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पीएम मोदी क्या ईरान के साथ मिलकर इसराइल को मना पाएँगे?
- Author, प्रियंका झा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
सात अक्टूबर को हमास ने इसराइल पर बड़ी संख्या में रॉकेट दागकर दुनिया को चौंकाया था. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे 'आतंकवादी हमला' बताते हुए इसकी निंदा की थी.
इसके बाद से इसराइल की ग़ज़ा पट्टी में बमबारी जारी है. इसराइल और हमास में जारी संघर्ष के बीच सोमवार को ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की फ़ोन पर बात हुई.
इस बातचीत के बाद ये सवाल उठा कि क्या ईरान और भारत साथ आकर इसराइल को ग़ज़ा के मामले में मना पाएंगे?
ईरानी राष्ट्रपति से हुई बातचीत की जानकारी देते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया साइट एक्स पर लिखा, "पश्चिम एशिया क्षेत्र में कठिन परिस्थितियों और इसराइल-हमास संघर्ष पर ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी से चर्चा हुई. आतंकवादी घटनाएं, हिंसा और आम लोगों की जान जाना चिंता के मुद्दे हैं."
वहीं, ईरान की ओर से जारी किए गए बयान के अनुसार इब्राहिम रईसी ने पीएम मोदी से कहा कि मध्य पूर्व में जारी इस संघर्ष को रोकने के लिए भारत को अपनी पूरी क्षमताओं का इस्तेमाल करना चाहिए.
इससे एक दिन पहले ही विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने ईरानी समकक्ष हुसैन आमिर अब्दुल्लाहियान से बात की थी.
ईरान और भारत के शीर्ष नेताओं की ये वार्ता ऐसे समय भी हुई है, जब सात अक्तूबर को हमास के इसराइल पर हमले के बाद पीएम मोदी के ट्वीट को फ़लस्तीन पर भारत के रुख में बदलाव से जोड़ा जाने लगा था.
हालांकि, भारत ये स्पष्ट कर चुका है कि फ़लस्तीन को लेकर उसकी नीति नहीं बदली और वो दो राष्ट्र समाधान का ही समर्थक है. संघर्ष के बीच पीएम मोदी ने फ़लस्तीनी क्षेत्र के राष्ट्रपति महमूद अब्बास से भी फ़ोन पर बात की और ग़ज़ा को मानवीय सहायता भी भेजी है.
लेकिन पीएम मोदी और इब्राहिम रईसी की बातचीत के बाद ईरान की ओर से जारी किए गए बयान में इसराइल पर सीधे हमले किए गए हैं, जिससे भारत के रुख पर एक बार फिर चर्चा तेज़ हुई है.
ईरान ने मोदी-रईसी के बारे में क्या बताया?
ईरान की समाचार एजेंसी इरना ने जानकारी दी है कि ईरान के राष्ट्रपति ने नरेंद्र मोदी से सोमवार को हुई बातचीत के दौरान क्या-क्या कहा.
इब्राहिम रईसी ने कहा कि उनका देश तुरंत युद्ध विराम और ग़ज़ा के लोगों को मदद पहुंचाने के लिए पूरी दुनिया के संयुक्त प्रयासों के पक्ष में है.
इरना के मुताबिक़, रईसी ने मोदी को ‘पश्चिमी उपनिवेशवाद के ख़िलाफ़ भारत के संघर्ष’ और ‘गुट-निरपेक्ष आंदोलन का संस्थापक देश होने’ की याद दिलाई.
रईसी ने कहा, “आज भारत से उम्मीद है कि वह ग़ज़ा के बाशिंदों के ख़िलाफ़ ज़ायनवादियों के अपराधों को रोकने के लिए अपनी पूरा क्षमताओं का इस्तेमाल करे.”
रईसी का कहना था, ‘'फ़लस्तीनी लोगों की हत्याएं जारी रहने से सभी स्वतंत्र देश बेचैन हैं और इन हत्याओं का असर इस क्षेत्र के बाहर भी देखने को मिलेगा.”
