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ईरान किस पॉलिटिक्स के तहत अरब जगत में आगे बढ़ रहा है? – दुनिया जहान
जनवरी 2024 में मध्य पूर्व संघर्ष की चपेट में आ गया. इसराइल और हमास के बीच ग़ज़ा में युद्ध छिड़ गया. हूती विद्रोही गुट ने लाल सागर में जहाज़ों का अपहरण कर लिया. ईरान ने पड़ोसी देश पाकिस्तान की सीमा के भीतर मिसाइल हमले किए.
इस हमले ने कई लोगों को चौंका दिया- ख़ासतौर पर पाकिस्तान को क्योंकि यह दोनों एक-दूसरे के सहयोगी हैं. जवाब में पाकिस्तान ने भी ईरान पर हमले किए. दोनो देशों ने हमलों को आत्मरक्षा के लिए की गई कार्रवाई बताते हुए कहा कि वो सीमापार आतंकवादियों के ठिकानों को निशाना बना रहे हैं.
बढ़ते तनाव के बीच चीन ने हस्तक्षेप करते हुए दोनों पक्षों से संयम बरतने की अपील की.
जनवरी में ईरान द्वारा किया गया यह एकमात्र शक्ति प्रदर्शन नहीं था.
ईरान ने सीरिया और इराक़ के भीतर भी हमले किए जबकि यह दोनों ही उसके सहयोगी हैं. वो इसराइल पर हमले करने को भी आतुर लगता है. उसका आरोप है कि सीरिया में इसराइल के हवाई हमले में वहां तैनात वरिष्ठ ईरानी सुरक्षा अधिकारी मारे गए थे.
पहले से तनाव में फंसी मध्य-पूर्व की राजनीति में तनाव और बढ़ गया है. इसलिए इस हफ़्ते दुनिया जहान में हम यह समझने की कोशिश करेंगे कि ईरान क्या चाहता है?
मध्य पूर्व में प्रतिरोध की धुरी
ईरानी पत्रकार और सेंटर फ़ॉर इंटरनेशनल पॉलिसी की वरिष्ठ शोधकर्ता निगार मोर्तज़ावी का मानना है कि एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस यानि प्रतिरोध की धुरी, दरअसल मध्य-पूर्व के इस्लामी ग़ैर सरकारी गुटों का अनौपचारिक गठबंधन है, जो ईरान के सहयोगी हैं.
इसमें लेबनान का हिज़्बुल्लाह, इराक़ के शिया मिलिशिया गुट, हमास और हूती गुट शामिल हैं. ईरान इन गुटों को अपने शत्रु अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ सहयोगी की तरह देखता है. उनके प्रतिरोध का वह सैद्धांतिक रूप से समर्थन करता है.
आपको याद होगा कि 2002 में अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज डब्लू बुश ने ईरान, इराक़ और उत्तर कोरिया को दुष्टता की धुरी क़रार देते हुए कहा था कि इनसे विश्व शांति को ख़तरा है.
निगार मोर्तज़ावी कहती हैं, ''एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस यानि प्रतिरोध की धुरी उसी अमेरिकी अभिव्यक्ति के विरुद्ध इजाद की गयी अभिव्यक्ति है. वो कह रहे हैं कि हम दुष्ट नहीं हैं, बल्कि अमेरिका ने हमारे क्षेत्र में अशांति फैला रखी है. जब तक वो अपनी कार्रवाइयां बंद नहीं करेगा हम उसका विरोध करते रहेंगे और लड़ते रहेंगे.''
हाल ही में पश्चिमी इराक़ के एक ऐसे सैनिक हवाई अड्डे पर रॉकेट और मिसाइलों से हमले हुए जहां अमेरिकी सैनिक तैनात थे. इस हमले में कई सैनिक घायल हो गए. ईरान से जुड़े एक गुट 'इस्लामिक रेज़िस्टेंस' ने इन हमलों की ज़िम्मेदारी ली थी.
