इस्लामिक देशों में रहने वाले हिंदुओं का ‘हिंदुत्व’ कैसा?

क़तर
इमेज कैप्शन, राजन शर्मा (बाएं) और मोहम्मद वसीम (दाएं) क़तर की राजधानी दोहा में रूममेट हैं.
    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सिवान और औरंगाबाद से

रामेश्वर साव बिहार के औरंगाबाद में जिस गाँव के हैं, वहाँ कोई भी मुस्लिम परिवार नहीं रहता है. आसपास के गाँवों में भी मुसलमान नहीं हैं.

पढ़ाई के दौरान भी किसी मुसलमान से मुलाक़ात नहीं हुई. कम उम्र में शादी के बाद ज़िम्मेदारियाँ बढ़ीं तो रोज़गार का संकट खड़ा हुआ. 2015 में रामेश्वर को रोज़गार की तलाश में सऊदी अरब जाना पड़ा.

हिंदू बहुल गाँव, समाज और देश में रह रहे रामेश्वर साव के लिए इस्लामिक देश सऊदी अरब पहुँचना उनकी ज़िंदगी की अहम घटना थी.

रामेश्वर बताते हैं कि जल्द ही मुसलमान उनके रूममेट बन गए. कुछ मुसलमान भारत के थे और कुछ पाकिस्तान के.

रामेश्वर के मन में पाकिस्तान को लेकर मीडिया के ज़रिए छवि बनी थी कि यहाँ के लोग 'आतंकवादी और कट्टर' होते हैं. मुसलमानों को लेकर भी रामेश्वर के मन में यही छवि थी.

रामेश्वर साव कहते हैं, "मुसलमानों और पाकिस्तानियों के साथ रहते हुए मेरे मन की कई धारणाएँ बदलीं. पहले ऐसा लगता था कि मुसलमान हिंदुओं से नफ़रत करते हैं. लेकिन सच यह था कि मैं मुसलमानों से नफ़रत करता था. मेरे मन से मुसलमानों को लेकर नफ़रत ख़त्म हुई. दोस्ती ऐसी हुई कि पाकिस्तान के लोग मुश्किल में मेरी मदद करते थे और उन्हें कोई ज़रूरत होती थी तो मैं मदद करता था. हम साथ में खाना भी खाने लगे."

रामेश्वर अपने व्यक्तित्व में इस बदलाव को काफ़ी अहम मानते हैं. उन्हें लगता है कि अगर वह सऊदी अरब नहीं जाते तो कई सच्चाइयों से नावाक़िफ़ रह जाते.

वीडियो कैप्शन, खाड़ी देशों में बसे भारत के हिंदू-मुसलमान एक साथ कैसे रहते हैं

बाहर मेलजोल, देश में अलगाव

सऊदी अरब
इमेज कैप्शन, रामेश्वर साव पिछले सात सालों से सऊदी अरब के दम्माम में रह रहे हैं

बिहार में सिवान के चांदपाली मौजा गाँव में बड़ी आबादी मुसलमानों की है.

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

यहाँ हिंदू के 10-12 घर ही हैं. इस गाँव के हर घर से एक या दो पुरुष खाड़ी के इस्लामिक देशों में नौकरी करते हैं.

गाँव के पाँच सौ से ज़्यादा लोग खाड़ी के देशों में रहते हैं. खाड़ी के देशों की कमाई का असर भी इस गाँव में साफ़ दिखता है. गाँव में कोई भी घर मिट्टी का नहीं है.

राजन शर्मा इसी गाँव से हैं. उनके पास कोई रोज़गार नहीं था. राजन बताते हैं कि सिवान में रहते हुए रोज़ सौ रुपए कमाना भी मुश्किल था.

एक दिन राजन से गाँव के ही सोहराब अली ने पूछा कि क़तर काम करने जाओगे? राजन ने हाँ करने में बिल्कुल देरी नहीं की. सोहराब ने ही उनके लिए वीज़ा बनवा दिया.

