You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
वुसत की डाएरी: गरीब देशों के डर पर पनप रहा है युद्ध का बिज़नेस
- Author, वुसअतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
क्या ज़माना था जब संयुक्त राष्ट्र की जनरल असेंबली में नेहरू, नासिर, डिगॉल, कास्त्रो, अराफ़ात, भुट्टो, इंदिरा, वाजपेयी, मंडेला जैसे लोग बोलते थे तो अपनी समस्याओं और कामयाबियों के ढिंढोरे से ज़्यादा संसार के दुख और सुख की बात करते थे.
अब सिर्फ़ गिने चुने नेता ही बचे हैं जो अपनी पीड़ा भूल के वो बात करें जो इस पृथ्वी का हर आम आदमी सुनना चाहता है.
इस एतबार से मुझे इस साल जनरल असेंबली में सबसे अच्छी तकरीर मलेशिया के 93 वर्ष के प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद की लगी.
चौबीस मिनट के भाषण में एक टुकड़ा ये भी था -
मैडम स्पीकर कैसी अजीब बात है कि अगर आप एक व्यक्ति की हत्या करें तो आप हत्यारे कहलाएं, लेकिन युद्ध के नाम पर लाखों इंसानों को मार डालें तो आप हीरो.
एक इंसान को कत्ल करें तो आपको मृत्युदंड सुनाया जा सकता है, लाखों को मारने पर इतिहास में आपका नाम सुनहरे अक्षरों में लिखा जाता है. सीने पे तमग़ों की कतारें सजती हैं. आपके बुत स्थापित किए जाते हैं.
हत्या अगर कड़ा अपराध है तो युद्ध के नाम पर होने वाला नरसंहार जायज़ और क़ानूनी.
शायद हमारी मानसिकता और तरबियत में केई ऐसी टेढ़ है जिसे सीधा करने की बहुत ज़्यादा ज़रूरत है. विडंबना तो ये है कि हम आज भी ये यक़ीन रखते हैं कि शांति बनाए रखने के लिए युद्ध ज़रूरी है. चुनांचे एक से एक घातक हथियार तैयार और इस्तेमाल हो रहा है.
हथियारों की मंडी
अविकसित देशों को इन नए और कमरतोड़ महंगे हथियारों की लेबोरेटरी और मंडी बना दिया गया है. बल्कि असलियत तो ये है कि वैश्विक शांति की माला सबसे ज़्यादा जपने वाले देश ही इस शर्मनाक़ कारोबार में सबसे आगे हैं.
इस व्यापार ने कई देशों का दिवाला निकाल दिया है.
आज एक आधुनिक फ़ाइटर जेट सौ मिलियन डॉलर का आता है. उसकी देखरेख पर लाखों डॉलर अलग से खर्च करने पड़ते हैं.
मगर ग़रीब देश की भले औक़ात हो ना हो ये हथियार खरीदने के लिए ताक़तवर देशों के दवाब का शिकार हैं.
उन्हें डराया जाता है कि उनके दुश्मनों और हमसायों के पास ये हथियार पहले से मौजूद हैं और लिहाजा उन्हें भी शक्ति का संतुलन बनाए रखने के लिए ये हथियार ख़रीदने ज़रूरी हैं.
चुनांचे भूख और दूसरी मुसीबतों से जूझते देशों के बजट का बड़ा हिस्सा इन महंगे हथियारों की खरीदारी में चला जाता है, जो मुमकिन है कभी इस्तेमाल भी ना हों.
मगर मैडम स्पीकर मुझे यक़ीन है कि मेरे जीवन में ना सही पर अगली कोई ना कोई पीढ़ी इस रिवाज, इस सोच का बोझ ज़रूर उतार फेंकेगी.
ये भी पढ़ें:-
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)