ट्विटर और फ़ेसबुक क्या पार कर रहे हैं हद?- दुनिया जहान

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
साल 2016 . महीना दिसंबर.
न्यूयॉर्क के ट्रंप टॉवर में एक अहम मीटिंग चल रही थी.
इसमें एप्पल के टिम कुक और फ़ेसबुक की शेरिल सैंडबर्ग के अलावा अमेज़ॉन और गूगल के आला अधिकारी भी मौजूद थे. इस मीटिंग के मेजबान थे अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप. मीटिंग में चर्चा का मुद्दा था कि ये कंपनियाँ ट्रंप के साथ मिलकर कैसे काम करें?
उम्दा मेजबान की तरह पेश आते ट्रंप ने कहा, "ये वाकई बहुत बेहतरीन लोगों का समूह है. आप अच्छी तरह से काम कर सकें, मैं इसमें मदद करना चाहता हूँ."
चार साल पहले की इस मीटिंग के बाद से वक़्त काफ़ी आगे बढ़ चुका है.
ट्रंप कार्यकाल पूरा होने के बाद व्हाइट हाउस छोड़ चुके हैं. इस बीच ट्विटर ने उन्हें बैन कर दिया. फ़ेसबुक और गूगल के स्वामित्व वाले यूट्यूब जैसे सोशल मीडिया नेटवर्क ने उनका अकाउंट सस्पेंड कर दिया.

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कंपनियाँ कर रही हैं मनमानी?
इस बीच, ट्विटर ने क़रीब 70 हज़ार अकाउंट पर रोक लगा दी. इसे लेकर गंभीर सवाल उठे. बोलने की आज़ादी का सवाल उठाते हुए कई लोगों ने पूछा कि सोशल मीडिया पर विचार रखने पर रोक का अधिकार किसके पास होना चाहिए?
राजनीतिक विषयों पर लिखने वाली रैचल एलेक्ज़ेंडर कहती हैं, "दरअसल, ये दक्षिणपंथी सोच वालों को किनारे करने की कोशिश है."
रैचल वकील हैं और कई वेबसाइटों के लिए लिखती हैं. वो दावा करती हैं कि कुछ वक़्त से सोशल मीडिया पर उनके जैसी रूढ़िवादी सोच रखने वालों की आवाज़ ख़ामोश की जा रही है.
रैचल एलेक्ज़ेंडर कहती हैं, "कई सारे अकाउंट बंद कर दिए गए हैं. मेरे दोस्त जिन्हें मैं निजी तौर पर जानती हूँ, उन्हें फ़ेसबुक से हटा दिया गया है. मैं उन सैंकड़ों लोगों के बारे में सुनती हूँ, जिन्हें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब से हटा दिया गया."

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पाबंदी की आशंका
रैचल को लगता है कि जल्दी ही उन पर भी पाबंदी लग सकती है. उन्हें चेतावनी भी मिलने लगी है.
वो बताती हैं कि उन्होंने एक मीम पोस्ट किया था, जिसमें दावा किया गया था कि अगर जस्टिस गिन्सबर्ग 80 साल की उम्र में रिटायर हो गईं होतीं, तो तब के अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा उनकी जगह किसी उदारवादी जज को ले आते.
इसके बाद उन्हें इंस्टाग्राम की ओर से एक संदेश मिला कि आपकी पोस्ट की फ़ैक्ट चेकिंग की गई है. अब ये पोस्ट ग्रे हो चुकी है. उसे देखने के लिए आपको क्लिक करना होगा. रैचल जिस मीम की बात कर रही हैं, वो वायरल हो गया था.
जस्टिस रूथ गिन्सबर्ग की मौत के बाद जब ट्रंप प्रशासन ने ख़ाली जगह को भरने की प्रक्रिया शुरू की, तब ये मीम सामने आया था. रैचल मानती हैं कि लोगों पर पाबंदी का फ़ैसला विचारधारा के आधार पर किया जाता है.

