कंगना बनाम विक्रमादित्य सिंह: मंडी से कौन मारेगा बाज़ी, बॉलीवुड की 'क्वीन' या हिमाचल के 'प्रिंस'

विक्रमादित्य सिंह और कंगना रनौत

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    • Author, आदर्श राठौर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"कंगना रनौत मेरे बारे में कहती हैं कि मैं राजा का बेटा हूं. मेरे पिता वीरभद्र सिंह सिर्फ़ रामपुर बुशहर रियासत के राजा नहीं थे, वो हिमाचल प्रदेश के दिलों के राजा थे और मुझे गर्व है कि मैं उनका बेटा हूं."

हिमाचल प्रदेश के लोकनिर्माण मंत्री और मंडी लोकसभा सीट से कांग्रेस के प्रत्याशी विक्रमादित्य सिंह ने रविवार को रामपुर बुशहर में अपने पुश्तैनी आवास 'पद्म पैलेस' के बाहर इकट्ठा लोगों को संबोधित करते हुए ये शब्द कहे.

शनिवार शाम को कांग्रेस की ओर से मंडी लोकसभा सीट का प्रत्याशी बनाए जाने के अगले दिन वह अपने प्रचार अभियान का आग़ाज़ कर रहे थे.

बीजेपी की ओर से कंगना को टिकट दिए जाने के बाद से ही यह माना जाने लगा था कि कांग्रेस इस बार उनकी मां और वर्तमान सांसद प्रतिभा सिंह के बजाय विक्रमादित्य सिंह को मंडी से उतार सकती है.

वजह ये थी कि विक्रमादित्य ने सीधे कंगना रनौत के पुराने बयानों को उठाते हुए उनपर निशाना साधना शुरू कर दिया था. कभी उन्होंने सोशल मीडिया पर कंगना रनौत की राजनीतिक समझ पर सवाल उठाए तो कभी पत्रकारों से बात करते हुए उनके पुराने बयानों का ज़िक्र किया.

अभी से गर्माया राजनीतिक माहौल

विक्रमादित्य सिंह

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फिर कंगना ने भी सीधे विक्रमादित्य सिंह पर निशाना साधना शुरू कर दिया. इससे कुछ ऐसा माहौल बना कि पूरे प्रदेश में चर्चा होने लगी कि कंगना रनौत को विक्रमादित्य सिंह ही टक्कर दे सकते हैं.

आख़िरकार शनिवार शाम कांग्रेस ने आधिकारिक तौर पर विक्रमादित्य को मंडी संसदीय क्षेत्र से उम्मीदवार घोषित कर दिया.

मंडी लोकसभा सीट में छह ज़िलों के 17 विधानसभा क्षेत्र आते हैं. इनमें से तीन विधानसभा क्षेत्र अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं और पांच अनुसूचित जाति के लिए.

आबादी और भूगोल के हिसाब से इतनी विविधता वाले इस विधानसभा क्षेत्र से कई बड़ी हस्तियां चुनकर संसद पहुंची हैं. इनमें भारत की पहली स्वास्थ्य मंत्री रहीं राजकुमारी अमृत कौर, पूर्व दूरसंचार मंत्री पंडित सुखराम और वीरभद्र सिंह शामिल हैं.

इस बार हिमाचल प्रदेश की चारों लोकसभा सीटों पर आख़िरी चरण के तहत मतदान होना है लेकिन मंडी लोकसभा सीट पर सियासी पारा लगातार चढ़ रहा है.

हेमंत
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कंगना और विक्रमादित्य एक-दूसरे पर तीखे ज़ुबानी हमले कर चुके हैं. कई बार उनके बयान निजी हमलों की शक्ल में भी होते हैं.

जहां विक्रमादित्य सिंह ने कंगना रनौत को 'मौसमी राजनेता' बताते हुए उनपर बीफ़ खाने का आरोप लगाया, वहीं कंगना ने उनसे सबूत मांगते हुए उन्हें 'छोटा पप्पू' और 'राजा बेटा' कह दिया.

