इसराइल-हमास युद्धः ईरान की तुरंत क़दम उठाने की चेतावनी में कितना दम

ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई

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इमेज कैप्शन, ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई
    • Author, दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

इसराइल के ग़ज़ा में किसी भी वक़्त ज़मीनी अभियान शुरू करने की आशंका के बीच ईरान ने चेतावनी दी है कि वो ‘अहतियातन’ क़दम उठा सकता है.

ईरान समर्थित लेबनानी चरमपंथी समूह हिज़बुल्लाह और इसराइली सेना के बीच इसराइल सीमा पर रह-रहकर गोलीबारी भी हो रही है.

ईरान के विदेश मंत्री अमीर अब्दुल्लाहियान ने सोमवार रात दिए एक साक्षात्कार में कहा है अगले कुछ घंटों में ‘इसराइल के विरोधियों की तरफ़ से अहतियाती क़दम’ उठाये जा सकते हैं.

ईरानी विदेश मंत्री के इस बयान को इसराइल को लेकर अब तक का सबसे सख़्त बयान माना जा रहा है.

इसराइली सैनिक

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इमेज कैप्शन, लेबनान की सीमा पर एक अज्ञात स्थान पर मार्च करते इसराइल के सैनिक

वहीं इसराइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने संसद में बोलते हुए ईरान और हिज़बुल्लाह को चेतावनी दी है.

उन्होंने हिज़बुल्लाह और उसके समर्थक ईरान को चेताते हुए कहा, “हमारी परीक्षा ना लें, आपको बहुत गंभीर चोट पहुंचेगी.”

ईरान की सरकारी समाचार सेवा प्रेस टीवी के मुताबिक़ ईरान के सर्वोच्च धर्मगुरु अयातुल्लाह अली ख़ामेनेई ने कहा है कि अगर इसराइल के हमले जारी रहे तो मुसलमानों को कोई नहीं रोक पाएगा.

ख़ामेनेई ने कहा, "अगर ये अपराध जारी रहे, तो मुसलमान और विद्रोही बल बेचैन हो जाएंगे और फिर उन्हें कोई भी रोक नहीं पाएगा."

ख़ामेनेई ने कहा, "ये एक तथ्य है कि इसराइल कुछ भी करे, वो उस निंदनीय विफलता की भरपाई नहीं कर पाएगा जो उसे झेलनी पड़ी है."

वहीं ईरानी विदेश मंत्री ने कहा है कि हिज़बुल्लाह इसराइल के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल सकता है.

नेतन्याहू का बयान

अमीर अब्दुल्लाहियान ने कहा, “हिज़बुल्लाह के लिए सभी संभावित विकल्प और परिदृश्य मौजूद हैं. उनकी गणना में हर स्थिति को सहीं से आंका गया है और विरोध के नेता यहूदी सत्ता (इसराइल) को क्षेत्र में कोई क़दम नहीं उठाने देंगे. अगले कुछ घंटों में विरोध की तरफ़ से संभावित अहतियाती क़दम उठाये जा सकते हैं.”

उनका इशारा लेबनान की तरफ़ से इसराइल-ग़ज़ा संघर्ष में एक नया मोर्चा खोलने की ओर था.

ईरानी विदेश मंत्री

उन्होंने ये भी कहा कि विरोध (हिज़बुल्लाह) के सभी नेताओं का ये मानना है कि ग़ज़ा संकट का अगर कोई राजनीतिक समाधान निकलता है तो वो इसे मौक़ा देंगे लेकिन, ‘अगर यहूदी सत्ता नागरिकों के ख़िलाफ़ युद्ध अपराध जारी रखेगी तो कोई भी क़दम उठाया जा सकता है.’

ईरान की सरकारी समाचार सेवा आईआरएनए के मुताबिक़, ईरानी विदेश मंत्री ने कहा कि ‘विरोध फ्रंट के पास दुश्मन से लंबा युद्ध लड़ने की क्षमता है और अगर जारी संघर्ष और फैलता है तो इससे इसराइल का नक़्शा बदल जाएगा.’

ईरान के विदेश मंत्री

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इमेज कैप्शन, शनिवार को लेबनान की राजधानी बेरूत में प्रेस वार्ता के दौरान ईरान के विदेश मंत्री हुसैन अमीर अब्दुल्लाहियन ने कहा कि इसराइल को 'बड़े भूकंप' का सामना करना होगा.