राजन शर्मा पिछले नौ सालों से क़तर में रह रहे हैं और हर महीने 30 हज़ार रुपए बचा लेते हैं. क़तर की कमाई से गाँव में ही राजन ने तीन मंज़िला घर बनवा लिया है. राजन अपने भाई की शादी में गाँव आए हुए हैं लेकिन गाँव आकर उन्हें निराशा हुई.

राजन बताते हैं, "अयोध्या में राम मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा के मौक़े पर हमारे गाँव के पास से एक जुलूस गुज़रा जो जानबूझकर मुस्लिम इलाक़ों में चिढ़ाने के लिए घुसने की कोशिश कर रहा था. किसी तरह मामले को सँभाला गया.. नहीं तो सांप्रदायिक तनाव बढ़ सकता था."

राजन कहते हैं, "मुझे यह देखकर बहुत दुख हुआ. मैंने अपनी माँ से जाकर कहा कि हमारे राम ऐसे तो नहीं थे. वह राजा की तरह रहते थे और प्रजा का ख़्याल रखते थे. राम के नाम पर लोगों को ठगा जा रहा है. पिछले दस सालों में ऐसी चीज़ें बढ़ी हैं."

क़तर की राजधानी दोहा में राजन के रूममेट चांदपाली के ही मोहम्मद वसीम हैं. वसीम के अलावा दो और लोग हैं लेकिन राजन इकलौते हिंदू हैं.

राजन के लिए मुसलमान साथियों ने कमरे के ही एक कोने में छोटा-सा मंदिर बनवा दिया है. राजन कमरे में ही पूजा करते हैं और मुसलमान दोस्त भी उसी कमरे में नमाज़ पढ़ते हैं.

राजन कहते हैं, "क़तर में मेरी तबीयत बहुत ज़्यादा ख़राब हो गई थी. बिस्तर से उठना मुश्किल था. वसीम भाई मेरे कपड़े तक धोते थे. क्या ऐसी ही मोहब्बत देश के भीतर नहीं रह सकती है?"

सेक्युलर होना किस काम का?

इस्लामिक देश
इमेज कैप्शन, सिवान के चांदपाली मौजा गाँव में राजन शर्मा और मोहम्मद वसीम

चाँदपाली के ही मोहम्मद नसीम सऊदी अरब में रहते हैं और इन दिनों छुट्टियाँ मनाने गाँव आए हुए हैं. मोहम्मद नसीम जून में सऊदी अरब लौटेंगे.

वह भारत में धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति को लेकर चिंतित हैं. वो कहते हैं, "सऊदी अरब इस्लामिक देश है. वहाँ राजशाही है और एक ही परिवार का शासन है. हम मुसलमान होने के नाते वहाँ जाकर धार्मिक रूप से बहुसंख्यक हो जाते हैं लेकिन इसका हमें कोई विशेषाधिकार नहीं मिलता है. वहाँ सबके लिए क़ानून बराबर है. वहाँ गुंडे को गुंडे के रूप में देखा जाता है कि न कि मुस्लिम गुंडा और हिन्दू गुंडा के रूप में."

मोहम्मद नसीम कहते हैं, "भारत के मुसलमान यहीं की मिट्टी के हैं. भारत के निर्माण में हमारे पूर्वजों का भी ख़ून-पसीना लगा है लेकिन धर्म के आधार पर दोयम दर्जे का नागरिक बनाया जा रहा है. यह देखकर दुख होता है. हिन्दू-मुसलमान विदेशों में मिलकर रहते हैं और देश में आते ही दीवारें खड़ी हो जाती हैं. सेक्युलर देश में भेदभाव नहीं होना चाहिए लेकिन हो उल्टा रहा है."

मोहम्मद नसीम के गाँव चाँदपाली से 10 किलोमीटर दूर दरवेश पुर के उपेंद्र राम उनके रूममेट हैं. नसीम बताते हैं, "उपेंद्र के लिए मुसलमानों ने कमरे में ही प्लाईबोर्ड से एक छोटा-सा मंदिर बनवा दिया है. सऊदी अरब में बुतपरस्ती आसान नहीं है लेकिन हमने अपने हिन्दू भाई के लिए इसकी परवाह नहीं की."

