े में बदलाव आ रहा है. अब और ज़्यादा लोग नौकरी या पढ़ाई के लिए यूरोप, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया और बाक़ी के देश जा रहे हैं.
आंकड़े बताते हैं कि साल 2018 के मुक़ाबले साल 2023 में बाहर जाने वालों की संख्या 1.29 लाख से बढ़कर 2.50 लाख हो गई है.
इस पूरे प्रकरण का सबसे अहम पहलू ये है कि इन कुशल मज़दूरों से केरल सरकार के ख़ज़ाने में बढ़ोतरी हो रही है.
केरल की लाइफलाइन है रेमिटेंस
तिरुवनंतपुरम में अपने दफ्तर में बैठे प्रोफ़ेसर राजन बताते हैं कि ''ताज़ा अध्ययन बताता है कि साल 2023 में केरल सरकार को प्रवासियों की ओर से भेजे गए धन से दो लाख 16 हज़ार 893 करोड़ रुपये प्राप्त हुए. हर साल भारत आने वाले प्रवासियों के पैसे में केरल का हिस्सा हमेशा से 20 फीसदी रहा है. बीते साल यह 125 अरब डॉलर था. केरल सरकार की कुल आय में इसकी हिस्सेदारी 25 फ़ीसदी है.''
राजन ने बताया, ''ये पैसा केरल की अर्थव्यवस्था को चला रहा है. इसी कारण मुख्यमंत्री (पिनरायी विजयन) कहते हैं कि प्रवासी केरल की लाइफ़लाइन हैं.''
ये तब है, जब कोरोना महामारी के बाद खाड़ी के देशों में काम करने वालों की तनख्वाह में 20 से 30 फीसदी तक की कटौती हुई है. राजन के मुताबिक, ''इसका मतलब है कि वे लोग घर पर पैसा भेजने के लिए और त्याग कर रहे हैं.''
प्रोफ़ेसर राजन कहते हैं, ''भारत ने खाड़ी के सभी देशों के साथ क़रार किया हुआ है. मेरा मानना है कि इन क़रारों पर और काम होना चाहिए. ये बगैर दांत के शेर जैसा नहीं होना चाहिए. भारत आज एक महाशक्ति है. भारत को आय, रहन-सहन की व्यवस्था पर बात करनी चाहिए. वरना हम अपने नागरिकों को ऐसे नहीं रख सकते.''
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