राजेश खन्ना का ‘आशीर्वाद’: जिसे कभी ‘भूत बंगला’ कहा गया

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- Author, यासिर उस्मान
- पदनाम, फ़िल्म इतिहासकार, बीबीसी हिंदी के लिए
एक पूरा दौर गुज़रा है जब फिल्म स्टार्स के स्टारडम की पहचान उनके आलीशान बंगले रहे.
ये बंगले फ़लक छूती कामयाबी से लेकर दिल तोड़ने वाली नाकामी तक के ख़ामोश गवाह रहे हैं.
इसलिए बॉलीवुड के मशहूर बंगलों पर इस ख़ास सीरीज़ की शुरुआत उस बंगले से जिसका नाम, शाहरुख़ खान के ‘मन्नत’ से सालों पहले, अपने आप में एक पूरा पता बन गया था.
सुपरस्टार राजेश खन्ना का बंगला ‘आशीर्वाद’.
लेकिन इस बंगले की दास्तान राजेश खन्ना के सुपर स्टारडम से सालों पहले शुरू हुई थी.

भूत बंगला के नाम से मशहूर ‘बानो विला’

बांद्रा पश्चिमी मुंबई का एक मशहूर उपनगर है. आज यहां का बांद्रा बैंडस्टैंड और उसके क़रीब की कार्टर रोड एक लैंडमार्क लोकेशन के रूप में जाने जाते हैं.
समंदर के सामने बसे इस पॉश इलाक़े में आज भी कई बड़े फिल्म स्टार और बिज़नेसमैन रहते हैं.
कई हाई-राइज़ बिल्डिंग्स की वजह से आजकल ये इलाका बेहद भीड़भाड़ वाला महसूस होता है. लेकिन ग़ौर से देखें तो इन आलीशान और ऊंची इमारतों के बीच, आज भी आपको सालों से खड़ी कुछ जर्जर इमारतें और पुराने बंगले नज़र आ जाएंगे.
ये इमारतें और बंगले अपने अंदर एक पूरा इतिहास समेटे हुए हैं. 1950-60 के दशक में कार्टर रोड पर बहुत बंगले हुआ करते थे.
इनमें से ज़्यादातर ईस्ट इंडियन और पारसी समुदाय के लोगों के थे. इसी कार्टर रोड पर, समंदर के सामने वाला एक बंगला ‘आशियाना’, उस दौर में हिंदी सिनेमा के श्रेष्ठ संगीतकार नौशाद का हुआ करता था.

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‘आशियाना’ के क़रीब ही एक और दो मंज़िला बंगला था जो बेहद जर्जर और बुरी हालत में था.
इंटरनेट पर मौजूद कई लेखों में कहा गया है कि पहले ये बंगला अभिनेता भारत भूषण का था लेकिन ये दावा सही नहीं है.
इस बंगले की बाहरी दीवार पर अंग्रेज़ी में गुदा हुआ था ‘बानो विला’. आसपास के लोग इस बंगले को अभिशप्त बंगला या भूत बंगला कहकर पुकारते थे.
कोई इसे ख़रीदने को तैयार नहीं था.
तक़रीबन इसी दौर में हिंदी सिनेमा में दस साल से संघर्ष कर रहे अभिनेता राजेन्द्र कुमार को मदर इंडिया (1957) में अपने छोटे से रोल और उसके बाद धूल का फूल (1959) से कुछ कामयाबी मिली थी.
उनके घर में बेटी का जन्म हुआ जिसका नाम उन्होंने रखा डिंपल. परिवार बढ़ रहा था तो राजेन्द्र अपने सांता क्रूज़ के किराए के छोटे फ्लैट से किसी बड़े घर में शिफ्ट होना चाहते थे.
3 फरवरी 1959 की सुबह उन्हें एक प्रॉपर्टी ब्रोकर का फोन आया, “कार्टर रोड पर एक दो मंज़िला घर है. बिलकुल वैसा जैसा आप ढूंढ रहे हैं. क्या आप अभी आ सकते हैं?”