मोहम्मद नसीम बताते हैं कि उपेंद्र जाति से मोची हैं लेकिन उन्होंने कभी अछूत नहीं माना जबकि सवर्ण हिंदू सऊदी अरब में भी उनके साथ खाना खाने से परहेज़ करते हैं.

टूट रहीं धारणाएँ

सऊदी अरब
इमेज कैप्शन, चांदपाली के मोहम्मद नसीम सऊदी के दम्माम में अपने रूममेट उपेंद्र राम से बात करते हुए

बिहार में औरंगाबाद की इला शर्मा के पति श्याम दुबई में एल-एंड-टी कंपनी में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं. वह कई सालों से दुबई में रह रही हैं. अभी उनके पति दोहा में शिफ़्ट हो गए हैं इसलिए वीज़ा के इंतज़ार में औरंगाबाद आ गई हैं.

इला शर्मा कहती हैं कि दुबई में रहते हुए उन्हें कभी अहसास नहीं हुआ कि वह एक इस्लामिक देश में रहती हैं.

इला कहती हैं, "सच कहिए तो मैंने दुबई में होली, दिवाली और छठ पूजा ज़्यादा धूमधाम से मनाई है. कोई दिक़्क़त नहीं हुई. कभी ऐसा नहीं लगा कि हम धार्मिक रूप से अल्पसंख्यक हैं. सुरक्षा के मामले में तो भारत से ज़्यादा यहाँ बेफ़िक्री है. रात में दो बजे भी महिलाएँ अकेले दुबई में चल सकती हैं."

खाड़ी के इस्लामिक देशों में रहने वाले हिंदुओं से मिलिए तो ज़्यादातर लोग इस बात को स्वीकार करते हैं कि वे मुसलमानों के बारे में जो पहले सोचते थे, अब वैसा नहीं सोचते हैं. गल्फ़ की नौकरी से न केवल इनके जीवन में आर्थिक तब्दीली आई है बल्कि राजनीतिक और सामाजिक सोच भी बदली है.

क्यों बदल रही है सोच?

यूएई
इमेज कैप्शन, इला शर्मा के पति श्याम दुबई में प्रोजेक्ट मैनेजर हैं और पिछले कई आठ सालों से दुबई में ही रह रही हैं

पटना में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी ताविशी बहल पांडे इस बदलाव के बारे में कहती हैं, "एक ही जगह पर रहते हुए कई तरह की धारणाएँ घर कर जाती हैं लेकिन हम दूसरे देशों में जाते हैं और अलग-अलग संस्कृति के लोगों से मिलते हैं तो ये धारणाएँ बदलती हैं. हमें बाद में लगता है कि जो हम पहले से मानकर बैठे थे, वो पूरा सच नहीं था. यह सबके साथ होता है. मुझे लगता है कि हमारे भीतर स्वीकार्यता बढ़ती है और थोड़ी समझ भी अच्छी होती है."

खाड़ी के देशों में रहने वाले जितने भी बिहारी हिंदुओं से बात की, सबने यही कहा कि मुसलमानों को लेकर उनकी सोच पहले से बदली है. सिवान के रवि कुमार सऊदी अरब में नौ साल रहे. अभी वह सिवान में अपना घर बनवा रहे हैं.

रवि कहते हैं, "सऊदी अरब जाने से पहले मुसलमानों को लेकर जो सोचता था, उसमें मोहब्बत न के बराबर थी. उनके बारे में कई तरह की धारणाएँ थीं, जो कि सऊदी अरब जाकर बदल गईं. सऊदी अरब भले इस्लामिक देश है लेकिन भारत के मुसलमानों को इसका अलग से कोई फ़ायदा नहीं मिलता है. हिन्दुओं के साथ भी वहाँ कोई भेदभाव नहीं होता है. भारत आते ही ऐसा लगता है कि हम अब भी हिन्दू-मुसलमान में उलझे हुए हैं."

रवि कुमार

इमेज स्रोत, bbc

इमेज कैप्शन, सिवान के रवि कुमार सऊदी अरब में कई वर्षों से काम कर रहे हैं

अब्दुल बारी सिद्दीक़ी राष्ट्रीय जनता दल के पुराने और क़द्दावर नेता माने जाते हैं. सिद्दीक़ी से पूछा कि गल्फ़ में जाने वाले हिंदुओं के मन में मुसलमानों को लेकर बदलती सोच को वो कैसे देखते हैं?