विक्रमादित्य पहले भी अपने विवादित और आक्रामक बयानों के लिए चर्चा में रहे हैं. कई मौकों पर बाद में ऐसे बयानों पर उन्हें खेद भी प्रकट करना पड़ा है.

एक-दूसरे पर ज़ुबानी हमलों के मामलों में दोनों अभी तक एक से बढ़कर एक नज़र आ रहे हैं, लेकिन क्या वोटों के मामले में भी दोनों के बीच कड़ी टक्कर होगी?

वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हेमंत का मानना है इस बार मंडी लोकसभा क्षेत्र का चुनाव तीखी बयानबाज़ी के कारण मसालेदार होने वाला है, हालांकि इस सब का मतदाताओं पर कोई ख़ास असर नहीं होगा.

वह बताते हैं, "कंगना के भाषणों को सुनें तो लगता है कि वह एक मंझे हुए राजनेता की तरह दिखने की कोशिश कर रही हैं. दूसरी ओर विक्रमादित्य की शैली भी ऐसी रहती है मानो वह बड़े अनुभवी हों. उनके बीच तीखी बयानबाज़ी हो रही है. वैसे तो पूरे हिमाचल में साक्षरता का स्तर अच्छा है, मगर मंडी के मतदाता राजनीतिक रूप से बहुत सजग हैं. ऐसी जागरूकता प्रदेश में कहीं और नहीं दिखती. ऐसे में इन बयानों से आधार पर तो मतदाताओं की राय पर कोई असर नहीं पड़ने वाला."

विरासत की सियासत

पिता वीरभद्र सिंह के साथ विक्रमादित्य सिंह

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विक्रमादित्य सिंह कई बार कह चुके हैं कि इस बार लोकसभा चुनाव मुद्दों के आधार पर लड़ा जाएगा. वह कंगना से सवाल पूछ रहे हैं कि जब बीते साल हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक आपदा आई थी, तब वह कहां थीं.

उनका आरोप है कि केंद्र की मोदी सरकार ने उस दौरान हिमाचल की पर्याप्त मदद नहीं की और ऊपर से राज्य के विकास के लिए मिलने वाले फंड में भी कटौती की है.

जबकि कंगना रनौत राज्य की कांग्रेस सरकार पर घोटाले करने और चुनाव से पहले किए वादों से मुकरने का आरोप लगा रही हैं.

हालांकि, हेमंत मानते हैं कि मुद्दों की बात बेमानी है क्योंकि पहले भी यहां लोकसभा चुनाव मुद्दों के आधार पर नहीं लड़े गए.

उन्होंने कहा, "बीजेपी पिछले दो चुनावों से तो कोई भी ठोस मुद्दा लेकर नहीं उतरी. वो पीएम मोदी के नाम पर ही वोट मांगती है. वहीं कांग्रेस भी ऐसा मुद्दा लाने में नाकाम रही है, जिसके आधार पर वोटरों को लुभाया जा सके."

वीरभद्र सिंह

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मंडी से बीजेपी के सांसद रहे रामस्वरूप शर्मा के निधन के बाद साल 2021 में इस सीट पर उपचुनाव हुए थे, जिसमें विक्रमादित्य सिंह की मां प्रतिभा सिंह ने क़रीब दस हज़ार वोटों से जीत हासिल की थी.

उस दौरान कांग्रेस ने दिवंगत वीरभद्र सिंह के कार्यकाल के दौरान हुए कामों का हवाला देते हुए उनके लिए श्रद्धांजलि के तौर पर वोट मांगे थे. इस अपील का असर किन्नौर, लाहौल-स्पीति, आनी और रामपुर के इलाक़ों में देखने को मिला था.

इनमें से कई इलाक़े उस पूर्व रामपुर बुशहर रियासत का हिस्सा थे, जिसपर वीरभद्र परिवार के पूर्वजों का शासन रहा था.

