अरविंद केजरीवाल पर शीशमहल में रहने की तोहमत, जानिए क्या होता है- शीशमहल

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- Author, त्रिभुवन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
दिल्ली विधानसभा के इन चुनावों में शीशमहलों की चर्चा ने इतिहास के पन्नों पर अपने वैभव के कारण इठलाते शीशमहलों की रुपहली दास्तान को एक बार फिर जीवंत कर दिया है.
शीशमहल को लेकर फ़िलहाल आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल पर सबसे अधिक पत्थर पड़ रहे हैं; लेकिन इतिहास से वर्तमान तक एक निग़ाह दौड़ाएं तो इतिहास के पन्ने अचंभित कर देने वाले शीशमहलों की वैभवशाली कहानियों से तारी हैं.
शीशमहलों की इस इबारत को सही पढ़ें, तो सबसे चर्चित शीशमहल जयपुर के आमेर महल में स्थित है. यही वह शीशमहल है, जिसके बारे में कभी कवि बिहारी ने ये दोहा लिखा था:
प्रतिबिंबित जयसाहि-दुति, दीपति दरपन-धाम.
सबु जगु जीतन कौं कर्यौ, काय-ब्यूहु मनु काम॥
इसी शीशमहल को देखकर लाहौर के क़िले में भी एक शीशमहल तामीर किया गया था.

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ओरछा का शीशमहल हो या पटियाला का, आगरा का शीशमहल हो या भोपाल का, ये हमेशा ही राजसी और शासक वर्ग के लिए सम्मोहन का विषय रहे हैं तो ये आम लोगों के हाथों में आए पत्थरों की ज़द में भी रहे हैं.
भारत और उपमहाद्वीप के इतिहास में "शीश महल" ग़ुलामवंश से लेकर हाल के वर्षों तक विलासिता और अद्भुत शिल्पकला के प्रतीक रहे हैं.
इन महलों का निर्माण राजाओं और नवाबों की भव्य जीवनशैली को दर्शाने के लिए किया गया था. इनकी दीवारें और छतें छोटे-छोटे शीशों से सजाई जाती थीं, जो रोशनी पड़ने पर ऐसे चमकतीं जैसे तारे जमीन पर उतर आए हों.
आज, दिल्ली के राजनीतिक परिदृश्य में "शीशमहल" एक बयानबाज़ी का प्रतीक बन चुका है; लेकिन इन भव्य ऐतिहासिक निर्मितियों की कहानियां अपने आप में कम रोमांचक नहीं हैं.
ढाई करोड़ काँच के टुकड़ों से दिपदिपाता रनिवासे का राजसी वैभव

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शीशमहलों की बात चले और आमेर (जयपुर, राजस्थान) के क़िले में स्थित शीशमहल चर्चा में न आए तो यह हैरानी की बात है.
आमेर क़िले का निर्माण राजा मानसिंह ने 16वीं सदी में करवाया था; लेकिन इसके भीतर शीशमहल को आधुनिक रूप देने का श्रेय राजा जयसिंह प्रथम को जाता है.
प्रसिद्ध फ़िल्म अभिनेता दिलीप कुमार अभिनीत सुपरहिट ऐतिहासिक फ़िल्म 'मुग़ल-ए-आज़म' में अपने समय की सबसे ख़ूबसूरत और ख्यातिप्राप्त अभिनेत्री मधुबाला पर फ़िल्माए गए मशहूर गीत "जब प्यार किया तो डरना क्या" की वह शानदार लोकेशन इसी शीशमहल से प्रेरित है.
इस गीत में शीशमहल की खूबियों को बखू़बी उजागर किया गया है. कई रंगों के ये शीशे जब रोशनी में जगमगाते हैं तो लगता है किसी ने दमकते बेशकीमती रत्नों और आभूषणों की मंजूषा खोल दी है.
कहते हैं कि कमाल अमरोही ने इसे देखा तभी उनके दिलोदिमाग़ में जगमगाता शीशमहल खनक उठा था.
प्रसिद्ध इतिहासकार गोपीनाथ शर्मा ने "राजस्थान का इतिहास" में इस क़िले में बने शीशमहल को अतुलनीय बताते हुए मानसिंह के वास्तुशिल्प ज्ञान की बहुत तारीफ़ें की हैं.
उन्होंने लिखा है, "शीशमहल जनाना महलों के भाग हैं, जो देखने के क़ाबिल हैं. शीशमहल में बेल-बूटों का काम अनूठा है. भवन की बाहरी और भीतरी दीवारों पर फूलों के गुलदस्ते बने हैं और फूलों पर तितलियां बनाई गई हैं. ये मुग़लकला की साम्यता बताती है और यह आगरा, दिल्ली या सीकरी की कारीगरी से कम नहीं."