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'वामपंथियों का दबदबा'
वो कहती हैं, "लोगों का एक समूह है, जिनका सोशल मीडिया कंपनियों पर नियंत्रण है. उनकी सोच वामपंथी है. उन्होंने तय किया है कि वो इसी तरह से बहस में जीत हासिल करेंगे. हम जैसे लोग, जिनके विचार उनसे मेल नहीं खाते, उन्हें सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म से हटाकर वो उनकी आवाज़ ख़ामोश कर देंगे. मैं मानती हूँ कि ऐसा राजनीतिक सोच के आधार पर किया जा रहा है, क्योंकि मैंने कभी नहीं सुना कि वामपंथी सोच वालों को हटाया गया है."
ट्विटर के बॉस जैक डोर्सी का कहना है कि कैपिटल बिल्डिंग पर हुए हमले के बाद डोनाल्ड ट्रंप के अकाउंट को हटाने का फ़ैसला, उस समय जितनी जानकारी उपलब्ध थीं, उसके आधार पर किया गया था.
लेकिन क्या इसे बोलने की आज़ादी पर रोक की तरह देखा जाना चाहिए. इस सवाल पर रैचल कहती हैं, "अमेरिका में पहला संशोधन ही अभिव्यक्ति की आज़ादी को लेकर हुआ था. हमने उसे इतना अहम माना था."
वो कहती हैं कि जब ट्रंप ने अपने समर्थकों से शांतिपूर्ण मार्च करने को कहा, तो उसे बोलने की आज़ादी के दायरे में रखा जाएगा और अगर आप अब उसे आपराधिक बर्ताव की तरह देख रहे हैं, तो आप उन्हें बोलने के लिए अपराधी ठहरा रहे हैं.
हालाँकि, रैचल ये भी कहती हैं कि सोशल मीडिया पर हिंसा के लिए उकसाने की कोई जगह नहीं होनी चाहिए. वो कुछ बदलाव भी चाहती हैं.
रैचल कहती हैं, "मैं ये चाहूँगी कि सोशल मीडिया कंपनियाँ बेमतलब के कारण बताते हुए आपको यूँ ही चलता न कर दें. मैं ये भी नहीं चाहती कि यहाँ सरकार का नियंत्रण हो. होना ये चाहिए कि संपादकीय फ़ैसलों को लेकर हम यानी यूजर्स उन पर मुक़दमा कर सकें."

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क्यों है भ्रम की स्थिति?
सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म के मुक़ाबले ऑनलाइन अख़बारों पर क़ानूनी बाध्यताएँ ज़्यादा हैं. इसकी वजह क़ानूनी है.
राजनीतिक विश्लेषक एशली जॉनसन कहती हैं, "बोलने की आज़ादी लोगों को सरकारी सेंसरशिप और सज़ा से बचाती है. ये ट्विटर और फ़ेसबुक जैसी प्राइवेट कंपनी से संरक्षण नहीं देती. आम तौर पर इसे लेकर भ्रम की स्थिति बन जाती है. ये हमें सिर्फ़ सरकार से संरक्षण देती है."
एशली जॉनसन वॉशिंगटन में विश्लेषक हैं. इंटरनेट से जुड़े नीतिगत मुद्दों में उनकी विशेषज्ञता है. इसमें अमेरिका के कम्युनिकेशन डीसेंसी एक्ट का सेक्शन 230 शामिल है. सेक्शन 230 वेबसाइटों को संरक्षण देता है. ये न सिर्फ़ बड़ी 'टेक कंपनियों' की मदद कर रहा है, बल्कि ये ऐसे प्लेटफ़ॉर्म को भी मदद मुहैया कराता है जिनके पास कंटेंट को नियंत्रित करने के लिए समय, धन या फिर स्टाफ़ नहीं है.
एशली जॉनसन बताती हैं कि अगर वो ऐसा कंटेंट हटा देते हैं, जिसे अमेरिका में बोलने की आज़ादी के तहत संरक्षण हासिल है और उसके बाद कोई उन पर मुक़दमा करता है तो उनकी कोई जवाबदेही नहीं बनेगी.

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बदलाव का इरादा
यानी कोई आपके बारे में ऑनलाइन कुछ पोस्ट करे, तो आप उन पर केस कर सकते हैं लेकिन प्लेटफ़ॉर्म पर नहीं. यही वजह थी कि #MeToo अभियान के दौरान ट्विटर के ज़रिए मशहूर लोगों पर इल्ज़ाम लगाए जाते रहे हैं.
अमेरिका में सेक्शन 230 बीती शताब्दी के आख़िरी दशक के दो अहम कोर्ट केस के ज़रिए अस्तित्व में आया. अब अमेरिका में दोनों राजनीतिक दल अलग-अलग कारण से इसे बदलना चाहते हैं.
एशली जॉनसन कहती हैं, "डेमोक्रेटिक पार्टी का कहना है कि सेक्शन 230 थर्ड पार्टी के कंटेट को लेकर ऑनलाइन सेवाओं को जवाबदेही से संरक्षण देता है. ऐसे में ऑनलाइन सेवा देने वाले हेट स्पीच, बच्चों के यौन उत्पीड़न से जुड़े कंटेंट या फिर और भी किसी नुक़सानदेह सामग्री को हटाने के लिए प्रेरित नहीं होते हैं. दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी के आलोचक तर्क देते हैं कि ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म काफ़ी बयानों को सेंसर कर देते हैं."
सेक्शन 230 को लेकर राजनीतिक बहस जारी है, लेकिन एशली कहती हैं कि इसका मक़सद ये नहीं था.
एशली कहती हैं, "एक ग़लत धारणा बन गई है कि सेक्शन 230 के तहत ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म को राजनीतिक तौर पर तटस्थ होना चाहिए. सेक्शन 230 को लेकर इरादा ये था कि प्लेटफ़ॉर्म कंटेट को निष्पक्ष तरीक़े से नियंत्रित कर सकें. ऐसे में आप पाएँगे कि कुछ प्लेटफ़ॉर्म का रुझान वामपंथ की तरफ़ है, तो कुछ प्लेटफ़ॉर्म से रूढिवादी सोच के लोग बड़ी संख्या में जुड़े हैं."

