राजस्थान में बीजेपी और कांग्रेस को बारी-बारी कुर्सी मिलने का इतिहास- प्रेस रिव्यू

कांग्रेस नेता

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राजस्थान में विधासभा चुनाव का मतदान 25 नवंबर को है. देश के बाक़ी राज्यों से राजस्थान कई मामलों में बिल्कुल अलग है.

अंग्रेज़ी अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने राजस्थान की राजनीति में बीजेपी और कांग्रेस के दबदबे पर एक कहानी की है. आज की प्रेस रिव्यू में पहली ख़बर के रूप में इसे ही पढ़िए.

क्षेत्रफल के मामले में राजस्थान देश का सबसे बड़ा राज्य है. पिछले 33 सालों में राजस्थान में केवल तीन मुख्यमंत्री हुए और पिछले 50 सालों में महज़ छह मुखख्यमंत्री. छह मुख्यमंत्रियों में एक की गिनती नहीं की गई है क्योंकि उनका कार्यकाल महज़ 15 दिनों का रहा था.

राजस्थान में कई बार खंडित जनादेश मिला लेकिन चुनाव में जिस भी पार्टी को सबसे ज़्यादा सीटें मिलीं, वो बहुमत जुटाने में कामयाब रही. यहाँ आँकड़ों के खेल में कभी सरकार नहीं गिरी. ऐसा तब है, जब यहाँ तीन बार मुख्यमंत्री को बर्खास्त किया गया.

राजस्थान में कांग्रेस और बीजेपी के अलावा कभी किसी का शासन नहीं रहा. जनता पार्टी सत्ता में रही लेकिन बीजेपी उसका हिस्सा थी. बीच-बीच में दूसरी सियासी पार्टियों ने पांव जमाने की कोशिश की लेकिन कभी कामयाबी नहीं मिली.

1993 में जब बीजेपी के भैरों सिंह शेखावत मुख्यमंत्री बने तब से कांग्रेस और बीजेपी के बीच सत्ता आती-जाती रही. राजस्थान में विधानसभा की 200 सीटें हैं. 34 सीटें अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व हैं और 25 अनुसूचित जनजाति के लिए.

राजस्थान 25 लोकसभा सीटें हैं. तीन अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व हैं और चार अनुसूचित जनजाति के लिए. यहाँ से 10 राज्यसभा सांसद चुने जाते हैं.

भैरों सिंह शेखावत

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राजस्थान चुनाव में क़रीबी के मुक़ाबले का इतिहास

राजस्थान में चुनावी नतीजे में बीजेपी और कांग्रेस छोटे बहुमत या बहुत के क़रीब जैसी स्थिति में अक्सर होती हैं. 1962 में कांग्रेस को 176 में 88 सीटें मिली थीं. 1967 में कांग्रेस विरोधी लहर के बावजूद 184 में से 89 सीटें उसे मिली थीं.

1990 में बीजेपी और वीपी सिंह के जनता दल के बीच गठबंधन हुआ था. बीजेपी को 200 में से 85 सीटें मिलीं और उसने जनता दल के 55 विधायकों के समर्थन से सरकार बनाई.

1993 में बीजेपी ने 95 सीटें जीतीं और बहुमत के क़रीब पहुंच गई. 2008 और 2018 में कांग्रेस ने 200 सीटों वाली विधानसभा में क्रमश: 96 और 100 सीटें जीती.

कुछ मौक़ों पर राजस्थान में पूर्ण बहुमत से भी सरकारें बनी हैं.

1972 में कांग्रेस ने 184 में से 145 सीटें जीतकर स्पष्ट बहुमत हासिल किया था. इसके बाद 1980 में 200 में से 133 सीटें और 1985 में 113 सीटें जीती थीं.

1977 में जनता पार्टी ने 200 में से 152 सीटें जीती थीं और 1998 में कांग्रेस 153 सीटों पर विजयी रही थी.

ट्रांसफर को लेकर हाई कोर्ट के रिटायर जज का आरोप

इलाहाबाद हाई कोर्ट

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इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे प्रीतिंकर दिवाकर ने अपने तबादले को लेकर एक बड़ा आरोप लगाया है.