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इस शीशमहल को राजा जयसिंह ने समृद्ध किया और ख़ासतौर पर शाही दरबार और रानियों के लिए तैयार किया. इसकी दीवारों पर लगे छोटे शीशे और मीनाकारी का काम इसकी ख़ूबसूरती को चार चांद लगाते हैं.
यह इस तरह बना है कि एक दीये की रोशनी पूरे शीशमहल को रोशन कर दे. यह प्रकाश, कुशलता और कला का एक अनोखा संगम है.
यहां शाही कार्यक्रम और संगीत सभाएं आयोजित की जाती थीं.
सोहराब मोदी और नसीम बानों की 1950 की एक फ़िल्म "शीशमहल" भी तो बहुत लोकप्रिय हुई थी. नसीम बानो प्रसिद्ध फिल्म अभिनेत्री सायरा बानो की माँ थीं.
आमेर के शीशमहल ने और बहुत से शासकों को अपने यहाँ शीशमहल बनाने के लिए प्रेरित किया.
राजस्थान के जन इतिहासकार और शिक्षक-पत्रकार श्रीकृष्ण जुगनू याद करते हैं कि शीशमहल की लोकप्रियता उस दौर में अपार थी और राजस्थान के सुदूर इलाक़ों में "बिआयां रै महल माहल्याणां मैं काँच भळीका मारै!" यानी सगे-संबंधियों के यहाँ अब शीशमहल आँखों को चौंधिया रहे हैं.
आइए, अब आपको लिए चलते हैं, शीशमहल की एक और नगरी.
मुमताज का वह सपना और बादशाह का शीशमहल बनवाकर देना