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मददगार क़ानून
याद कीजिए, जब डोनाल्ड ट्रंप पर ट्विटर ने पाबंदी नहीं लगाई थी, तब वो सेक्शन 230 को ख़त्म करने को लेकर लगातार ट्वीट करते थे.
यूनाइटेड स्टेट्स नेवल एकेडमी में साइबर सिक्यूरिटी लॉ के प्रोफ़ेसर जेफ़ कॉसेफ़ कहते हैं, "कुछ ऐसे लोग हैं, जो मानते हैं कि इंटरनेट पर किसी तरह की छानबीन या नियंत्रण नहीं होना चाहिए. वो सोचते हैं कि अगर आप इंटरनेट पर कुछ पोस्ट करते हैं, तो वो सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म पर उसी तरह जाना चाहिए, जैसे वो उनकी ही कंपनी हो. लेकिन, ऐसा हुआ तो इंटरनेट बेमतलब हो जाएगा, क्योंकि तब वहाँ तमाम नुक़सानदेह और कचरे जैसी सामग्री होगी. तब इंटरनेट इस्तेमाल करना मुश्किल हो जाएगा."
जेफ़ कहते हैं कि सेक्शन 230 ख़त्म होने पर दोनों पार्टियों के लोग निराश होंगे. वो कहते हैं कि मान लीजिए सेक्शन 230 को ख़त्म कर दिया जाए, तो भी फ़ेसबुक, ट्विटर और यूट्यूब जैसे प्लेटफ़ॉर्म मौजूद रहेंगे, लेकिन वो काम अलग तरीक़े से करेंगे.
वो कहते हैं, "मुझे लगता है कि जवाबदेही बढ़ने की वजह से उन्हें बेमतलब सामग्री को हटाने में ज़्यादा मेहनत करनी होगी. तब ज़्यादा निलंबन और पाबंदियाँ होंगी. उस स्थिति में ख़त्म होंगे तो छोटे प्लेटफ़ॉर्म और सोशल मीडिया का बाज़ार और भी छोटा हो जाएगा."

