ग़ज़ा में गहराया शरणार्थी संकट: दस लाख लोग पहुँचे ख़ान यूनिस, खाने और पानी का गंभीर संकट

ख़ान यूनिस

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इमेज कैप्शन, लोगों को जहाँ जगह मिल रही है वहीं बैठने को मजबूर हैं.
    • Author, रुश्दी अबू अलूफ़
    • पदनाम, ख़ान यूनिस, ग़ज़ा से

ग़ज़ा पट्टी के ख़ान यूनिस इलाक़े में मानों लोगों का सैलाब आ गया है.

लाख़ों लोग ग़ज़ा पट्टी के उत्तर से जान बचाकर यहां पहुँच रहे हैं. लोग जो कुछ सामान उठा पाए उसके साथ लंबी पैदल यात्रा कर यहां पहुंचे हैं.

इन सब के पास कोई विकल्प नहीं था.

लेकिन ख़ान यूनिस क़स्बे के पास ग़ज़ा शहर से आ रहे, अपनी ख़ुद की आबादी से दोगुने लोगों के लिए कुछ ख़ास इंतज़ाम नहीं हैं.

शहर की हर गली, हर मोहल्ला और हर सड़क पुरुषों, औरतों और बच्चें से अटे पड़े हैं.

और लोगों के पास यहां से कहीं और जाने की कोई दूसरी जगह नहीं है.

हमास का कहना है कि उत्तरी ग़ज़ा में रहने वाले 11 लाख लोगों में से 4 लाख सलाह अल-दीन सड़क के रास्ते दक्षिण की ओर रवाना हुए हैं.

इसराइल ने आम लोगों को 24 घंटे के भीतर ग़ज़ा शहर को खाली करने की चेतावनी दी थी.

मैं दो दिन का भोजन लेकर, अपनी पत्नी और तीन बच्चों के साथ इसी बड़े से काफ़िले का हिस्सा था.

इसराइल-हमास

सात अक्तूबर को हमास के हमले में 1400 इसराइली मारे गए थे. उसके बाद इसराइल ने लोगों से ग़ज़ा शहर खाली करने को कहा था. हमास ने लोंगों से कहा था कि वो हरगिज़ शहर न छोड़ें लेकिन इसराइली बमों और हमले का डर ऐसा था कि लाखों लोगों ने ग़ज़ा पट्टी के दक्षिणी हिस्से का रुख़ किया .

लेकिन ज़मीन की पतली पट्टी जिसे चारों तरफ़ से इसराइल ने घेर रखा है, से निकलना सुरक्षा की गारंटी तो कतई नहीं है.

किसी को नहीं मालूम आगे क्या होने वाला है. लाखों ग़ज़ा निवासी ख़ान यूनिस में पहुँच रहे हैं.

ख़ान यूनिस की आबादी क़रीब 4 लाख है. लेकिन रातों-रात यहां 6 लाख लोग और पहुँच गए हैं.

इन 6 लाख लोगों में हर एक को सिर ढंकने के लिए घर और पेट भरने को खाना चाहिए.

सब कुछ तहस नहस

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इमेज कैप्शन, ख़ान यूनिस में खाने और पानी की भारी क़िल्लत है. यहां लोग पानी की क़तार में लगे हुए हैं.
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समाप्त

ख़ान यूनिस में संसाधन बहुत ही सीमित हैं. और जो हैं वो तेज़ी से ख़त्म हो रहे हैं. शहर की आबादी करीब चार लाख थी जो ग़ज़ा से आने वाले लोगों को जोड़कर रातोंरात दस लाख से भी अधिक हो गई है.

ये शहर पहले ही ग़ज़ा से आने वालों के बोझ से दबा हुआ था लेकिन अब तो लोगों का सैलाब आ गया है.

कुछ भी व्यवस्थित कर पाना नामुमकिन है.

यहां का प्रमुख अस्पताल दवाओं की कमी से जूझ रहा है. अब अस्पताल भी लोगों का इलाज करने के बजाय एक रिफ्यूजी कैंप बन गया है.

डॉक्टर अस्पताल में इलाज की कोशिश कर रहे हैं लेकिन कॉरिडोर शरणार्थियों से अटा पड़ा है. फ़िज़ा में लोगों की चीख़-पुकार गूंज रही है.

आप लोगों को यहां आने के लिए दोषी नहीं ठहरा सकते हैं.

संघर्ष के समय अस्पताल शायद सबसे सुरक्षित स्थान है क्योंकि उसकी सुरक्षा अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत सुनिश्चित है.

ये कह सकते हैं कि अस्पतालों के कॉरिडोर में शरण लिए लोग ख़ुशकिस्मत हैं, कम से कम फ़िलहाल तो ये सही ही है.

डॉक्टरों का कहना है कि उनके पास लोगों को देने के लिए कुछ नहीं है. प्रति व्यक्ति सिर्फ़ 300 मिली लीटर पानी दिया जा रहा है.

