मध्य-पूर्व में ब्रिटेन और फ़्रांस के औपनिवेशिक शासन का वो दौर, जिसमें नर्क बन गई थीं ज़िंदगियाँ?

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- Author, टॉम बेटमैन
- पदनाम, बीबीसी मध्य-पूर्व संवाददाता
इस तस्वीर में दिख रहे शख़्स ईद हदाद के माता-पिता हैं.
1938 में ये किशोरावस्था में थे, जब फ़लस्तीनी इलाक़े में ब्रिटिश शासन की मौजूदगी को इन्होंने क़रीब से देखा.
अपने माता-पिता के उन अनुभवों के बारे में बात करते हुए ईद हदाद बताते हैं, “उनकी आँखों के सामने किस तरह ब्रिटिश फ़ौजें आती थीं, लोगों पर हमले करती थीं. मेरे पिता ने एक बार बताया था कि किस तरह एक आदमी के सिर पर लकड़ी के ऐसे हथौड़े से मारा गया था, जिसका पारंपरिक तौर पर इस्तेमाल मांस कूटने में होता है.”
एक और वाकये का ज़िक्र करते हुए हदाद बताते हैं, ‘’एक बार तो एक आदमी और उसके बेटे को तब पीछे से गोली मार दी गई, जब वो तंबाकू के पत्ते सुखा रहे थे. तब चारो तरफ़ ऐसी ही अराजकता देखने को मिल रही थी.’’
ईद हदाद के माता-पिता फ़लस्तीन के उस अल-बास्सा गाँव में रहते थे, जिसे ब्रिटिश फ़ौज ने सामूहिक सज़ा की श्रेणी में रखा था.
इस तरह की कार्रवाई को ब्रिटिश फ़ौज ‘दंडात्मक उपाय’ की संज्ञा देती थी. इसके तहत अगर फ़ौज पर किसी भी विद्रोही गुट ने हमला किया, तो इसकी सज़ा पूरे गाँव को दी जाती थी.
बीबीसी रेडियो-4 की स्पेशल सिरीज़ में छलका दर्द

ईद हदाद ने अन्याय और शोषण की ऐसी तमाम कहानियाँ बीबीसी रेडियो-4 पर प्रसारित हुई नई सिरीज़ ‘द मैंडेट’ में साझा की.
बीबीसी की ये ख़ास सिरीज़ एक सदी पहले मध्य पूर्व पर ब्रिटेन और फ़्रांस के नियंत्रण की पड़ताल करती है, जिसकी गूँज आज भी पूरे क्षेत्र में सुनाई देती है.
बीबीसी की टीम ने इस सिरीज़ के लिए कई इतिहासकारों और विशेषज्ञों से बातचीत कर यह समझने की कोशिश की कि औपनिवेशिक शासन के दौरान आज के इसराइल, फ़लीस्तीनी क्षेत्रों, जॉर्डन, लेबनान और सीरिया में कैसे हालात थे.
हमने उन महिलाओं और पुरुषों से भी बातचीत की, जो उस हालात से सीधे प्रभावित हुए. उन घटनाओं का दंश उनकी अगली पीढ़ियों की यादाश्त में भी दर्ज है.
ईद हदाद ऐसे ही प्रभावित लोगों में से एक हैं. हादद से मेरी मुलाक़ात पिछले साल हुई थी, जब मैं फ़लीस्तीन की तरफ से की गई एक बड़ी मांग की ख़बर रिपोर्ट कर रहा था.
फ़लीस्तीन की मांग थी, कि ब्रिटेन 1917 से 1948 तक अपने क़ब्ज़े के दौरान यहाँ किए गए कथित युद्ध अपराधों के लिए माफ़ी मांगे.
इस बार जब हमने ईद हदाद से बात की, तो वो डेनमार्क में अपने घर में थे.
फ़ोन पर हुई बातचीत में उन्होंने लेबनान में गुज़रे अपने बचपन के उन दिनों को याद किया जब ख़ून-ख़राबे और उथल-पुथल की वजह से उनके परिवार को अपना मुल्क छोड़ना पड़ा था.
इस सिरीज़ के लिए जितने लोगों का हमने इंटरव्यू किया, हदाद के माता-पिता की तरह सबकी शुरुआती ज़िंदगी भी बिखरी नज़र आई.
वो ब्रिटिश और फ़्रांसीसी शासन का दौर था, जिसमें बरसों तक संघर्ष और सांप्रदायिक उथल-पुथल की स्थिति पूरे क्षेत्र में बनी रही.
उथल-पुथल और उत्पीड़न का वो दौर