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ये जानकारी राजेन्द्र कुमार की आधिकारिक जीवनी 'जुबली कुमार: द लाइफ़ एंड टाइम्स ऑफ़ ए सुपरस्टार' लिखने वाली लेखिका सीमा सोनी आलिमचंद से मिली.
उन्होंने मुझे बताया, “राजेन्द्र कुमार उसी समय वहां पहुंचे. उन्होंने देखा कि ये पुराना खूबसूरत घर समंदर के सामने था जहां से ठंडी हवा आ रही थी. उन्हें फौरन अपने परिवार के ज्योतिषी की बात याद आ गयी जिन्होंने कहा था कि राजेन्द्र का नया घर समंदर के पास होगा. पहली नज़र में ही बानो विला राजेन्द्र को जम गया.”
प्रॉपर्टी ब्रोकर से किराया पूछा तो उसने कहा कि मकान मालिक किराए पर नहीं बल्कि बेचना चाहता है, “यहां कोई राइटर रहता है जो लोगों को बताता रहता है कि इस घर में भूतों का वास है ताकि ये घर बिकने ना पाए और वो खुद यहां रहता रहे. मकान मालिक किसी भी हाल में इसे बेचेगा और मैं आपको अच्छी डील दिला सकता हूं.”
सौदा तय हुआ 65,000 में. राजेन्द्र की पत्नी भुतहा घर के बारे में सुनकर घबरा गयीं. लेकिन पत्नी की मां बोलीं- “बंबई जैसे शहर में इंसानों के रहने को तो जगह है नहीं, भूत क्या ख़ाक रहेंगे.”
फ़ैसला हो गया. मगर राजेन्द्र कुमार के पास पूरे पैसे नहीं थे. उन्होंने मशहूर फिल्मकार बी.आर चोपड़ा से कहा कि वो ना सिर्फ़ उनकी फ़िल्म क़ानून (जिसमें गाने नहीं थे) बल्कि दो और फ़िल्मों में काम करने को तैयार हैं बशर्ते उन्हें उनकी फ़ीस एडवांस में दे दी जाए.

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बीआर चोपड़ा मान गए और राजेन्द्र कुमार ने भूत बंगले के नाम से मशहूर ‘बानो विला’ को ख़रीद लिया. उसका नया नाम अपनी बेटी के नाम पर रखा ‘डिंपल’. क़रीबी दोस्त अभिनेता मनोज कुमार की सलाह पर राजेन्द्र कुमार गृह प्रवेश से पहले भूतों को भगाने वाला एक विशेष हवन करवाना नहीं भूले.
फिल्म इंडस्ट्री के पुराने लोग याद करते हैं कि इस घर ने राजेन्द्र कुमार की क़िस्मत बदल दी. जिस बड़ी कामयाबी को वो पिछले दस साल से ढूंढ रहे थे वो अब अचानक से आयी.
जिस दौर में वो इस बंगले में रहे वो राजेन्द्र कुमार का सबसे सुनहरा दौर बन गया. मेरे महबूब, घराना संगम, आरज़ू, सूरज, उनकी ज़्यादातर फिल्में जुबिली मनाती थीं जिसकी वजह से वो हिंदी सिनेमा के ‘जुबिली कुमार’ कहलाए.
लेखिका सीमा सोनी आलिमचंद की लिखी जीवनी 'जुबिली कुमार: द लाइफ़ एंड टाइम्स ऑफ़ ए सुपरस्टार' में राजेन्द्र कुमार कहते हैं. “मैंने अपने जीवन के सबसे कामयाब और बेहतरीन साल इसी घर में गुज़ारे.”
काफ़ी दौलत और शोहरत हासिल कर चुके राजेन्द्र कुमार कुछ साल बाद ये बंगला छोड़कर, पाली हिल इलाक़े के अपने नए बंगले में शिफ्ट हो गए. कार्टर रोड का ये बंगला जो राजेन्द्र कुमार के बेहतरीन दौर का गवाह था, अब एक नए मालिक का इंतज़ार कर रहा था.
इतिहास ख़ुद को एक बार फिर से दोहराने वाला था