हेमंत का कहना है, "हालांकि वह कोविड संकट के बाद तुरंत हुए चुनाव थे तो मेरा मानना है कि तत्कालीन बीजेपी सरकार के प्रति नाराज़गी के कारण भी कांग्रेस को वोट पड़े थे. हालांकि, मंडी लोकसभा सीट के तहत अभी भी एक बड़ा तबका ऐसा है जो वीरभद्र परिवार के प्रति वैसा ही राजा वाला भाव रखता है."

यही कारण है कि वीरभद्र सिंह के परिवार से उम्मीदवार उतारने में ही कांग्रेस को जीत की ज़्यादा संभावनाएं नज़र आती हैं.

कंगना का आक्रामक अभियान

कंगना रनौत

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कंगना रनौत काफ़ी पहले से ही बीजेपी की विचारधारा से क़रीबी दिखती रही हैं. सोशल मीडिया से लेकर मीडिया के मंचों पर वह बीजेपी के पक्ष में और उसके विरोधी दलों पर हमलावर रही हैं.

उनकी यही शैली उनके कार्यक्रमों में भी दिख रही हैं. यहां वह प्रदेश की कांग्रेस सरकार से लेकर केंद्र में पहले की कांग्रेस सरकारों की नीतियों पर सवाल उठा रही हैं.

जब विक्रमादित्य सिंह ने उनपर निशाना साधा तो कंगना ने कहा कि वह हिमाचल की बेटी हैं, एक आम परिवार से संबंध रखती हैं और अपने दम पर मुंबई जाकर मुक़ाम हासिल किया है.

उन्होंने कहा, "यह किसी के बाप-दादाओं की रियासत नहीं है कि मुझे डराकर भगा देंगे." उन्होंने राहुल गांधी को पप्पू और विक्रमादित्य को छोटा पप्पू कह दिया.

चूंकि वीरभद्र के निधन के बाद विक्रमादित्य का सांकेतिक राजतिलक करने की पंरपरा निभाई गई थी, ऐसे में उनके कुछ प्रशंसक उन्हें राजा कहकर संबोधित करते हैं.

विकास शर्मा
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कंगना ने विक्रमादित्य पर जो टिप्पणियां की हैं, उनसे अच्छा संदेश नहीं गया है. तो कहीं न कहीं इसका असर देखने को मिल सकता है क्योंकि हिमाचल में लोग ऐसी बातों को गंभीरता से लेते हैं.
विकास शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार

इसपर चुटकी लेते हुए कंगना ने उन्हें 'राजा बेटा' भी कह दिया था. शिमला के वरिष्ठ पत्रकार विकास शर्मा कहते हैं कि कंगना के इस तरह के बयानोंं को नकारात्मक ढंग से देखा जा रहा है.

उन्होंने कहा, "उनके पुराने बयान और अभी जिस तरह की भाषा वो इस्तेमाल कर रही हैं, उन्हें जनता सकारात्मक तौर पर नहीं देख रही. हिमाचल में ऐसे विषयों पर चर्चा होती है और लोग इन्हें गंभीरता से लेते हैं. उन्होंने विक्रमादित्य पर जो टिप्पणियां की हैं, उनसे भी अच्छा संदेश नहीं गया है. तो कहीं न कहीं इसका असर देखने को मिल सकता है."

हाल ही में कंगना धर्मशाला जाकर तिब्बती धर्मगुरु दलाई लामा से मिलीं.

दरअसल, कुछ समय पहले फेसबुक पर उन्होंने जो बाइडन और दलाई लामा की तस्वीर पर एक टिप्पणी कर दी थी, जिसे लेकर उनकी कड़ी आलोचना हुई थी.

कंगना

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उनकी हालिया मुलाक़ात को उसी से हुए डैमेज कंट्रोल की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है क्योंकि मंडी के तहत आने वाले लाहौल स्पीति और किन्नौर में बौद्ध धर्म को मानने वालों की संख्या अच्छी ख़ासी है.