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हदाद के बचपन की स्मृतियों में वो दौर भी दर्ज है, जब मध्य-पूर्व में यूरोपीय शक्तियों ने दखलअंदाज़ी बंद की, लेकिन दशकों तक पूरा क्षेत्र हिंसा और अस्थिरता से जूझता रहा.
इंटरव्यू के दौरान एक इतिहासकार ने तो यहाँ तक कहा कि मध्य-पूर्व में ‘जनादेश का इतिहास’ इतना बुनियादी है कि वो यहाँ के वर्तमान का इतिहास प्रतीत होता है.
पहले विश्वयुद्ध के दौरान जब ब्रिटेन ने ढहते हुए ऑटोमन साम्राज्य पर आक्रमण और क़ब्ज़ा किया, तब इसने ‘आत्मनिर्णय’ में यक़ीन रखने वाली शक्तियों का सहारा लिया.
ब्रिटेन ने तब बड़े क्षेत्र को लेकर लंबे चौड़े वादे किए. ख़ासतौर पर अरब लोगों से, जो पूरे क्षेत्र की स्वतंत्रता की मांग कर रहे थे.
इसके साथ ब्रिटेन ने यहूदियों से भी वादे किए, जो फ़लस्तीन में यहूदियों के स्थायी निवास की मांग कर रहे थे.
ब्रिटेन और फ़्रांस ने इस क्षेत्र पर अपना नियंत्रण उस कथित जनादेश के ज़रिए मज़बूत बनाया था, जो नए-नए बने ‘लीग ऑफ नेशन’ ने इन्हें दिया था.
कहने की बात नहीं कि ये ऐसी संस्था थी, जिसमें ब्रिटेन और फ्रांस इन्हीं दो राजशाही शक्तियों का वर्चस्व था.
फ़लस्तीनी इलाक़ों में ब्रिटेन की नीतियों की वजह से राष्ट्रीय आंदोलन पहले दो धड़े में बँटा और फिर एक दूसरे से टकराव के रास्ते पर चल पड़ा.
ये 1930 के दशक के आख़िरी बरसों की बात है, जब ब्रिटेन अरब विद्रोह को बुरी तरह कुचलने में कामयाब रहा था.
हालाँकि ब्रिटिश फौज को बाद में ज़ायनिस्ट मिलिशिया के विद्रोह का सामना करना पड़ा था. इस दौरान ब्रिटेन ने अपनी कई नीतियों में उलटफेर किया था.
इसमें यूरोप को लेकर इमीग्रेशन पॉलिसी भी शामिल थी. अपने वादे के उलट ब्रिटेन ने उन शरणार्थी नौकाओं को वापस भेजना शुरू कर दिया था, जिसमें होलोकॉस्ट से ज़िंदा बचे लोग सवार थे.
ये लोग नाज़ी क़ब्ज़े वाले यूरोप से पहले ही भाग गए थे.
इसराइली इतिहासकार टॉम सेगेव कहते हैं, ‘’ब्रिटेन को ये पता ही नहीं था, कि इन चीज़ों को कैसे मैनेज किया जाए."
जब फ़्रांस ने आज़माई ब्रिटिश 'डिवाइड एंड रूल' पॉलिसी
उधर फ़्रांस ने अपनी जनादेश शक्ति के आधार पर लेबनान को सीरिया से अलग कर दिया.
मक़सद था अपने लिए रणनीतिक लिहाज से महत्वपूर्ण समुद्रतट हासिल करना.
इस तरह 1920 के दशक के शुरुआती वर्षों में फ़्रांस ने पूरे क्षेत्र में नई सीमाएँ बना दीं. ये अरब विद्रोह से पहले की बात है, जिसे बुरी तरह कुचल दिया गया था.
जैसा कि इतिहासकार जेम्स बर्र बताते हैं, ‘’फ्रांस ने क्षेत्रों का विभाजन धर्म और नस्ली आधार पर किया था. इसे आप कह सकते हैं- ये ‘फूट डालो और राज करो’ की निंदनीय नीति थी.’’
दूसरे विश्वयुद्ध के कुछ बरस बाद ब्रिटेन और फ़्रांस मध्य-पूर्व से चले गए.
हालाँकि ब्रिटेन को अच्छी तरह पता था कि उनके जाने के बाद फ़लीस्तीन जैसे क्षेत्रों में स्थानीय संघर्ष किस तरह क्षेत्रीय युद्ध में बदल चुका था.
क्योंकि तब तक देश के रूप में इसराइल का ऐलान हो चुका था.
ईद हदाद के माता-पिता को अपने गाँव अल-बस्सासा से भागना पड़ा क्योंकि यहूदी अर्धसैनिक बलों ने पूरे गाँव को तबाह कर दिया था.
1947-48 के संघर्ष में क़रीब साढ़े सात लाख फ़लस्तीनी लोगों को या तो भागना पड़ा या फिर जबरन इन्हें घरों से निकाला गया. फलस्तीनी लोग आज भी इसे नक़्बा या क़यामत कहते हैं.
लेबनान के रिफ्यूजी कैंप में जन्म और बचपन