निगार मोर्तज़ावी कहती हैं कि ईरान और पाकिस्तान की सीमा पर हुई झड़पों का एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस से कोई संबंध नहीं है. इसका निशाना एक स्थानीय बलोची गुट है, जिसे ईरान आतंकवादी संगठन मानता है. एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस के अधिकांश गुटों को कई पश्चिमी देश आतंकवादी संगठन क़रार दे चुके हैं.
निगार मोर्तज़ावी ने कहा कि दो दशक पहले यमन में हूती गुट ने स्थानीय लोगों के अधिकारों के लिए प्रतिरोध शुरू किया था. वहीं इसराइल के लेबनान पर हमले के विरुद्ध हिज़्बुल्लाह का प्रतिरोध जारी है. ऐसे में ईरान ने सोचा कि अमेरिका और इसराइल के ख़िलाफ़ उसके और इन गुटों के लक्ष्य एक जैसे हैं और वह इन गुटों के साथ जुड़ गया है.
यमन का हूती गुट, इसराइल को दुश्मन मानता है और ग़ज़ा में इसराइली युद्ध के शुरू होने के बाद से उसने एक्स्सि ऑफ़ रेज़िस्टेंस के अपने सहयोगी सदस्य हमास के प्रति समर्थन जताने के लिए लाल सागर में व्यापारिक जहाज़ों पर हमले तेज़ कर दिए हैं. इसके जवाब में अमेरिका और ब्रिटेन ने हूती के ठिकानों पर हवाई हमले किए हैं.
निगार मोर्तज़ावी कहती हैं कि इस गुट को ईरान से आर्थिक और राजनीतिक समर्थन मिलता है. वो ईरान के इशारों पर चलता है. इसके ज़रिए ईरान अपने प्रतिद्वंदियों के लिए ग़ैर परंपरागत तरीके से सैनिक चुनौती पेश कर सकता है.
दरअसल ईरान के पास ताक़तवर दुश्मनों से लड़ने के लिए पर्याप्त बड़ी सेना या संसाधन नहीं हैं, इसलिए उसने समान विचारधारा वाले इन प्रतिरोधी गुटों से संबंध बनाया है ताकि संघर्ष की स्थिति में वो अपने दुश्मनों के ख़िलाफ़ इनका इस्तेमाल कर सके. मगर इन गुटों के प्रति ईरान की कितना प्रतिबद्ध है यह स्पष्ट नहीं है.
निगार मोर्तज़ावी ने कहा, ''ईरान की सरकार कहती है कि यह स्वायत्त गुट हैं और केवल साझा लक्ष्य के कारण वह उनका समर्थन करती है. मैं अमेरिकी ख़ुफ़िया जानकारी से सहमत हूं कि ग़ज़ा से इसराइल पर हुए हमास के हमले की योजना बनाने में ईरान का हाथ नहीं था.''
''ईरानी अधिकारियों ने दो तरफ़ा बयान दिए. एक तो उन्होंने कहा कि सैद्धांतिक रूप से वो उस कार्रवाई का समर्थन करते हैं, मगर साथ यह भी कहा कि वो पूरी तरह से फ़लस्तीनियों की कार्रवाई थी. यानि ईरान ऐसे समर्थन करता है कि ज़रूरत पड़ने पर वो 7 अक्तूबर के हमले के परिणामों से बच सके.''
निगार मोर्तज़ावी के अनुसार एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस और ईरान के बीच कई मुद्दों पर मतभेद भी हैं. मगर ईरान की भूमिका को समझने के लिए उसके इतिहास में झांकना ज़रूरी है.
ईरान में सत्ता परिवर्तन
वर्तमान ईरान एक इस्लामी गणतंत्र है, लेकिन इससे पहले वहां राजशाही थी. ईरान के शाह पश्चिमी देशों की सहायता से देश का आधुनिकीकरण करना चाहते थे. ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सटी में ईरान के इतिहास और राजनीति की प्रोफ़ेसर मरियम आलेमज़ादेह कहती हैं कि ईरान के शाह मोहम्मद रज़ा पेहलवी और अमेरिका के बीच घनिष्ठ संबंध थे.