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शासक जम्हूरियत के ज़र्द पत्ते नहीं देखते; लेकिन उनकी मुहब्बतों के ग़म बेशकीमती होते हैं. इसी का एक अनूठा उदाहरण है लाहौर (पाकिस्तान) का शीशमहल.
यह शीशमहल पूरी तरह आमेर के शीशमहल से प्रभावित है. मुग़ल सम्राट शाहजहां ने इसे 1631-32 में एक ख़ास वजह से बनवाया था.
यह रानियों के लिए एक निजी कक्ष था, जिसे उत्कृष्ट मीनाकारी और नक्काशी से सजाया गया. इसका कुछ हिस्सा महाराजा रणजीत सिंह ने बाद में बनवाया.
कहा जाता है कि इस महल के शीशों को इटली से मंगवाया गया था. मुग़ल दरबार में विदेशी व्यापार और शाही विलासिता की गहरी रुचि के एक स्मारक के रूप में भी शीशमहल है.
इसे इस तरह सजाया गया था कि रात के सीने पर यह रोशनी के झरने की तरह फूट पड़ता था. इसका उपयोग शाही बैठकों और अंतरंग सभाओं के लिए किया जाता था.
इसके निर्माण की कहानी बहुत दिलचस्प है.
कई जगहों पर इसका जिक्र है कि किसी रात मुमताज महल ने सपना देखा कि वह आसमान में सितारों को छूते हुए तैर रही है. यह मानो कोई आकाश नहीं, एक शीशमहल हो.
मुमताज ने जागते ही यह बात अपने प्रेमी बादशाह को बताई तो तत्काल ऐसे ही शीशमहल की तामीर का हुक़्म हुआ और बहुत से शीशमहल देखे गए.
हालांकि बादशाह ने शीशमहल तो बनवा दिया; लेकिन मुमताज महल इसके पूरे होने से पहले ही इस दुनिया से रुख़सत हो गईं.
बाद के कई मुग़ल सम्राटों ने इसे लाहौर क़िले के शाही हरम के रूप में इस्तेमाल किया.
इस शीशमहल के पीछे के कक्ष में संगमरमर का एक पर्दा है, जिस पर टेंड्रिल, पुष्प और ज्यामितीय पैटर्न में अतुलनीय नक्काशियां की गई हैं.
"हिस्ट्री ऑव कंजर्वेशन ऑव शीशमहल इन लाहौर-पाकिस्तान" नामक एक रिसर्च रिपोर्ट तैयार करने वाले स्कॉलर मुहम्मद कामरान, एमवाई अवान और एस गुलज़ार लिखते हैं कि इसके संरक्षण के समस्त कार्य जनवरी 2021 में पूरे किए गए.
यह शीशमहल लाहौर क़िले में सबसे प्रमुख, सुंदर और कीमती महल है.
यह क़िले में उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित है. इसकी दीवारों और छतों पर दर्पण के काम के व्यापक उपयोग के कारण इसे दर्पणों के महल के रूप में भी जाना जाता है.
इसका हॉल शाही परिवार के निजी उपयोग के लिए आरक्षित था.
शीशमहल 1975 में पाकिस्तान के पुरातत्व विभाग ने इसे पुरावशेष अधिनियम के तहत संरक्षित स्मारक के रूप में सूचीबद्ध कर दिया था.
शीशमहल अद्वितीय महलों में एक है, जिसमें खूबसूरती से जड़े हुए पत्थर के काम, कांच के मोज़ेक का काम और प्लास्टर की नक्काशी है.
बारीक नक्काशीदार संगमरमर की जाली का उपयोग उद्घाटन में किया गया है और फर्श को सफेद संगमरमर से पक्का किया गया है.
एक बहुत पुराने आईसीएस नानालाल चमनलाल मेहता ने 1933 में लिखी अपनी पुस्तक "भारतीय चित्रकला" में बताया है, "महाराजा रणजीतसिंह ने भी लाहौर के क़िले में स्थित शीशमहल में सुंदर भित्ति चित्र बनवाए थे. इनमें सावन के झूले के चित्र और वसंत का रमणीय आलेखन अप्रतिम है."
आज से ठीक एक सौ साल पहले 1923-24 में प्रसिद्ध पत्रिका "माधुरी" के अगस्त 1923-जनवरी 1924 के अंक में संतराम बीए का एक लेख लाहौर के विषय में छपा हुआ है, जिसमें वे लिखते हैं, "शीशमहल का कुछ अंश शाहजहां ने और कुछ अंश औरंगजेब ने बनवाया है. इस शीशमहल से रावी का प्रवाह चांदी की रेखा की तरह दिखता है."
भोपाल का शीशमहल