विकास शर्मा का कहना है कि कंगना की बोलचाल में राजनेताओं जैसी बात नहीं दिखती. हालांकि, अब वह लोगों से स्थानीय बोली में बात कर रही हैं, जिससे लोगों को अपनापन लग सकता है.

वह कहते हैं, "कंगना एक सेलिब्रिटी हैं तो लोग उन्हें देखने और सुनने के लिए जुट रहे हैं. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उनके लिए ये लड़ाई एक-तरफ़ा है."

वरिष्ठ पत्रकार हेमंत भी कहते हैं, "लोगों ने हिमाचल के साथ लगते पंजाब के गुरदासपुर का भी उदाहरण देखा है, जहां अभिनेत सन्नी देओल पर चुनाव जीतने के बाद वापस अपने हलके की ओर न देखने के आरोप लगे थे. हिमाचल में लोग चाहते हैं कि नेता उनके सुख-दुख में शामिल रहे. ऐसे में लोग कंगना को सिर्फ़ अभिनेत्री होने के कारण वोट दे देंगे, ऐसा लगता नहीं है."

विक्रमादित्य की साख पर कितना असर?

प्रतिभा सिंह के साथ विक्रमादित्य सिंह

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विक्रमादित्य के पिता वीरभद्र सिंह कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे. वह छह बार हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे और तीन बार मंडी लोकसभा सीट से सांसद चुने गए. उनकी पत्नी प्रतिभा सिंह ने भी यहां से तीन बार जीत हासिल की है.

अब पार्टी ने उनके बेटे को मौक़ा दिया है जो इस समय शिमला ग्रामीण से विधायक हैं और प्रदेश सरकार में लोकनिर्माण मंत्री हैं.

हालांकि, ख़ुद को कांग्रेस का वफ़ादार बताने वाले विक्रमादित्य सिंह पर पिछले दिनों सवाल खड़े हो गए थे.

राज्यसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस के छह विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी, तब कांग्रेस सरकार ख़तरे में नज़र आ रही थी.

एक ओर कांग्रेस आलाकमान बाग़ी विधायकों को साधने में लगी थी, दूसरी ओर विक्रमादित्य सिंह ने यह कहते हुए मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे दिया कि सरकार में उन्हें अपमानित किया गया और वीरभद्र सिंह की प्रतिमा शिमला के ऐतिहासिक रिज मैदान पर नहीं लगाई गई.

विकास शर्मा
BBC
विक्रमादित्य सिंह को एक बात का फ़ायदा मिलता है कि वह वीरभद्र सिंह के बेटे हैं. बहुत से लोग उनमें वीरभद्र की छवि देखते हैं.
विकास शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार

बाद में विक्रमादित्य सिंह ने इस्तीफ़ा वापस ले लिया.

उनकी मां और कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष प्रतिभा सिंह भी मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की कार्यशैली पर सवाल उठाती रही हैं. उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि वह आगामी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ सकतीं क्योंकि जनता के काम नहीं हुए हैं और वह वोट नहीं मांग पाएंगी.

बाद में प्रतिभा सिंह ने भी अपने तेवर बदल लिए. सोशल मीडिया पर इसे उनका यू-टर्न कहा गया और इस पर काफ़ी चर्चा हुई.

क्या इस पूरे प्रकरण का विक्रमादित्य की छवि पर असर हुआ है और क्या इसका असर वोटों पर पड़ सकता है?

हेमंत कहते हैं, "कांग्रेस में यहां कभी कोई कैडर जैसी बात नहीं देखने को मिलती कि किसी बात से कैडर प्रभावित हो जाए. इसलिए इसका असर ज़्यादा नहीं पड़ेगा. जबकि ऐसे मामलों का असर बीजेपी में पड़ता है. जैसे कंगना को लाने पर भी कुछ नाराज़गी के स्वर देखे जा रहे थे."

