यूजीसी के नए नियमों से जुड़े किन सवालों को परख कर फ़ैसला करेगा सुप्रीम कोर्ट?

सुप्रीम कोर्ट की इमारत

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इमेज कैप्शन, कोर्ट ने कई मुद्दों पर विस्तृत जांच की बात कही है
    • Author, उमंग पोद्दार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (यूजीसी) उच्च शिक्षा संस्थानों में भेदभाव को रोकने के लिए जनवरी 2026 में नए नियम लेकर आई था.

गुरुवार 29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने इन नियमों पर रोक लगा दी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक कोर्ट आगे इस पर फ़ैसला नहीं देती तब तक 2012 के नियम लागू रहेंगे.

कोर्ट ने कहा, "प्रथम दृष्टया इन नियमों के कुछ प्रावधानों में अस्पष्टताएं थीं और इनके दुरुपयोग की संभावना को अनदेखा नहीं किया जा सकता."

कोर्ट के मुताबिक कुछ सवाल हैं जिन पर विस्तृत जांच की ज़रूरत है.

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आइए यहां समझते हैं कि किन मुद्दों पर कोर्ट ने नए नियमों पर रोक लगाई और इस मामले पर आगे फ़ैसला करेगी?

कोर्ट के सवाल

यूजीसी के नियमावली का पेज नंबर 14

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इमेज कैप्शन, यूजीसी के नए नियमों में पिछड़े वर्गों को जोड़े जाने के बाद से विवाद शुरू हुआ था

कोर्ट का पहला सवाल 'जाति-आधारित भेदभाव' की परिभाषा से जुड़ा था.

नए नियमों में यूजीसी ने जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा जोड़ी थी. इसके पहले यूजीसी के पुराने नियमों में केवल भेदभाव की परिभाषा थी.

नए नियमों में भेदभाव के साथ जाति-आधारित भेदभाव को अलग से परिभाषित किया गया है.

इन नियमों में कहा गया है कि अगर किसी अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ी जाति के स्टूडेंट्स के साथ केवल उनकी जाति के आधार पर भेदभाव हो, तो वह 'जाति-आधारित भेदभाव' की परिभाषा में आएगा.

इस परिभाषा में जनरल कैटेगरी, या सामान्य श्रेणी, के स्टूडेंट्स के न होने पर विवाद चल रहा है.

कोर्ट ने कहा है कि उन्हें ये देखना होगा कि जाति-आधारित भेदभाव को अलग से लाने की ज़रूरत है या नहीं, जब भेदभाव की एक परिभाषा नए नियम में दी गई है.

साथ ही, कोर्ट ने ये भी कहा कि जाति-आधारित भेदभाव के नियम को लागू करने की प्रक्रिया इन नियमों में नहीं बताई गई है.

कोर्ट ने दूसरे सवाल में कहा कि जाति-आधारित भेदभाव के नियम के लागू होने से अति पिछड़ी जातियों को संविधान में दी गई सुरक्षा पर कोई फर्क पड़ेगा क्या?

यूजीसी के विरोध में प्रदर्शन

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इमेज कैप्शन, कोर्ट ने कहा है कि 'रैगिंग' की बात नए नियमों में नहीं की गई है,

तीसरे सवाल में कोर्ट ने कहा कि नियमों में 'सेग्रेगेशन' यानी स्टूडेंट्स को अलग करने की बात कही गई है.

दरअसल, नए नियमों में कहा गया है कि कॉलेजों या यूनिवर्सिटीज़ को अगर स्टूडेंट्स को हॉस्टल, क्लासरूम या किसी अकादमिक उद्देश्य के लिए चुनना हो या उन्हें अलग-अलग करना हो तो इसे करने की प्रक्रिया 'पारदर्शी, निष्पक्ष और गैर-भेदभावपूर्ण' तरीक़े से हो.

कोर्ट ने कहा कि अलग-अलग करने की प्रक्रिया को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 में दिए गए मौलिक अधिकारों के संदर्भ में देखना होगा. इन अनुच्छेदों में समानता के अधिकार की बात की गई है.

चौथे सवाल के लिए कोर्ट ने कहा है कि 'रैगिंग' की बात नए नियमों में नहीं की गई है, जबकि 2012 के नियमों में रैगिंग की बात की गई थी. तो इस बात की जांच करनी होगी कि जब पहले वाले नियम में 'रैगिंग' की बात कही गई थी और अब उसका ज़िक्र नहीं करना, क्या यह संविधान के ख़िलाफ़ जाता है.

इसके अलावा कोर्ट ने ये भी कहा कि इस मामले की सुनवाई के दौरान जो भी और सवाल खड़े होंगे, कोर्ट उन मुद्दों पर भी फै़सला करेगी.

यूजीसी और सरकार ने क्या कहा?

दिल्ली में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का दफ़्तर

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इमेज कैप्शन, यह देखना होगा कि केंद्र सरकार और यूजीसी इन नियमों का बचाव कोर्ट में करते हैं या नहीं

फ़िलहाल कोर्ट ने यूजीसी और केंद्र सरकार से उनका जवाब मांगा है.

हालांकि, गुरुवार की सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता मौजूद थे. उन्होंने कोर्ट से इन नियमों पर रोक लगाने के ख़िलाफ़ बहस नहीं की.

वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह कोर्ट में इन नियमों का बचाव कर रही थीं.

इंदिरा जयसिंह ने एक्स पर कहा, "क्या कह सकते हैं जब केंद्र सरकार अपने नियमों का बचाव कोर्ट में नहीं कर सकती?"

उन्होंने सवाल पूछा कि क्या यह संवैधानिक कर्तव्य की विफलता है.

आम तौर पर जब सरकार द्वारा बनाए गए किसी क़ानून को रोकने की बात होती है, तो सरकार उसका विरोध करती है. जैसे, इससे पहले जब कई याचिकाकर्ताओं ने वक़्फ़ क़ानून संशोधन पर रोक की मांग सुप्रीम कोर्ट से की थी तब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रोक लगाने के ख़िलाफ़ बहस की थी.

अब यह आगे देखने वाली बात होगी कि केंद्र सरकार और यूजीसी इन नियमों का बचाव कोर्ट में करते हैं या नहीं.

क़ानून के जानकारों की क्या है राय?

यूजीसी का विरोध

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इमेज कैप्शन, तीनों पैमानों पर कोर्ट फ़ैसला करता है कि क़ानून को रोका जाना चाहिए या नहीं
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किसी भी क़ानून पर रोक लगाने के लिए आम तौर पर कोर्ट तीन मुद्दों पर उस क़ानून को परखता है.

पहले वह प्रथम दृष्टया उस क़ानून के प्रावधानों का असर देखते हैं. फिर देखते हैं कि क़ानून को न रोकने से क्या ऐसा नुक़सान होगा जिसकी भरपाई बाद में न की जा सके. और तीसरा, कोर्ट देखता है कि क़ानून को रोकने और न रोकने दोनों में से किस पक्ष का ज़्यादा नुक़सान होगा.

इन तीनों पैमानों पर अदालत यह फ़ैसला लेती है कि क़ानून को रोका जाना चाहिए या नहीं.

गुरुवार के फ़ैसले का विरोध करते हुए संवैधानिक क़ानून के जानकार गौतम भाटिया ने अपने एक लेख में लिखा कि इस फ़ैसले में कोर्ट ने यह स्पष्ट तरीक़े से नहीं बताया कि कैसे ऊपर बताए तीनों पैमानों के तहत इन नियमों को रोकने की ज़रूरत है.

साथ ही उन्होंने यह भी लिखा कि पहले के कुछ मामलों में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि क़ानून का दुरुपयोग होने की संभावना के कारण किसी क़ानून को रोका नहीं जा सकता.

टीवी चैनल एनडीटीवी को इंटरव्यू देते हुए सीनियर एडवोकेट जे साईं दीपक ने इस रोक का समर्थन किया.

उन्होंने कहा कि इन नियमों की परिभाषा में दिक़्क़तें थीं. इसकी तुलना ऐसे क़ानूनों से नहीं की जा सकती जहां क़ानून के प्रावधानों में कोई ख़ामियां नहीं हैं, लेकिन उनका दुरुपयोग किया जा रहा है.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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