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बदलाव हुए तो बढ़ेगी परेशानी
जेफ़ कॉसेफ़ आगे कहते हैं, "मुझे लगता है कि सेक्शन 230 को ख़त्म करने के बाद कोई नया प्लेटफ़ॉर्म खड़ा करना मुश्किल होगा. अगर आप ट्विटर, फ़ेसबुक और यूट्यूब के बारे में सोचें और फिर ये सोचें कि ये एक ऐसी दुनिया में खड़े हो पाते, जहाँ सेक्शन 230 नहीं होता, तो शायद ये मुमकिन न था. ये ऐसे कारोबार हैं, जो पूरी तरह से उस सामग्री पर चलते हैं, जो यूजर्स बनाते हैं. अगर उनकी जवाबदेही तय होने लगे, तो फिर यूजर्स कुछ भी कैसे बना पाएँगे?"
सेक्शन 230 के मुताबिक़ सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म का राजनीतिक तौर पर तटस्थ होना ज़रूरी नहीं है. जेफ़ कॉसेफ़ की फ़िक्र सिर्फ़ इतनी है कि कहीं ऐसा न हो कि फ़ेसबुक, ट्विटर और गूगल बड़े होते जाएँ और बाक़ी सब बाज़ार से हट जाएँ.
वहीं, इलेक्ट्रॉनिक फ़्रंटियर फ़ाउंडेशन के सलाहकार कोरी डॉक्टरो की फ़िक्र अलग वजह को लेकर है. वो कहते हैं, "दिक्कत ये है कि हमने अपनी संस्कृति का एक बड़ा हिस्सा आधा दर्जन टेक कंपनियों के अधिकारियों के हवाले कर दिया है."
डोनाल्ड ट्रंप के सोशल मीडिया अकाउंट इतने लंबे वक्त तक चलते रहे, तो इसकी वजह ये थी कि तब ट्विटर और फ़ेसुबक मानते थे कि उनके संदेश समाज के लिए मायने रखते हैं. बाद में उन्हें लगा कि ऐसा नहीं है और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई. कोरी ताक़त के इस एकीकरण को लेकर आगाह करते हैं.
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उठे कई सवाल
ट्विटर ने ट्रंप पर बैन लगाया, तो लोगों ने दुनिया के दूसरे नेताओं की ओर उंगली उठाई. इनमें ईरान के सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली ख़ामनेई का नाम शामिल है.
कोरी डॉक्टरो कहते हैं, "इन सब बातों पर चर्चा के दौरान मुझे सोवियत युग की याद आती है. तब कई ऐसे लोग थे, जो तमाम लोगों की ज़िंदगी के बारे फ़ैसले लेते थे, लेकिन उनकी कोई जवाबदेही नहीं होती थी. वो क्या कर रहे हैं, हमें इस बारे में कोई जानकारी नहीं होती थी. हम सिर्फ़ अफ़वाहें ही सुनते थे. मुझे लगता है कि हमें यहाँ सबक ये नहीं मिलता कि फ़ेसबुक और ट्विटर बोलने से जुड़ी नीति पर फ़ैसला लेने के लिए उपयुक्त नहीं हैं, बल्कि दिक्कत ये है कि कोई भी इसके काबिल नहीं है."
सवाल ये भी है कि जब अमेरिका में एकाधिकार को लेकर नियम और कानून हैं, फिर ये टेक कंपनियाँ इतनी बड़ी कैसे हो गईं?
कोरी डॉक्टरो कहते हैं, "सिर्फ़ अमेरिका और ब्रिटेन ही नहीं, बल्कि पूरे पश्चिम में सरकारें ऐतिहासिक तौर पर एकाधिकार के ख़िलाफ़ हैं. इन देशों में सोच रही है कि अगर किसी कंपनी का एकाधिकार हो, तो ये ग्राहकों, कर्मचारियों और सप्लाई चेन किसी के लिए अच्छा नहीं है. ये शासन के लिए भी अच्छा नहीं है. वो अतिरिक्त मुनाफ़े का इस्तेमाल नीतियों को प्रभावित करने के लिए करेंगे."

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जारी रहेगी समीक्षा!
कोरी ये भी कहते हैं कि बाद में सोच बदली. ग्राहकों के कल्याण की बात सामने आई. इनमें कहा गया कि एकाधिकार पर सज़ा का प्रावधान तभी होना चाहिए, जब क़ीमतें ऊपर जाने की आशंका हो. फ़ेसबुक और गूगल जैसे कारोबारों में ऐसा करना मुश्किल है, क्योंकि वो कोई क़ीमत ही नहीं लेते हैं. वो कहते हैं कि हमारे पास सभी औज़ार मौजूद हैं सिवाए राजनीतिक इच्छा शक्ति के. लेकिन, अगर कई विकल्प हों और आज़ादी भी हो, तब भी कुछ बंदिशें होंगी.
कोरी डॉक्टरो कहते हैं, "मैं अपनी बेटी से बात करते हुए जो भाषा इस्तेमाल करता हूँ, वो वैसी नहीं होती, जो मैं उनकी टीचर से बात करते समय इस्तेमाल करता हूँ. आपसे बात करते वक़्त भी मेरी वो भाषा नहीं है. न मैं अपनी बीवी से उस भाषा में बात करता हूँ. सबका तरीक़ा अलग है. तो मुद्दा ये है कि सब जगह एक से नियम लागू नहीं हो सकते हैं."
तो क्या बड़ी टेक कंपनियाँ बोलने की आज़ादी पर रोक लगाने के लिए हद पार कर रही हैं. कई लोगों का जवाब होगा, 'हाँ.'
ट्विटर के सीईओ जैक डोर्सी भी इस बात से सहमत हैं. वो कहते हैं कि डोनाल्ड ट्रंप पर पाबंदी उनकी नज़र में एक ख़तरनाक नज़ीर पेश करती है.
कुछ लोग ऐसे हैं जो कहेंगे, 'नहीं ये सही नहीं है.' उनका तर्क होगा कि बोलने की आज़ादी से किसी ख़ास मंच पर बोलने का अधिकार नहीं मिल जाता है.
लेकिन जब तमाम अहम मंचों पर कुछ एक कंपनियों का ही अधिकार हो, तो शायद समस्या सेंसरशिप से ज़्यादा इस बात की हो कि ये कंपनियाँ कितनी बड़ी हो चुकी हैं?
अमेरिका में दोनों पार्टियों के सांसद ये पता कर रहे हैं कि क्या ऑनलाइन कंपनियों ने अपनी शक्तियों का ग़लत इस्तेमाल किया है. अमेरिका के नए राष्ट्रपति जो बाइडन के प्रशासन के दौरान इस समीक्षा का दायरा बढ़ेगा.
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