''मोहम्मद रज़ा पेहलवी महानता चाहते थे और अपने आप को अमेरिका का विश्वसनीय सहयोगी मानते थे. 1979 की इस्लामी क्रांति से पहले ईरान की विदेश नीति काफ़ी हद तक अमेरिका के साथ गठबंधन पर केंद्रित थी जो मध्य पूर्व के अन्य देशों के साथ उसके संबंधों को प्रभावित करती थी.''
उस दौरान अमेरिका, सोवियत संघ और उनके सहयोगी देशों के बीच तनाव बढ़ गया था. अमेरिका मध्य पूर्व में अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए एक सहयोगी चाहता था. उसी समय शाह ने ईरान को पश्चिमी देशों जैसा बनाने के लिए कोशिश तेज़ कर दी थी.
उनके प्रशासन के ख़िलाफ़ देश में हड़ताल और दंगे शुरू हो गए. करीब चालीस साल तक सत्ता में रहने के बाद 1979 में शाह देश छोड़कर भाग गए. उनके जाने के बाद एक धार्मिक नेता अयातुल्लाह ख़ोमैनी निष्कासन से ईरान वापस लौटे और देश के सुप्रीम लीडर या सर्वोच्च नेता बन गए.
मरियम आलेमज़ादेह का मानना है कि इस्लामी क्रांति के बाद ईरान में सबसे बड़ा परिवर्तन लोगों के रहन-सहन के तरीके में आया. महिलाओं के लिए हिजाब पहनना और मर्दों के लिए सामान्य कपड़े पहनना अनिवार्य कर दिया गया.
दूसरा परिवर्तन ईरान की विदेश नीति में आया. दुनिया के अधिकांश देशों को दुश्मन की तरह देखा जाने लगा और विश्व की बड़ी ताकतों के प्रभाव से दूर रहने पर बल दिया जाने लगा.
इसके साथ ही दूसरे देशों में इस्लामी क्रांति लाने के लिए भी योजना बनाई जाने लगीं. मरियम आलेमज़ादेह कहती हैं कि इसके लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए गए क्योंकि देश के प्रभावशाली गुटों का एक बहुत छोटा हिस्सा ही ऐसा चाहता था.
मरियम आलेमज़ादेह का मानना है कि कुछ धार्मिक नेता और गुरिल्ला मिलिशिया नेता जिन्होंने सीरिया, लेबनान और फ़लस्तीनी गुटों के साथ संबंध बना रखे थे, वो ऐसा चाहते थे लेकिन इस्लामी क्रांति के कुछ सालों बाद ही यह नेता हाशिए पर आ गए थे क्योंकि ईरान की मुख्य नीति- राष्ट्र निर्माण और क्षेत्र में अन्य देशों के साथ गठबंधन बनाने पर केंद्रित हो गई थी.
ईरान के सर्वोच्च नेता का 1989 में निधन हो गया. उनके उत्तराधिकारी आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई पिछले 35 सालों से सरकार में हैं. लेकिन ईरान में सत्ता के ढांचे का क्या स्वरूप है?
मरियम आलेमज़ादेह कहती हैं कि देश में सत्ता की सीढ़ी के सबसे ऊपर सुप्रीम लीडर हैं. उसके बाद चुनी हुई सरकार, मंत्रिमंडल और संसद है. लेकिन नीतिगत फ़ैसलों में कई समानांतर संस्थाओं की भूमिका होती है.
इसमें इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) भी शामिल है. इस सैनिक संस्था का गठन देश और इस्लामी क्रांति की सुरक्षा के लिए किया गया था. यह केवल सैनिक संस्था ही नहीं है बल्कि वित्तीय और विदेश नीति पर भी प्रभाव रखती है.
मरियम आलेमज़ादेह के अनुसार- आईआरजीसी में भीतरी मतभेद हैं. इसके कुछ नेता सुप्रीम लीडर की कट्टरवादी विदेश नीति के पक्ष में नहीं हैं. मगर जब तक वर्तमान सुप्रीम लीडर आयातुल्लाह अली ख़ामेनेई हैं तब तक आख़िरी फ़ैसला उन्हीं का रहेगा.
