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जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव: श्रीनगर में क्या है माहौल
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
इस साल अप्रैल और मई में हुए लोकसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर में क़रीब 58 फ़ीसदी वोटिंग हुई थी, जो एक रिकॉर्ड था.
इस बार एक बड़ा बदलाव ये भी था कि किसी भी राजनीतिक दल ने इन चुनावों का बहिष्कार नहीं किया था.
अब जम्मू-कश्मीर में 10 साल बाद विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं.
भारतीय जनता पार्टी का चुनावी घोषणापत्र जारी करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा, "ये 10 साल (2014-2024) जम्मू-कश्मीर के लिए शांति और विकास के रहे हैं. ये 10 साल मैक्सिमम टेररिज़म की जगह मैक्सिमम टूरिजम पर शिफ़्ट हुए हैं. 10 साल सुख और समृद्धि का रास्ता प्रशस्त करने वाले रहे हैं."
कश्मीर के हालात सुधर गए हैं?
केंद्र सरकार के आँकड़े ये भी बताते हैं कि साल 2020 से लेकर जून 2024 के बीच जम्मू-कश्मीर में छह करोड़ से ज़्यादा सैलानी आए.
सरकार का कहना है कि अनुच्छेद 370 हटने के बाद से पर्यटन के क्षेत्र में पिछले तीन सालों में औसतन 15 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई है.
श्रीनगर में रहने वाले डॉ शेख़ शौक़त हुसैन एक जाने-माने राजनीतिक विशेषज्ञ हैं.
वो कहते हैं, "कुछ बातों से पता चलता है कि हालात सामान्य हुए या नहीं. एक तो हमेशा ये रहा कि हालात सामान्य हो जाएंगे तो कश्मीरी पंडित वापस आएंगे. कितने आ गए ये तो आपको भी मालूम है. कोई नहीं आया.”
डॉ शेख़ कहते हैं, ''ये सही है कि भीड़ वाली हिंसा कम हो गई है लेकिन उधमपुर, कठुआ और डोडा जैसे इलाक़े जो मिलिटेंसी से प्रभावित नहीं थे, वहाँ ऐसी दिक़्क़ते बढ़ी हैं. जो कह रहे हैं कि हालात बहुत अच्छे हो गए, उनको ख़ुद उस बात पर यक़ीन होता तो लोकसभाल चुनाव में वो ख़ुद यहाँ से लड़ते. उन्होंने नहीं लड़ा.''
घाटी में कैसा दिखता है माहौल?
हमने कश्मीर घाटी के कई इलाक़ों का दौरा किया.
श्रीनगर के पर्यटकों से भरे इलाकों में सब कुछ सामान्य ही दिखता है सिवाय सुरक्षा बलों की असाधारण मौजूदगी के. होटल, हाउसबोट और रेस्तराँ चलाने वाले लोग पर्यटकों की आमद से ख़ुश लगते हैं लेकिन पुराने श्रीनगर के इलाक़े में लोगों से बात करने पर इससे बहुत अलग माहौल नज़र आता है.
डाउनटाउन कहे जाने वाले इलाक़े में एक कश्मीरी बुज़ुर्ग ने कहा, "कोई सच बोलेगा तो शाम को उसे बंद कर दिया जाएगा. हमारी बात सुनने वाला भी कोई नहीं है."
स्थानीय निवासी साहिल अराफ़ात का कहना था, "कब्र का हाल मुर्दा ही जान सकता है. डरे हुए हैं लोग. डरते हैं बेचारे. अमन की बात हो रही है लेकिन अमन नहीं है."
अनंतनाग में सामाजिक कार्यकर्ता अब्दुल बारी नाईक ने कहा, "मैं हमेशा कहता हूँ कि अमन होता है दिलों के प्यार से. यहाँ वैसा माहौल बनाया जाना चाहिए कि यहाँ के लोग अमन और सुक़ून को कायम करें. यहाँ इतनी फ़ोर्स नहीं होनी चाहिए, जब इतनी फ़ोर्स नहीं होगी तो हम कहेंगे कि अमन है."