फ़िलहाल किसका पलड़ा भारी?

कंगना रनौत

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साल 2014 और 2019 के चुनावों में मंडी सीट बीजेपी की झोली में गई थी. 2014 के चुनाव में बीजेपी ने कांग्रेस की प्रतिभा सिंह के सामने पंडित रामस्वरूप शर्मा को उतारा था.

शर्मा बीजेपी संगठन में भले बड़ा नाम थे, लेकिन आम लोगों के बीच उनका ज़्यादा नाम नहीं था. मगर वह प्रतिभा सिंह को हराने में सफल रहे थे.

फिर 2019 में के चुनावों में वीरभद्र सिंह ने एलान किया था कि उनके परिवार का कोई सदस्य चुनाव नहीं लड़ेगा. ऐसे में वहां पूर्व केंद्रीय मंत्री पंडित सुखराम के पोते आश्रय शर्मा ने कांग्रेस से चुनाव लड़ा और वह बीजेपी के रामस्वरूप शर्मा से बड़े अंतर से हारे थे.

Hemant

इस बार के हालात के बारे में कोई भी टिप्पणी करना अभी जल्दबाज़ी होगा, लेकिन वरिष्ठ पत्रकार विकास शर्मा कहते हैं कि फ़िलहाल यहां कांग्रेस का पलड़ा भारी नज़र आ रहा है.

उन्होंने कहा, "अगर कंगना रनौत के सामने कांग्रेस ने प्रतिभा सिंह को उतारा होता तो बात अलग होती लेकिन विक्रमादित्य के उतरने के कारण हालात बदल गए हैं. विक्रमादित्य सिंह युवा हैं, राज्य सरकार में मंत्री हैं और सबसे बड़ी बात वह वीरभद्र सिंह के बेटे हैं."

"इन सब बातों से लड़ना कंगना के लिए आसान नहीं है. सक्रिय राजनीति में कंगना नई हैं, जबकि विक्रमादित्य को अपने अनुभव के साथ वीरभद्र सिंह के परिवार से होने का भी लाभ मिलता है. वो जानते हैं कि हिमाचल की जनता किन बातों से जुड़ाव महसूस करती है. कंगना को इस दिशा में भी मेहनत करनी होगी."

लेकिन विक्रमादित्य के लिए भी राह आसान नहीं है. वरिष्ठ पत्रकार हेमंत बताते हैं कि मंडी संसदीय क्षेत्र में पिछले कुछ समय से कांंग्रेस संगठनात्मक रूप से कमज़ोर हुई है.

कंगना

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इमेज कैप्शन, हमीरपुर के एक मंदिर में कंगना

हेमंत कहते हैं, "मंडी लोकसभा क्षेत्र में किन्नौर को छोड़ दें तो बाकी जगह कांग्रेस का संगठन सक्रिय नहीं दिखता. फिर सरकार के स्तर पर भी मंडी ज़िले में कुछ ख़ास नहीं हुआ."

"यहां से कोई मंत्री भी नहीं है क्योंकि इस संसदीय क्षेत्र में पड़ने वाली मंडी ज़िले की सभी नौ सीटें बीजेपी के पास हैं. फिर सुक्खू के सीएम बनने के बाद भी कांग्रेस में व्यवस्था का परिवर्तन हुआ है. उसका असर भी देखना होगा."

"यहां कांग्रेस व्यक्ति आधारित रणनीति ज़्यादा नज़र आती है. वीरभद्र सिंह नहीं तो प्रतिभा सिंह, वह नहीं तो उनके बेटे को टिकट दिया है."

"दूसरी ओर अगर बीजेपी में कुछ लोग कंगना को टिकट दिए जाने से नाराज़ हैं तो भले बड़े नेता कुछ न कहें, उनके साथ चलने वाले लोग क्या करेंगे, यह देखना होगा. मगर फ़िलहाल तो 'क्वीन' और 'राजा' का मुक़ाबला देखने लायक होगा."

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