इरना के मुताबिक़, रईसी ने भारत के प्रधानमंत्री के साथ बातचीत में कहा कि ‘प्रतिरोध करने वाले फ़लस्तीनी समूहों के पास ज़ायनवादी अतिक्रमण का मुक़ाबला करने का पूरा अधिकार है और सभी देशों को इस दमन से मुक्ति के लिए संघर्ष कर रहे फ़लस्तीनी लोगों का समर्थन करना चाहिए.’
दोनों नेताओं ने मध्य पूर्व में पैदा हुए हालात को बिगड़ने से रोकने और तुरंत शांति बहाल करने की ज़रूरत बताई.
भारत के प्रधानमंत्री कार्यालय की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि इस बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ग़ज़ा में हालात बेकाबू होने से रोकने, मानवीय मदद पहुंचाने के लिए प्रयास जारी रखने और पूरे क्षेत्र में शांति व स्थिरता को तुरंत बहाल करने की ज़रूरत पर ज़ोर दिया.
इसमें कहा गया है कि पीएम ने आतंकवादी घटनाओं, हिंसा और आम लोगों की जान जाने पर चिंता जताई. उन्होंने इसराइल-फ़लस्तीन मसले पर भारत के स्थायी और लंबे समय से चले आ रहे रुख़ को दोहराया.
भारत का 'बैलेंसिंग एक्ट'?
ईरान शिया इस्लामिक देश है और भारत में भी ईरान के बाद सबसे ज़्यादा शिया मुसलमान हैं. अगर भारत का विभाजन न हुआ होता यानी पाकिस्तान नहीं बनता तो ईरान से भारत की सीमा लगती.
दूसरी ओर 2014 में मोदी सरकार आने के बाद इसराइल और भारत भी करीब आते गए हैं. दोनों देशों के बीच रक्षा, सायबर, तकनीकी के क्षेत्र में सहयोग बढ़ा है. इसराइली पीएम बिन्यामिन नेतन्याहू और पीएम मोदी एक-दूसरे की सराहना करते दिखते हैं.
इसराइल पर हमास के हमले के बाद ईरान ने खुलकर हमास का समर्थन किया था. वहीं भारत ने फ़लस्तीन या हमास का ज़िक्र किए बग़ैर इसे आतंकवादी हमला कहा.
ताज़ा घटनाक्रम के बाद ये सवाल पूछा जा रहा है कि इसराइल और ईरान के बीच क्या भारत संतुलन बैठाने की कोशिश कर रहा है?
नई दिल्ली स्थित थिंक टैंक सेंटर फॉर इंडिया वेस्ट एशिया डायलॉग (सीआईडब्ल्यूएडी) के डायरेक्टर डॉक्टर उमैर अनस ऐसा नहीं मानते.
बल्कि उनका कहना है कि भारत और ईरान के बीच संवाद ये दिखाता है कि ग़ज़ा का संकट अब जिस ओर जा रहा है, उससे सभी देशों का सब्र टूट रहा है. सभी देशों को डर है कि अब ये संघर्ष बड़े क्षेत्रीय संकट में बदल सकता है और इससे प्रभावित होने वाले देशों में भारत ज़रूर होगा.
वो कहते हैं, "इस वक्त तो इसराइल और ईरान के बीच संतुलन बैठाना कोई बड़ा सवाल नहीं है बल्कि ग़ज़ा में जो संकट चल रहा है, वो सबसे बड़ा मुद्दा है. ग़ज़ा को लेकर इस क्षेत्र में भारत की एक छवि बन गई है. ऐसा माना जा रहा है कि वो इसराइल के साथ खड़ा है. अरबी मीडिया देखिये चाहे फारसी, हर तरफ़ यही लिखा जा रहा है कि भारत ने फ़लस्तीन को छोड़ दिया और पूरी तरह से इसराइल का साथ दिया है. इससे भारत को अरब देशों के बीच नुकसान हो सकता है."