ईरान में पश्चिमी राजनीतिक और सांस्कृतिक विचारधारा का विरोध बरक़रार है. जब ईरान के पश्चिमी देशों के साथ संबंध इतने कड़वे हो चुके हैं तो उसे आर्थिक सहयोगी कहां से मिलेंगे?
रूस और चीन से आर्थिक सहयोग
वाशिंगटन स्थित ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूशन की उपाध्यक्ष और फ़ॉरेन पॉलिसी प्रोग्राम की निदेशक सूज़न मेलोनी कहती हैं कि ईरान अब रूस, चीन और एशिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ आर्थिक गठबंधन बना रहा है.
''ईरान का नेतृत्व देश को रूस और चीन के बराबर बनाना चाहता है. इस गठजोड़ से रूस को यूक्रेन युद्ध के लिए ईरान से मिसाइल और ड्रोन की सप्लाई हो रही है. वहीं ईरान को इससे आर्थिक लाभ हो रहा है.''
रूस और ईरान दुनिया के ऐसे देश हैं जिन पर सबसे अधिक प्रतिबंध लगे हुए हैं. ईरान पर प्रतिबंध इसलिए लगे हैं क्योंकि वो अपने परमाणु संयंत्रों की अंतरराष्ट्रीय निगरानी से मना करता है और उस पर विदेशों में कार्रवाइयां कर महत्वपूर्ण व्यक्तियों की हत्या के आरोप हैं.
सूज़न मेलोनी का कहना है कि यह दोनो देश प्रतिबंधों से बच कर व्यापार जारी रखने में एक दूसरे की मदद करते हैं. ईरान अपनी सैनिक क्षमता मज़बूत करने के लिए रूस से लड़ाकू विमान और अन्य सैन्य सामग्री चाहता है. दोनों देशों के बीच इस प्रकार का सहयोग कई सालों से जारी है.
कई सालों से ईरान और चीन के बीच व्यापारिक संबंध भी मज़बूत हो रहे हैं.
सूज़न मेलोनी के मुताबिक चीन ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अमेरिकी प्रतिबंध के बावजूद ईरान का अधिकांश तेल चीन ख़रीदता है. चीन और रूस ने ईरान के साथ नज़दीकी संबंध बना लिए हैं क्योंकि ईरान अमेरिका का प्रखर विरोधी है.
सूज़न मेलोनी कहती हैं कि ईरान एशिया में भी नए गठबंधन बना रहा है. 2003 में सद्दाम हुसैन को सत्ता से हटाए जाने के बाद इराक़ में ईरान का प्रभाव बढ़ गया है. वो इराक़ को बिजली और दूसरी आवश्यक चीज़ों की सप्लाई में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है.
चीन की मध्यस्थता से ईरान ने सऊदी अरब और खाड़ी के अन्य देशों के साथ अपने संबंध सुधार लिए हैं. मगर प्रतिबंधों की वजह से ईरान की अर्थव्यवस्था को सैंकड़ों अरब डॉलर का नुकसान हुआ है. उसे अपनी नीतियों की भारी कीमत चुकानी पड़ी है.
पश्चिमी देशों से वार्ता की संभावना
अटलांटिक काउंसिल के स्कोक्रॉफ़्ट मिडिल ईस्ट प्रोग्राम की शोधकर्ता क्रिस्टीन फोंटैनरोज़ के अनुसार ईरान के नेता क्षेत्र के अपने पड़ोसियों और विश्व के अधिकांश देशों को अपने दृष्टिकोण के लिए ख़तरे के तौर पर देखते हैं.
''वो देश में शिक्षा के सुधार, नई टेक्नोलॉजी, खाद्य सुरक्षा और विश्व के बाज़ार में जगह बनाने के बारे में सोचने के बजाय केवल अपनी सरकार बचाना चाहते हैं इसलिए उनके साथ बातचीत मुश्किल है.''
