दिल्ली चुनाव में हार-जीत से अरविंद केजरीवाल पर क्या असर पड़ सकता है?

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- Author, अंशुल सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिल्ली विधानसभा चुनाव में वोटिंग के बाद जब एग्ज़िट पोल आए तो भारतीय जनता पार्टी अरविंद केजरीवाल की आम आदमी पार्टी से आगे दिखी.
आम आदमी पार्टी के सामने सत्ता बचाने की चुनौती है लेकिन एग्ज़िट पोल के आंकड़े इससे उलट हैं. हालांकि एग्ज़िट पोल के अनुमान हर बार सही साबित नहीं होते. लेकिन इस बार दिल्ली में एग्ज़िट पोल के नतीजे सही साबित हुए तो बीजेपी यहां लगभग 27 साल बाद सत्ता में वापसी कर लेगी.
अगर आम आदमी पार्टी हारती है तो ये पार्टी के लिए एक बड़ी हार साबित होगी. बीते एक दशक में आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के साथ पंजाब में पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने के साथ राष्ट्रीय पार्टी बनने की यात्रा पूरी की है.
इस सफर के दौरान दिल्ली में पार्टी के शीर्ष नेतृत्व पर कथित शराब घोटाले के आरोप लगे और कई नेताओं को जेल जाना पड़ा. इस घटना का असर पार्टी की रणनीति पर भी दिखी. आम तौर पर आक्रामक रहने वाली आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार के आरोपों के बाद कई मौक़ों पर डिफ़ेंसिव मोड में दिखी.
जेल से आने के बाद अरविंद केजरीवाल ने मुख्यमंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया. केजरीवाल ने कहा था कि वो 'जनता की अदालत' में ख़ुद को साबित करेंगे.

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वो साल 2011 था. लोगों का हुजूम दिल्ली के रामलीला मैदान में जुटा था. सिर पर सफ़ेद रंग की 'आइ एम अन्ना' लिखी टोपी और जुबां पर भ्रष्टाचार विरोधी नारे. इन लोगों के सामने एक बड़ा सा मंच था. मंच पर अन्ना हजारे अपने सहयोगियों संग अनशन पर बैठे थे. इनमें से एक अरविंद केजरीवाल भी थे.
दिसंबर जाते-जाते अन्ना हज़ारे का भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन ख़त्म हो चुका था. अरविंद केजरीवाल ने इसके बाद अगले साल राजनीति में जाने की ठानी और 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी के गठन की घोषणा की.
तब केजरीवाल ने कहा था, "मजबूरी में हम लोगों को राजनीति में उतरना पड़ा. हमें राजनीति नहीं आती है. हम इस देश के आम आदमी हैं जो भ्रष्टाचार और महंगाई से दुखी हैं."
गढ़ बचाने की लड़ाई

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केजरीवाल जिस पार्टी को मजबूरी में शुरू करने की बात करते थे, उस पार्टी ने महज दस साल में दिल्ली के भीतर अपनी दमदार मौजूदगी दर्ज कराई.
आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में तीन बार विधानसभा और दो नगर निगम के चुनाव लड़े. विधानसभा में दो बार पार्टी ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया और एक बार दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी. वहीं 2017 में पार्टी को नगर निगम चुनाव में हार मिली लेकिन 2022 में एमसीडी में भी जीत मिली.
केजरीवाल ने 2013 में 28 सीटों के साथ दिल्ली की राजनीति शुरू की थी. इसके बाद 2015 में आप ने 70 में से 67 सीटें जीतीं और दिल्ली में सारे रिकॉर्ड तोड़कर नया इतिहास बना दिया.
2020 में सीटों की संख्या कम होकर 62 हुई लेकिन कोई भी दल केजरीवाल को चुनौती देते हुए नहीं दिखा.
राजनीतिक विश्लेषक अभय कुमार दुबे बीबीसी से कहते हैं, "आम आदमी पार्टी केवल दो राज्यों- दिल्ली और पंजाब की पार्टी है. अगर एक राज्य हार जाएगी तो उसके ऊपर बहुत बड़ा प्रहार होगा. दिल्ली आप का मुख्यालय है. यहीं से पार्टी लॉन्च हुई थी इसलिए यहां पर चुनाव जीतना उसके लिए ज़रूरी है."
हालांकि लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी दिल्ली में अब तक खाता नहीं खोल पाई है. आप ने तीन लोकसभा चुनाव (2014, 2019 और 2024) लड़े और तीनों में हार मिली.