हालांकि, वो पीएम मोदी के पिछले बयान का ज़िक्र करते हुए ये कहते हैं कि ग़ज़ा को लेकर इस क्षेत्र में भारत की एक छवि बन गई है. ऐसा माना जा रहा है कि वो इसराइल के साथ खड़ा है.
वह कहते हैं, "अरबी मीडिया देखिये चाहे फ़ारसी, हर तरफ़ यही लिखा जा रहा है कि भारत ने फ़लस्तीन को छोड़ दिया और पूरी तरह से इसराइल का साथ दिया है. इससे भारत को अरब देशों के बीच नुकसान हो सकता है."
जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी के नेल्सन मंडेला सेंटर फॉर पीस एंड कॉन्फ़्लिक्ट रिज़ॉल्यूशन में पढ़ा रहे असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर प्रेमानंद मिश्रा भी इसे बैलेंसिंग एक्ट नहीं मानते.
वो कहते हैं कि मौजूदा स्थिति ऐसी नहीं है जिसमें भारत को ईरान या इसराइल में से किसी एक को चुनना है. न तो भारत को ईरान को खुश करना है और ईरान-इसराइल के बीच कोई सीधी लड़ाई भी नहीं हो रही है.
वो कहते हैं, "इस तथ्य को भी कम करके नहीं आंका जा सकता कि इसराइल और हमास के बीच जो संघर्ष चल रहा है, उसमें ईरान एक महत्वपूर्ण खिलाड़ी है. बैलेंसिंग एक्ट तब ज़्यादा होता है जब कोई एक शक्ति अन्य दो शक्तियों के बीच पिस रही हो.''
ईरान को भारत से इतनी उम्मीद क्यों?
डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल में अमेरिका ने परमाणु समझौते को लेकर बात न बन पाने की वजह से ईरान पर कई प्रतिबंध लगाए थे. इसके कारण भारत और ईरान के संबंधों ने भी कई चुनौतियों का सामना किया. भारत को वर्ष 2019 में ईरान से तेल आयात बंद करना पड़ा था.
ईरान और भारत के संबंध कभी खराब नहीं रहे हैं लेकिन ईरान पर लगे प्रतिबंधों के कारण दोनों के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे ज़रूर रहे हैं.
साल 2021 में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए विदेश मंत्री एस जयशंकर तेहरान गए थे. इस दौरे को दोनों देशों के रिश्तों में आई कड़वाहट को कम करने की कोशिश के तौर पर देखा गया था. इसी साल भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने भी ईरान का दौरा किया था.
इसे दोनों देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सुरक्षा के क्षेत्र में बढ़ते सहयोग का संकेत माना गया.
बीते महीने ही कुछ मीडिया रिपोर्टों में ये कहा गया कि भारत और ईरान के बीच चाबहार पोर्ट के संचालन के लिए प्रस्तावित 10-साल के समझौते पर मतभेदों को कम किया जा रहा है.
वहीं, भारत में ईरान के राजदूत इराज इलाही ने भी एक चैनल को दिए इंटरव्यू में कहा कि भारत सीज़फ़ायर तक पहुंचने में एक रचनात्मक भूमिका निभा सकता है.
ऐसे में सवाल ये है कि ईरान ने भारत से इतनी उम्मीदें क्यों पाल ली हैं? जानकार इसके पीछे ईरान के अपने हितों को सबसे बड़ी वजह मानते हैं.
उमैर अनस कहते हैं, "ईरान इस बड़े झगड़े का हिस्सा नहीं बनना चाहता. ईरान के ऊपर भी बहुत दबाव है. लेबनान से हिज़्बुल्लाह और सीरिया से किसी को न आने देने का दबाव है. ईरान पर ये भी दबाव है कि ग़ज़ा में इतने सारे लोग मारे जा रहे हैं, तो आख़िर आप कब कार्रवाई करेंगे. ईरान के समर्थन करने वाले जितने भी लड़ाके गुट हैं, वो भी लगातार ईरान से कह रहे हैं कि आप हमें इस संघर्ष में कब जाने की इजाज़त देंगे. ईरान पर दोनों मोर्चों से दबाव है."
वहीं प्रेमानंद मिश्रा का कहना है कि ईरान ये ज़रूर जानता है कि भारत भले ही वर्ल्ड पॉलिटिक्स में डॉमिनेंट पावर न हो लेकिन महत्वपूर्ण शक्ति ज़रूर है, जिसके संबंध इसराइल, फ़लस्तीन और अरब देशों से अच्छे हैं और अमेरिका से भी अच्छे हैं.
वहीं, ईरान को ये भी जानकारी है कि पिछले 40 सालों से उसके सुन्नी अरब, अमेरिका और इसराइल किसी से भी अच्छे संबंध नहीं हैं.
"ऐसे में जब आप भारत जैसी शक्ति को देखते हैं, जिसके साथ संबंध उतने खराब नहीं हैं, तो आप अपनी कई बातें उनके ज़रिए रखने की कोशिश करते हैं."
भारत रोक सकता है इसराइल-हमास संघर्ष?
जब रूस ने पिछले साल यूक्रेन पर आक्रमण किया था तब भी ये सवाल उठा था कि क्या भारत इस युद्ध को रोकने में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकता है?
भारत उस समय भी गुट-निरपेक्ष की नीति पर ही चला. एक बार फिर से ये सवाल उठ रहा है. इस बार तो भारत ऐसा देश है जिसके इसराइल, फ़लस्तीन और ईरान तीनों से ही अच्छे संबंध हैं.
उमैर अनस कहते हैं कि प्रधानमंत्री ने दो बातें बड़ी स्पष्टता से रखी है.
पहला कि सात अक्टूबर को हमास का इसराइल पर किया हमला एक आतंकवादी घटना थी, जो नहीं होना चाहिए था. वह इसे भारत की मज़बूत डिप्लोमेसी का उदाहरण भी बताते हैं.
दूसरी तरफ़ वो इस पर भी बात कर रहे हैं कि फ़लस्तीन में जो नागरिक आहत हो रहे हैं, उसपर भी भारत फ़िक्रमंद है. ये भारत की मज़बूत डिप्लोमेसी का संकेत है.
लेकिन क्या भारत अंतरराष्ट्रीय मंच पर खुद को इतनी बड़ी शक्ति के तौर पर स्थापित कर चुका है कि वो इसराइल और फ़लस्तीन के विवाद को सुलझा पाए, तो इसका जवाब अधिकांश जानकार ना में ही देते हैं.
डॉक्टर प्रेमानंद मिश्रा इसके पीछे की वजह समझाते हुए कहते हैं, " ऐसा नहीं होगा कि इसराइल और फ़लस्तीन दोनों भारत की बात सुन लें और संघर्ष खत्म हो जाए. फिलहाल अमेरिका के अलावा ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो इस संघर्ष को रोक पाए. यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र भी उस स्थिति में नहीं है कि इस मामले को रातोंरात बदल दे."
वह कहते हैं कि भारत की भूमिका इतनी ही है कि वो दबाव बनाए ताकि दोनों पक्ष सहमति पर पहुंचे. वो अंतरराष्ट्रीय कानूनों का हवाला दे सकता है. लेकिन अगर ये पूछे कि क्या भारत इसराइल और फ़लस्तीन के मुद्दे को सुलझा सकता है तो फिलहाल उसका कद अंतरराष्ट्रीय मंच पर इतना बड़ा नहीं है.
प्रेमानंद मिश्रा अपनी बात ये कहते हुए ख़त्म करते हैं कि, "भारत एक तरह से अप्रत्यक्ष मध्यस्थ के तौर पर भूमिका निभा सकता है. हो सकता है कि ईरान भारत के साथ इस मुद्दे पर भी बात करना चाहे क्योंकि भारत के संबंध सभी देशों के साथ अच्छे हैं. अगर आपके संबंध दो विरोधी मुल्कों के साथ अच्छे हों तो आप अप्रत्यक्ष मध्यस्थ की भूमिका ज़रूर निभा सकते हैं."
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