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भोपाल के नवाबों ने इस महल का निर्माण 1855 के आसपास किया. यह महिलाओं के लिए बनाया गया था. इसका निर्माण इतनी कुशलता से किया गया था कि बाहरी शोर-शराबा अंदर तक नहीं पहुंचता था.
इसे ठंडी और शांति देने वाली जगह के रूप में डिज़ाइन किया गया. शाही परिवार की गोपनीय सभाओं के लिए उपयोग होता था.
मोतीलाल भार्गव ने अपनी पुस्तक "नाना साहब" में कमालुद्दीन हैदर की पुस्तक "कैसेरुत्तवारीख़" का हवाला देते हुए लिखते हैं, "27 जुलाई, 1858 को लखनऊ पर अंग्रेज़ों का अधिकार हो गया तो नाना साहब ने बेगम हज़रत महल को पत्र लिखा कि क्या आपके नगर में प्रवेश करें?"
"इस पर बेगम हज़रत महल ने तत्काल उनके स्वागत में 200 घुड़सवार, 2 हाथी, जिनके चाँदी के हौदे लगे थे, दो ऊँट सवार और बहुत से लोग भेजे. नाना आए तो उन्हें शीशमहल में ठहराया गया और उनके लिए इसे पूरी तरह सजाया गया. नाना को 11 तोपों की सलामी भी दी गई."
हालांकि प्रसिद्ध साहित्यकार नाथूराम प्रेमी के संबंध में छपे एक ग्रंथ में शिवसहाय चतुर्वेदी लिखते हैं, "सागर से 41 मील दूर खुरई में एक ऐतिहासिक शीशमहल चर्चित रहा है, जिसे हिन्दू और मुस्लिम शासकों ने मिलकर बनवाया था."
आगरे का शीशमहल

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आगरे के क़िले में स्थित शीशमहल शाहजहां ने रानियों के स्नानगृह के रूप में बनवाया था. इसमें शीशों का ऐसा संयोजन किया गया था कि पानी की बूंदें भी प्रकाश से झिलमिला उठतीं.
इस महल के शीशों पर उत्कीर्ण फूल और पत्तियां मुग़ल कालीन कला के उत्कृष्ट नमूने हैं. इसके निर्माण का साल 1631-1640 है. इसे रानियों की आरामगाह और ठंडे माहौल के लिए डिज़ाइन किया गया.
डीग के सुरम्य उद्यानों के बीच शीशमहल
राजस्थान के डीग का शीशमहल (भरतपुर) भी इतिहास के पन्नों पर अपनी आभा बिखेरता है.
भरतपुर के राजा सूरजमल ने इसे 1730 के आसपास बनवाया था. इसे खासतौर पर गर्मियों में ठंडी हवा के लिए डिज़ाइन किया गया था.
डीग के शीश महल में झील और फव्वारों का ऐसा संयोजन था कि यहां रुकने वाले शाही मेहमान इसे स्वर्ग का टुकड़ा कहते थे.
फव्वारे और झीलों के साथ शीश महल का निर्माण एक अद्भुत दृश्य प्रदान करता था. इसे एक शाही रिट्रीट के रूप में इस्तेमाल किया जाता था.
पटियाला का शीशमहल

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पंजाब में पटियाले का शीशमहल भी ख़ूब चर्चा में रहा है. महाराजा नरेंद्र सिंह ने इस महल का निर्माण 1847 में शुरू करवाया था और यह 1862 में पूरा हुआ था.
यह महाराजा का ग्रीष्मकालीन निवास था. इस शीशमहल में भारतीय और यूरोपीय शिल्पकला का अनूठा मिश्रण है. इसके फव्वारे और झीलें इसे अद्वितीय बनाती हैं.
ओरछा का शीशमहल

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ओरछा के राजा वीर सिंह ने इसे 1618 में बनवाया. इसे एक गेस्ट हाउस के रूप में उपयोग किया जाता था.
कहा जाता है कि ओरछा के इस शीशमहल में रात को जलाए गए दीपकों की रोशनी दूर से एक स्वर्णिम महल का भ्रम देती थी. इसकी भव्यता और चमक इसे आकर्षण का केंद्र बनाती थी.
मेहरानगढ़ का शीशमहल

