जीएसटी को लेकर पॉपकॉर्न और पुरानी कारें क्यों चर्चा में, इससे क्या फ़र्क़ पड़ेगा

    • Author, चंदन कुमार जजवाड़े
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत में सात साल पहले जीएसटी (वस्तु एवं सेवा कर) लागू किया गया था. हालांकि इस पर आज भी कई तरह के भ्रम और लोगों के बीच बहस देखने को मिलती है.

जीएसटी के मामले में लोगों की एक शिकायत यह है कि एक ही सामान के लिए अलग-अलग टैक्स स्लैब होने से सिस्टम जटिल हो गया है.

शनिवार को राजस्थान के जैसलमेर में जीएसटी काउंसिल की 55वीं बैठक हुई. वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में इस बैठक में कुछ टैक्स को सरल बनाने की सिफ़ारिशें की गईं, लेकिन टैक्स बहस का मुद्दा बन गए.

इनमें पॉपकॉर्न और पुरानी कारों पर लगने वाले टैक्स की चर्चा सबसे ज़्यादा हो रही है. सोशल मीडिया पर भी लोग इसे लेकर पोस्ट कर रहे हैं.

पॉपकॉर्न पर अलग-अलग टैक्स

जीएसटी परिषद ने स्पष्ट किया कि नमक और मसालों के साथ खाने के लिए तैयार पॉपकॉर्न अगर पहले से पैक करके बिना लेबल के बेचा जाता है तो उस पर 5% जीएसटी लगेगा. लेकिन अगर वही पॉपकॉर्न लेबल लगाकर बेचा जाए तो 12 प्रतिशत जीएसटी लगेगी.

इतना ही नहीं काउंसिल ने स्पष्ट किया है कि पॉपकॉर्न में चीनी मिलाने से इसकी श्रेणी बदल जाएगी और इसे कैरेमल पॉपकॉर्न माना जाएगा, जिससे इस पर टैक्स रेट बढ़कर 18 फ़ीसदी होगा.

इस प्रकार भारत में तीन तरह के पॉपकॉर्न माने गए हैं- सादा, मसालेदार और भुना हुआ. इन पर जीएसटी दर 5 प्रतिशत से 18 प्रतिशत तक लगाया गया है.

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, "हम हर जीएसटी काउंसिल के बाद संवाददाता सम्मेलन करते हैं. टैक्स ऐसा विषय होता है जिसमें बहुत लेयर्स होते हैं. आंख बंद करके कोई टैक्स लगाते भी नहीं हैं और आंख बंद करके हटाते भी नहीं हैं. कृपया पूरे विषय समझने के बाद अपने मीडिया में चलाइए."

इसके बाद वित्त मंत्री ने पॉपकॉर्न की तीन तरीक़ों से बिक्री के बारे में जानकारी दी और उस पर लगने वाले टैक्स के बारे में बताया.

इससे पहले जैसलमेर में हुई बैठक में फ़्लेवर और पैकेजिंग के आधार पर पॉपकॉर्न पर जीएसटी की नई दरें निर्धारित की गई थीं और इसे लेकर लगातार बहस छिड़ी हुई थी.

लोग इसे लेकर तरह तरह के दावे कर रहे थे, जिसमें थिएटर के पॉपकॉर्न और रेहड़ी पर बेचे जा रहे पॉपकॉर्न की तुलना की जा रही थी. सोशल मीडिया पर भी इसे लेकर बहस छिड़ी हुई थी और फिर सरकार ने इस पर अपनी सफ़ाई दी है.

टैक्स के जानकार और चार्टर्ड अकाउंटेंट विकास कहते हैं, "अगर अब आप सिनेमाहॉल में नमक के साथ तैयार किया गया पॉपकॉर्न खाते हैं तो आपको 5% टैक्स देना होगा और अगर ट्रेन में चीनी मिला हुआ पॉपकॉर्न ख़रीदते हैं तो 18% टैक्स देना होगा. "

विकास का कहना है कि जीएसटी काउंसिल के प्रस्ताव के बाद जल्द ही नई दरों की अधिसूचना भी जारी कर दी जाएगी.

पुरानी कार बेचने पर जीएसटी दरों में बढ़ोतरी का सच

जीएसटी काउंसिल ने अपनी 55वीं बैठक में पुरानी कारों पर जीएसटी को 12 फ़ीसदी से बढ़ाकर 18 फ़ीसदी करने का प्रस्ताव भी किया है. टैक्स की यह दर पुरानी कार ख़रीदकर उसे जिस मार्जिन पर बेचा जाएगा, उसी पर लागू होगी.

इससे पहले 1200 सीसी और 4 हज़ार मि.मी. तक की लंबाई वाली पुरानी कारों पर 12% जीएसटी लगाया गया था. जबकि इससे बड़ी गाड़ियों पर जीएसटी की दर 18% थी.

इसलिए यह इज़ाफ़ा भी सोशल मीडिया पर बहस का एक बड़ा मुद्दा बन गया.

हालांकि यह दर भारत में व्यवसायिक प्रतिष्ठानों के ज़रिए बेची जाने वाली पुरानी कारों पर ही लागू होगा.

पुरानी और इस्तेमाल की जा चुकी कारों का बिज़नेस करने वाले कार्स-24 के सीईओ विक्रम चोपड़ा ने नए टैक्स रेट पर बीबीसी तमिल से बात की है.

उनका कहना है, "सरकार को केवल पुरानी कारों पर टैक्स बढ़ाने पर ध्यान देने के बजाय एक दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाना चाहिए था. पुरानी कारें लाखों भारतीयों के लिए ज़रूरी हैं. पुरानी कारों से लोगों के कार रखने का सपना आसानी से पूरा होता है. जीएसटी की नई नीति इस क्षेत्र के विकास को धीमा कर देगी."

