भारत में दुनिया की इतनी बड़ी मुस्लिम आबादी फिर भी OIC का सदस्य क्यों नहीं?

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    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मुस्लिम आबादी के लिहाज से भारत, इंडोनेशिया और पाकिस्तान के साथ शीर्ष तीन देशों में है. प्यू रिसर्च के अनुसार, मुसलमानों की आबादी 2060 में सबसे ज़्यादा भारत में होगी और दूसरे नंबर पर पाकिस्तान होगा.

ओआईसी इस्लामिक या मुस्लिम बहुल देशों का संगठन है. इसके कुल 57 देश सदस्य हैं. ओआईसी में सऊदी अरब का दबदबा है, लेकिन सऊदी अरब दुनिया के उन टॉप 10 देशों में भी शामिल नहीं है, जहाँ मुस्लिम आबादी सबसे ज़्यादा है. हालांकि इस्लाम के लिहाज से मक्का और मदीना के कारण सऊदी अरब काफ़ी अहम है.

भारत मुस्लिम आबादी के लिहाज से शीर्ष तीन देशों में होने के बावजूद ओआईसी का सदस्य नहीं है. 2006 में 24 जनवरी को सऊदी अरब के किंग अब्दुल्लाह बिन अब्दुल अज़ीज़ भारत के दौरे पर आए थे.

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पाकिस्तान का पेच

इस दौरे में उन्होंने कहा था कि भारत को ओआईसी में पर्यवेक्षक का दर्जा मिलना चाहिए. सऊदी के किंग ने कहा था कि यह अच्छा होगा कि भारत के लिए यह प्रस्ताव पाकिस्तान पेश करे.

हालांकि पाकिस्तान ने इस पर आपत्ति जताई थी और कहा था कि जो भी देश ओआईसी में पर्यवेक्षक का दर्जा चाहता है, उसे ओआईसी के किसी भी सदस्य देश के साथ किसी भी तरह के विवाद में संलिप्त नहीं होना चाहिए.

यरुशलम की अल-अक़्सा मस्जिद पर मोरक्को की राजधानी रबात में 1969 में आयोजित इस्लामिक समिट कॉन्फ़्रेंस के बाद से ही ओआईसी और भारत रिश्तों में उलझन रही है. सऊदी अरब के किंग फ़ैसल ने इस कॉन्फ्रेंस में भारत को आमंत्रित किया था. उनका कहना था कि यहां मुस्लिम देशों का मामला नहीं है बल्कि सभी मुसलमानों का मामला है. तब भारत के राष्ट्रपति ज़ाकिर हुसैन थे.

तब भारतीय प्रतिनिधिमंडल ने समिट को संबोधित भी किया था. लेकिन पाकिस्तान को यह ठीक नहीं लगा था और उसने समिट के बाक़ी सत्रों से भारत को बाहर करवा दिया था. पाकिस्तान के राष्ट्रपति जनरल याह्या ख़ान ने भारत का बहिष्कार किया था.

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रिश्तों में नहीं रही है मधुरता

उसके बाद से ओआईसी और भारत के रिश्तों में बहुत मधुरता नहीं रही है. कश्मीर मुद्दे पर ओआईसी पाकिस्तान की लाइन के क़रीब बयान देता है और यह भारत के लिए कभी स्वीकार्य नहीं रहा है. ओआईसी कहता है कि संयुक्त राष्ट्र के 1948 और 1949 के प्रस्ताव के हिसाब से कश्मीरियों को आत्मनिर्णय का अधिकार मिलना चाहिए.

ओआईसी चार्टर के अनुसार, इस संगठन के लक्ष्यों को बढ़ावा देने के इच्छुक मुस्लिम देश ही सदस्यता के योग्य हैं. लेकिन ग़ैर-मुस्लिम देशों को ओआईसी में पर्यवेक्षक का दर्जा मिला है और कुछ को पूरी सदस्यता भी है. 2005 में रूस ऑब्ज़र्वर के तौर पर शामिल हुआ. 1998 में थाईलैंड को भी पर्यवेक्षक का दर्जा मिला, जबकि वह बौद्ध बहुल देश है.

खाड़ी के कई देशों में भारत के राजदूत रहे तलमीज़ अहमद ने बीबीसी हिन्दी से कहा, ''सदस्य और ऑब्ज़र्वर बनाने के मामले में ओआईसी अपने चार्टर को कोने में रखता है. चार्टर में तो कहा गया है कि संवैधानिक रूप से इस्लामिक देश होना चाहिए, लेकिन तुर्की संवैधानिक रूप से इस्लामिक नहीं सेक्युलर देश है और वह ओआईसी का मेंबर है. यहाँ तक कि तुर्की के एक राजनयिक ओआईसी के महासचिव भी बने. अफ़्रीका के कई देश तो मुस्लिम बहुल भी नहीं हैं लेकिन ये ओआईसी के सदस्य हैं.''

भारत के पूर्व राजनयिक और पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने 2006 में कहा था कि भारत ओआईसी का केवल पर्यवेक्षक नहीं बल्कि सदस्य बनने की पात्रता रखता है. उन्होंने कहा था, ''मुस्लिम बहुल देश होना कोई शर्त नहीं हो सकती. भारत में इंडोनेशिया के बाद सबसे ज़्यादा मुसलमान हैं.'' हालांकि 2016 में हामिद अंसारी ने कहा था कि ओआईसी अपनी प्रासंगिकता खो चुका है.

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तलमीज़ अहमद कहते हैं कि जब वो सऊदी में भारत के राजदूत थे तो विदेश मंत्री जसवंत सिंह थे और उनका साफ़ निर्देश था कि ओआईसी की किसी टिप्पणी का जवाब तक नहीं देना है.

अहमद कहते हैं, ''जसवंत सिंह की यह नीति बिल्कुल सही थी. हम अपने आंतरिक मामलों में ओआईसी की टिप्पणी का जवाब देते हैं तो उसकी अहमियत बढ़ाते हैं. ओआईसी एक बेकार का संगठन है और उसे तवज्जो नहीं देनी चाहिए.''

तलमीज़ अहमद कहते हैं, ''भारत के ख़िलाफ़ बयान पाकिस्तान तैयार करता है और सऊदी के समर्थन के कारण उसे ये आज़ादी मिली हुई है. ओआईसी में पाकिस्तान का एजेंडा चल जाता है. भारत की एक हैसियत है और उसे ओआईसी के मंच से पाकिस्तान से हुज्जत करने की ज़रूरत नहीं है. ओआईसी के बयान को लेकर हमलोग सऊदी से शिकायत करते थे तो सऊदी साफ़ कहता था कि ओआईसी के बयान पर मत जाइए क्योंकि यह हमारी राष्ट्रीय नीति नहीं है.''

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OIC और मोदी सरकार

तलमीज़ अहमद को लगता है कि मोदी सरकार ओआईसी को जवाब देकर अपनी घरेलू सांप्रदायिक राजनीति को खाद पानी दे रही है.

अमहद कहते हैं, ''इन्हें देश के भीतर दिखाना है कि देखो सारे मुस्लिम देश ख़िलाफ़ हैं और हमने मुँहतोड़ जवाब दे दिया है. ये जब जवाब देते हैं तो देश के भीतर सुना जाता है. यह उनके सांप्रदायिक एजेंडे का हिस्सा है. ओआईसी के किसी बयान को तवज्जो नहीं देनी चाहिए. जसवंत सिंह ने हमें निर्देश दिया था कि ओआईसी जब भी आंतरिक मामलों पर टिप्पणी करे तो कोई जवाब नहीं देना है. दरअसल, मोदी सरकार की नीतियों में विरोधाभास है.''

अहमद कहते हैं, ''भारत से जुड़ा बयान पाकिस्तान बनाता है. इसे लेकर कोई बैठक नहीं होती है. शुरू में हमको नागवरा गुज़रता था कि लेकिन जसवंत सिंह ने मना कर दिया था. इंडिया का यह जवाब होता था कि यह आंतरिक मामला है और भारत इस पर कोई टिप्पणी नहीं करेगा. ओआईसी के सदस्य देश यही कहते थे कि यह उनकी राष्ट्रीय नीति नहीं है. ओआईसी एक कम्युनल ऑर्गेनाइज़ेशन है. हम क्यों ऑब्ज़र्वर स्टेटस चाहेंगे.''

14 फ़रवरी को ओआईसी ने भारत में हिजाब विवाद और हरिद्वार की कथित धर्म संसद को लेकर टिप्पणी की. भारत के विदेश मंत्रालय ने 15 फ़रवरी को इसका जवाब दिया. भारत के विदेश मंत्रालय ने कहा कि ओआईसी अपनी प्रतिष्ठा को नुक़सान पहुँचा रहा है.

तलमीज़ अहमद कहते हैं कि भारत किस प्रतिष्ठा की बात कर रहा है. वह कहते हैं, ओआईसी की कभी कोई प्रतिष्ठा नहीं रही है. पाकिस्तान को छोड़ दें तो ओआईसी के सारे सदस्य देशों से भारत के अच्छे संबंध हैं.

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ओआईसी का बयान और भारत का जवाब

भारत में हिजाब विवाद और धर्म संसद पर इस्लामिक देशों के संगठन ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन यानी ओआईसी के महासचिव की ओर से 14 फ़रवरी को जारी बयान में कहा गया था, ''भारत के हरिद्वार में हिन्दुत्व के झंडाबरदारों की ओर से मुसलमानों के जनसंहार की अपील और सोशल मीडिया पर मुस्लिम महिलाओं के उत्पीड़न दुखद है.''

ओआईसी ने कहा, ''कर्नाटक में मुस्लिम महिलाओं के हिजाब पहनने पर प्रतिबंध भी चिंताजनक है. हम इन मामलों में अंतरराष्ट्रीय समुदाय ख़ास कर संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार परिषद से ज़रूरी क़दम उठाने की अपील करते हैं.''

इसके जवाब में भारत के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अरिंदम बागची ने 16 फ़रवरी को कहा था, ''हमने भारत से संबंधित मामलों पर ऑर्गेनाइज़ेशन ऑफ़ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआईसी) के महासचिव की ओर से एक और प्रेरित और भ्रामक बयान देखा है.''

''भारत में अलग-अलग मुद्दों को संवैधानिक ढांचे एवं तंत्र और लोकतांत्रिक लोकाचार एवं राजव्यवस्था के आधार पर देखा जाता है. ओआईसी पर निहित स्वार्थ समूहों का क़ब्ज़ा बना हुआ है जो भारत के ख़िलाफ़ अपने नापाक दुष्प्रचार को जारी रखे हुए हैं और इस वजह से ओआईसी ने सिर्फ़ अपनी ही प्रतिष्ठा को ठेस पहुंचाई है.''

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