बम धमाके में आंखों की रोशनी खोई, फिर भी जीता गोल्ड मेडल

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वली नूरी ने अफ़ग़ानिस्तान में ब्रितानी सैनिक के साथ अनुवादक के तौर पर काम करने के दौरान साल 2009 में अनजाने में एक बम पर अपना पैर रख दिया था.
इससे वह बम फट गया और धमाके की वजह से वली नूर ने 20 साल की उम्र में अपनी आंखों की रोशनी खो दी.
बचपन से ही वली नूर को पहाड़ों पर भागने-दौड़ने का शौक़ था, लेकिन बम धमाके की वजह से जो अंधेरा उनकी ज़िंदगी में आया, उससे ऐसा लगा जैसे ज़िंदगी में दोबारा कभी नहीं दौड़ पाएंगे.
लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और ब्रिटेन में शरण लेने के बाद उनकी ज़िंदगी एकदम बदल गई.
चार्ली जोन्स ने वली नूर से उनके इस बदलाव की कहानी के बारे में विस्तार से बात की. पढ़िए वली नूर की ज़ुबान से, उनकी अपनी कहानी -

'मैंने मान लिया था कि मैं मर सकता हूं'

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मैंने काबुल में अपना बचपन बिताया. मैं एक अच्छा बॉक्सर था और ख़ुद को फ़िट रखने के लिए दौड़ता भी था. मैंने अपनी स्कूली शिक्षा पूरी की और उच्च शिक्षा के लिए यूनिवर्सिटी भी जाना चाहता था, लेकिन मेरा परिवार बहुत ग़रीब था और मुझे उनकी आर्थिक मदद भी करनी थी.
मेरी पांच बहनें और चार भाई हैं. मेरे परिवार के लिए दो वक्त की रोटी एक चुनौती की तरह थी. मेरे पिता की हालत कोई नौकरी करने लायक नहीं थी.
इसलिए 18 वर्ष की उम्र में मैंने अफ़ग़ानिस्तान आई ब्रिटेन की सेना में अनुवादक का काम शुरू किया. मैंने स्कूल में अंग्रेज़ी पढ़ी थी और मुझे इस भाषा पर पकड़ हासिल हो गई थी.
ब्रिटेन की सेना, अफ़ग़ान बलों और नागरिकों की बातचीत एक दूसरे को समझाना मेरी ज़िम्मेदारी थी. मैं यह काम अच्छे से कर देता था.
फिर मुझसे पूछा गया कि क्या मैं अफ़ग़ानिस्तान के राज्य हेलमंद जाना पसंद करूंगा और मैंने हां कह दिया. मुझे मालूम था कि मुझे यह बात माननी पड़ेगी कि मैं वहां मर भी सकता हूं.
वहां स्थिति जहन्नुम जैसी थी, हर दिन हमले हो रहे थे और लोग मर रहे थे, लेकिन मैं डरा हुआ नहीं था.
मुझे वहां काम करते हुए लगभग 2 साल बीत चुके थे. अचानक एक दिन गश्त के दौरान मैंने ग़लती से एक बम पर पैर रख दिया. इससे बम फट गया और इस धमाके ने मुझे उछाल दिया, फिर मैं ज़मीन पर आ गिरा. मैं सोच रहा था कि जैसे मैं मर रहा हूं, लेकिन यह सब किसी डरावने सपने की तरह था.
मेरे पूरे चेहरे में कीलें चुभ गई थीं और मेरे सभी 28 दांत झड़ गए थे.
मेरी सांस रुक रही थी, लेकिन मैं अपने मुंह में हाथ डालकर एक कील निकालने में कामयाब हो गया. मुझे कुछ नज़र नहीं आ रहा था और फिर मुझे हेलीकॉप्टर से वहां से काबुल ले जाया गया, जहां मैंने सेना के एक अस्पताल में कोमा में दो हफ़्ते गुज़ारे.
'मैं समझा ज़िंदगी खत्म हो गई'

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डॉक्टरों को मेरे ज़िंदा बचने की उम्मीद नहीं थी. जब मैंने आंखें खोलीं तो मैं ज़रा भी बोलने की स्थिति में नहीं था. इसीलिए मैंने अपना नाम एक काग़ज़ पर लिखा, ताकि वहां मौजूद स्टाफ़ के सदस्य मेरे दोस्त से संपर्क कर सकें और परिवार तक मेरा संदेश पहुंच सके.
जब वहां पहली बार मेरे माता-पिता मुझसे मिलने के लिए आए तो मैं मुश्किल से उठकर बैठा, ताकि उन्हें मेरी हालत ज़्यादा ख़राब न लगे. मैंने उनके लिए मुस्कुराने की भी कोशिश की, लेकिन मैं उस वक़्त भी कुछ बोल नहीं पा रहा था.
मुझे इसके बाद बग़राम एयरबेस भेजा गया, जहां अमेरिकियों ने मेरा इलाज किया और टूटी हुई हड्डियां जोड़ीं. सांस लेने में मदद के लिए मेरे गले में ट्यूब लगाई गई थी.
मैंने वहां लगभग एक महीना गुज़ारा और फिर अपनी आंखों का इलाज करवाने के लिए भारत और पाकिस्तान भी गया, लेकिन मेरी आंखों की रोशनी वापस नहीं आई.
यह सब मेरे लिए आसान नहीं था, बल्कि वह मेरी ज़िंदगी के सबसे अंधेरे दिन थे. मुझे भागना-दौड़ना बहुत पसंद था, लेकिन मैं उस वक़्त सोच रहा था कि मेरे भागने-दौड़ने के दिन अब ख़त्म हो चुके हैं.
मैं अविवाहित था, इसलिए अफ़ग़ानिस्तान में ही रह रहे अपने परिवार वालों के पास चला गया. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि मैं अपनी ज़िंदगी कैसे बिताऊंगा और सोच रहा था कि अब मुझसे कोई लड़की शादी नहीं करेगी.
लेकिन साल 2012 में मेरी शादी हो गई. उस दिन से लेकर आज तक मेरी बीवी मेरी सबसे बड़ी सपोर्टर हैं. उन्होंने मेरी सफ़ेद छड़ी फेंक दी और कहा, “मैं आपकी छड़ी हूं.”
वह एक बहुत मेहरबान महिला साबित हुईं और जब भी मैं उदास होता तो वह कहतीं, “मैं हूं ना आपके पास.”
हम बहुत भाग्यशाली हैं कि हमारे तीन बच्चे भी हुए.
प्रिंस हैरी से अविश्वसनीय मुलाक़ात

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मैं काम करना चाहता था, लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में रहते हुए यह संभव नहीं था. हादसे के बाद ब्रिटिश सेना ने मुझे एक साल की तनख़्वाह दी, लेकिन मैं फिर भी परेशान था क्योंकि अफ़ग़ानिस्तान, विकलांग लोगों के लिए कोई अच्छी जगह नहीं है.
फिर वर्ष 2014 में मुझे ब्रिटिश सरकार ने बताया कि मैं अपने परिवार के साथ ब्रिटेन में शरण ले सकता हूं. हमें कोलचस्टर पहुंचने में लगभग दो साल लगे और फिर इसके बाद हमने कभी पलटकर नहीं देखा.
मुझे यहां रहना बहुत पसंद है, यह बहुत अच्छी जगह है जहां मैंने अच्छे दोस्त भी बना लिए हैं. मेरे रनिंग क्लब का नाम कोलचस्टर हैरियर्स है और हम यहां बहुत सुरक्षित हैं.
क्लब के पास गाइड रनर थे और मुझे यहां अंदाज़ा हुआ कि मैं दोबारा भाग सकता हूं, दौड़ सकता हूं. इसकी वजह से मुझमें आज़ादी का एहसास और बढ़ा, मेरा मानसिक स्वास्थ्य भी बेहतर हुआ.
मैंने लगभग पांच साल इंतज़ार किया और पिछले वर्ष मैंने इंवेक्टिस गेम्स में गर्व के साथ ब्रिटेन का प्रतिनिधित्व किया. मैंने 100 मीटर, 200 मीटर, 400 मीटर और 1500 मीटर की रेस में चार गोल्ड मेडल जीते. (इंवेक्टिस गेम्स मौजूदा और पूर्व सैनिकों का खेल उत्सव है, जिसमें विकलांग हो चुके सैनिक भाग लेते हैं.)
मैंने प्रिंस हैरी और मेगन से मुलाक़ात की. वह बहुत गर्मजोशी और दोस्ताना अंदाज़ में मुझसे मिले.
हैरी ने मुझसे हाथ मिलाया, लेकिन मुझे मालूम ही नहीं था कि वह कौन हैं. मैंने पूछा आप कौन हैं और उन्होंने जवाब दिया “मैं प्रिंस हैरी हूं.”
हम एक साथ बैठकर हंसे और आपस में बातचीत भी की. वह मेरे जीवन का एक अविश्वसनीय पल था.
'हार नहीं मानूंगा'

मैं अब तक रेसिंग के मुक़ाबलों में 21 और तैराकी के मुक़ाबलों में तीन मेडल जीत चुका हूं. मैं जीवन में कभी पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहता, बल्कि केवल आगे ही बढ़ना चाहता हूं.
मेरा सपना है कि मैं पैरालंपिक मुक़ाबलों में हिस्सा लूं. मैं उन मुक़ाबलों के लिए क्वालीफ़ाई कर चुका था, लेकिन वक़्त पर आवेदन नहीं कर सका. लेकिन एक दिन मैं वहां तक ज़रूर पहुंच जाऊंगा.
मैं चाहता हूं कि सभी 6 बड़े मैराथन पूरे कर लूं. मैं साल 2019 में लंदन मैराथन में हिस्सा ले चुका हूं.
मैंने अभी अपने जीवन पर एक किताब लिखी है जो 12 सितंबर को छपकर आएगी. मैं स्कूल-कॉलेजों में जाता हूं और दूसरे पूर्व सैनिकों के विभिन्न समूहों में भी उठता-बैठता हूं और उनके साथ अपनी कहानी शेयर करता हूं. हाल ही मैं मैंने उन फ़ौजियों से भी मुलाक़ात की है, जो यूक्रेन में घायल हुए थे.
मुझे अपने संबोधनों के लिए जो पैसे मिलते हैं, वह मैं अफ़ग़ानिस्तान भेज देता हूं ताकि विधवाओं और अनाथ बच्चों की मदद हो सके.
ब्रिटिश सेना ज्वाइन करने या मेरे साथ जो भी हुआ, मैं उस पर कभी नहीं पछताऊंगा. जीवन मेरे लिए पहले बहुत मुश्किल था, लेकिन अब अच्छा गुज़र रहा है.
मैं दृष्टिहीनता के सामने कभी नहीं झुकूंगा. मैं लोगों को प्रभावित करता रहूंगा और उन्हें बताऊंगा कि कोई भी कमज़ोरी आपके जीवन में ऊंचा स्थान प्राप्त करने से नहीं रोक सकती.
( चार्ली जोन्स से वली नूरी की बातचीत पर आधारित)
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