1969 में राजेश खन्ना की कामयाबी ने किसी तूफ़ान की तरह देश में दस्तक दी. वो पहले फिल्मस्टार थे जिन्हें ‘फ़िनोमिना’ कहा गया, जिनके लिए ‘सुपरस्टार’ शब्द गढ़ा गया.
बंबई में ही पले-बढ़े राजेश खन्ना को समंदर बेहद पसंद था और एक सी-फेसिंग घर ख़रीदने का उनका पुराना सपना था. ये बंगला उन्हें अपने सपने के बेहद क़रीब लगा.
साल 1969 आधे से ज़्यादा बीत चुका था जब एक शाम निर्देशक रमेश बहल और राजेश खन्ना, राजेन्द्र कुमार के घर में बैठे थे.
तब राजेश खन्ना, राजेन्द्र कुमार से बोले, “पापाजी आपका कार्टर रोड वाला बंगला ख़ाली पड़ा है और मुझे एक घर ख़रीदना है…” राजेन्द्र कुमार ने जवाब दिया, “मुझे उस घर को बेचने की ज़रूरत नहीं है.”
“पापाजी, प्लीज़ इस बारे में सोचिएगा. मैंने अपना करियर शुरू किया है और आप देश के सबसे बड़े स्टार हैं. आपका घर ले लूंगा तो मेरी ज़िंदगी बदल जाएगी. शायद आपके जैसी थोड़ी बहुत कामयाबी मेरे हिस्से भी आ जाए.”
राजेश खन्ना ने बहुत देर तक मिन्नत की. आखिरकार राजेन्द्र कुमार मुस्कुराए, “बरख़ुर्दार, अगर ऐसा है तो डिंपल तुम्हारा हुआ. मैं उम्मीद करता हूं कि ये घर तुम्हारे लिए किस्मत लेकर आए.”
राजेश खन्ना ने राजेन्द्र कुमार के पैर छूकर आशीर्वाद लिया.

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बंगले के साथ क़िस्मत की अदला-बदली?

सीमा सोनी आलिमचंद ने लिखा है कि इस बात से राजेन्द्र कुमार की पत्नी शुक्ला बेहद नाराज़ हुईं, उन्होंने राजेंद्र कुमार से कहा भी था, “हमें पैसे की ज़रूरत नहीं थी फिर भी तुमने सिर्फ साढ़े तीन लाख में वो घर बेच दिया.”
मगर राजेन्द्र ज़ुबान दे चुके थे. बंगला बिकने के बाद राजेन्द्र कुमार की फ़िल्में आश्चर्जनक रूप से पिटने लगीं. बतौर हीरो उनका करियर ढलान पर आ गया.
मीडिया ने कहा कि इसकी वजह भाग्यशाली ‘डिंपल’ का बिकना है. मगर राजेन्द्र कुमार खुद इसमें यक़ीन नहीं करते थे.
सुपरस्टार राजेश खन्ना बड़े धूमधाम से बंगले में शिफ्ट हुए. अपने पिता चुन्नीलाल खन्ना से बंगले का नाम रखने को कहा.
राजेश के माता-पिता को अचानक मिली इस बेमिसाल कामयाबी के बाद ये डर सताता कि कहीं उनके बेटे को किसी की नज़र ना लग जाए.
अभिनेता सचिन पिलगांवकर ने मुझे इस बंगले के नामकरण से जुड़ी एक दिलचस्प बात बताई थी, “काका जी (राजेश खन्ना) के पिता बोले बंगले का नाम आशीर्वाद होगा."
"इसके पीछे ये सोच थी कि उनका बेटा हमेशा ‘आशीर्वाद’ के साए में रहेगा. वो बोले कि अगर जतिन (राजेश) से जलने वाला उसे ख़त में गाली देगा या बुराई भी लिख कर भेजेगा तब भी पते के रूप में उसे ‘राजेश खन्ना, आशीर्वाद’ तो लिखना ही पड़ेगा. यानी राजेश खन्ना को अपने घर आने वाले हर ख़त, हर संदेश के ज़रिए आशीर्वाद मिलता रहेगा.”

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बंगले में शिफ्ट होते ही राजेन्द्र कुमार से भी ज़्यादा करिश्माई सफलता राजेश खन्ना के जीवन में आयी.
लगातार पंद्रह सुपरहिट फिल्में. फ़िल्म मैगज़ीन और अख़बारों में सुपरस्टार के नए बंगले की तस्वीरें छपीं.
आशीर्वाद भी राजेश खन्ना की तरह ही मशहूर हो गया और बंबई के टूरिस्ट डिपार्टमेंट का ख़ास टूरिस्ट स्पॉट बन गया था.
देश भर से बंबई आने वाले लोगों की ख़ास मांग रहती कि उन्हें सुपरस्टार का बंगला दिखाया जाए.
हर रोज़ उनके पास फैन्स के ऐसे हज़ारों ख़त आते, जिसमें पते के रूप में बस इतना ही लिखा होता- राजेश खन्ना, आशीर्वाद, बंबई.
इनमें राजेश खन्ना की दीवानी लड़कियों के खुश्बू से महकते ख़त भी होते थे, शादियों के प्रपोज़ल भी और ख़ून से लिखे ऐसे ख़त भी थे, जिनके बारे में पहले भी बहुत कुछ कहा और लिखा जा चुका है.
आशीर्वाद पहुंचने वाले खतों की तादाद इतनी ज़्यादा थी कि राजेश खन्ना ने उन खतों को छांटकर, उनका जवाब देने के लिए बाक़ायदा एक शख़्स को रख लिया. ये शख्स थे प्रशांत रॉय. प्रशांत तकरीबन 20 साल तक आशीर्वाद में काम करते रहे.
प्रशांत ने मुझे बताया, “आशीर्वाद में फैन मेल का ढेर लगता था हर दिन. काका जी अक्सर आते थे और पूछते थे कि प्रशांत आज सबसे अच्छे ख़त कौन से चुने? वो ज़ोर-ज़ोर से ख़त पढ़ते थे और हमारी तरफ़ देखकर मुस्कुराते थे."
"वो फैन्स के जज़्बात देखकर हैरान हो जाते थे और हंसते हुए पंजाबी में कहते-‘हुँण की करां? इधर से लोग...उधर से लोग, ख़ून दे लेटर...मैं क्या करूं? ऐ की हो गया?’ हाल ये था कि इंडस्ट्री में नयी कहावत बन गयी थी- ऊपर आका, नीचे काका."
इस बंगले में राजेश खन्ना का तस्वीरों और ट्रॉफ़ीज़ से सजा हुआ वो मशहूर कमरा भी था जिसमें बैठ कर वो इंटरव्यू दिया करते थे.

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लेखक सलीम ख़ान ने मुझे बताया, "आज मेरा बेटा सलमान बड़ा स्टार है. हमारे घर के बाहर उसे देखने के लिए हर रोज़ भीड़ लगती है. लोग मुझसे कहते हैं कि किसी स्टार के लिए ऐसा क्रेज़ पहले नहीं देखा. मैं उन लोगों से कहता हूं कि इसी सड़क से कुछ दूरी पर, कार्टर रोड पर आशीर्वाद के सामने मैं ऐसे कई नज़ारे देख चुका हूं. राजेश खन्ना के बाद मैंने किसी भी दूसरे स्टार के लिए ऐसी दीवानगी नहीं देखी.”
हर शाम को ‘आशीर्वाद’ में महफिल सजती थी जिसे फिल्म इंडस्ट्री में ‘खन्ना दरबार’ के नाम से पुकारा जाता था.
आशीर्वाद में नयी डिंपल

अजीब संयोग था कि जिस बंगले का नाम पहले ‘डिंपल’ हुआ करता था उस घर की मालकिन एक और डिंपल बनीं.
राजेश की ग़ैरहाज़िरी में घर पर आने वाले फ़ोन कॉल रिसीव करके उन्हें एक नोटबुक में लिखने का काम प्रशांत रॉय का था, उन्होंने मुझे बताया, “काकाजी का फोन नंबर 53117 हुआ करता था और तकरीबन हर मिनट एक कॉल आती थी."
"एक सुबह एक लड़की का कॉल आया. वो काकाजी से बात करना चाहती थी. उसने अपना नाम डिंपल बताया. मैंने कहा काकाजी तो शूट पर गए हैं."
"फिर 3-4 दिन तक लगातार कॉल आते रहे. वो मुझसे बहुत इज़्ज़त से बात करती थी, मुझे प्रशांत साहब कहती थी. एक शाम को मैंने काकाजी से कहा कि डिंपल नाम की एक लड़की रोज़ कॉल करके आपको पूछती है. काकाजी मुस्कुरा दिए...बोले हां हां...वो बॉबी की हीरोइन है, उसकी कॉल ठीक से अटेंड किया करो.”
कुछ दिन बाद चुन्नीभाई कपाड़िया आशीर्वाद आए. उनके साथ एक लड़की भी थी. प्रशांत को देखकर वो बोले, “प्रशांत ये मेरी बेटी हैं डिंपल.” इस बात पर डिंपल हंस पड़ी और बोली, 'प्रशांत साहब मुझे पहचाना? हमारी कई बार बात हो चुकी है'.”
प्रशांत हंस पड़े और मेहमानों को घर के अंदर ले आए. ये डिंपल का आशीर्वाद में पहला क़दम था.

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मार्च 1973 में, अपनी पहली फिल्म बॉबी रिलीज़ होने से पहले ही डिंपल राजेश खन्ना की जीवनसंगिनी बन कर आशीर्वाद में आयीं.
दोनों की शादी उस दौर में बंबई ही नहीं देश की सबसे बड़ी शादी के रूप में चर्चित हुई थी. शुरुआत के साल कामयाबी और खुशियों के साल थे.
डिंपल ने फिल्म इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया था. दोनों की दो बेटियां हुईं. लेकिन फिर अमिताभ की एंट्री और फिल्म इंडस्ट्री में रोमांटिक फिल्मों के उलट एक्शन फिल्मों के नए दौर ने समय बदल दिया.
कुछ ही साल में अमिताभ नए सुपरस्टार के रूप में उभरे. करिश्माई कामयाबी के बाद राजेश खन्ना के ढलान पर आते करियर ने उन्हें बुरी तरह हिलाकर रख दिया था.
महाचोर, महबूबा, अजनबी, आशिक हूं बहारों का जैसी बड़ी बड़ी फिल्मों की नाकामी ने राजेश के आत्मविश्वास को गहरी चोट पहुंचाई थी. अंदर ही अंदर जल रही नाकामी की आग को हर शाम की शराब और भी ज़्यादा भड़का देती थी.
और फिर एक रात, आशीर्वाद की टेरेस पर वो वाक़या हुआ जिसे राजेश खन्ना ने सालों बाद मूवी मैगज़ीन को दिए इंटरव्यू में बयां किया था, “मुझे याद है कि एक बार सुबह के तीन बज रहे थे. मैंने बहुत ज़्यादा शराब पी ली थी. अचानक मेरे लिए सबकुछ बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल हो गया क्योंकि ऐसी नाकामी से मेरा सामना पहली बार हुआ था. एक के बाद एक मेरी सात फिल्में फ़्लॉप हो गई थीं. उस रात बारिश हो रही थी, घुप्प अंधेरा था और मैं अपनी टेरेस पर अकेला था. अचानक मैं जैसे अपने होश खो बैठा और चीख पड़ा- ‘परवरदिगार! हम ग़रीबों का इतना सख़्त इम्तेहान ना ले कि हम तेरे वजूद को इनकार कर दें.”
डिंपल के साथ उनके रिश्तों में भी तनाव बढ़ता जा रहा था. तक़रीबन नौ साल लंबे समय तक साथ रहने के बाद राजेश खन्ना और डिंपल अलग हो गए.
डिंपल आशीर्वाद छोड़कर चली गयीं. 1992 में राजेश खन्ना ने फिल्मों से ब्रेक लेकर राजनीति में क़िस्मत आज़माई और दिल्ली से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीते. बीस साल आशीर्वाद में रहने के बाद अब वो भी बंगला छोड़कर दिल्ली शिफ्ट हो गए.

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आशीर्वाद में काम करने वाले कई लोग भी धीरे-धीरे काम करने कहीं दूसरी जगहों पर चले गए.
राजेश खन्ना की ज़िंदगी में कई दौर आए. हर दौर में क़रीबी लोग का साथ छूटता रहा. अगर कुछ था जिसने ज़िंदगी के किसी भी लम्हे में उनका साथ कभी नहीं छोड़ा तो वो था…अकेलापन. हर गुज़रते दिन के साथ वो और अकेले होते चले गए.
सालों बाद राजनीति से भी उनका मोहभंग हो गया. वो अपने शहर वापस लौटे जो अब बंबई से मुंबई बन चुका था.
इनकम टैक्स से जुड़ा एक मसला बढ़ा और कुछ वक्त बाद ही उनके बंगले आशीर्वाद को टैक्स अथॉरिटीज़ ने सील कर दिया. ऐसा समय आया जब आशीर्वाद छोड़कर राजेश खन्ना बान्द्रा लिंकिंग रोड पर, टाइटन के शोरूम के ऊपर वाली मंज़िल में स्थित अपने ऑफिस में शिफ़्ट हो गए थे. वो ऑफ़िस काफी बड़ा था मगर अपना बंगला छोड़ने की तकलीफ़ उन्हें बहुत थी.

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उनकी आख़िरी फिल्म रियासत के निर्देशक अशोक त्यागी ने मुझे बताया, “ये उन दिनों की बात है जब वो लिंकिंग रोड वाले ऑफ़िस में रहा करते थे. उनका बंगला इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने सील किया हुआ था. एक दिन मुझे लेकर वो ड्राइव पर निकल गए और सीधे आशीर्वाद के सामने गाड़ी रोक दी. हम आमने-सामने एक बेंच पर बैठ गए.”
उस रात हल्की-हल्की बारिश के बीच में राजेश खन्ना ने अशोक त्यागी को अपने सुनहरे दौर की कई बातें सुनाईं. उन्होंने अशोक से कहा, “जिस बेंच पर हम बैठे हैं, किसी ज़माने में उसी बेंच के पास सैकड़ों लोग हर रोज़ मुझे देखने के लिए घंटों इंतज़ार करते थे.”
गुज़रे ज़माने के सुपरस्टार का दर्द अशोक समझ गए थे. वह बोले, “काकाजी फिक्र मत कीजिए, आप देखना वो फैन फिर से आएंगे ज़रूर.”
इस बात पर राजेश खन्ना ने एक फीकी सी मुस्कान दी थी.
और फिर…उनके फैन्स ‘आशीर्वाद’ लौट आए

हालांकि उनका बंगला आर्थिक संकटों से बाहर आया और जीवन के अंतिम वर्षों में राजेश खन्ना आशीर्वाद में अकेले ही रहे.
लेकिन फिल्मों में वो कभी मज़बूत वापसी नहीं कर सके. सालों बाद अचानक उनकी गंभीर बीमारी की ख़बर आयी. राजेश खन्ना इतने ज़्यादा कमज़ोर हो चुके थे कि बार-बार बेहोश तक हो जाते थे. वह मुंबई के लीलावती अस्पताल में भर्ती थे.
20 जून को जब उन्हें अस्पताल में होश आया तो उन्होंने अपने परिवार से कहा कि वो अस्पताल में नहीं रहना चाहते. वो अपने घर जाना चाहते हैं.
उस दिन जब वो कार्टर रोड पर अपने बंगले आशीर्वाद पहुंचे, तो नज़ारा अलग ही था. इतिहास दोहराया जा रहा था.
आशीर्वाद के सामने आज एक बार फिर सैकड़ों फैन्स और देशभर की मीडिया के लोग जमा थे. हर कोई जानना चाहता था कि देश के पहले सुपरस्टार की हालत अब कैसी है?

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21 जून 2012 की दोपहर, आंखों पर काला चश्मा लगाए, गले में शॉल डाले हुए, अपनी ख़ास अदा में मुस्कुराते राजेश खन्ना, कार्टर रोड पर बने अपने बंगले आशीर्वाद की अपनी उसी मशहूर बालकनी में निकल आए.
सामने खड़े उनके फैन्स उन्हें देखकर ख़ुशी से चीख़ पड़े. इस पल में, बाक़ी हर ख़बर भूलकर, देश का तक़रीबन हर न्यूज़ चैनल राजेश खन्ना की ये तस्वीरें लाइव दिखा रहा था.
राजेश खन्ना ने अपने चिर-परिचित अंदाज़ में हाथ उठाकर सबकी तरफ बड़े स्टाइल से वेव किया...उनके होठों पर मुस्कुराहट फैली थी… हां…उनके फैन्स लौट आए थे. पूरा माहौल उनके सुपरस्टारडम के दिनों की याद दिला रहा था.

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अगले ही दिन यानी 23 जून को उन्हें फिर लीलावती अस्पताल में भर्ती करा दिया गया.
हर गुज़रते दिन के साथ उनकी हालत और ख़राब होती गयी. उनका परिवार चाहता था कि वो अस्पताल में ही रहें. लेकिन उनकी ज़िद थी कि वो आखिरी सांस आशीर्वाद में ही लेना चाहते हैं.
उनकी मर्ज़ी के मुताबिक़ 17 जुलाई को उन्हें आख़िरी बार मुंबई के लीलावती अस्पताल से डिस्चार्ज करवा कर उनके बंगले आशीर्वाद ले जाया गया.
राजेश खन्ना के जीवन और फ़िल्म करियर पर मैंने एक पुस्तक लिखी है और उस किताब को लिखने के दौरान मुझे उनके क़रीबी लोगों ने बताया था कि 18 जुलाई को आशीर्वाद में अपने बेडरूम में उन्होंने अपनी आख़िरी सांस लेते हुए कहा, “टाइम अप हो गया…पैकअप!”
2014 में परिवार ने आशीर्वाद को एक उद्योपति को बेच दिया. एक नयी इमारत खड़ी करने के लिए आशीर्वाद को कुछ साल बाद ढहा दिया गया.
राजेश खन्ना के साथ साथ शायद आशीर्वाद का चक्र भी पूरा हो गया था.
फिल्म इतिहास के पन्नों में जब-जब राजेश खन्ना का ज़िक्र होगा आशीर्वाद भी सिनेमा के एक अहम दौर के गवाह के तौर पर शामिल रहेगा.
(लेखक गुरुदत्त, राजेश खन्ना, संजय दत्त और रेखा के जीवन पर किताब लिख चुके हैं.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित















