You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
विवेचना: इंदिरा गांधी को अपनी बहन मानते थे यासिर अराफ़ात
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली
इसराइल के एक नामी वकील योएल सिंगर का मानना है कि उन्होंने यासिर अराफ़ात से अच्छा वार्ताकार नहीं देखा. वो एक हॉलीवुड फ़िल्म के जुआरी की तरह थे जिसके पास ख़राब पत्ते होते हुए भी वो हमेशा लोगों को झाँसा देता रहता था कि आख़िर में जीत उसकी ही होगी.
जब सब समझते थे कि बातचीत अपने अंतिम दौर में पहुंच गई है और अब बस समझौता होने भर की देर है, अराफ़ात अचानक अपनी माँगें बढ़ा देते थे.
अगर हस्ताक्षर समारोह कल है तो अराफ़ात आज अपने लिए ज़्यादा से ज़्यादा रियायत लेने की फ़िराक में रहते थे.
संयुक्त राष्ट्र संघ में भाषण
अराफ़ात की ज़िदगी में 13 नवंबर, 1974 का ख़ास महत्व है. उस दिन न्यूयॉर्क के संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में काफ़ी कड़ी सुरक्षा थी.
फ़लस्तीन मुक्ति संगठन के प्रमुख यासिर अराफ़ात को संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्लेनरी सत्र में भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया था. पहली बार किसी राष्ट्र का नेतृत्व न करने वाले शक्स को ये सम्मान हासिल होने वाला था.
उस ज़माने में अराफ़ात के करीबी और बाद में फलस्तीनी प्रशासन के पहले विदेश मंत्री नबील शाथ को वो दिन अभी तक याद है.
नबील याद करते हैं, "अराफ़ात ने पहली बार वो चीज़ मानी थी जो उन्होंने पहले कभी भी स्वीकार नहीं की थी. उन्होंने अपनी दाढ़ी पूरी तरह से साफ़ करा दी थी और नया सूट भी पहना था. उनके ख़ाकी सूट पर बहुत ढ़ंग से प्रेस की गई थी और वो बिल्कुल चमक रहे थे."
जैतून की शाख़
उस दिन अराफ़ात न्यूयॉर्क हवाई अड्डे से हैलीकॉप्टर से सीधे संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय पहुंचे थे. ठीक उसी समय कारों का एक काफ़िला वहाँ से 'वॉलडॉर्फ़ एस्टोरिया' होटल की तरफ़ रवाना हुआ था ताकि अराफ़ात के विरोधियों को ये आभास दिया जाए कि वो कार के ज़रिए अपने होटल जा रहे हैं.
उस दिन अराफ़ात ने अपने भाषण का अंत दो यादगार वाक्यों से किया था. वो बोले थे "मैं यहाँ ज़ैतून की शाख़ और स्वतंत्रता सेनानी की बंदूक लिए आया हूँ. मेरे हाथ से ज़ैतून की इस शाख़ को गिरने मत दीजिए."
अगले दिन ये भाषण दुनिया के हर अख़बार की सुर्ख़ी बना और उस भाषण के नौ दिनों के भीतर संयुक्त राष्ट्र संघ ने अपना प्रस्ताव नंबर 3237 पारित कर पीएलओ को संयुक्त राष्ट्र में पर्यवेक्षक का दर्जा दे दिया था.
अपनी सुरक्षा के प्रति बहुत जागरूक
अराफ़ात दाढ़ी नहीं बनाते थे. उनकी शक्ल ऐसी दिखती थी जैसे उन्हें तुरंत नहाने की ज़रूरत हो.
अराफ़ात की जीवनी लिखने वाले एलन हार्ट लिखते हैं, "अराफ़ात नाटे क़द के शख़्स थे, क़रीब 5 फ़ीट 4 इंच लंबे या शायद इससे भी कम. वो चाहे जहाँ भी हों या कुछ भी कर रहे हों, वो एक जगह स्थिर हो कर नहीं बैठ सकते थे."
उनके मुख्य राजनीतिक सलाहकार हनी हसन बताया करते थे कि "किसी जगह पर बैठने से पहले अराफ़ात उस हर कोण का अद्धयन करते थे जहाँ से उन पर गोली चलाई जा सकती थी. हम बातचीत में खोए होते थे कि अराफ़ात अचानक हमें रोक कर अपने बैठने की जगह बदल लेते थे. हमने कभी उनसे इसका कारण नहीं पूछा. उनका एक जगह से दूसरी जगह जाना इतना गुप्त रख जाता था कि उनके नज़दीकी लोगों को भी पता नहीं रहता था कि वो कहाँ जा रहे हैं."
