इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे पर जो जयशंकर ने कहा, उसके पीछे क्या कारण है?

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मंगलवार को कहा कि इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे का काम 70 फ़ीसदी पूरा हो गया है लेकिन बाक़ी का काम म्यांमार में राजनीतिक बदलाव के कारण प्रभावित हुआ है.
2021 में म्यांमार में सैन्य तख़्तापलट हुआ था और तब से वहाँ के कई इलाक़ों में अस्थिरता है.
जयशंकर ने कहा कि इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड हाईवे से पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण पूर्वी एशियाई इलाक़े के बीच क्रांतिकारी बदलाव आएंगे. भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि यह हाईवे दोनों इलाक़ों के लिए संपर्क और आर्थिक संपन्नता के मामले में गेमचेंजर साबित होगा.
गुवाहाटी में एक्ट ईस्ट, एक्ट फ़र्स्ट और एक्ट फर्स्ट सेशन ऑफ द एडवांटेज असम 2.0 इन्फ़्रास्ट्रक्चर एंड इन्वेस्टमेंट समिट को संबोधित करते हुए जयशंकर ने कहा था, ''इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड ट्राइलेटरल हाईवे असली गेमचेंजर साबित होगा. म्यांमार में आंतरिक उठापटक के कारण इसे पूरा करने में दिक़्क़तें आ रही हैं. दक्षिण पूर्वी एशिया की आबादी 70 करोड़ है, जो भारत की क़रीब आधी आबादी के बराबर है. यहाँ की जीडीपी 4.25 ट्रिलियन डॉलर की है. ऐसे में इस इलाक़े से हमारी साझेदारी बढ़ती है तो इसके बेहतरीन नतीजे होंगे.''
जयशंकर ने कहा कि 2014 से भारत की नेबरहुड फ़र्स्ट पॉलिसी के तहत, चाहे बांग्लादेश हो या भूटान, नेपाल हो या म्यांमार सबके साथ संबंधों में सकारात्मक प्रगति हुई है. भारतीय विदेश मंत्री ने कहा कि इन देशों के साथ नए रोड, चेकपॉइंट्स, रेलवे लाइन्स, समंदर, पावर ग्रिड्स, फ्यूल पाइपलाइन और ट्रांजिट सुविधा के ज़रिए सहयोग बढ़ा है.
तीनों देशों के बीच यह हाईवे क़रीब 1400 किलोमीटर का है. इसे कई लोग कोलकाता टू बैंकॉक हाईवे भी कहते हैं. 2002 में यांगून में तीनों देशों बीच ट्राइलेटरल मिनिस्ट्रियल मीटिंग हुई थी. इसी बैठक में भारत म्यांमार की सीमा पर स्थित मोरेह-तामु शहर से लेकर म्यांमार-थाईलैंड सीमा पर स्थित माए सोत शहर तक 1360 किलोमीटर लंबा हाईवे बनाने की बात हुई थी.

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क्यों हो रही है देरी?
2017 में भारत और म्यांमार ने संयुक्त बयान जारी कर कहा था कि कंस्ट्रक्शन का काम फिर से जल्द ही शुरू होगा. इसकी शुरुआत तामु-किइगोन-कलेवा रोड और कलेवा-यार्गी सेक्टर के बीच ब्रिज के निर्माण से होगी. तब इसकी डेडलाइन 2020 रखी गई थी लेकिन अब 2025 आ चुका है और काम अभी 70 प्रतिशत ही हुआ है.
इस प्रोजेक्ट पर काम पहली बार 2012 में ही शुरू हो गया था और इसकी पहली डेडलाइन 2015 थी. देरी में इसकी कुछ वजहें भौगोलिक भी हैं. मॉनसून के वक़्त में भूस्खलन बहुत होता है. इसी तरह 2013 में बांग्लादेश-चाइना-इंडिया-म्यांमार इकनॉमिक कॉरिडोर प्रस्तावित किया गया था लेकिन ज़मीन पर नहीं उतर पाया था.
भारतीय सेना में नॉर्दन आर्मी कमांडर रहे जनरल (रिटायर्ड) दीपेंद्र सिंह हु्ड्डा कहते हैं कि इस प्रोजेक्ट के पूरा होने में देरी का कारण केवल म्यांमार की राजनीतिक अस्थिरता ही नहीं है.
जनरल हुड्डा कहते है, ''म्यांमार में सैन्य तख़्तापलट के बाद के राजनीतिक हालत इस प्रोजेक्ट में देरी का मुख्य कारण है लेकिन भारत की अपनी दिक़्क़तें भी हैं. मैं तो इस इलाक़े में रहा हूँ और मुझे पता है कि कई घरेलू कारण भी हैं. जैसे मणिपुर में कुकी और मैतेई के बीच जो हिंसा चल रही है, उसका असर भी पड़ा है. महीनों तक नाकाबंदी हो जाती है, जिसका असर ऐसी परियोजनाओं पर सीधा पड़ता है.''
अंतरराष्ट्रीय परियोजनाओं में देरी पर जनरल (रिटायर्ड) हुड्डा कहते हैं, ''अगर अंतरराष्ट्रीय प्रोजेक्ट जल्दी पूरे होंगे तो इससे भारत की छवि अच्छी होगा. देरी के कारण एक संदेश जाता है कि भारत इसे पूरा करने में बहुत वक़्त लेगा. अगर आप चीन से तुलना करें तो हम इस मामले में पिछड़ जाते हैं. मुझे नहीं पता कि फंड के कारण ऐसा होता है या फिर कोई और वजह है.''
भारत के पास ऐसे रोड प्रोजेक्ट को अंजाम तक पहुँचाने का अनुभव है. बॉर्डर रोड ऑर्गेनाइज़ेशन यानी बीआरओ ने मुश्किल से मुश्किल इलाक़ों में सड़कें बनाई हैं. बीआरओ भारतीय सेना का ही एक विंग है. बीआरओ ने 1997 से 2009 के बीच तामु से कलेमयो-कलेवा तक 160 किलोमीटर सड़क बनाई थी. इसे इंडिया-म्यांमार फ्रेंडशिप रोड भी कहा जाता है.

