अहमदाबाद प्लेन क्रैश: बोइंग 787 ड्रीमलाइनर के सबसे सुरक्षित होने के दावे पर उठते ये सवाल

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- Author, थियो लेगेट
- पदनाम, इंटरनेशनल बिज़नेस संवाददाता
अहमदाबाद में एयर इंडिया के विमान हादसे में कम से कम 270 लोग मारे गए थे.
यह बोइंग का सबसे आधुनिक और लोकप्रिय विमान था. अब तक बोइंग के इस मॉडल को सबसे सुरक्षित विमानों में से एक माना जाता था.
एयर इंडिया की उड़ान संख्या 171 टेक ऑफ़ के महज़ 30 सेकंड के बाद दुर्घटनाग्रस्त हो गई थी.
हालांकि अब तक इस हादसे की वजह के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाई है. हादसे की जांच कर रहे लोगों ने फ़िलहाल फ़्लाइट रिकॉर्डरों का डेटा हासिल कर लिया है और इसकी वजह जानने की कोशिश कर रहे हैं.
लेकिन यह हादसा जिस विमान के साथ हुआ था, उसने लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ ज़रूर खींचा है. बोइंग का 787 ड्रीमलाइनर आधुनिक और ईंधन की कम खपत के लिहाज से नई पीढ़ी का पहला विमान है.
अहमदाबाद हादसे से पहले क़रीब डेढ़ दशक तक 787 के साथ कोई ऐसा बड़ा हादसा नहीं हुआ था, जिसमें किसी की मौत हुई हो.
बोइंग के मुताबिक़ इस दौरान एक अरब से ज़्यादा लोगों ने इस मॉडल के विमान से यात्रा की. मौजूदा समय में ऐसे 11 सौ से ज़्यादा विमान पूरी दुनिया में उड़ान भर रहे हैं.
हालांकि 'बोइंग 787' विमान क्वालिटी कंट्रोल से जुड़ी कई समस्याओं से घिरा रहा है.
इस विमानों के प्रोडक्शन में जिन मानकों का पालन किया जाता है, उसे लेकर विमानों पर नज़र रखने वाले व्हिसलब्लोअर्स ने कई तरह की चिंता व्यक्त की.
कुछ व्हिसलब्लोअर्स का दावा है कि ऐसे विमान, जिनमें गंभीर खामियां थीं और जो काफ़ी ख़तरनाक हो सकता था, उन्हें भी उड़ान भरने के लिए भेजा गया.
हालांकि बोइंग कंपनी ने लगातार ऐसे दावों को ग़लत बताया है.
सोनिक क्रूज़र और 9/11 का असर

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साल 2009 में दिसंबर महीने की एक ठंडी सुबह एक बिल्कुल नया विमान सिएटल के पास पेन फील्ड हवाई अड्डे के रनवे पर उतरा. जब यह विमान उड़ान भर रहा था तो वहाँ मौजूद भीड़ काफ़ी उत्साह से इसे देख रही थी.
इस उड़ान के लिए कई साल तक कोशिश की गई थी और इस पर अरबों डॉलर का निवेश किया गया था.
दरअसल, 2000 के दशक की शुरुआत में विमानों के ईंधन पर होने वाला ख़र्च एक बड़ी चिंता बन चुकी थी. उस वक़्त तेल की क़ीमतें लगातार बढ़ रही थीं. इसलिए बोइंग ने एक ऐसा विमान बनाने की योजना पर काम शुरू किया जो एक नया स्टैंडर्ड तय कर दे.
एविशन सेक्टर के विशेषज्ञ शिआ ओकले बताते हैं, "1990 के दशक के अंत में बोइंग कंपनी सोनिक क्रूज़र नाम के डिज़ाइन पर काम कर रही थी, जिसका मक़सद क़रीब-क़रीब ध्वनि की गति से 250 लोगों को विमान की यात्रा कराना था. इसका शुरुआती ज़ोर सफर में लगने वाले समय को कम करना था न कि ईंधन पर होने वाले ख़र्च में कटौती करना."
लेकिन 9/11 की घटना ने पूरी एविएशन इंडस्ट्री को झकझोर कर रख दिया. ओकले के मुताबिक़ एयरलाइन्स ने बोइंग से कहा कि उन्हें बहुत तेज़ उड़ने वाले नहीं बल्कि ईंधन पर होने वाले ख़र्च के लिहाज से किफ़ायती विमान चाहिए.
इसके बाद बोइंग ने अपनी शुरुआती योजना को छोड़कर उस योजना पर काम शुरू किया, जिससे 787 मॉडल तैयार हुआ. इसने एयरलाइन्स के लिए एक नया बिज़नेस मॉडल भी खड़ा कर दिया.
अब लोगों को छोटे एयरपोर्ट से विमानों में बैठकर बड़े एयरपोर्ट जाने की ज़रूरत नहीं थी ताकि वो आगे की अपनी कनेक्टिंग फ़्लाइट ले सकें. अब कम भीड़ वाले रूट्स पर भी लोगों को फ़्लाइट्स की सुविधा मिलने लगी.
एयरबस का सुपरजंबो बनाम बोइंग