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यह महल रानियों के निजी आवास के लिए बनाया गया था. इसे महाराजा अजीत सिंह ने बनवाया था. इसे इस तरह डिज़ाइन किया गया कि गर्मियों में ठंडक और सर्दियों में गर्मी बनी रहे.
इसे मुख्यतः रानियों के निजी आवास और पूजा स्थल के रूप में बनाया गया. शीशों का काम इस कक्ष को भव्य और धार्मिक रूप से पवित्र बनाता था.
भारतीय चित्रकला के इतिहास में पेज 230 पर डॉ. अविनाश बहादुर वर्मा लिखते हैं, "राजा भूपतपाल ने 1635 में रावी के दाहिनी तट पर बसोहली नगर की स्थापनी की थी और इसके क़िले में मेदिनीपाल ने एक ऐसा शीशमहल बनवाया था, जिसमें सुसज्जित नायिका-भेद के विषयों पर आधारित भित्ति चित्र भारतीय चित्रकला का वैभव रहे हैं. यह शीशमहल उस कालखंड में सात आश्चर्यलोक में से एक था."
साहित्य में शीशमहल
लोगों के जीवन में आए अंधकार के चमकीले निर्झर में ऐसे शीशमहल की सबसे पुरानी गूंज 1290 से आती है, जब सुल्तान बलबन के पोते और बुगरा खाँ के बेटे कैकुबाद ने 18 साल की उम्र में सत्ता संभालते ही एक शानदार शीशमहल तामीर करवाया था.
सुलोचना चतुर्वेदी "खुसरो, तानसेन तथा अन्य कलाकार" में लिखती हैं कि शीशमहल वैभव में डूबे कैकुबाद की हत्या इसी शीशमहल में ख़िलजी मलिक ने कर दी थी.
शासक अक्सर जनता की चिंताओं की अनदेखी करते रहे हैं; लेकिन शीशमहल उनकी पहली पसंद रहा है.
कांच के महलों की चमक उनके कर्तव्यों पर चढ़ी धुंध को और गहरा कर देती है.
अभी तक के इतिहास में यही सामने आता है कि भव्य इमारतों की नींव में अक्सर आम लोगों के सपनों की कुर्बानी शामिल होती है. भले यह लोकतांत्रिक युग हो या राजतांत्रिक कालखंड.
लेकिन, ऐसे शासक भूल जाते हैं कि जनता की आवाज़ें शीशमहलों को चकनाचूर कर सकती हैं.
इसीलिए राही मासूम रज़ा "मैं एक फेरीवाला" में बहुत सही कहते हैं, "यादों के उस शीशमहल तक कांटों का एक जंगल फैला है."
शीशमहलों की यह कहानी यहीं नहीं रुकती. आसफुदौला के बाद उनके बेटे नवाब वज़ीर अली को लखनऊ की गद्दी पर बिठाया गया तो वह अपने पिता के बने शीशमहल में रहने लगा.
यह शीशमहल नवाब आसफुदौला ने अपनी पहली पत्नी शम्सुन्निसा के लिए बनवाया था और वे इसमें भी सात पर्दों में रहती थीं.
कुछ जगहों पर यह दावा भी दिखता है कि लखनऊ की ख़ास ज़ुबान इसी शीशमहल में सबसे पहले तैयार हुई थी. यहीं से यह ज़बान बख़ूबी पली और पनपी. लेकिन शीशमहल तो नहीं, भाषा का वह अंदाज़ ज़रूर है, जो दिल्ली के चुनावों में प्रयुक्त बदमज़ा भाषा को शीशा दिखाती है.
सत्ता की असली विरासत भव्यता में नहीं, बल्कि लोगों के जीवन में सुधार लाने में है.
इसीलिए, शीशमहल की चर्चाएं देवकीनंदन खत्री के उपन्यास "भूतनाथ" से शुरू होती हैं तो वे चतुरसेन शास्त्री के धरती और आसमान, विजय तेंदुलकर के नाटकों और स्वामी रामतीर्थ के व्याख्यानों में भी दिखती है और ब्रज के मंदिरों में भी, जैन मंदिरों में भी, अमिताव घोष के सी ऑव पॉपीज सहित साहित्य की विभिन्न गाथाओं से होती हुई राजस्थानी महिलाओं के घाघरों की झालरों पर नन्हे-नन्हे शीशों के रूप में लहराती हैं.
कल्पसूत्र हो या महावीर स्वामी के जन्म की गाथा, शीशमहल भव्यता की रात के आख़िरी जज़ीरे की तरह हैं लेकिन मौजूदा समय में इसका राजनीति में इस्तेमाल हो रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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