बिजबिहाड़ा में मोहम्मद अब्दुल्ला शाह कहते हैं, "अगर ये दिल जीत जाते तो लोग सामने आते. जब दिल ही नहीं जीता तो अंदर में लावा फटता है."
बहुत से स्थानीय लोगों का कहना है कि जम्मू-कश्मीर से आर्टिकल 370 नहीं हटाया जाना चाहिए था.
श्रीनगर में रहने वाले हाजी ग़ुलाम नबी ने कहा, "वो हमारा बुनियादी हक़ है. हमसे छीन लिया वो. ज़बरदस्ती छीन लिया.”
बहुत से लोग ऐसे भी थे जो कैमरा पर बात करने के लिए तैयार नहीं हुए जिससे वहाँ मौजूद तनाव का एहसास होता है.
क्या है मीडिया का हाल?
बहुत से लोगों का कहना है कि कश्मीर में मीडिया भी आज़ाद तरीक़े से काम नहीं कर पा रहा है.
फहाद शाह एक कश्मीरी पत्रकार हैं, जिन्हें साल 2022 में आतंकवाद से जुड़े आरोपों के तहत गिरफ़्तार कर लिया गया था.
क़रीब दो साल जेल में रहने के बाद वो 2023 में ज़मानत पर रिहा हुए.
वो कहते हैं, "जब आम जनता में डर और घुटन होती है तो वो किसी हद तक मीडिया में भी आ ही जाती है क्योंकि आख़िरकार मीडिया के लोग भी स्थानीय लोग ही हैं.''
फ़हाद शाह कहते हैं, ''यहाँ मीडिया के साथ समस्याएँ हैं. मैं दो साल के लिए बंद था. अगर मैं बंद था तो वो भी बहुत से लोगों के लिए एक संदेश था कि ऐसा भी हो सकता है कि आप में से कोई दो साल तक जेल में जा सकता है. वो भी अपने काम से जुड़ी किसी बात के लिए. मीडिया बहुत दबाव में है."
श्रीनगर का लाल चौक एक ऐसा इलाक़ा है, जहाँ कुछ साल पहले तक चरमपंथी हमले होते रहते थे और एक ख़ौफ़ का माहौल रहता था.
आज यहां घूमते-फिरते लोगों का हवाला देकर केंद्र सरकार का कहना है कि साल 2019 में जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद यहां अमन की वापसी हुई है.
लेकिन जब हमने कैमरा निकाला तो जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक अधिकारी ने हमें रोका.
इस अधिकारी ने पहले कहा कि हमें लाल चौक पर माहौल को फिल्माने की इज़ाज़त नहीं है.
जब हमने पूछा कि एक सार्वजनिक जगह पर इजाज़त क्यों लेनी होगी तो उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारी को फ़ोन मिलाया.
कुछ देर बाद उन्होंने हमसे कहा कि हम शूटिंग के दौरान लाल चौक पर आम लोगों से बातचीत न करें.
जब हमने इसकी वज़ह पूछी तो उनका कहना था कि इससे ''अमन में ख़लल पड़ सकता है.''
क्या कह रहे हैं राजनीतिक दल?
विधानसभा चुनाव में कुछ ही दिन बचे हैं और सभी राजनीतिक दल ज़ोर-शोर से चुनाव प्रचार कर रहे हैं.
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती की बेटी इल्तिजा मुफ़्ती पहली बार चुनाव मैदान में उतरी हैं. हमने उनसे कश्मीर के हालात के बारे में पूछा.
उन्होंने कहा, "लोग समझते हैं कि उनके जो अधिकार हैं, उनकी जो ज़मीन है, उनकी जो नौकरियां हैं, उनके जो संसाधन हैं, वो ख़तरे में हैं. तो ये जो अलगाव की भावना है, वो 2019 के बाद और बढ़ गई है. आप यहां लोगों से बात करिए. कितना डर है लोगों में.”
