इसराइल अपने गठन के 75 साल बाद असमंजस में क्यों है?

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- Author, पाउला रोसा
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़ मुंडो
''इसराइल एक ऐसा देश है जो एक ट्रांसजेंडर महिला को यूरोविज़न सॉन्ग कॉन्टेस्ट में भाग लेने के लिए भेजता है. साथ ही इतना धार्मिक भी है कि सब्त के दिन यानी शनिवार को हम सार्वजनिक परिवहन को चलने की अनुमति नहीं देते.''
इसराइल में मौजूद दो दुनिया के इस सह-अस्तित्व को वहां के प्रसिद्ध लेखकों में शुमार एटगर केरेट के मुकाबले शायद ही कोई बता सकता है.
एटगर केरेट, डाना इंटरनेशनल नाम के सिंगर की 1998 के यूरोविज़न सॉन्ग कॉन्टेस्ट में मिली जीत का हवाला दे रहे थे.
वे इस उदाहरण के ज़रिए बताना चाह रहे थे कि इसराइल ऐसा विरोधाभासी देश है, जहां उदार नज़रिया और धार्मिक रूढ़िवाद दोनों साथ-साथ चलते हैं, लेकिन कई अनिश्चितताओं के साथ.
इसराइल ने बीते 14 मई को अपनी आज़ादी की 75वीं वर्षगांठ मनाई. इस मौक़े पर बीबीसी के साथ एक साक्षात्कार में एटगर केरेट ने चेतावनी के अंदाज़ में कहा कि कई तथ्यों के बावजूद ऐसा संतुलन टिकने वाला नहीं है.
वो इसराइल की तुलना अनानास और पेपरोनी पिज़्ज़ा से करते हुए कहते हैं, ''यह पूरी तरह से बेमेल बात है, लेकिन जब चलता है तो ये बहुत सुंदर और समृद्ध दिखता है.''
केरेट कहते हैं, ''लेकिन इसराइली समाज में अब यह अंतर वास्तव में एक लड़ाई में तब्दील हो गया है. यह लड़ाई इस बात की है कि इसराइल को पहले उदार होना चाहिए और फिर यहूदी, या पहले यहूदी होना चाहिए और बाद में उदार.''
इसराइल की समस्या
यह संघर्ष 1948 में एक देश के रूप में इसराइल के उदय के बाद से ही चला आ रहा है, लेकिन नवंबर 2022 में धुर दक्षिणपंथी और अति-रूढ़िवादी दलों के सत्ता में आने के बाद यह संघर्ष और बढ़ गया है.
इसराइल के दूसरे बुद्धिजीवियों की तरह, 55 साल के केरेट ने भी न्यायिक सुधार की सरकार की कोशिश के विरोध में देश में हुए विरोध प्रदर्शनों में भाग लिया था.
इन विरोध प्रदर्शनों के बारे में विपक्षी नेताओं का दावा रहा है कि ये ईश्वर के शासन की दिशा में बढ़ाया एक क़दम है.

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एटगर केरेट 'सडेनली', 'ए नॉक ऑन द डोर' जैसे कहानी संग्रह और पिज़्ज़ेरिया कामिकेज़ जैसे उपन्यास के लेखक के तौर पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं.
उनका मानना है कि राजनीतिक संकट अब देश की पहचान के संघर्ष में बदल गया है.
वो कहते हैं, ''जब कोई साइंस की एक अच्छी गल्प कथा लिखता है, तो उस पर फिल्म बनाई जाती है, लेकिन इसराइल एक ख़राब विज्ञान गल्प कथा से लिया गया उदाहरण है, जिससे प्रेरणा लेकर यह देश बनाया गया.''
वो 1902 में लिखी 'द ओल्ड न्यू लैंड' नामक उपन्यास का ज़िक्र करते हैं और कहते हैं कि इस किताब ने 'यहूदी देश' के विचार को लोकप्रिय बनाने में मदद की.
केरेट कहते हैं कि वो 'धर्म से पहले आज़ादी' चाहते हैं. साथ ही चेतावनी देते हैं कि इसे लेकर उनके ही परिवार में गहरे मतभेद हैं.
मेरा भाई अति-वामपंथी और एंटी-ज़ियोनिस्ट है, जबकि मेरी बहन अति-रूढ़िवादी हैं. बावजूद इसके हमारे बीच काफी सद्भाव है.
वो कहते हैं, ''समस्या यह नहीं है कि लोगों के विचार अलग-अलग हैं, लेकिन समस्या यह है कि हम कई गुटों के दौर में जी रहे हैं. जब परस्पर विरोधी विचार के लिए सहिष्णुता की कमी इस देश की जटिलता से मिल जाती है, तो मुझे लगता है कि बर्बाद होना तय है.''
फलस्तीन संकट
केरेट की एक कहानी में एक टैक्सी ड्राइवर कहता है कि वो उन दिनों के लिए तरस रहा है जब इसराइल 'वास्तविक' युद्धों में व्यस्त था, बजाय इसके कि इसराइल, फ़लस्तीन संघर्ष सहित अपने आंतरिक संघर्षों में फंसा रहे.
केरेट कहते हैं, ''मैं ऐसे देश में पला-बढ़ा हूं, जो मिस्र, सीरिया, जॉर्डन और लेबनान जैसे दुश्मन देशों से घिरा हुआ है. वे सब मिलकर चारों ओर से हम पर या तो हमले कर रहे थे या हमें धमका रहे थे.''
''इसराइल अब ख़ुद को पश्चिम एशिया की सबसे बड़ी और मजबूत ताक़त के तौर पर भले माने, लेकिन हम ज्यादातर समय फलस्तीनियों से लड़ते रहते हैं, जो चाकुओं और कट्टों से लैस होते हैं.''