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ईरानी विदेश मंत्री ने पिछले सप्ताह के दौरान मध्य पूर्व के कई देशों में नेताओं और राजनयिकों से मुलाक़ात की है. इसका हवाला देते हुए उन्होंने कहा है कि अगर ‘युद्ध रोकने के लिए संयुक्त राष्ट्र के पास जो सीमित विकल्प मौजूद हैं उनका इस्तेमाल नहीं किया गया तो इसराइल के ख़िलाफ़ एक नया मोर्चा खोला जाना अपरिहार्य है.’

अमीर अब्दुल्लाहियान ने कहा, “अगर हम आज ग़ज़ा की रक्षा नहीं करेंगे, तो हम कल अपने देश के बच्चों के अस्पतालों को इन फॉसफोरस बमों से बचाना पड़ेगा.”

सोमवार को ही ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने कहा था कि ग़ज़ा संकट का राजनीतिक समाधान निकालने के लिए वक़्त बीतता जा रहा है. रईसी ने भी चेतावनी देते हुए कहा है कि इसराइल-हमास संघर्ष क्षेत्र में अन्य इलाक़ों में भी फैल सकता है.

इसराइल-हमास संघर्ष के बीच लेबनान की तरफ़ से इसराइल पर हमले और इसराइल की जवाबी बमबारी भी जारी है.

मंगलवार को भी हिज़बुल्लाह ने एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल इसराइल की तरफ़ दाग़ी. इसराइली मीडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ इस हमले में तीन इसराइली घायल हुए हैं.

आईडीएफ़ ने लेबनान में हिज़बुल्लाह के ठिकानों पर हमले के कई वीडियो भी जारी किए हैं.

आईडीएफ़ अब ग़ज़ा में अपने अभियान के अगले चरण की तैयारी कर रहा है. इसराइली सेना ग़ज़ा पर हमला कभी भी शुरू कर सकती है.

वीडियो कैप्शन, COVER STORY: मिस्त्र की सीमा पर फ़ंसे गज़ा छोड़ने की कोशिश कर रहे हज़ारों लोग

7 अक्तूबर को ग़ज़ा पर शासन करने वाले फ़लस्तीनी चरमपंथी समूह हमास ने इसराइल पर अचानक बड़ा हमला किया था. इसमें 1400 से अधिक इसराइली नागरिक मारे गए थे.

इसके जवाब में इसराइल ने ग़ज़ा पर भारी बमबारी की है और ज़मीनी हमले के लिए ग़ज़ा की घेराबंदी की है. इसराइल के हवाई हमले अभी भी जारी है. अब तक ग़ज़ा में 2700 से अधिक फ़लस्तीनी मारे गए हैं और दस हज़ार से अधिक घायल हैं.

दस दिनों से इसराइली घेराबंदी की वजह से ग़ज़ा में पीने के पानी, खाद्य सामग्री और दवाइयों की किल्लत है जिससे मानवीय संकट पैदा होने का ख़तरा है. इसराइल ने उत्तरी ग़ज़ा से दस लाख से अधिक फ़लस्तीनियों को दक्षिण की तरफ़ जाने के लिए कहा है.

वीडियो कैप्शन, इसराइल-हमास संघर्ष: ग़ज़ा छोड़कर जा रहे लोगों के क़ाफ़िले पर हमला

ईरान पहले भी दे चुका है चेतावनी

इसराइल-हमास संघर्ष शुरू होने के बाद से ही ईरान खुलकर हमास का समर्थन कर रहा है. ईरानी विदेश मंत्री ने सीरिया, इराक़, लेबनान और क़तर का दौरा किया है और यहां शीर्ष नेताओं से मुलाक़ात की है.

हमास के इसराइल पर हमले के पीछे ईरान के हाथ को लेकर सवाल उठते रहे हैं. हमास ने ऐसे कई वीडियो जारी किए हैं जिनमें ईरानी हथियार दिख रहे हैं. वहीं हमास के नेताओं ने हमले के बाद अपने बयानों में कहा है कि उन्हें ईरान का समर्थन प्राप्त है.

पश्चिमी मीडिया की रिपोर्टों में दावा किया गया था कि हमले से पहले हमास ने इस बारे में ईरान को जानकारी दी थी. हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने सीबीएस को दिए एक साक्षात्कार में कहा है कि ‘उनके पास इस बात के ठोस सबूत नहीं है कि हमास के हमले में ईरान का हाथ है.’

ग़ज़ा पर बमबारी

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इमेज कैप्शन, इसराइल 7 अक्तूबर के हमले के बाद से ग़ज़ा पर लगातार बमबारी कर रहा है. अब तक यहां 2700 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं.