सिद्दीक़ी कहते हैं, "पिछले कुछ सालों से मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत का नशा चढ़ा है लेकिन यह बहुसंख्यक हिंदुओं में नहीं है. मेरा मानना है कि बहुसंख्यक हिंदू अब भी एक समावेशी समाज की वकालत करते हैं. गल्फ़ में जाने के बाद हिंदू देखते होंगे कि इस्लाम से नफ़रत जिस आधार पर भारत में वो करते हैं, उसका कोई ठोस आधार नहीं है. धारणाएँ तो मेलजोल से ही बदलती हैं."

सिद्दीक़ी कहते हैं, “मैंने कायस्थ परिवार में पली-बढ़ी लड़की से शादी की. इस शादी को कराने और जमाने में हिंदुओं ने ही मदद की. तब कर्पूरी ठाकुर बिहार के मुख्यमंत्री थे और उन्होंने तो अपने घर में कई दिनों तक रखा. अब की राजनीति में नफ़रत को ज़्यादा जगह मिल रही है लेकिन नफ़रत की भी एक उम्र होती है."

बिहार से बढ़ा गल्फ़ में पलायन

बिहार से पलायन
इमेज कैप्शन, पटना में क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी ताविशी बहल पांडे

पिछले कुछ सालों में गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल (जीसीसी) के छह सदस्य देशों- सऊदी अरब, यूएई, कुवैत, बहरीन, ओमान और क़तर में भारत के प्रवासी श्रमिकों के आने का ट्रेंड पूरी तरह से बदल गया है.

यूएई में हुई एक स्टडी के मुताबिक़, पहले केरल से इन देशों में ब्लू कॉलर कामगार बड़ी संख्या में जाते थे लेकिन इसमें 90 फ़ीसदी की गिरावट आई है और इसकी भरपाई यूपी-बिहार के कामगार कर रहे हैं.

2023 के पहले सात महीनों में जीसीसी देशों में जाने वाले भारतीय मज़दूरों की तादाद 50 प्रतिशत बढ़ी है और इसमें सबसे ज़्यादा यूपी-बिहार के हैं.

ताविशी बहल पांडे कहती हैं, "क्षेत्रीय कार्यालय पटना की ओर से हर साल लगभग तीन से चार लाख पासपोर्ट जारी किए जाते हैं. ज़्यादातर लोगों ने पासपोर्ट खाड़ी के इस्लामिक देशों में काम करने के लिए बनवाए हैं. बिहार से खाड़ी जाने का ट्रेंड बढ़ा है. पहले यह पलायन देश के भीतर ज़्यादा था. बिहार के सिवान और गोपालगंज से गल्फ़ में सबसे ज़्यादा लोग रहते हैं और रेमिटेंस में भी इन दोनों ज़िलों का सबसे बड़ा योगदान है."

खाड़ी के इस्लामिक देशों में क़रीब 90 लाख भारतीय रहते हैं. सबसे ज़्यादा यूएई में 34 लाख और उसके बाद सऊदी अरब में 26 लाख भारतीय रहते हैं. 2023 में भारतीयों ने विदेशों से कमाकर भारत 125 अरब डॉलर भेजा था. इसमें सबसे ज़्यादा हिस्सेदारी गल्फ़ में रहने वाले भारतीयों की थी. 125 अरब डॉलर में केवल यूएई में रहने वाले भारतीयों की हिस्सेदारी 18 फ़ीसदी है.

पटना के क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय के बाहर हर दिन सैकड़ों की संख्या में लोग लाइन में लगे रहते हैं. इनमें से ज़्यादातर युवा हैं. इन युवाओं से बात कीजिए तो बिहार को लेकर नाउम्मीदी से भरे दिखते हैं. ये युवा या तो ग्रैजुएट हैं या 12वीं पास. ऐसा लगता है कि गल्फ़ जाने के लिए भारत के मुसलमान ज़्यादा उत्साहित रहते हैं लेकिन यह सच नहीं है.