'केजरीवाल की अग्नि परीक्षा'
13 सितंबर, 2024 को अरविंद केजरीवाल कथित शराब घोटाले में सुप्रीम कोर्ट से ज़मानत मिलने के बाद तिहाड़ जेल से बाहर आए. 15 सितंबर को केजरीवाल ने पार्टी दफ़्तर में कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए दो दिन के भीतर इस्तीफ़ा देने की बात कही.
केजरीवाल का कहना था कि मैं तब तक सीएम की कुर्सी पर नहीं बैठूंगा जब तक जनता अपना फ़ैसला न सुना दे. उन्होंने कहा था कि वह अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए जनता के बीच जाएंगे. केजरीवाल के इस कार्यक्रम को 'जनता की अदालत' नाम दिया गया.
'जनता की अदालत' की शुरुआत जंतर-मंतर से हुई. 2012 में इसी जंतर-मंतर में केजरीवाल अपने सहयोगियों संग अनशन पर बैठे थे.
केजरीवाल ने ज़ोर देकर कहा, "मैंने तय किया कि मैं जनता की अदालत में जाऊंगा. जनता से पूछूंगा कि जनता मुझे बताए कि मैं बेईमान हूं या नहीं. आने वाला चुनाव केजरीवाल की अग्नि परीक्षा है. अगर आपको लगता है कि केजरीवाल ईमानदार है तो केजरीवाल को वोट देना. अगर आपको लगता है कि केजरीवाल बेईमान है तो मुझे कतई वोट मत देना."
इसके बाद दिल्ली में केजरीवाल ने अलग-अलग जगहों पर इस तरह की अदालत लगाई और ईमानदारी पर वोट देने की बात दोहराई.
अगर एग्ज़िट पोल सही साबित होते हैं तो निश्चित रूप से यह केजरीवाल के लिए किसी झटके से कम नहीं होगा.
इसके अलावा यह चुनाव अरविंद केजरीवाल की मुफ़्त वाली योजनाओं का लिटमस टेस्ट भी है.

पार्टी का भविष्य

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विश्लेषकों का कहना है कि अन्ना हजारे के आंदोलन से जन्मी पार्टी अपने सबसे बुरे दौर से गुजर रही है. पार्टी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ आंदोलन से जनता के बीच आई थी और अब उस पर कथित भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग चुके हैं.
अगर नतीजे एग्ज़िट पोल से मिलते-जुलते रहे तो दिल्ली में आम आदमी पार्टी विपक्ष के तौर पर अपनी पारी शुरू कर सकती है. हालांकि अतीत में कई मौक़ों पर एग्ज़िट पोल ग़लत साबित हो चुके हैं.
विश्लेषकों के मुताबिक़ आम आदमी पार्टी की बीजेपी, कांग्रेस, समाजवादी या कम्युनिस्ट पार्टी की तरह कोई एक विचारधारा नहीं है. इसका गठन सत्ता में आने के लिए हुआ था. ऐसे में पार्टी के लिए बिना किसी ठोस विचारधारा के विपक्ष में रहना भी एक चुनौती होगी.
अगर कड़ी टक्कर में आम आदमी पार्टी सरकार में आ भी जाती है तब भी उनकी मुश्किलें कम नहीं होंगी. शराब नीति मामले में केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और सत्येंद्र जैन जैसे शीर्ष नेतृत्व के सामने अभी क़ानूनी चुनौतियां बरकरार हैं.
ऐसे में विधायक चुनकर आए इन नेताओं के सामने अयोग्य होने की चिंता रहेगी. इस परिस्थिति से निपटने के लिए आप को बहुमत से ज़्यादा सीटें जीतनी होंगी.
वरिष्ठ पत्रकार प्रमोद जोशी कहते हैं, "दिल्ली मॉडल के सहारे ही आम आदमी पार्टी दूसरे राज्यों में जा रही है. पंजाब और गुजरात में उन्हें सफलता भी मिली. अगर यहां अच्छा प्रदर्शन नहीं करते हैं तो उनके विस्तार की योजना भी प्रभावित होगी. पार्टी का अस्तित्व ही दिल्ली के कारण है."
वोटिंग से ठीक पहले आम आदमी पार्टी के आठ विधायकों ने पार्टी छोड़ दी थी. ये सारे विधायक बीजेपी में शामिल हो चुके हैं. जनादेश कम होने की स्थिति में इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता है.
साल 2020 में मध्य प्रदेश में ऐसा हुआ था जब बीजेपी विपक्ष में थी. कांग्रेस विधायकों के एक बड़े वर्ग ने पार्टी छोड़ी और बीजेपी ने राज्य में बहुमत साबित कर दिया. ऐसे में केजरीवाल के सामने अंतिम समय तक जनादेश आने तक अपने समर्थकों को एकजुट रखने की चुनौती है.
मोदी बनाम केजरीवाल नैरेटिव