हमास के साथ खड़ा है ईरान

विश्लेषक मानते हैं कि भले ही ईरान ने ये हमला निर्देशित ना किया हो लेकिन हमास के लड़ाकों के प्रशिक्षण, उन्हें हथियार देने और हमले से पहले समर्थन देने में ईरान की अहम भूमिका है.

वैश्विक सुरक्षा मामलों पर केंद्रित थिंक टैंक आईटीएसएस वेरोना में सुरक्षा विशेषक ओमरी ब्रिनर कहते हैं, “इसमें कोई शक नहीं है कि ईरान ने हमास को हथियार दिए और उसके लड़ाकों को प्रशिक्षित किया. इसके समर्थन में ठोस सबूत और बयान हैं. बहुत संभव है कि ईरान ने ऐसे हमले के लिए हमास को मंजूरी दी हो. पिछले कुछ सालों में हमास और ईरान के संबंध मज़बूत हुए हैं. जिस समय ये हमला हुआ है उसमें भी ईरान की भूमिका नज़र आती है.”

हमास का ये हमला ऐसे समय में हुआ है जब सऊदी अरब और इसराइल के बीच संबंध सामान्य करने के लिए अमेरिका की मध्यस्थता में प्रयास किए जा रहे थे.

ब्रिमर कहते हैं, “इसका मतलब ये है कि ईरान के तीन सबसे बड़े दुश्मन- इसराइल, अमेरिका और सऊदी एक साथ आ रहे थे. इस वार्ता में इसराइल और फ़लस्तीन के मुद्दे पर भी चर्चा हो रही थी. ज़ाहिर है ईरान इससे बहुत ख़ुश नहीं था. ये कहना ग़लत नहीं होगा कि इस वार्ता को पटरी से उतारने के लिए और इसराइल के फ़लस्तीनियों को भविष्य में कुछ देने की संभावनाओं को ख़त्म करने के लिए ऐसा किया गया हो. सऊदी अरब फ़लस्तीनियों के लिए कुछ सुनिश्चित किए बिना शायद ही संबंध बहाली के समझौते को मंज़ूरी देता.”

ईरान के सर्वोच्च नेता अयोतोल्लाह खमेनई का पोस्टर

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क्या सीधे युद्ध में शामिल होगा ईरान?

ईरान ने इसराइल को ग़ज़ा में ना घुसने की चेतावनी दी है. लेकिन सवाल ये है कि ईरान किस हद तक इस युद्ध में शामिल होगा?

इसराइल की तेल अवीव यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर नेशनल सिक्यूरिटी स्टडीज़ से जुड़े राज़ ज़िम्मित ने लिखा है, “ऐसा लगता है कि इस स्थिति में, ईरान की हिज़बुल्लाह के साथ पूरी तरह युद्ध में कूद जाने में कोई दिलचस्पी नहीं है. इसकी एक वजह ये है कि यदि हिज़बुल्लाह युद्ध में शामिल होता है तो उसे भारी क़ीमत चुकानी होगी. हिज़बुल्लाह इस क्षेत्र में ईरान का ‘स्ट्रेटेजिक एसेट’ है.’ हालांकि अगर इसराइल ज़मीनी हमला करता है जिससे हमास के अस्तित्व पर ही ख़तरा हो जाएगा या ग़ज़ा पट्टी पर उसका प्रभावी नियंत्रण ख़त्म हो जाएगा, तो ईरान एक अन्य सक्रिय मोर्चा खोलने के बारे में सोच सकता है.”

अमेरिका खुलकर इसराइल के समर्थन में है. अमेरिका ने अपने दो विमानवाहक पोतों के साथ जंगी बेड़े मध्य पूर्व में भेजे हैं. यही नहीं दो हज़ार अमेरिकी सैनिक भी इसराइल के अभियान में मदद करने के लिए पहुंच रहे हैं. अमेरिकी विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन इसराइल के दौरे कर चुके हैं. बुधवार को अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन भी इसराइल पहुंचेंगे.

ज़िम्मित के मुताबिक़, “अमेरिका के सैन्य हस्तक्षेप और इससे ईरान को राजनीतिक और सैन्य नुक़सान उठाने की संभावना भी ईरान को सीधे दख़ल देने से रोक सकती है.”

इसराइल ने अभी तक अपना ज़मीनी हमला शुरू नहीं किया है और ईरान की आगे की प्रतिक्रिया इस पर निर्भर कर सकती है.

ओमरी मानते हैं कि ईरान की चेतावनी के बावजूद इसराइल को ग़ज़ा पर ज़मीनी हमला करना ही होगा क्योंकि हवाई हमलों के दम पर वह हमास को ग़ज़ा से ख़त्म नहीं कर सकता है.