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ईद हदाद का जन्म फ़लस्तीन से भागे हुए ऐसे ही एक परिवार में हुआ था, जो पड़ोसी लेबनान के शरणार्थी कैंप में रहने को मजबूर था.
लेबनान में फ़लस्तीनी शरणार्थियों के बढ़ने का असर ये हुआ कि यहाँ फ्रेंच शासन के बाद ईसाइयों और मुस्लिमों के बीच जो सद्भाव क़ायम हुआ था, वो अस्थिर होता गया.
ये पीएलओ (फ़लस्तीन लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन) की स्थापना के बाद और भी ख़राब हुआ. फ़लस्तीनियों का ये सशस्त्र ग्रुप इसराइल पर लगातार हमले कर रह था.
हालाँकि देश में अब भी ऐसे प्रभावशाली ऑफ़िसर थे, जो सीरिया और मिस्र के के साथ ‘पैन अरब अलायंस’ के पक्षधर थे.
क्योंकि ये वो गठबंधन था, जो यूरोपीय देशों को दिए गए जनादेश के ख़िलाफ़ विद्रोह के साथ मज़बूत हुआ था. लेबनान आगे चलकर सांप्रदायिक गृहयुद्ध में फँसता चला गया.
ईद हदाद, जो फ़लस्तीनी मूल के ईसाई के हैं, बताते हैं किस तरह लेबनान के ईसाई अतिराष्ट्रवादियों के समूह ने उनके 16 साल के भाई की गोली मारकर हत्या कर दी.
चरमपंथियों का ये समूह फलीस्तीन से आए शरणार्थियों को निशाना बनाता था. 1975 में इसी समूह ने बेरूत के शरणार्थी कैंप पर हमला किया था.
हदाद भी इसी साल एक सामूहिक नरसंहार में बाल बाल बचे थे. उन्होंने एक वार्डरोब में छिपकर किसी तरह ख़ुद को हमलावरों से बचाया था.
हदाद ने अपनी आँखों से देखा कि चरमपंथियों ने उस हमले में लोगों के साथ कैसी बर्बरता और अपमानजनक बर्ताव किया.
हदाद बताते हैं वो किस तरह बचपन से लेकर जवानी तक की उन घटनाओं की वजह से पोस्ट्रॉमैटिक स्ट्रेस डिसॉर्डर (पीटीएसडी) का शिकार हुए.
हदाद कहते हैं, ‘’मुझे लगता है कि मेरे माता-पिता भी ऐसे ही डिसॉर्डर का शिकार हुए, क्योंकि उन्होंने बचपन से ही ऐसी तमाम घटनाएँ देखी होंगी. आप कल्पना कीजिए मेरे पिता पर क्या गुज़री होगी जब ब्रिटिश फ़ौज उन्हें सख़्त पूछताछ के लिए ले जाने वाली थी’’
न पिता वतन लौटे और न ईद हदाद

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हदाद बताते हैं 1938 में अल-बास्सा पर कार्रवाई के दौरान कैसे ब्रिटिश फ़ौज महिलाओं को डिटेन किए पुरुषों से अलग कर दिया करती थी. तब उनके पिता किशोर उम्र के थे. उन्हें बचाने के लिए एक गाँव वाले ने उनका पहनावा लड़की का कर दिया.
हदाद के मुताबिक़, ‘’उन्होंने मेरे पिता के सिर पर स्कार्फ बांधा और लड़कियों वाले ड्रेस पहना दिए. इस तरह उन लोगों ने मेरे पिता को ब्रिटिश फ़ौज की यातना से बचा लिया.’’
हालाँकि ब्रिटेन की सरकार ने अल-बास्सा में किए गए उत्पीड़न को कभी कबूल नहीं किया. माना जाता है कि यहाँ हुई घटनाओं में 30 से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
इसे साथ हदाद ये भी बताते हैं कि वो आख़िरकार आज तक यूरोप से अपने देश क्यों नहीं लौटे.
वो कहते हैं, ''मुझे हमेशा लगता है कि कि मेरे वजूद का एक बड़ा हिस्सा ग़ायब है. मैं ख़ुद को उस समुद्री द्वीप की तरह लगता हूँ, जो अब भी मेरे लिए विदेश समान है.’’
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