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जम्मू-कश्मीर में बना दुनिया का सबसे ऊंचा रेलवे ब्रिज कैसे भारत के लिए होगा गेम-चेंजर?
- Author, निखिल इनामदार
- पदनाम, बीबीसी बिज़नेस संवाददाता
दुनिया का सबसे ऊंचा सिंगल आर्क ब्रिज जम्मू-कश्मीर में बनकर तैयार हो चुका है. इसके ज़रिए कश्मीर को देश के दूसरे हिस्सों से रेल कनेक्टिविटी के माध्यम से जोड़ा जाएगा.
ब्रिज को बनाने में भारतीय रेलवे को 20 साल से ज़्यादा का समय लगा. यह ब्रिज जम्मू के रियासी ज़िले में चिनाब नदी के ऊपर बनाया गया है.
ब्रिज की ऊंचाई एफ़िल टॉवर की ऊंचाई से 35 मीटर ज़्यादा है. जल्द ही इस ब्रिज के ऊपर से पहली ट्रेन गुज़रेगी, जो कि बक्कल और कौरी के बीच चलेगी.
यह ब्रिज हर मौसम में चलने वाली 272 किलोमीटर लंबी रेलवे लाइन का हिस्सा है, जो कि जम्मू को कश्मीर घाटी से जोड़ेगी.
हालांकि अभी इस रेलवे लाइन के लिए कोई टाइमलाइन जारी नहीं की गई है.
वर्तमान समय में सर्दी के महीनों में भारी बर्फ़बारी के चलते जम्मू से कश्मीर की ओर जाने वाला सड़क मार्ग बंद हो जाता है.
विशेषज्ञों के अनुसार, नई रेलवे लाइन से भारत को सीमा क्षेत्र में रणनीतिक लाभ होगा.
रणनीतिक तौर पर अहम है ये पुल
चिनाब नदी के ऊपर इस रेलवे ब्रिज को बनाने वाली कंपनी एफ़कॉन्स इंफ्रास्ट्रक्चर के उप-प्रबंध निदेशक गिरिधर राजगोपालन कहते हैं, "इस ब्रिज की मदद से सैन्य बल और ज़रूरी सामान सीमाई क्षेत्र में सालभर पहुंचाया जा सकता है."
रणनीतिक मामलों की विशेषज्ञ श्रुति पांडलाई कहती हैं, "इससे भारत को पश्चिमी और उत्तरी सीमाओं पर तनावपूर्ण संबंध वाले पाकिस्तान और चीन के किसी भी दुस्साहस से निपटने के रणनीतिक लक्ष्य का फ़ायदा उठाने में मदद मिलेगी."
लेकिन ज़मीनी स्तर पर इस पुल को लेकर लोगों की राय मिली-जुली है.
नाम न बताने की शर्त पर कुछ स्थानीय लोगों ने कहा कि इस कनेक्टिविटी से निश्चित तौर पर परिवहन को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी, जिससे उन्हें फ़ायदा होगा.
लेकिन उन्हें यह भी चिंता है कि इससे सरकार घाटी पर अपना नियंत्रण और ज़्यादा बढ़ा सकती है.
यह रेलवे लाइन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार द्वारा 50 से अधिक राजमार्ग, रेलवे और बिजली परियोजनाओं के साथ-साथ एक बड़े बुनियादी ढांचे के विस्तार का हिस्सा है.
नरेंद्र मोदी सरकार ने अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर में विशेष दर्जा ख़त्म कर राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में बांट दिया था.
इस फै़सले के बाद राज्य में महीनों तक कड़ी सुरक्षा व्यवस्था लागू रही.
तब से सरकार ने कई प्रशासनिक बदलाव किए हैं, जिन्हें वो कश्मीर को भारत के अन्य क्षेत्रों के साथ अधिक निकटता से एकीकृत करने के प्रयासों के रूप में देखती है.
रणनीतिक मामलों की विशेषज्ञ श्रुति पांडलाई कहती हैं, "इस क्षेत्र के लिए भारत की योजनाएं स्वाभाविक रूप से इसके रणनीतिक लक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए बनाई जाती हैं, लेकिन स्थानीय ज़रूरतों और संदर्भ को भी ध्यान में रखना होगा."
इस पुल को बनने में क्यों लगे 20 साल
चिनाब नदी पर बने इस पुल के निर्माण को साल 2003 में मंज़ूरी दी गई थी, लेकिन क्षेत्र की ख़तरनाक भौगोलिक संरचना, सुरक्षा कारणों और अदालती मामलों के कारण इसके निर्माण में समयसीमा से अधिक देरी हुई.
इस परियोजना पर काम करने वाले इंजीनियरों को निर्माण के शुरुआती चरणों के दौरान पैदल या खच्चर की मदद से रिमोट एरिया तक पहुंचना पड़ा.