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इसी दौर में यूरोप की विमान बनाने वाली बड़ी कंपनी एयरबस ए-380 सुपरजंबो विमान विकसित कर रही थी. यह विमान बिज़ी रूट्स पर एक बार में ज़्यादा मुसाफ़िरों को सेवा देने के लिए बन रहा था.
लेकिन ईंधन की बड़ी खपत की वजह से केवल 251 विमानों के निर्माण के बाद साल 2011 में ए-380 बनना बंद हो गया.
एयरोडायनामिक एडवाइज़री के मैनेजिंग डायरेक्टर रिचर्ड अबुलाफिया कहते हैं, "एयरबस को लगता था कि भविष्य बड़े एयरपोर्ट्स का होगा, जहाँ लोग हमेशा फ़्रैंकफ़र्ट, हीथ्रो या नैरिटा जैसी जगहों पर जाकर अपनी फ़्लाइट बदलना चाहेंगे. लेकिन इस मामले में बोइंग का नज़रिया सही साबित हुआ."
एविएशन सेक्टर के लिए '787' वाक़ई एक क्रांतिकारी विमान था. यह पहला व्यावसायिक विमान था, जिसे एल्यूमिनियम की जगह मुख्य रूप से कार्बन फाइबर जैसे कंपोज़िट मटीरियल से बनाया गया.
इससे विमान का वज़न कम किया जा सका. इसके अलावा एडवांस एयरोडायनेमिक्स का इस्तेमाल कर इसे उड़ाने में लगने वाले बल को कम किया गया था.
इस विमान में जनरल इलेक्ट्रिक और रॉल्स रॉयस के बेहतर क्षमता वाले आधुनिक इंजन लगाए गए. इसके अलावा विमान को बेहतर बनाने के लिए मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल सिस्टम में कई बदलाव किए गए.
बोइंग का कहना था कि इन सभी बदलावों से यह विमान पुराने बोइंग 767 की तुलना में 20 फ़ीसदी बेहतर होगा.
इस विमान से शोर भी कम आता था. बोइंग के मुताबिक़ इसमें विमानों में शोर के लिए ज़िम्मेदार नॉइज़ फूटप्रिंट भी 60 फ़ीसदी तक छोटा था.
आपातकालीन लैंडिंग और सफ़र के दौरान हुई घटना

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हालांकि इस विमान के सेवा में आने के कुछ समय बाद ही समस्या सामने आ गई. जनवरी 2013 में इसके लीथियम‑आयन बैटरी में आग लग गई थी. यह हादसा बोस्टन के लॉगन इंटरनेशनल हवाई अड्डे पर खड़े विमान में हुआ था.
एक सप्ताह बाद ही जापान में एक घरेलू उड़ान के दौरान 787 की बैटरी बहुत ज़्यादा गरम होने की वजह से विमान को इमर्जेंसी लैंडिंग करनी पड़ी.
इसके बाद बोइंग ने दुनियाभर में 787 के पूरे बेड़े को कुछ महीनों के लिए उड़ान भरने से रोक दिया और इसकी खामियों को ठीक करने की कोशिश शुरू की गई.
उसके बाद इस विमान के दैनिक संचालन में सुधार हुआ लेकिन इसके प्रोडक्शन के साथ गंभीर समस्या बनी रही.
विश्लेषकों का मानना है कि इसका एक कारण बोइंग की मैन्युफैक्चरिंग लाइन शुरू करना था, जो अमेरिका के साउथ कैरोलाइना में सिएटल से क़रीब दो हज़ार किलोमीटर दूर था.
इस इलाक़े में नई मैन्युफ़ैक्चरिंग लाइन शुरू करने के पीछे का कारण मज़दूर संगठनों और राज्य से मिलने वाला सहयोग था.
व्हिसलब्लोअर्स का आरोप

