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जम्मू-कश्मीर चुनाव: कश्मीरी पंडितों को क्या हालात बेहतर होने की उम्मीद है?
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी के लिए
क्या जम्मू-कश्मीर के हालात बेहतर हो गए हैं? क्या हिंसा की घटनाएं बंद हो गई हैं? क्या वहां रहने वाले लोगों के लिए ये महफ़ूज़ हो चुका है? क्या यहां अनुच्छेद 370 हटने के बाद सब कुछ सामान्य हो गया है.
और क्या मौजूदा केंद्र सरकार, कश्मीरी पंडितों के लिए यहां रहने लायक माहौल बना पाई है?
इन सब सवालों को लेकर जम्मू-कश्मीर में रहने वाले और यहां से विस्थापित हो चुके कश्मीरी पंडितों की राय मिली-जुली है.
जम्मू और कश्मीर में क़रीब एक दशक के बाद विधानसभा चुनाव हो रहे हैं. यहां 18 सितंबर, 25 सितंबर और एक अक्तूबर को तीन चरणों में वोटिंग होगी और आठ अक्तूबर को मतगणना होगी.
‘कुछ नहीं बदला’
भारतीय जनता पार्टी, नेशनल कॉन्फ़्रेंस (एनसी), पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) और कांग्रेस ने अपने-अपने चुनावी घोषणा पत्रों में कश्मीरी पंडितों से संबंधित अपनी योजनाओं का ज़िक्र किया है. लेकिन ख़ुद कश्मीरी पंडित इस चुनाव को लेकर कितने उत्साहित हैं?
क्या उन्हें किसी बदलाव की उम्मीद है?
90 के दशक में जब कश्मीर में चरमपंथ शुरू हुआ तो कई कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाया गया. उनकी हत्याएं हुईं, उनकी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया. जिसके कारण बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों का वहां से विस्थापन शुरू हो गया. वो जम्मू समेत भारत के अलग-अलग शहरों में रहने लगे.
लेकिन कुछ कश्मीरी पंडित कश्मीर घाटी से कभी विस्थापित नहीं हुए. श्रीनगर में रहने वाले संजय टिक्कू भी उन्हीं में से एक हैं.
विधानसभा चुनाव को लेकर वो कहते हैं कश्मीरी पंडितों से फिर वही सब वादे किए जा रहे हैं जो सालों पहले किए जाते थे. मतलब साफ़ है कि इतने साल गुज़र गए लेकिन कुछ नहीं बदला.
बीबीसी से बात करते हुए संजय टिक्कू कहते हैं, "आज जो विधानसभा चुनाव जम्मू -कश्मीर में हो रहे हैं, उनकी कोई अहमियत नहीं है. अहमियत इसलिए नहीं है कि जो भी अधिकार विधानसभा के पास होते हैं वो यहां उपराज्यपाल को दे दिए गए हैं. सरकार सिर्फ़ इसलिए चुनाव करा रही है ताकि दुनिया को दिखा सके कि कश्मीर में सब सामान्य हो गया है और हम यहां विधानसभा चुनाव करा रहे हैं."
संजय टिक्कू कहते हैं कि बीजेपी, कांग्रेस समेत बाक़ी क्षेत्रीय दलों के घोषणापत्रों में कश्मीरी पंडितों का ज़िक्र ज़रूर है लेकिन ये महज़ नारेबाज़ी जैसा है और कुछ नहीं.
वो कहते हैं कि जो कश्मीरी पंडित विस्थापित हुए हैं उन्हें वापस लाने के वादे ज़रूर किए गए हैं लेकिन जो कश्मीरी पंडित घाटी में ही रह गए उनकी कोई बात ही नहीं करता.
संजय टिक्कू के मुताबिक़, “हमारे जैसे कश्मीरी पंडित हैं जिन्होंने यहीं रहकर अपने मुसलमान भाइयों के साथ ही तमाम कष्टों को सहा. हमारी कोई बात ही नहीं करता. हर चुनाव में विस्थापित हुए कश्मीरी पंडितों को वापस लाने की बातें की जाती हैं. लेकिन जो लोग यहीं रह गए उनका क्या.” संजय टिक्कू, कश्मीरी पंडितों के लिए काम करने वाली संस्था ‘कश्मीरी पंडित संघर्ष समिति’ के अध्यक्ष भी हैं.
कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास कार्यक्रम
90 के दशक के बाद से आज तक कई सरकारों ने घाटी से विस्थापित पंडितों के पुनर्वास की बात की. इस दिशा में कुछ क़दम भी उठाए गए. लेकिन कई कश्मीरी पंडितों को लगता है कि ये क़दम काफ़ी नहीं हैं.
साल 2010 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार ने एक योजना के तहत विस्थापित कश्मीरी पंडितों के लिए सरकारी नौकरियों की स्कीम निकाली जिसे प्रधानमंत्री पैकेज या पीएम पैकेज का नाम रखा गया है.
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ इस योजना के तहत अभी तक कम से कम छह हज़ार विस्थापित कश्मीरी पंडितों को कश्मीर में सरकारी नौकरियां दी गई हैं.