वीडियो कैप्शन, ग़ज़ा की सीमा पर घूम रहे इसराइली टैंक, नेतन्याहू क्या बोले

ओमरी कहते हैं, “अगर नेतन्याहू ज़मीनी हमले का आदेश नहीं देते हैं तो इसराइल में वो अपनी बची-कुची साख भी गंवा सकते हैं. हालांकि अभी ऐसा नहीं लगता कि सिर्फ़ ज़मीनी हमले की वजह से ईरान सीधे इसराइल पर कोई कार्रवाई कर सकता है. ये उसकी भूल होगी. हालांकि अगर ईरान के स्ट्रेटेजिक एसेट्स जैसे हिज़बुल्लाह या उसके परमाणु कार्यक्रम या उसके राजनीतिक नेतृत्व या सैन्य संगठन आईआरजीसी (रिवोल्यूशनरी गार्ड) पर सीधा हमला हुआ तब ही ईरान सीधे युद्ध में शामिल होगा.”

हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि भले ही ईरान युद्ध में ख़ुद सीधे तौर पर शामिल ना हो लेकिन हिज़बुल्लाह इसराइल को परेशान करना जारी रखेगा.

ओमरी कहते हैं, “अगर इसराइल ने हिज़बुल्लाह के ख़िलाफ़ आक्रामक कार्रवाई की तब भी ईरान इस संघर्ष में आ सकता है.”

इसराइल-हमास संघर्ष शुरू होने के बाद से अरब जगत में भी गतिविधियां बढ़ी हैं. फ़लस्तीनियों के समर्थन में कई शहरों में प्रदर्शन हुए हैं.

विश्लेषक मानते हैं कि इसराइल को निशाना बनाने के लिए ईरान साइबर हमले कर सकता है या इसराइल के भीतर रहने वाली अरब मूल की आबादी को इसराइल के ख़िलाफ़ उकसा सकता है, ख़ासकर पूर्वी यरूशलम के लोगों को.

दिल्ली की जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर एके पाशा मानते हैं कि ईरान इस मौके को इस्लामी दुनिया के नेतृत्व पर अपना दावा मज़बूत करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकता है.

हमास

वहीं ओमरी कहते हैं, “ईरान इसराइल के ख़िलाफ़ युद्ध को इस्लाम के ख़िलाफ़ युद्ध की दिशा में मोड़ने की कोशिश कर सकता है और अल-अक़्सा मस्जिद के लिए लड़ाई को मुसलमानों की लड़ाई बनाने का प्रयास कर सकता है.”

विश्लेषक मानते हैं कि हमास-इसराइल युद्ध में अमेरिका की मध्य पूर्व में सैन्य मौजूदगी निर्णायक भूमिका निभा सकती है.

ओमरी कहते हैं, “इसराइल के पास ईरान के परमाणु कार्यक्रम को नुक़सान पहुंचाने की ऐसी क्षमता नहीं है जैसी अमेरिका के पास है. अमेरिका हिज़बुल्ला और ईरान के हितों को भी नुक़सान पहुंचा सकता है. मौजूदा हालात में ना ही हिज़बुल्लाह और ना ही ईरान अमेरिका को निशाना बनना चाहेंगे. इस युद्ध में सीधे शामिल होना अमेरिका के हित में भी नहीं है.”

अमेरिका ने हिज़बुल्लाह और ईरान के ख़िलाफ़ चेतावनी तो दी लेकिन अपनी सैन्य मौजूदगी को बढ़ाने के अलावा अभी तक कोई आक्रामक क़दम नहीं उठाया है.

ओमरी कहते हैं, “ईरान अगर युद्ध में सीधे शामिल होता है तो अमेरिका भी मैदान में उतर सकता है. लेकिन मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा लग रहा है कि इसराइल और हिज़बुल्लाह के बीच छोटी-मोटी झड़पें तो होंगी, लेकिन सीधा टकराव नहीं होगा. ये अलग बात है कि कोई एक पक्ष बड़ी भूल कर दे और फिर हालात और ख़राब हो जाएं. हालांकि इसकी संभावना बहुत कम नज़र आती है.”

वहीं राज़ ज़िम्मित लिखते हैं, “हमारा अनुमान है कि अगर ईरान इसराइल के ख़िलाफ़ एक नया मोर्चा खोल भी देता है तब भी वो सीधे टकराव से बचेगा. ईरान अपने प्रॉक्सी (हिज़बुल्ला और अन्य संगठन) पर ही अधिक निर्भर रहेगा.”

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