कैसे बढ़ाई-घटाई जाती हैं दरें

हर साल जीएसटी काउंसिल की बैठक में इसे लेकर कई तरह के फ़ैसले होते हैं. इसमें नए टैक्स या टैक्स दरों में बदलाव का प्रस्ताव रखा जाता है और काउंसिल की स्वीकृति के बाद ही इसे लागू किया जाता है.

झारखंड सरकार में मंत्री और पूर्व में राज्य का वित्त मंत्रालय संभाल चुके रामेश्व उरांव कहते हैं, "प्रस्ताव के समर्थन या विरोध में जिस पक्ष में 50 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट होता है, उसे ही माना जाता है. इसमें राज्यों के पास एक वोट होता है."

"राज्य की तरफ़ से बैठक में मुख्यमंत्री, वित्त मंत्री या कोई अन्य भी हिस्सा ले सकता है. लेकिन अभी विपक्षी दलों की कुछ ही राज्यों में सरकार है तो हम जो चाहते हैं वो नहीं हो सकता, बल्कि केंद्र सरकार जो चाहती है वही होता है."

जीएसटी क्या है?

भारत में साल 2017 में जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स लागू किया गया था. इसे लागू करने के लिए 30 जून को संसद भवन में एक ख़ास कार्यक्रम आयोजित किया गया और रात के 12 बजे ऐप के ज़रिए इसे लागू किया गया था.

भारत में कई ज़्यादातर वस्तुओं और सेवाओं पर लगने वाले अलग-अलग टैक्स को हटाकर उसे जीएसटी के अधीन लाया गया था.

सरकार ने दावा किया था कि यह भारत में अब तक का सबसे बड़ा टैक्स सुधार है. इस टैक्स को 'एक देश एक कर' बताया गया.

हालांकि जीएसटी के अधीन अलग-अलग टैक्स दरों पर विपक्षी दलों ने लगातार सरकार के दावे पर सवाल खड़े किए हैं. इसके अलावा सोशल मीडिया पर भी जीएसटी को एक जटिल कर प्रणाली बताकर सरकार पर हमले किए जाते रहे हैं.

जीएसटी की हालिया बैठक के बाद कुछ दरों में बदलाव पर भी लोग आरोप लगा रहे हैं कि जीएसटी में टैक्स की अलग-अलग दरें हैं और फिर भी सरकार का दावा है कि यह सरल टैक्स है.

जीएसटी में कितने टैक्स स्लैब हैं?

भारत में जीएसटी के चार स्लैब रखे गए हैं, जिसके मुताबिक़ 5 फ़ीसदी, 12 फ़ीसदी, 18 फ़ीसदी और 28 फ़ीसदी टैक्स लगाया जाता है. इसके अलावा कुछ वस्तुओं पर विशेष टैक्स रेट भी लगाया गया है.

इनमें खाद्य तेल, चीनी, मसाले, चाय और कॉफ़ी (इंस्टेंट कॉफ़ी को छोड़कर), कोयला, रेलवे इकोनॉमी क्लास यात्रा और रासायनिक उर्वरक जैसी कई ज़रूरी चीज़ें 5 प्रतिशत स्लैब के अंतर्गत आती हैं.

12 प्रतिशत स्लैब में अत्यधिक प्रोसेस्ड और लग्ज़री वस्तुओं को शामिल किया गया है. इनमें फलों का जूस, कंप्यूटर, आयुर्वेदिक दवाएं, सिलाई मशीन और सस्ते होटल जैसी चीज़ें और सेवाएं शामिल हैं.

वित्तीय सेवाओं और बीमा, दूरसंचार सेवाओं, आईटी सेवाओं, गैर-एसी रेस्तरां, सस्ते कपड़े और जूते सहित ज़्यादातर अन्य वस्तुओं और सेवाओं पर 18 प्रतिशत जीएसटी लगाया गया है.

28 फ़ीसदी टैक्स स्लैब में लग्ज़री वस्तुएं और सेवाएं शामिल हैं. इनमें शीर्ष स्तर के वाहन, एसी-फ्रिज जैसे उत्पाद, तंबाकू और महंगे होटल शामिल हैं.

इसके अलावा कुछ श्रेणियों के लिए विशेष दरें भी हैं. मसलन सोने और क़ीमती पत्थरों के लिए तीन प्रतिशत, छोटे उत्पादों के लिए एक प्रतिशत और कुछ रेस्तरां के लिए पांच प्रतिशत की विशेष जीएसटी दर लागू है.

राज्य के पास कितना अधिकार

रामेश्वर उरांव कहते हैं कि जीएसटी के मामले में राज्यों के पास कोई अधिकार नहीं है.

उनका कहना है, "हमारे पास डीज़ल और पेट्रोल पर लगने वाले वैट को तय करने का अधिकार है, इसलिए हम उसे छोड़ना नहीं चाहते हैं, ताकि अपनी ज़रूरत के हिसाब से वैट को कम या ज़्यादा कर सकें. इसके अलावा शराब के मामले में भी राज्य टैक्स लगाने के अपने अधिकार को खोना नहीं चाहता है."

रामेश्वर उरांव बताते हैं कि पहले जीएसटी के कलेक्शन और इसके बंटवारे में समस्या होती थी, लेकिन ऑनलाइन होने के बाद इस समस्या का समाधान हो गया है.

पहले राज्यों को मिलने वाले एस-जीएसटी और केंद्र को मिलने वाले सी-जीएसटी का बंटवारा हर महीने की 20 तारीख़ को होता था, जिससे राज्यों को बड़ी समस्या होती थी, क्योंकि यह उनके राजस्व का बड़ा हिस्सा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)