वे कहती हैं, “कितनी औरतें हैं, जिनके पति डेढ़-डेढ़, दो-दो साल से आगरा लखनऊ की किसी जेल में हैं. बिना किसी इल्ज़ाम के लोगों पर यूएपीए लगा दिया गया है. जम्मू कश्मीर को तो आपने जेल बना दिया. अब आपको दूर से हालात सामान्य दिख रहे हैं तो हम क्या कह सकते हैं."
क्या कहना है बीजेपी के नेता का?
लेकिन सब लोग इल्तिज़ा मुफ़्ती के नज़रिए से सहमत नहीं हैं.
श्रीनगर में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता अल्ताफ़ ठाकुर कहते हैं कि एक ज़माने में लाल चौक एक जनाज़ा-गाह बन गया था, जहाँ "दहशतगर्दों के बड़े-बड़े जनाज़े हुआ करते थे".
ठाकुर कहते हैं, "दहशतगर्दों का लाल चौक पर दबदबा था. आज आप लाल चौक देखिए, तिरंगे के रंग में रंगा हुआ है. आज तिरंगा वहां लहरा रहा है. जिस तरह लाल चौक पहले जनाज़ा-गाह बन गया था, 2019 के बाद वो सेल्फी-पॉइंट बन गया है."
अल्ताफ़ ठाकुर कहते हैं कि अगर कश्मीर में कोई दबाव महसूस कर रहा है तो वो अलगाववादी विचारधारा से जुड़ा हुआ आदमी ही है.
वो कहते हैं, "आज के जम्मू-कश्मीर में ना गन के लिए कोई जगह है, ना ग्रेनेड के लिए कोई जगह है, ना हड़ताल के लिए कोई जगह है, ना प्रोटेस्ट के लिए कोई जगह है और ना भारत के ख़िलाफ़ बोलने की इ़ज़ाज़त किसी को दी जाएगी."
अलगाववाद और चुनाव
इसी साल हुए लोकसभा चुनाव में जम्मू-कश्मीर की बारामूला सीट से इंजीनियर रशीद के नाम से मशहूर अब्दुल रशीद शेख़ ने बड़ी जीत दर्ज की.
ये जीत सुर्ख़ियों में इसलिए भी रही क्योंकि इंजीनियर रशीद पिछले पांच साल से दिल्ली की तिहाड़ जेल में टेरर-फाइनेंसिंग के इल्ज़ामों के तहत बंद हैं. इसके बावजूद वे बड़े अंतर से जीत हासिल करने में कामयाब रहे.
इंजीनियर रशीद की ग़ैर-मौजूदगी में उनका चुनावी प्रचार उनके बेटे अबरार रशीद ने संभाला था.
आगामी विधानसभा चुनावों में इंजीनियर रशीद की अवामी इत्तेहाद पार्टी फिर से मैदान में है.
अबरार ने बीबीसी से कहा, "अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है. लोग बात करने से डरते हैं. अगर कोई बात करे तो पता नहीं कल को क्या दिक्क़त हो जाए. ज़मीन पर हालात नहीं बदले हैं. थोड़े हालात बेहतर ज़रूर हुए हैं लेकिन डर बना हुआ है."
दिलचस्प बात ये भी है कि इंजीनियर रशीद की जीत के बाद अब बहुत से ऐसे लोग चुनाव लड़ना चाह रहे हैं जिन्हें अलगाववादी माना जाता रहा है.
डॉ तलत मजीद पुलवामा से एक निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं लेकिन उन्हें प्रतिबंधित जमात-ए-इस्लामी पार्टी का समर्थन हासिल है.
वो कहते हैं, "अनुच्छेद 370 हटने के बाद एक राजनीतिक अस्थिरता पैदा हो गई है. लोग ख़ौफ़ में जी रहे हैं. उनके मुद्दों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है. अब 2024 के जो चुनाव होंगे यहाँ पर उससे अब कुछ उम्मीदें बढ़ गई हैं. 2024 के चुनावों ने ये बिल्कुल साबित कर दिया है कि भारत के लोकतान्त्रिक देश है."
अलगाववाद के आरोपों में जेल में बाद सरजान बरकाती ने भी गांदरबल और बीरवाह सीटों से नामांकन भरा है.
उनकी बेटी सुगरा बरकाती ने हमें बताया कि उनके पिता चुनाव क्यों लड़ना चाहते हैं.
वो कहती हैं, "मैंने बाबा से कहा कि अगर हम चुनावों में हिस्सा लेंगे और अगर हम जीतें तो कुछ अच्छा करेंगे. जब मैं बाबा के पास मुलाक़ात के लिए जाती थी तो वहां पर सिर्फ़ मेरे बाबा जेल में बंद नहीं हैं बल्कि कश्मीर के बहुत सारे नौजवान जेलों में बंद हैं. मैंने उन्हें कहा कि अगर चुनावों में जीतने के बाद आप छूटेंगे तो बहुत सारे नौजवान भी जेलों से छूट जाएँगे.”
तो क्या जम्मू कश्मीर में अलगाववाद की विचारधारा के अब कोई मायने रह गए हैं?
डॉ शेख़ शौक़त हुसैन कहते हैं कि इंजीनियर रशीद की लोकसभा चुनाव में जीत से इस सवाल के जवाब का अंदाज़ा लगाया जा सकता है.
वो कहते हैं, "इंजीनियर रशीद को अलगाववादी कहा जाता है. वो हैं या नहीं, मुझे नहीं पता. लेकिन लेबल उन पर यही है ना? तो जब लोगों के पास विकल्प था तो उन्होंने भारी संख्या में उनके पक्ष में मतदान किया."
नई सरकार का बेसब्री से इंतज़ार
साल 2019 में अनुच्छेद 370 हटाए जाने के बाद जम्मू-कश्मीर राज्य को दो केंद्र-शासित प्रदेशों में बाँट दिया गया: जम्मू-कश्मीर और लद्दाख
जम्मू-कश्मीर का प्रशासन लेफ्टिनेंट गवर्नर मनोज सिन्हा चला रहे हैं लेकिन महंगाई और बेरोज़गारी से जूझ रहे कश्मीरियों ने इन पांच सालों में खुद की चुनी हुई सरकार का न होना बहुत गहराई से महसूस किया है.
पत्रकार फहाद शाह कहते हैं, "लोगों में एक लाचारी आई है. लोगों में एक घुटन आई है, जिसकी वजह से आम अवाम और प्रशासन के बीच बाधा खड़ी हुई है. जो सारा सेट-अप था, वो नौकरशाही और नौकरशाह चलाते थे. कोई चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं था तो लोगों के पास कोई रास्ता नहीं था, उस प्रशासन के साथ बात करने का."
श्रीनगर में रहने वाले मंज़ूर रहमान कहते हैं, "सरकार अगर बन जाएगी तो लोगों में उम्मीद बढ़ जाएगी. हम जाएंगे किसी के पास और बताएंगे कि हमारी ये दिक्क़त है, इसका हल निकालें."
यही वजह है कि लोग अगली सरकार बनने का बेसब्री से इंतज़ार कर रहे हैं.
श्रीनगर के डाउनटाउन में किराने की दुकान चलाने वाले महबूब जान कहते हैं, "चुनाव से बहुत उम्मीदें हैं. अपनी हुक़ूमत आ जाएगी तो हमारी जो समस्याएं हैं उसमें थोड़ी सी कुछ नरमी हो जाए."
वहीं अनंतनाग में मोहम्मद अब्दुल्ला शाह कहते हैं, "इलेक्शन में हिस्सा लेना हमारा फ़र्ज़ बनता है. हमने लोकसभा चुनावों में भी वोट डाले. आज भी वोट डालेंगे."