मगर ईरान और पश्चिमी देशों के बीच वार्ता पूरी तरह ठप भी नहीं हुई है. मिसाल के तौर पर पिछले साल सितंबर में क़तर की मध्यस्थता से ईरान और अमेरिका के बीच बंदियों की रिहाई के लिए एक समझौता हुआ था जिसके तहत अमेरिका प्रतिबंधों की वजह से ज़ब्त किए गए ईरान के 6 अरब डॉलर लौटाने को तैयार हो गया था. लेकिन 7 अक्तूबर को हमास के इसराइल पर हमले के बाद अमेरिका और क़तर ने तय किया कि फ़िलहाल ईरान यह पैसे नहीं ले पाएगा क्योंकि इस धन का ग़लत इस्तेमाल भी हो सकता है.
ईरान के सुप्रीम लीडर की नियुक्ति आजीवन काल के लिए होती है. अब वो 84 साल के हैं. उनका कोई उत्तराधिकारी नहीं चुना गया है.
क्रिस्टीन फोंटैनरोज़ का कहना है कि अगले नेता को सत्ता सौंपने के दौरान उनके लिए जोखिम को कम करने के लिए कदम उठाए जा रहे हैं और सीमा पार मिसाइल हमले से इस काम में मदद मिलेगी.
क्रिस्टीन फोंटैनरोज़ की राय है कि ईरान के नेता अपनी जनता को यह संदेश देना चाहते हैं कि सरकार मज़बूत है और विरोधी गुटों से जनता की रक्षा कर सकती है. लोग देश के नेताओं पर भरोसा करें और उनकी नीतियों का समर्थन करें. ऐसा इसलिए भी हो रहा है क्योंकि जनता में सरकारी नीतियों के ख़िलाफ़ नाराज़गी है.
कुछ लोगों का यह मानना भी है कि इसराइल और ग़ज़ा के बीच संघर्ष की वजह से विश्व का ध्यान ईरान की कार्रवाइयों पर कम हो गया है.
क्रिस्टीन फोंटैनरोज़ का मानना है कि ईरान की सरकार इसका फ़ायदा उठा कर देश और विदेश में होने वाले विरोध को कुचल रही हैं. जनवरी में ईरान ने ओमान की खाड़ी में उस तेल वाहक जहाज़ पर दोबारा कब्ज़ा कर लिया जिसे अमेरिका ने प्रतिबंधों के उल्लंघन की वजह से पिछले साल ज़ब्त किया था. साथ ही ईरान ने तीन पड़ोसी देशों पर मिसाइल हमले किए हैं. मगर ईरान इस युद्ध को किस तरह समाप्त होता देखना चाहेगा?
क्रिस्टीन फोंटैनरोज़ ने कहा, ''ईरान चाहेगा कि ग़ज़ा संघर्ष में इसराइल नष्ट हो जाए क्योंकि इसराइल को दुनिया के नक़्शे से मिटाना ईरान का एक घोषित लक्ष्य है. उसे पता है कि यह हासिल नहीं हो सकता. ऐसे में वो चाहेगा कि पड़ोसी अरब देशों और विश्व के दूसरे देशों के लिए इसराइल के साथ गठबंधन मुश्किल हो जाए जिससे क्षेत्र में इसराइल और अमेरिका का प्रभाव कम हो जाए. अगर वो यह लक्ष्य हासिल कर पाए तो पिछले कई सालों से उसका हमास में किया गया निवेश फ़ायदेमंद साबित होगा.''
अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर कि ईरान क्या चाहता है? हमारे एक्सपर्ट की राय है कि ईरानी नेता अपनी सत्ता बरकरार रखना चाहते हैं. दूसरा ईरान मध्य पूर्व का सबसे प्रभावशाली देश बनना चाहता है. इसराइल और अमेरिका से सीधी लड़ाई किए बिना वो चीन और रूस के साथ मिल कर अपनी ताकत बढ़ाना चाहता है.
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