अमर उजाला की ख़बर के अनुसार, हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से हुए विदाई समारोह में उन्होंने कहा था कि उनका तबादला छत्तीसगढ़ से इलाहाबाद हाईकोर्ट दंड देने के लिए किया गया था, मगर यह इनाम साबित हुआ.

उन्होंने कहा कि इस बहाने वह एशिया की सबसे बड़ी बार की खूबियों और यहां के काबिल वकीलों से परिचित हो सके.

प्रीतिंकर दिवाकर बीते 21 नवंबर को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बतौर चीफ़ जस्टिस रिटायर हुए हैं. साल 2009 में वह छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट जज बने थे और अक्टूबर 2018 को उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट में किया गया था.

अख़बार लिखता है, "वह इससे ख़ुश नहीं थे और बरसों से सीने में दबा उनका यह दर्द हाईकोर्ट बार एसोसिएशन की ओर से रखे गए विदाई समारोह में छलक आया."

पीएमएलए पर सुनवाई के दौरान सिब्बल से सुप्रीम कोर्ट का सवाल

सुप्रीम कोर्ट

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नवभारत टाइम्स की ख़बर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में प्रिवेंशन ऑफ़ मनी लॉन्डरिंग एक्ट (पीएमएलए) पर सुनवाई के दौरान जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और सीनियर एडवोकेट कपिल सिब्बल के बीच तीखी बहस हुई.

बुधवार को अदालत पीएमएलए के प्रावधानों की वैधता पर सुनवाई कर रही थी. पूर्व कांग्रेस नेता और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश होकर इस क़ानून के प्रावधानों का विरोध कर रहे हैं.

जस्टिस त्रिवेदी ने जानना चाहा कि जब पीएमएलए को लागू किया गया, तब सिब्बल विपक्ष में थे या सत्ताधारी राजनीतिक दल में.

बुधवार को सुनवाई के दौरान सिब्बल ने कहा कि 'मैं 35 साल से जनप्रतिनिधि रहा हूं, विपक्ष में भी रहा, लेकिन ऐसा कानून कभी नहीं देखा.'

इस पर जस्टिस त्रिवेदी ने पूछा, 'तब आप विपक्ष में थे?'

दरअसल, पीएमएलए को संसद में 2002 में पारित किया था, मगर इसे साल 2005 में लागू किया गया. उस समय कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार केंद्र में थी, जिसमें सिब्बल भी सामिल थे.

इस पर कपिल सिब्बल ने जवाब दिया, "इसे भले ही एक दल ने संशोधित और लागू किया हो, मगर हमने कभी इसे ऐसे लागू करने की नहीं सोची थी. आप जो पूछ रही हैं, वह विवादास्पद है."

इस पर जस्टिस त्रिवेदी ने कहा कि मैं सिर्फ़ यह पूछ रही हूं कि 'क्या आप उस साल विपक्ष में थे.'

यूएन में खेलों पर प्रस्ताव पर भारत ने नहीं किया मतदान

संयुक्त राष्ट्र महासभा

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193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा ने मंगलवार को फ्रांस की ओर से पेश किए गए प्रस्ताव ‘खेल और ओलंपिक के माध्यम से एक शांतिपूर्ण और बेहतर दुनिया का निर्माण’ पारित किया.

इकनॉमिक टाइम्स की ख़बर के अनुसार, भारत ने इस प्रस्ताव पर हुए मतदान से अनुपस्थित रहा.

यह प्रस्ताव 'खेलों के ज़रिये एक शांतिपूर्ण और बेहतर दुनिया के निर्माण, आतंकवाद व हिंसक अतिवाद को रोकने और उसका मुकाबला करने के साथ ही मानवाधिकारों को बढ़ावा देने में खेल की भूमिका को स्वीकार करने से जुड़ा था.

यूएन के 193 सदस्य देशों में से 120 इस मतदान के दौरान मौजूद रहे. इसके पक्ष में 118 वोट पड़े, जबकि रूस और सीरिया ने मतदान नहीं किया. इसके विपक्ष में कोई वोट नहीं पड़ा. रूस ने इस प्रस्ताव पर रिकॉर्डेड वोट का आह्वान किया था.

भारत उन 73 देशों में शामिल था, जो प्रस्ताव पर मतदान से अनुपस्थित रहे.

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