गल्फ़ ही विकल्प

सऊदी अरब
इमेज कैप्शन, पटना का क्षेत्रीय पासपोर्ट ऑफिस

पासपोर्ट ऑफिस के बाहर लगी लाइनों से साफ़ होता है कि मुसलमानों से ज़्यादा हिंदू गल्फ़ में रोज़गार के लिए रुख़ कर रहे हैं.

आरा के अमन तिवारी ओमान जाने के लिए पासपोर्ट बनवाने आए हैं. वह 12वीं पास हैं. उनसे पूछा कि क्या भारत में रोज़गार मिलना मुश्किल है?

अमन तिवारी इस सवाल के जवाब में कहते हैं, "ओमान जाकर भी मज़दूरी ही करनी है लेकिन वहाँ इसके ठीक-ठाक पैसे मिल जाएँगे. भारत में इसी काम के लिए कम पैसे मिलेंगे और रहने ख़ाने का भी कोई ठिकाना नहीं होगा.''

''भारत में अगर 20 हज़ार रुपए हर महीने घर भेजना है तो कम-से-कम 30 हज़ार रुपए सैलरी होनी चाहिए. दिल्ली-मुंबई में तो 30 हज़ार सैलरी होने के बावजूद 10 हज़ार बचाना मुश्किल है. भारत में निजी सेक्टर में काम करने वाले किसी भी मज़दूर की सैलरी 30 हज़ार नहीं है. यही वजह है कि हम अपने बुजु़र्ग माँ-बाप को छोड़ दूसरे मुल्क में भी जाने के लिए तैयार हैं."

अमन के साथी सरोज पांडे कहते हैं कि बिहार में नीतीश कुमार 20 साल से जमे हैं लेकिन शिक्षा और रोज़गार की हालत पहले से भी ज़्यादा ख़राब हुई है. सरोज कहते हैं, "पहले खेती से काम चल जाता था लेकिन अब खेती घाटे का कारोबार है."

धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति का असर

यूएई
इमेज कैप्शन, यूएई के शारजाह में ममज़ार बीच पर छठ पर्व मनाते बिहार के हिन्दू

बिहार के जाने-माने इतिहासकार इम्तियाज़ अहमद कहते हैं, “गल्फ़ में रहने वाले भारतीय भारत के भीतर जारी नफ़रत और हिंसा से ख़ुश तो नहीं ही होते होंगे. अरब में ये आपस में मिलकर रहते हैं क्योंकि अरबी लोग इन्हें मज़दूर से ज़्यादा नहीं समझते हैं, वो चाहे भारत के मुसलमान हों या हिंदू. ऐसे में भारतीय आपस में मिलकर रहते हैं ताकि वहाँ सुख-दुख में एक दूसरे के साथ खड़े रहें.’’

‘’ये ज़रूर है कि भारत में धर्म के आधार पर हिंसा या नफ़रत होती है तो ख़बरें दुनिया के हर कोने में जाती हैं. इससे भारत की छवि न केवल अरब शासकों के बीच ख़राब होती है बल्कि आम लोगों के बीच भी ठीक संदेश नहीं जाता है."

रामेश्वर साव से पूछा कि सऊदी अरब में रहते हुए क्या कभी हमवतन मुसलमानों से भारत की राजनीति पर बहस हुई?

रामेश्वर साव बताते हैं, "भारत के मुसलमान बीजेपी को पसंद नहीं करते हैं. गल्फ़ में रहने वाले भारतीय मुसलमान भी बीजेपी को लेकर निराश रहते हैं और आलोचना करते हैं. मुझे लगता है कि उन्हें विदेशों में अपने देश की बुराई नहीं करनी चाहिए. पाकिस्तान के मुसलमान ऐसा नहीं करते हैं."

लेकिन बीजेपी की आलोचना देश की बुराई कैसे हो गई? इसके जवाब में रामेश्वर कहते हैं, "बीजेपी भारत की ही पार्टी है. सरकार में वही है. ऐसे में देश और पार्टी को अलग-अलग नहीं देख सकते."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)