और सेहतमंद लोगों को देने के लिए तो बिल्कुल ही कुछ नहीं है.

शहर के बाक़ी हिस्सों में स्थानीय लोग, शरणार्थियों को हर संभव मदद का प्रयास कर रहे हैं. ख़ान यूनिस में पहले ही लोग काफ़ी तंग गलियों में जी रहे थे. अब तो हाल पहले से कहीं बदतर हो गए हैं.

मैंने ऐसे कई अपार्टमेंट्स देखे हैं जहां 50 से 60 लोग रह रहे हैं. इन हालात में लोग अधिक दिन नहीं रह पाएंगे.

मेरा परिवार अब दो कमरे की एक अपार्टमेंट में है. हमारे साथ चार लोग और हैं. मैं ख़ुद को ख़ुशकिस्मत मानता हूं.

शहर के स्कूलों को भी इस संघर्ष में सुरक्षित माना गया है. वहां भी हज़ारों लोग पहुँचे हैं. लेकिन सुरक्षा

का वादा भी वादा ही है.

स्कूल में मौजूद लोगों को तो गिनना भी मुश्किल है.

संयुक्त राष्ट्र की सहायता एजेंसी द्वारा चलाए जा रहे एक स्कूल में हर कमरे ठूंस-ठूंस कर लोगों से भरा हुए .

हर बालकनी, हर खिड़की, हर कोनें पर लोग ही लोग हैं.

माताएं और दादियां बाहर पार्क के बेंचों पर खान बना रही हैं. भूखे बच्चे बेसब्री से पेट भरने का इंतज़ार कर रहे हैं.

लेकिन जब अस्पताल और स्कूल भी भर गए तो लोग सड़कों पर ही बस गए.

गलियां, मोहल्ले, अंडरपास सब भर चुके हैं.

हज़ारों लोग खुले आसमान के नीचे गंदगी और धूल में सो रहे हैं. सब को इंतज़ार है कि दुनिया उनके लिए कुछ बेहतर इंतज़ाम करेगी. ये प्रतीक्षा फ़िलहाल निरर्थक साबित हो रही है.

कोई जगह सुरक्षित नहीं

ख़ान यूनिस

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इमेज कैप्शन, जिस ख़ान यूनिस शहर में लाखों लोग ग़ज़ा से जना बचाकर पहुँच रहे हैं, बमबारी वहाँ भी हो रही है.

और ये भी नहीं है कि ख़ान यूनिस हमलें से सुरक्षित है. यहाँ भी बमबारी होती रही है. ये भी युद्धक्षेत्र है. गिरी हुई इमारतें और मलबे का ढेर इसका सबूत है.

मैंने अस्पताल के पास से हमास द्वार रॉकेट छोड़े जाने की आवाज़ें सुनी हैं. ये बदले की कार्रवाई को खुला न्योता है.

अपने अगले निशाने की तलाश में इसराइल ड्रोन्स की आवाज़ भी आम-सी है.

और तभी एक बम गिरता है. एक इमारत ज़मींदोज़ हो जाती है. अस्पताल और मुर्दाघर फिर भरने लगते हैं.

आज सुबह हमारे फ़्लैट के पास एक बम गिरा. फ़ोन और संपर्क करने के सारे माध्यम बंद हैं इसलिए बम गिरने 20 मिनट बाद ही मैं अपने बेटे से संपर्क कर पाया.

इस तरह भी क्या कोई जी सकता है. और अभी तो इसराइल की ये चढ़ाई शुरू ही हुई है.

मैंने अपने शहर ग़ज़ा में रहते हुए चार युद्ध कवर किए हैं. लेकिन ऐसा पहले कभी नहीं देखा.

पहले की लड़ाइयां जितनी भी क्रूर रही हों पर मैंने कभी किसी भूख और प्यास से मरते हुए नहीं देखा है. अब इसकी पूरी संभावना दिखाई दे रही है.

ग़ज़ा से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है. और वो है मिस्र की सीमा पर स्थित रफ़ाह क्रॉसिंग. लेकिन ये क्रॉसिंग फिलहाल बंद है.

और मिस्र को इस बात का अहसास है कि इसे खोला तो शरणार्थियों का सैलाब आ जाएगा.

रफ़ाह क्रॉसिंग से महज़ 20 किलोमीटर दूर 10 लाख लोग पहुँच चुके हैं. जैसे ही क्रॉसिंग खुलेगा अफरा-तफ़री मच जाएगी.

मैंने वर्ष 2014 में भी ऐसा कुछ देखा था. तब भी ऐसे ही हज़ारों लोगों ने भागने की कोशिश की थी.

लेकिन इस बार हालात बहुत ही खराब हैं.

और मिस्र को इसका अहसास है.

लोगों का हुजूम सीमा पार करेगा और एक और मानवीय संकट का शुरुआत हो जाएगी.

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