"फ़रवरी 1973 में इसराइल ने लीबिया का एक यात्री विमान मार गिराया था जिसमें विमान में सवार सभी 100 यात्री मारे गए थे. मेरे पास कोई सबूत तो नहीं है, लेकिन मुझे आश्चर्य नहीं होगा अगर बाद में पता चले कि इसराइल ने इस उम्मीद में विमान गिरा दिया था कि उस पर मैं या हमारे दूसरे साथी सवार थे."
देर से शादी
भारत के पूर्व राजनयिक और संयुक्त राष्ट्र महासचिव चिनमय गरेखान को उनसे कई बार मिलने का मौका मिला था.
गरेखान कहते हैं, "अराफ़ात से मेरी कई बार मुलाकात हुई... कह सकते हैं, क्योंकि मैं संयुक्त राष्ट्र की तरफ़ से गज़ा में तैनात था. वो बहुत 'चार्मिंग' हो सकते थे जब वो चाहते थे. उनकी छोटी दाढ़ी होती थी और वो हमेशा फ़ौजी लिबास पहनते थे. सीधे इंसान थे. जटिल बिल्कुल भी नहीं थे लेकिन जहाँ तक फ़लस्तीनी आंदोलन या इसराइल के साथ संबंधों की बात थी, उस को वो बहुत गंभीरता से लेते थे और शंका की दृष्टि से देखते थे."
गरेखान कहते हैं कि उन्होंने बहुत देर से शादी की. पहले तो वो कहा करते थे कि उनकी शादी तो फ़लस्तीन से है. बाद मे उन्होंने सुहा से शादी की. सुहा ईसाई थीं जबकि अराफ़ात सुन्नी मुसलमान थे.
कहते हैं कि सुहा अराफ़ात को बहुत चाहती थीं. उनकी एक बच्ची भी थी जो अब बड़ी हो गई होगी. वो गज़ा में बहुत साधारण और छोटे से घर में रहते थे जिसमें दो मंज़िलें थीं.
अराफ़ात पहली मंज़िल पर रहते थे और ग्राउंड फ़्लोर पर उनकी पत्नी रहती थीं अपनी बच्ची के साथ.
अराफ़ात की फ़ौजी ड्रेस
अराफ़ात हमेशा सैनिक कपड़ों में ही दिखाई देते थे. उनके जूते ब्रिटिश सैनिक अफ़सरों की तरह हमेशा चमकते रहते थे.
यासिर अराफ़ात की जीवनी लिखने वाले बैरी रुबिन और ज्यूडिथ कोल्प रूबिन कहते हैं, "अराफ़ात सूट और टाई इसलिए नहीं पहनते थे, क्योंकि ये पश्चिम की पोशाक थी और दूसरे मंहगे कपड़ो से ऐयाशी का आभास होता था जिसका अन्तर्निहित अर्थ था भृष्टाचार. उनकी अधकचरी दाढ़ी देख कर कोई भी कह सकता था कि वो एक ग़रीब फ़लस्तीनी किसान हैं. उनकी ये वेषभूषा उन्हें लड़ाई के मैदान में एक सैनिक के रूप में भी दिखाती थी जिसके पास निजी ठाठ- बाठ के लिए कोई समय नहीं था."
"ख़ामनेई, हाफ़िज़ असद, सद्दाम हुसैन और ओसामा बिन लादेन, सब देखने में अच्छे दिखते थे, जिनको किसी हॉलीवुड थ्रिलर में सुपर विलेन के तौर पर रखा जा सकता था जो पूरी दुनिया को जीतने पर आमादा है. अराफ़ात अपने कपड़ों और हावभाव से इनके ठीक विरोधी दिखाई देते थे और दूसरों को ये ग़लतफ़हमी हो जाती थी कि उन्हें आसानी से मात दी जा सकती है.
रात बारह बजे सबसे ज़्यादा अलर्ट
अराफ़ात दो पारियों में सोया करते थे. सुबह चार बजे से सात बजे तक और शाम को चार से छह बजे के बीच. इसलिए आधी रात के समय अराफ़ात अपनी सर्वश्रेष्ठ फ़ार्म में रहा करते थे.
गरेखान कहते हैं, "जब भी उनसे अपॉएंटमेंट मांगो या मिलने को कहो तो कभी भी मना नहीं करते थे और हमेशा रात को ग्यारह - बारह बजे ही मिलते थे और रात को ही वो सबसे ज़्यादा अलर्ट रहते थे."
कमर में पिस्टल
अराफ़ात हमेशा अपनी कमर में पिस्टल लटका कर चलते थे. जब वो पहली बार संयुक्त राष्ट्र में भाषण देने गए तो उनसे कहा गया कि सभागार में कोई भी हथियार ले जाने पर मनाही है. समझौता इस बात पर हुआ कि वो अपनी ख़ाकी वर्दी पर पिस्टल को होल्सटर तो लगाए रहेंगें लेकिन इसमें पिस्टल नहीं होगी.
मार्क्सवादी कमयूनिस्ट पार्टी के नेता सीताराम येचूरी को उनसे कई बार मिलने का मौका मिला था.
येचूरी याद करते हैं, "अराफ़ात को भी फ़ीदेल कास्त्रो की तरह ज़ोर से गले लगाने की आदत थी. एक बार काहिरा में जब वो मुझसे गले मिले तो मेरे पास उनकी कमर पर बंधी पिस्टल को निकाल लेने का बहुत अच्छा अवसर था. मैंने उनसे कहा भी कि आप सावधान क्यों नहीं रहते. कोई भी ये काम कर सकता है."
"इस पर उन्होंने कहा एक राज़ की बात बताऊँ आपको कि पिस्टल में कोई गोली नहीं है. मैंने उनसे पूछा कि तब आप पिस्टल क्यों रखते हैं ? इस पर अराफ़ात ने कहा कि क्योंकि मेरे पास पिस्टल है कई लोग जो मुझ पर गोली चलाना चाहते हैं, वो ऐसा करने से पहले सौ बार सोचते हैं.'
शहद के शौकीन
मशहूर पत्रकार श्याम भाटिया को यासिर अराफ़ात से कई बार मिलने का मौका मिला था. एक बार इंटरव्यू के दौरान वे उनसे नाराज़ हो गए थे.
श्याम भाटिया बताते हैं, "उस ज़माने में अराफ़ात से इंटरव्यू लेना बहुत मुश्किल होता था. मेरी उनके स्टाफ़ से दोस्ती हो गई थी. उन्होंने मुझसे कहा कि अराफ़ात का इंटरव्यू लेना चाहते हो, तो उनके लिए शहद की एक बोतल लेकर आओ. एक बार मैं ट्यूनिस में उनका इंटरव्यू लेने गया. 20-25 मिनट बाद मैंने उनसे पूछा कि क्या मैं आपकी पत्नी का इंटरव्यू ले सकता हूँ ?"
"इतना सुनते ही अराफ़ात नाराज़ हो गए. बोले-आपकी हिम्मत कैसे हुई, मेरी पत्नी के बारे में बात करने की. फ़ौरन कमरे से निकल जाइए. मैंने कमरे से निकलते हुए डरते-डरते कहा, मैं आपके लिए शहद की बोतल लेकर आया हूँ, जो बाहर मेज़ पर रखी है. होटल में आने के बाद मैंने अपने कमरे का दरवाज़ा बंद ही किया था कि ज़ोर-ज़ोर से दरवाज़ा खटखटाने की आवाज़ सुनाई दी."
अराफ़ात के साथ भोजन
भाटिया कहते हैं, "बाहर अराफ़ात के दो बॉडीगार्ड खड़े थे. उन्होंने मुझे एक गाड़ी में बैठाया और अराफ़ात के उसी घर पर ले गए, जहां से उन्होंने मुझे बाहर निकाला था. जब दरवाज़ा खुला तो अराफ़ात एक बहुत सुंदर महिला के साथ खड़े थे. बोले-मिलिए मेरी पत्नी सुहा से. मैंने कहा आप तो नाराज़ थे मुझसे. वो बोले-वह नक़ली ग़ुस्सा था. आप रुकिए और हमारे साथ खाना खाइए और शहद के लिए बहुत शुक्रिया. "
"अराफ़ात और उनकी पत्नी ने बहुत प्यार से मुझे चावल, हुमुस, मटन स्टू, सलाद और दो सब्ज़ियां खिलाईं और मैं उनके पास दो घंटे तक रहा."
बेबी सिटिंग की ज़िम्मेदारी पत्रकार को
बाद में श्याम भाटिया और अराफ़ात दंपत्ति की नज़दीकी इतनी बढ़ गई कि एक बार अराफ़ात की पत्नी ने अपनी डेढ़ साल की बेटी ज़ह्वा की बेबी सिटिंग की ज़िम्मेदारी उन्हें सौंप दी.
श्याम बताते हैं, "एक बार मैं अराफ़ात का इंटरव्यू करने येरूशलम से ग़ज़ा गया. उनकी पत्नी सुहा ने मुझसे कहा कि क्या आप थोड़ी देर के लिए मेरी बेटी की देखभाल कर सकते हैं. हमारी आया आई नहीं है और हमें ज़रूरी मीटिंग के लिए तुरंत बाहर जाना है."
श्याम आगे बताते हैं, "मैंने उनसे पूछा मैं किस तरह इनकी देखभाल करूँ. सुहा ने कहा तुम्हारे भी बच्चे हैं. तुम्हें मालूम है बच्चों को किस तरह देखा-भाला जाता है. इसको प्रैम में बैठाओ और समुद्र के बग़ल में चहलक़दमी के लिए चले जाओ. कल्पना करें-मैं सूटबूट पहने, टाई समंदर की हवा में उड़ती हुई और मैं अराफ़ात की बेटी को प्रैम में टहला रहा हूँ और मेरे पीछे छह सशस्त्र फ़लस्तीनी सैनिक चल रहे हैं. डेढ़ घंटे बाद अराफ़ात और उनकी पत्नी लौटकर आए. उन्होंने मुझे धन्यवाद दिया और मुझे एक लंबा इंटरव्यू दिया."
इंदिरा गांधी से नज़दीकी
यासिर अराफ़ात अपनी हवाई यात्रा को बहुत गुप्त रखते थे और मेज़बान देश को पहले से नहीं बताया जाता था कि वो वहाँ आने वाले हैं. उनका अक्सर भारत आना होता था. वो इंदिरा गाँधी को अपनी बहन मानते थे.
चिनमय गरेखान याद करते हैं, "जब भी अराफ़ात यहाँ आते थे पहले से हमें बताते नहीं थे. जब उनके पहुंचने एक दो घंटे रह जाते थे तभी ख़बर आती थी कि वो आ रहे हैं. इसके बावजूद इंदिरा गांधी उन्हें हमेशा रिसीव करने हवाई अड्डे पर जाती थीं. हमेशा इंदिरा गांधी को माई सिस्टर कह कर पुकारते थे."
अराफ़ात की दरियादिली
एक ज़माने में भारत के विदेश सचिव रहे रोमेश भंडारी को कई बार यासिर अराफ़ात से मिलने का मौका मिला था.
उन्होंने मुझे बताया था, "एक बार जब मैं उनसे ट्यूनिस में बात कर रहा था ते मुझे ख़बर मिली कि मेरा बेटा गंभीर रूप से बीमार हो गया है. मैंने बातचीत समाप्त की और तुरंत भारत वापस लौट आया."
"जब बाद में अराफ़ात को पता चला कि मेरे बेटे का स्वर्गवास हो गया है तो उन्होंने तुरंत अपने राजदूत को भारत भेजा जो उस समय मंत्रणा के लिए ट्यूनिस आए हुए थे. उन्हें निर्देष थे वो हवाई अड्डे से सीधे मेरे घर जाएं और उनकी तरफ़ से संवेदना व्यक्त करें."
अराफ़ात की तुनुकमिजाज़ी
1983 में भारत में जब गुटनिरपेक्ष देशों का शिखर सम्मेलन हुआ तो वो इस बात पर नाराज़ हो गए कि उनसे पहले जॉर्डन के शाह को भाषण देने का मौका दिया गया. भारत के पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह उस सम्मेलन के सेक्रेट्री जनरल थे.
नटवर बताते हैं, "उस सम्मेलन में सुबह के सत्र में फ़ीदेल कास्त्रो अध्यक्ष थे. उसके बाद इंदिरा गांधी अध्यक्ष बन गईं थीं. सुबह के सत्र के बाद मेरे डिप्टी सत्ती लांबा मेरे पास दौड़े हुए आए और बोले बहुत बड़ी आफ़त आ गई है. यासिर अराफ़ात बहुत नाराज़ हैं और तुरंत ही अपने विमान से वापस जाना चाहते हैं. मैंने इंदिरा जी को फ़ोन किया और कहा कि आप फ़ौरन विज्ञान भवन आ जाइए और अपने साथ फ़ीडल कास्ट्रो को भी लेते आइए."
"कास्त्रो साहब आए और उन्होंने फ़ोन कर यासिर अराफ़ात को बुला लिया. उन्होंने अराफ़ात से पूछा आप इंदिरा गाँधी को अपना दोस्त मानते हैं कि नहीं. अराफ़ात ने कहा, 'दोस्त नहीं... वो मेरी बड़ी बहन हैं.' इस पर कास्त्रो ने तपाक से कहा तो फिर छोटे भाई की तरह बरताव करो और सम्मेलन में भाग लो."
अराफ़ात मान गए और शाम के सत्र में भाग लेने के लिए पहुंच गए.
राजीव का चुनाव प्रचार करना चाहते थे अराफ़ात
राजीव गांधी के साथ भी उनकी बहुत घनिष्टता थी. कहा जाता है कि एक बार उन्होंने भारत में राजीव गांधी के लिए चुनाव प्रचार करने की पेशकश की थी.
चिनमय गरेखान कहते हैं कि "राजीव गाँधी इंदिरा गांधी से ज़्यादा भावनात्मक इंसान थे. इंदिरा यथार्थवादी थीं और उनका तजुर्बा भी अधिक था. राजीव गांधी जब भी अराफ़ात से मिलते थे तो उन्हें ज़ोर से गले लगते थे. अराफ़ात ने मुझे ख़ुद बताया था कि उन्होंने राजीव के लिए चुनाव प्रचार करने का ऑफ़र किया था. मुझे लगता है कि राजीव गाँधी इस पेशकश से नाख़ुश नहीं थे."
"बाद में अराफ़ात ने उनका प्रचार नहीं किया और ये ठीक भी नहीं लगता कि कोई विदेशी इंसान भारत में आ कर चुनाव प्रचार करे. लेकिन अगर उन्होंने अपने समर्थकों को ये संदेश भी भेज दिया होता कि वो राजीव गाँधी को जीतते हुए देखना चाहते हैं, तो राजीव गाँधी काफ़ी ख़ुश हुए होते."
बेनज़ीर भुट्टो से हाथ मिलाना
राजीव गाँधी की तरह बेनज़ीर भुट्टो से भी यासिर अराफ़ात की बहुत नज़दीकी थी. एक बार दोनों के बीच मज़ेदार वाकया हुआ.
जब बेनज़ीर प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने चीफ़ ऑफ़ प्रोटोकॉल अरशद समी ख़ाँ से कहा कि ये ख़्याल रखिएगा कि मैं किसी पुरुष नेता से हाथ नहीं मिलाती.
इस बीच अराफ़ात का कराची आना हुआ और बेनज़ीर उनकी अगवानी करने हवाई अड्डे गईं.
अरशद समी ख़ाँ अपनी आत्मकथा, 'थ्री प्रेसिडेंट्स एंड एन एड' में लिखते हैं, "चीफ़ ऑफ़ प्रोटेकॉल की ज़िम्मेदारी होती है कि वो विमान के अंदर जा कर विदेश से आए मेहमान का स्वागत करता है. मैं अराफ़ात के विमान की सीढ़ियाँ चढ़ ही रहा था कि बेनज़ीर ने मुझे बुला कर मेरे कान में फुसपफुसाया, 'अराफ़ात को याद दिलाना मत भूलना कि मैं पुरुषों से हाथ नहीं मिलाती.' जैसे ही अराफ़ात मिले, मैंने उनसे कहा, 'एक्सिलेंसी, बेनज़ीर भुट्टो आपका स्वागत करने के लिए नीचे खड़ी हैं. आपको बस याद दिला दूँ कि वो पुरुषों से हाथ नहीं मिलाती. अराफ़ात ने कहा, हाँ, हाँ, हाँ... मुझे इस बारे में कई बार बताया गया है. बहरहाल याद दिलाने के लिए शुक्रिया."
अरशद समी आगे लिखते हैं, "जैसे ही अराफ़ात नीचे उतरे, मैं देखता क्या हूँ कि उन्होंने बेनज़ीर से हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. बेनज़ीर ने घूर कर मेरी तरफ़ देखा और झिझकते हुए अपना हाथ आगे बढ़ा दिया. अभी हम लोग चल ही रहे थे कि उन्होंने मुझसे फुसफुसा कर उर्दू में कहा ताकि अराफ़ात समझ न पाएं, 'आपने उन्हें बताया नहीं कि मैं मर्दों से हाथ नहीं मिलाती.' "
"इससे पहले कि मैं जवाब देता, अराफ़ात ने शरारती मुस्कान के साथ कहा, 'शुक्र मनाइए मोहतरमा कि मैंने आपका चुंबन नहीं लिया. ये एक अरबी रस्म है कि जो भी मेरा स्वागत करने आता है, मैं उसके गाल चूमता हूँ, एक बार नहीं, दो बार, दोनों गालों पर.' हम तीनों ने ठहाका लगाया और सलामी मंच की तरफ़ बढ़ गए."
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)