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मणिपुर में हिंसा का भी असर
इंडिया-म्यांमार-थाईलैंड (आईएमटी) हाईवे को तीनों देशों के बीच एक स्थायी संपत्ति के रूप में देखा जा रहा है. इस हाईवे को वियतनाम तक बढ़ाने की बात है. इसे इकनॉमिक कॉरिडोर के रूप में देखा जा रहा है, जिसके ज़रिए कई तरह की आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलेगा.
भारत और म्यांमार की सीमा पर कई नस्ली समूह रहते हैं. पिछले कुछ सालों से म्यांमार से लगे भारतीय राज्य मणिपुर में कुकी और मैतेई के बीच ख़ूनी संघर्ष चल रहा है. म्यांमार की सीमा की तरफ़ से भी इस हिंसा में लोगों के शामिल होने की कई रिपोर्ट्स आ चुकी हैं.
भारत सरकार ने इसके बाद सीमा पर बाड़ लगाने की घोषणा की थी. नस्ली हिंसा का असर भी इस प्रोजेक्ट पर पड़ा है. 2021 में म्यांमार में जब सैन्य तख़्तापलट हुआ तो इसका असर भी इस प्रोजेक्ट पर पड़ा. मंगलवार को जयशंकर इसी की ओर इशारा कर रहे थे. लेकिन कहा जा रहा है कि इसकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि मणिपर में नस्ली हिंसा कब थमेगी.
भारत और म्यांमार के बीच संबंधों का इतिहास काफ़ी जटिल रहा है. 1988 में जब म्यांमार में छात्रों की अगुआई में लोकतंत्र के लिए आंदोलन शुरू हुआ तो भारत पहला एशियाई देश था, जिसने इसका समर्थन किया था. भारत म्यांमार में सैन्य तख़्तापलट की निंदा करता रहा है. लेकिन म्यांमार में सैन्य शासन इतना लंबा रहता है कि भारत को व्यावहारिक रुख़ अपनाना पड़ा. भारत ने सैन्य सरकारों के साथ भी काम करना शुरू किया.
मणिपुर में कुई और मैतेई के बीच हिंसा शुरू होने के बाद गृह मंत्री अमित शाह ने पिछले साल फ़रवरी में सीमा पर बाड़ लगाने की घोषणा की थी. लेकिन इसकी जटिलता पर सवाल उठाने वालों में पूर्व सेनाध्यक्ष जनरल मनोज मुकुंद नरवणे भी रहे हैं.
नरवणे ने अंग्रेजी वेबसाइट 'द प्रिंट' पर छपे अपने लेख में लिखा था, "बाड़ लगाने की बात कहना जितना आसान है, उस पर अमल करना उतना मुश्किल है. वो भी तब जब ये बाड़ भारत-म्यांमार सीमा पर जंगलों से ढके मुश्किल पहाड़ी इलाक़े में लगानी हो. सड़कों की बात छोड़ दीजिए, कई इलाक़े ऐसे हैं, जहाँ पगडंडियों के रास्ते भी नहीं पहुंचा जा सकता. ये इलाक़ा भारत-पाक सीमा जैसा नहीं है, जहाँ सीमा पर बाड़ लगाना आसान है."
"यही नहीं, अगर आप बाड़ लगा भी लें तो भी इसका फ़ायदा तभी होगा जब आप उस पर नज़र रख पाएं और पूरे इलाक़े में गश्त लगा पाएं. वहीं, अगर घुसपैठ होने की स्थिति में आप पलटवार नहीं कर पाते हैं तो भी बाड़ का बहुत ज़्यादा अर्थ नहीं है."
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