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केरेट के अनुसार, ''पहले हम डेविड हुआ करते थे. लेकिन अब हम एक प्रकार के गोलियथ बन गए हैं.''
2015 में दिए एक साक्षात्कार में, केरेट ने बताया था कि उनके बेटे लेव ने 'कभी किसी फलस्तीनी को नहीं देखा'.
केरेट पुराने दिनों को याद करते हुए कहते हैं कि बचपन में उनका फलस्तीनी लोगों के साथ नियमित संपर्क होता था. उनके अनुसार, नब्बे के दशक में हुए 'ओस्लो सहमति' के बाद सब कुछ बदल गया.
वो आज से 30 साल पहले 1993 में इसराइल और फलस्तीन मुक्ति संगठन (पीएलओ) के बीच हुए समझौते का ज़िक्र कर रहे थे.
जब मैं बच्चा था तो फलस्तीनी हर समय साथ होते थे, क्योंकि तब कोई अलगाव नहीं था. इसलिए हम सब साथ ही रहते थे.
"यह सब बहुत स्वाभाविक था. अब चीज़ें बहुत बदल गई हैं. यहां तक कि काम करने के लिए इसराइल आने वाले फलीस्तीनियों के लिए भी माहौल बदल गया है.''
वो कहते हैं, ''विडंबना यह है कि ओस्लो संधि ने वास्तव में इसराइल और फलस्तीन के लोगों को मिलने-जुलने से रोक दिया, क्योंकि आवाजाही में पहले से अधिक सतर्कता बरती जाने लगी.''
केरेट का मानना है कि सोशल मीडिया माहौल को और ख़राब बना रहा है.
'फेसबुक के युग में, मुझे लगता है कि एक आम इसराइली किसी फ़लस्तीनी नागरिक से कहीं अधिक डरता है. मैं कहूंगा कि अब एक आम फ़लस्तीनी पहले से ज़्यादा नापसंद किया जाता है.''
सेकुलर या कट्टरपंथ: किस राह जाएगा इसराइल
केरेट की राय में आज के दौर में 'कट्टर दुश्मनी वाले पड़ोसी' के साथ जीने का विचार आज इसराइलियों को एकजुट करता है.
''हममें से कोई भी हारकर मरना नहीं चाहता. हम नहीं चाहते कि हम पर ईरान की ओर से बमबारी हो.''
लेकिन अब इसमें भी बदलाव आ रहा है.

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किस रास्ते जाएगा इसराइल
''अब हमारे यहां जो सरकार है वो धुर दक्षिणपंथी और बहुत आक्रामक है. जो लोग उन्हें वोट देते हैं उनमें से अधिकांश रूढ़िवादी और अति-रूढ़िवादी हैं, जो सेना में काम नहीं करते, क्योंकि क़ानून उन्हें भर्ती से बचने की अनुमति देता है.''
''वे आक्रामक हैं, लेकिन वे चाहते हैं कि मैं और मेरा बेटा उनके लिए लड़ें.''
केरेट ने 2022 की वित्त मंत्रालय की एक रिपोर्ट का हवाला दिया. उस रिपोर्ट में बताया गया था कि एक सेकुलर इसराइली किसी अति-रूढ़िवादी नागरिक की तुलना में छह गुना अधिक टैक्स का भुगतान करता है.
ऐसे में केरेट इसराइल का भविष्य क्या देखते हैं? क्या इसराइल धर्मनिरपेक्ष रास्ते पर जाएगा या और कट्टर बन जाएगा?
एटगर केरेट का सबसे बड़ा डर यही है कि कोई एक पक्ष मजबूत होगा. वो कहते हैं कि इसका मतलब यह होगा कि आधे लोगों का दमन किया जाएगा.
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