इस योजना के तहत जिन कश्मीरी पंडितों को सरकारी नौकरियां दी गईं, उनके लिए कश्मीर के कई ज़िलों में रहने के लिए ट्रांसिट कैंपस बनाए गए हैं.
पिछले दो सालों में मोदी सरकार ने विस्थापित हो चुके कश्मीरी पंडितों को दो हज़ार से ज़्यादा सरकारी नौकरियां देने का दावा किया.
इसके अलावा जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने एक आदेश जारी कर सरकार को निर्देश दिया कि कश्मीर में मंदिरों की निगरानी अब सरकार करे.
मौजूदा विधानसभा चुनाव के लिए जारी अपने-अपने घोषणा पत्रों में जम्मू -कश्मीर के सियासी दलों जैसे पीडीपी, नेशनल कॉन्फ़्रेंस और जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी ने कश्मीरी पंडितों की कश्मीर वापसी की बात की है.
‘चुनाव बेकार, उपराज्यपाल शासन ही बेहतर’
लेकिन 'सेव शारदा कमेटी कश्मीर' के संस्थापक रविंदर पंडिता को ना तो इन क्षेत्रीय दलों से और ना ही बीजेपी और कांग्रेस से कोई उम्मीद है.
वो कहते हैं, “किसी को कश्मीर पंडितों के अधिकारों से कोई मतलब नहीं है. केंद्र सरकार ने हमें ना तो राजनीतिक अधिकार दिए, ना सामाजिक और ना ही आर्थिक. हम बेहद निराश हैं.”
लेकिन जम्मू कश्मीर में चुनाव लड़ रही लगभग सभी पार्टियों ने तो अपने मैनिफ़ेस्टो में कश्मीरी पंडितों की वापसी की बात कही है, इस पर रविंदर पंडिता कहते हैं, “पीडीपी और नेशनल कॉन्फ़्रेंस जैसी पार्टियों ने हमारी वापसी की बात कही तो क्या हमारा इतने भर से पुनर्वास हो जाएगा. बल्कि इन दलों ने अपने घोषणा पत्र में जो दूसरी बातें कही हैं वो हमारे लिए डराने वाली हैं. वो कश्मीर से आर्म्ड फ़ोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ़्सपा) को हटाने की बात कर रहे हैं. पब्लिक सेफ्टी एक्ट (पीएसए) को हटाने की बात कर रहे हैं. ऐसे तो आतंकवादियों को जेल से छोड़ा जाने लगेगा. फिर कश्मीरी पंडित कैसे यहां वापस लौट पाएंगे.”
हलांकि गृह मंत्री अमित शाह ने भी जम्मू कश्मीर के एक चैनल गुलिस्तान न्यूज़ को इसी साल मार्च में दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि केंद्र सरकार यहां आफ़्स्पा हटाने पर विचार कर रही है.
जम्मू -कश्मीर में चरमपंथ का दौर शुरू होने के बाद केंद्र सरकार ने यहां आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (आफ़्स्पा) लागू कर दिया था जिसके तहत चरमपंथ को क़ाबू में करने के लिए जम्मू-कश्मीर में तैनात सुरक्षाबलों को कई अधिकार दिए गए थे.
इसके अलावा पब्लिक सेफ़्टी एक्ट (पीएसए ) के तहत किसी भी व्यक्ति को दो साल तक बिना सुनवाई के जेल में रखा जा सकता है.
इन दोनों ही क़ानूनों को लेकर जम्मू कश्मीर में विवाद होता रहा है. सुरक्षाबलों पर इन क़ानूनों के दुरुपयोग करने के आरोप लगते रहे हैं. लेकिन सरकार और सुरक्षाबल इन आरोपों से इनकार करते रहे हैं.
रविंदर पंडिता कहते हैं कि चुनाव को लेकर वो कतई उत्साहित नहीं हैं और मौजूदा उपराज्यपाल शासन को ही वो बेहतर बताते हैं.
पंडिता घाटी से विस्थापित होने के बाद दिल्ली में रहते हैं और विस्थापित कश्मीरियों के लिए बनाई गई विशेष योजना के तहत वो दिल्ली में ही जम्मू कश्मीर विधानसभा चुनाव के लिए मतदान कर सकते हैं.
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‘हालात हो रहे हैं बेहतर’
जम्मू के रहने वाले कश्मीरी पंडित रंजन पंडिता को इन विधानसभा चुनाव से बहुत उम्मीदें हैं. वो प्रधानमंत्री पैकेज स्कीम के तहत कश्मीर के अनंतनाग में सरकारी नौकरी करते हैं.
उनका परिवार जम्मू में रहता है.
वो कहतें हैं, "अभी तक मैंने तीन क्षेत्रीय राजनीतिक दलों (पीडीपी, नेशनल कॉन्फ़्रेंस और जम्मू कश्मीर अपनी पार्टी ) के घोषणा पत्र देखे हैं. इन सभी ने कश्मीरी पंडितों की बात की है. इनके घोषणा पत्रों में इज़्ज़त के साथ हमारे पुनर्वास की बात की गई है. ये एक सकारात्मक बदलाव है क्योंकि पहले तो हमारा ज़िक्र तक नहीं होता था. चाहे किसी भी दल की सरकार बने हमें उम्मीद है कि वो कश्मीरी पंडितों की बेहतरी के लिए क़दम उठाएगी. अब लगने लगा है कि हालात बेहतर हो रहे हैं और हमारे पुनर्वास के लिए काम शुरू होगा."
निशाने पर कश्मीरी पंडित
2014 के विधानसभा चुनाव में त्रिशंकु विधानसभा बनने के बाद बीजेपी और पीडीपी ने गठबंधन किया और मार्च 2015 में मिली जुली सरकार बनी. लेकिन जून 2018 में मतभेदों के बाद ये गठबंधन टूट गया और जम्मू कश्मीर में एक बार फिर राज्यपाल शासन लगा दिया गया.
साल 2019 में सरकार ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को हटा दिया.
सरकार ने दावा किया कि इससे क्षेत्र में शांति आएगी और चरमपंथ का ख़ात्मा होगा.
लेकिन उसके बाद बड़े पैमाने पर कश्मीरी पंडितों, प्रवासी मज़दूरों और ग़ैर कश्मीरी कर्मचारियों की हत्याओं के मामले सामने आए.
- छह अक्तूबर 2021- 70 साल के केमिस्ट माखनलाल बिंद्रा की श्रीनगर में गोली मारकर हत्या कर दी गई.
- इसके अगले ही दिन सात अक्तूबर 2021 को श्रीनगर में ही एक कश्मीरी पंडित और एक सिख शिक्षक की हत्या कर दी गई
- 13 मई 2022 -कश्मीर के बड़गाम ज़िले में कश्मीरी पंडित और सरकारी कर्मचारी राहुल भट्ट की गोली मारकर हत्या कर दी गई.
- 17 अगस्त 2022- शोपियां में सुनील कुमार नाम के कश्मीरी पंडित की गोली मारकर हत्या कर दी गई.
- 26 फ़रवरी 2023- दक्षिण कश्मीर के पुलवामा में कश्मीरी पंडित संजय शर्मा की उनके गांव के बाज़ार में गोली मारकर हत्या कर दी गई.
रविंदर पंडिता इसी बात पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, “सरकार के मुताबिक़ कश्मीर में 370 हटने के बाद पत्थरबाज़ी बंद हो गई. हड़तालें बंद हो गई लेकिन कश्मीरी पंडितों की हत्याओं का सिलसिला तो जारी है. ऐसे में हम कैसे मान लें कि हालात बेहतर हो गए हैं और कश्मीरी पंडितों के लिए अब यहां बेहतर माहौल है.”
क्या कह रहे हैं सियासी दल
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के प्रवक्ता मोहित भान कहते हैं, “कश्मीरी पंडितों के लिए हमारी पहली प्राथमिकता होगी उनकी कश्मीर वापसी और उनका पुनर्निवास.”
वो कहते हैं, “जो भी कश्मीरी पंडित वापस कश्मीर आना चाहता है उन्हें हम दो कमरों वाला फ़्लैट मुहैया कराएंगे. बेघरों के लिए सरकार ने जो ज़मीन देने की योजना बनाई है उसके दायरे में हम कश्मीरी पंडितों को भी लाएंगे. जितने भी मंदिर हैं उनको हम मुफ़्त बिजली देंगे.”
लेकिन कई कश्मीरी पंडितों ने उनकी पार्टी के घोषणापत्र पर आपत्ति जताई है क्योंकि उसमें आफ़्सपा और पीएसए हटाने का भी ज़िक्र है.
ये पूछने पर मोहित भान कहते हैं, “जब घोषणा पत्र बनता है तो उसे उस क्षेत्र के पॉलिटिकल लैंडस्केप को देखते हुए बनाना पड़ता है. कश्मीरी लोगों के मुश्किलात और उनके मुद्दे देखने पड़ते हैं. लोकतंत्र में ये सब करना पड़ता है.”
वहीं नेशनल कॉन्फ्रेंस का भी कहना है कि वो कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास और उनकी कश्मीर वापसी चाहते हैं.
पार्टी के प्रवक्ता इमरान नबी डार ने बीबीसी से कहा, “हम कश्मीरी पंडितों की वापसी और उनके पुनर्निवास, कश्मीर में पीएम योजना के तहत काम करने वाले पंडित कर्मचारियों के लिए रहने के और बेहतर इंतज़ाम करेंगे.“
बीजेपी के जम्मू और कश्मीर के प्रवक्ता सुनील सेठी कहते हैं, “कश्मीरी पंडितों के पुनर्निवास और सम्मान के साथ उनकी कश्मीर वापसी ज़रूरी है लेकिन उसके लिए उनकी सुरक्षा के इंतज़ाम, उनके रोज़गार के लिए भी चिंता करनी ज़रूरी है. जो लोग वापस आते हैं उनके लिए कोई विशेष पैकेज होना चाहिए . हमारी योजना है कि हम उनके कारोबार के लिए उन्हें टैक्स फ़्री लोन मुहैया कराएं.”
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