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आम आदमी पार्टी के गठन के बाद अरविंद केजरीवाल की राष्ट्रीय स्तर पर ख़ुद को स्थापित करने की महत्वाकांक्षा किसी से छिपी नहीं है.
2014 में उन्होंने दिल्ली में 49 दिनों की सरकार से इस्तीफ़ा दिया और लोकसभा चुनाव लड़ने की ठानी.
आम आदमी पार्टी 400 से ज़्यादा सीटों पर लोकसभा चुनाव लड़ी लेकन चार सीटें जीत पाई. अरविंद केजरीवाल ने वाराणसी से मोदी के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ा था. उन्हें तीन लाख 71 हज़ार से ज्यादा मतों के अंदर से हार का सामना करना पड़ा.
इस चुनाव से सबक लेते हुए केजरीवाल वापस दिल्ली की राजनीति में लग गए. एक साल के भीतर उन्होंने पार्टी को दिल्ली में ऐतिहासिक जीत दिलाई और पूर्ण बहुमत की सरकार बनी.
2022 में पार्टी ने पंजाब में भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और भगवंत मान मुख्यमंत्री बने. अब कांग्रेस के बाद दो राज्यों में सरकार वाली आप इक़लौती विपक्षी पार्टी थी.
दो राज्यों में जीत और दिल्ली में मज़बूत होती पकड़ के बाद आप के नेताओं ने मोदी के सामने अरविंद केजरीवाल को लाकर खड़ा कर दिया था.
2022 में मनीष सिसोदिया ने कहा था, "पंजाब के बाद अब पूरे देश में अरविंद केजरीवाल को राष्ट्रीय विकल्प के रूप में देखा जाने लगा है. अब तक लोग पूछते थे कि मोदी बनाम कौन? अब पूरे देश में माहौल बन रहा है कि मोदी जी की जगह अरविंद केजरीवाल को एक मौक़ा देना है."
हालांकि, दिल्ली में लोकसभा के आंकड़ें अरविंद केजरीवाल के पक्ष में नज़र नहीं आते हैं. इसके अलावा कथित शराब घोटाले से उनकी छवि पर भी असर पड़ा है. लेकिन एक सच यह भी है कि केजरीवाल बीजेपी के सामने एक अपराजेय मुख्यमंत्री हैं.
प्रमोद जोशी का मानना है कि अगर केजरीवाल हारते हैं तो इस नैरेटिव पर असर ज़रूर पड़ेगा.
उनका कहना है, "दिल्ली चुनाव के नतीजों का असली असर मोदी बनाम केजरीवाल के नैरेटिव पर पड़ेगा. जब आप बनी थी तब भी इसका इरादा राष्ट्रीय क्षितिज पर छा जाने का था. इस पर तो पहले पानी फिर चुका है लेकिन जो बचा-खुचा है वो इससे ख़त्म हो जाएगा. आम आदमी पार्टी हाल के दिनों में राष्ट्रीय पार्टी बन गई है. अगर हारे तो यह दर्जा भी प्रभावित हो सकता है."
अतीत में कुछ मौक़ों पर सीएम केजरीवाल का पीएम मोदी के साथ सीधे टकराव देखने को मिला था. केजरीवाल से पहले शायद ही दिल्ली की राजनीति में ऐसा कभी हुआ हो.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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