अभी हिमालय की भू-तकनीकी विशेषताओं को अभी भी पूरी तरह से समझा नहीं जा सका है और इसके अलावा ब्रिज अत्यधिक भूकंपीय क्षेत्र में बनाया गया है.
इन कारणों के चलते भारतीय रेलवे को काफ़ी रिसर्च करनी पड़ी. इसके आकार और अर्धमंडलाकार भाग में सुधार करना पड़ा ताकि यह पुल 266 कि.मी. प्रति घंटा तक की रफ्तार से चलने वाली हवा का सामना कर सके.
इस ब्रिज को लेकर राजगोपालन कहते हैं, "स्थान की दुर्गमता और संकरी सड़कों को देखते हुए रसद एक और बड़ी चुनौती थी. पुल के कई घटकों का निर्माण उसी जगह पर ही किया गया था."
ब्रिज के निर्माण में इंजीनियरिंग से जड़ी जटिलताओं के अलावा रेलवे को एक ब्लास्ट-प्रूफ संरचना बनानी थी.
निर्माण कंपनी एफ़कॉन्स का दावा है कि पुल 40 किलोग्राम टीएनटी तक के तेज़ विस्फोट का सामना कर सकता है.
विस्फोट में भले ही कोई नुक़सान हुआ हो या कोई पिलर टूट गया हो, इस दौरान ट्रेनें धीमी गति से चलती रहेंगी.
विशेषज्ञों का कहना है कि कश्मीर घाटी में हर मौसम में कनेक्टिविटी बनाए रखने से क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को बहुत ज़रूरी बढ़ावा मिल सकता है.
सर्दियों के महीनों के दौरान ख़राब कनेक्टिविटी घाटी के बड़े पैमाने पर कृषि पर निर्भर व्यवसायों के लिए एक प्रमुख समस्या रही है.
स्थानीय अर्थव्यवस्था को मिलेगी मज़बूती
थिंक-टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन के अनुसार, 10 में से सात कश्मीरी फलों की खेती पर निर्भर रहते हैं.
दक्षिण कश्मीर के पुलवामा ज़िले में कश्मीर की सबसे बड़ी कोल्ड स्टोरेज सुविधाओं में से एक के मालिक उबैर शाह ने कहा कि रेल लिंक का प्रभाव "बहुत बड़ा" हो सकता है.
अभी उनके कोल्ड स्टोरेज में रखे गये अधिकांश प्लम और सेब हरियाणा, पंजाब और दिल्ली जैसे उत्तरी राज्यों के बाज़ारों में जाते हैं.
उन्होंने कहा कि नई रेलवे लाइन किसानों को दक्षिण भारत तक पहुंच प्रदान करेगी जो उनकी आय बढ़ाने में मदद कर सकती है. फिर भी अंतिम क्षेत्र तक बेहतर कनेक्टिविटी के बिना उन्हें रेलवे कार्गो में तत्काल बदलाव की उम्मीद नहीं है.
शाह कहते हैं, "निकटतम स्टेशन 50 कि.मी. दूर है. हमें पहले उपज को स्टेशन पर भेजना होगा, फिर उसे उतारकर फिर से ट्रेन में लोड करना होगा. यह बहुत ज़्यादा संभाल कर करने वाला काम है. ख़राब होने वाली वस्तुओं के मामले में हमें नुक़सान को कम करने का प्रयास करना होगा."
इस परियोजना से क्षेत्र के पर्यटन राजस्व को बढ़ावा मिलने की भी उम्मीद है.
क्षेत्र की सुदूरता के बावजूद कश्मीर के शानदार पर्यटन स्थलों पर हाल ही में पर्यटकों की संख्या में वृद्धि देखी गई है.
जम्मू-कश्मीर से श्रीनगर के बीच सीधी ट्रेन न केवल सस्ती होगी, बल्कि यात्रा का समय भी आधा हो जाएगा. इससे पर्यटन को और बढ़ावा मिल सकता है.
इस बीच कई तरह की चुनौतियां भी आएंगी. कश्मीर लगातार हिंसा की घटनाओं से जूझ रहा है.
चरमपंथी गतिविधियों में हालिया उछाल देखा गया है, जो कि कश्मीर घाटी से अपेक्षाकृत शांत जम्मू क्षेत्र में स्थानांतरित हो गया है. यह चिंता का कारण है.
बीते जून महीने में रियासी में (जहां यह पुल स्थित है) चरमपंथियों ने एक बस पर हमला किया था, जिसमें नौ हिंदू तीर्थयात्रियों की मौत हो गई थी और दर्जनों घायल थे.
यह हाल के सालों में सबसे घातक चरमपंथी हमलों में से एक था. इसके अलावा सेना और नागरिकों पर कई अन्य हमले भी हुए हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसी घटनाएं यहां शांति की याद दिलाती हैं और स्थिरता के बिना, कनेक्टिविटी परियोजनाएं सिर्फ़ इस क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को पुनर्जीवित करने में ही सफल होंगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित