ट्विटर पर अदालत के किस फ़ैसले ने दी मोदी सरकार को असीमित ताक़त

उमंग पोद्दार

बीबीसी संवाददाता

एलन मस्क

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अमेरिकी टेक कंपनी ट्विटर ने पिछले साल जुलाई में केंद्र सरकार की ओर से कुछ ट्वीट्स और ट्विटर अकाउंट्स ब्लॉक करने के लिए दिए गए आदेश के ख़िलाफ़ कोर्ट जाने का फ़ैसला किया था.

उस वक़्त अभिव्यक्ति की आज़ादी के पक्षधरों ने इसे एक अहम मुकदमा करार दिया था.

ये पहला मौका था जब एक सोशल मीडिया कंपनी अपनी वेबसाइट पर उपलब्ध सामग्री को हटाने के लिए दिए गए सरकारी आदेश के ख़िलाफ़ अदालत जा रही थी.

सरकार की ओर से दिए जाने वाले इस तरह के आदेशों की अक्सर एकतरफ़ा और अपारदर्शी होने की वजह से आलोचना की जाती है.

हालांकि, कर्नाटक हाई कोर्ट ने बीती तीस जून को इस मामले पर फ़ैसला सुनाते हुए ट्विटर के मुकदमे को खारिज दिया. यही नहीं, अदालत ने ट्विटर पर सरकारी आदेश के पालन में देरी करने की वजह से पचास लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया.

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अदालत के आदेश ने पैदा की चिंताएं

कोर्ट की ओर से दिए गए इस फ़ैसले ने इंटरनेट से जुड़े अधिकारों के पक्षधरों को परेशान कर दिया है.

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इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन की प्रवक्ता और वकील राधिका रॉय कहती हैं, “अदालत के इस फ़ैसले ने सरकार को इंटरनेट पर मौजूद सामग्री ब्लॉक कराने की असीमित शक्ति प्रदान की है. इस फैसले ने प्रक्रिया को सुरक्षित बनाए रखने के लिए मौजूद प्रावधानों को दरकिनार कर दिया.”

रॉय का मानना है कि अदालत इस मामले में सरकार की ओर से इंटरनेट पर मौजूद नापसंद सामग्री को हटाने के लिए क़ानून के दुरुपयोग पर सवाल उठा सकती थी. लेकिन ऐसा करने की जगह उसने इसे विधिक रूप दे दिया है.

ट्विटर की ओर से ये मुकदमा कंपनी के पुराने नेतृत्व की ओर से दायर किया गया था. अब इस कंपनी को अमेरिकी टेक व्यवसायी एलन मस्क ने ख़रीद लिया है.

इसके बाद से ट्विटर ने अपनी वेबसाइट पर मौजूद सामग्री को हटाने से जुड़े सभी आदेशों का पालन किया है. जबकि पिछले नेतृत्व में कंपनी इस तरह के आदेशों को चुनौती देती दिखती थी.

पीएम मोदी के साथ हालिया बैठक के बाद मस्क ने कहा है कि कंपनी के पास सरकारों के क़ानून मानने के सिवा कोई विकल्प नहीं है, ऐसा नहीं करने पर कंपनी बंद हो जाने का ख़तरा है.

इसी वजह से इस फ़ैसले ने चिंताओं को जन्म दिया गया है क्योंकि सरकार ने हाल के सालों में इंटरनेट सेंसरशिप को बढ़ा दिया है.

साल 2022 में ट्विटर ने 3417 ट्विटर यूआरएल ब्लॉक किए वहीं, 2014 में सिर्फ़ 8 ट्विटर यूआरएल ब्लॉक किए गए थे.

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क्या था मामला

ट्विटर ने इस मामले में कोर्ट से कहा है कि केंद्र सरकार की ओर से आए ट्विटर अकाउंट और ट्वीट्स ब्लॉक करने के लिए दिए गए 39 आदेश ग़ैरक़ानूनी हैं.

ट्विटर ने कहा था कि सरकार के पास अकाउंट्स ब्लॉक करने की ताक़त नहीं है. वह सिर्फ़ कुछ विशेष ट्वीट्स को ब्लॉक कर सकती है.

इसके बाद ट्विटर ने कहा कि सरकार की ओर से ये आदेश दिए जाते वक़्त इनकी वजहों को स्पष्ट नहीं किया गया जो कि क़ानूनन अनिवार्य है.

ट्विटर ने कहा था कि कंटेंट हटाने के कारण जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, और क़ानून व्यवस्था जैसे कोई आधार नहीं दिए गए थे.

इसके साथ ही जिन अकाउंट्स और ट्वीट्स को ब्लॉक किया गया, उनके यूज़र्स को इसकी जानकारी नहीं दी गयी.

सरकार की ओर से तर्क दिया गया कि ये आदेश पूरी तरह क़ानून सम्मत हैं. सरकार ने कहा कि जिन ट्वीट्स को ब्लॉक करने के लिए कहा गया है, वे भारत के ख़िलाफ़ अभियान चलाने वालों की ओर से किए गए हैं. और अगर इन यूज़र्स को इस बारे में जानकारी दी गयी तो वे अपनी पहचान छिपा लेंगे और इससे ज़्यादा नुकसान करेंगे.

इसी वजह से इस बारे में सिर्फ़ ट्विटर को जानकारी दी गयी. ट्विटर इन आदेशों की समीक्षा करने की प्रक्रिया में भी शामिल हुआ था.

इस क़ानून के मुताबिक़, इन आदेशों को सार्वजनिक नहीं किया जाता है, ऐसे में अब तक ये स्पष्ट नहीं है कि सरकार की ओर से किन ख़ातों और ट्वीट्स को ब्लॉक करने के लिए कहा गया था.

लेकिन अदालत की ओर से दिए गए एक फ़ैसले में एक ट्विटर अकाउंट का ज़िक्र किया गया है जो साल 2021 के किसान आंदोलन से जुड़ा हुआ है.

भारत विरोधी लोग

अदालत ने इस मामले में पूरी तरह सरकार के पक्ष मे फ़ैसला सुनाया है.

इसमें कहा गया है कि सरकार के पास न सिर्फ़ ट्वीट्स ब्लॉक करने की ताक़त है, बल्कि वह पूरे अकांउट्स भी ब्लॉक कर सकती है. ये आदेश असीमित काल तक बने रह सकते हैं.

इसमें ये भी कहा गया है कि सरकार अगर सामग्री ब्लॉक करने जैसा कदम उठाती है, तो उस पर ब्लॉक किए जाने वाले ट्वीट्स और ट्विटर अकाउंट इस्तेमाल करने वालों को जानकारी देना अनिवार्य नहीं है.

क़ानून के तहत, संबंधित सामग्री को इंटरनेट पर जगह देने वाली कंपनी जैसे ट्विटर को नोटिस दिया जाना ज़रूरी है. इसके साथ ही आदेश दिए जाने से पहले सुनवाई किया जाना भी ज़रूरी है.

आपातकालीन परिस्थितियों में सरकार तत्काल प्रभाव से कोई भी वेबसाइट ब्लॉक कर सकती है. और ऐसा करने के बाद संबंधित वेबसाइट को नोटिस दे सकती है.

इस तरह के आदेशों में लिखित रूप से ये बताया जाना ज़रूरी है कि किसी वेबसाइट को ब्लॉक किए जाने की वजह क्या है.

ट्विटर की ओर से कहा गया था कि उसे जो आदेश दिए गए थे, उनमें इनकी वजहों को नहीं बताया गया था.

हालांकि, जब अदालत ने संबंधित ट्वीट्स और ख़ातों को देखा तो पाया कि इनमें अपमानजनक, विश्वासघाती और देश विरोधी सामग्री थी जो कि राष्ट्रीय सुरक्षा और क़ानून व्यवस्था को नुकसान पहुंचा सकती है. अदालत ने कहा है कि ये जानकारियां ट्विटर के साथ साझा की गयी थीं.

इसके साथ ही अदालत ने सरकार का तर्क स्वीकार किया कि इन आदेशों की समीक्षा के लिए की गयी बैठकों के दौरान ट्विटर के साथ ये आदेश दिए जाने से जुड़ी वजहें साझा की गयीं.

इसी आधार पर कहा गया कि अगर ट्विटर को अनौपचारिक ढंग से ही सही, वजहों को बताया गया था तो ट्विटर इस बात पर शिकायत नहीं कर सकता.

अदालत ने ये भी कहा कि यूज़र्स को विवेक के आधार पर नोटिस दिया जा सकता है. जिन यूज़र्स की बात हो रही थी अदालत ने उन्हें ‘आतंकवादी’ और ‘भारत को बदनाम और अस्थिर करने और सांप्रदायिक तौर पर राष्ट्रीय सुरक्षा को हानि पहुँचाने वाले विदेशी दुश्मन’ बताया.

और इस तरह अदालत ने सरकार के उस तर्क की स्वीकार किया जिसमें ये कहा गया था कि ‘भारत-विरोधी’ अभियान चलाने वालों को नोटिस जारी करना ‘वांछित’ नहीं है.

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अब आगे क्या?

अदालत का ये फ़ैसला यूज़र्स के अभिव्यक्ति की आज़ादी के अधिकार की रक्षा करने की क्षमता सीमित करता है.

सेंटर फॉर कम्युनिकेशन गवर्नेंस के प्रोग्राम मैनेजर सचिन धवन कहते हैं कि जिन यूज़र्स का कॉन्टेंट ब्लॉक होगा उन्हें ब्लॉक ऑर्डर से पहले अपना बचाव करने का अवसर नहीं मिलेगा.

सचिन धवन कहते हैं, “ऑर्डर पास होने के बाद भी, उसे ब्लॉक करने के कारणों के बारे में जानकारी नहीं मिलेगी. इस तरह जो प्रक्रिया पहले ही एक राज़ थी वो और अधिक अपारदर्शी बन जाएगी. ये उस मूल प्रक्रिया के विपरीत जिसके तहत आरोपी को नोटिस और सुनवाई का अधिकार है. ”

बहरहाल एक अन्य केस हाई कोर्ट में लंबित है. शायद उसकी सुनवाई के दौरान कोई रास्ता निकले.

इस केस में एक व्यंग्यात्मक वेबसाइट को पिछले साल मई में केंद्र सरकार ने संस्थापक को नोटिस दिए बग़ैर ब्लॉक कर दिया था. इस साइट पर दहेज का एक केलकुलेटर था.

पिछले साल मई में हाई कोर्ट ने सरकार से संस्थापक को ऑर्डर की कॉपी देने और उनका पक्ष सुनने का आदेश दिया था. इसके बाद वेबसाइट पर लगी पाबंदी बहाल रखी गई थी.

अब अदालत ये तय करेगी कि क्या वेबसाइट को ब्लॉक किया जा सकता है या नहीं. इंटरनेट फ़्रीडम फाउंडेशन से जुड़ी राधिका रॉय कहती हैं ये केस उम्मीद जगाता है.

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