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साल 2019 में बोइंग के निर्माण में लगातार कई ख़ामियां पाई गईं, जिनकी वजह से विमान के कई हिस्से ग़लत तरीके से फिट हो रहे थे.
इससे विमानों की सप्लाई में देरी हुई और मई 2021 से जुलाई 2022 तक इसकी सप्लाई पूरी तरह रोक दी गई.
इस मामले में सबसे गंभीर आरोप कंपनी में काम कर रहे कर्मचारियों और इसके पूर्व कर्मचारियों ने लगाए.
साउथ कैरोलाइना की फै़क्टरी में क्वालिटी कंट्रोल के मैनेजर जॉन बर्नेट ने आरोप लगाया कि तेजी से प्रोडक्शन के दबाव ने इस विमान की सुरक्षा को ख़त्म कर दिया था.
उन्होंने साल 2019 में बीबीसी को बताया था कि प्लांट में काम करने वाले कर्मचारियों ने कई सख़्त नियमों का पालन नहीं किया, जिनका पालन फैक्टरी में पुर्जों की जांच में होता है.
इससे पुर्जों के दोषपूर्ण हिस्सों की पहचान न हो पाने की आशंका बनी रही.
उन्होंने कहा कि कुछ मामलों में कर्मचारियों ने जानबूझकर स्क्रैप बिन से निकाले गए कम गुणवत्ता वाले हिस्से विमान में लगा दिए ताकि उत्पादन में देरी न हो.
उन्होंने यह भी दावा किया कि विमान की डेक को सुरक्षित करने के लिए दोषपूर्ण फिक्सिंग का इस्तेमाल किया गया.
जब इन्हें स्क्रू किया गया, तो उससे बेहद तेज धातु की छर्रियां निकलीं, जो कई बार में विमान के फर्श के नीचे उन जगहों पर जमा हो गए जहां काफ़ी वायरिंग होती है.
इन आरोपों की जांच को पहले ही अमेरिका के रेग्युलटर, फ़ेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेशन यानी एफ़एए को भेजा जा चुका था, जिसने जांच में कुछ दावों को सही पाया.
एफ़एए ने निष्कर्ष निकाला कि कम से कम 53 "नॉन कन्फ़र्मिंग" यानी स्टैंडर्ड से मेल न खाने वाले पुर्जे फैक्ट्री से गायब हो चुके थे.
एफ़एए की एक ऑडिट में यह भी पुष्टि हुई कि कई विमानों के फर्श के नीचे धातु की बुराद जमा थी.
बोइंग ने कहा कि उसके बोर्ड ने समस्या की समीक्षा की और पाया कि यह "विमान की सुरक्षा का मुद्दा नहीं" था. हालांकि इन पार्ट्स को बाद में फिर से डिज़ाइन किया गया.
कंपनी ने यह भी कहा कि उसने एफ़एए की पार्ट ट्रैसेबिलिटी से जुड़ी आपत्तियों को पूरी तरह सुलझा लिया है और भविष्य में ऐसी घटनाएं न हों, इसके लिए कदम उठाए हैं.
बर्नेट ने चेतावनी दी थी कि पहले से सेवा में जा चुके विमानों में दोष हो सकते हैं और कहा "मेरा मानना है कि 787 के साथ बड़ा हादसा होना समय की बात है."
साल 2024 की शुरुआत में बर्नेट ने आत्महत्या कर ली थी. उस वक़्त वो कंपनी के ख़िलाफ़ एक पुराने व्हिसलब्लोअर मुकदमे में सबूत दे रहे थे.
बर्नेट का कहना था कि उनके आरोपों के चलते कंपनी ने उन्हें प्रताड़ित किया है. हालांकि बोइंग ने ऐसे आरोप से इनकार किया.
उनके अधिकांश आरोप, उसी प्लांट की एक पूर्व क्वालिटी मैनेजर सींथिया किचेन्स के दावों की पुष्टि करते थे.
सींथिया किचेन्स ने साल 2011 में एफ़एए को सूचित किया था कि क्वारंटीन बिन से उपयोग के लिहाज़ से ख़राब पुर्जों को उठाकर विमान में लगाए गए थे.
उनके मुताबिक़ ऐसा विमान के उत्पादन को जारी रखने के लिए किया गया था.
सींथिया ने साल 2016 में बोइंग को छोड़ दिया. उन्होंने यह दावा भी किया था कि कंपनी ने कर्मचारियों को छोटी-मोटी ख़ामियों को नज़रअंदाज़ करने के लिए कहा था.
उन्होंने यह भी दावा किया था कि विमानों में दोषपूर्ण वायरिंग बंडल लगाए गए, जिनकी कोटिंग के भीतर धातु की बुराद थी और जिससे खतरनाक शॉर्ट-सर्किट का खतरा पैदा हो गया.
बोइंग ने इन ख़ास आरोपों पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. बोइंग के मुताबिक़ सींथिया को बताया गया कि उन्हें परफॉर्मेंस इम्प्रूवमेंट प्लान में रखा जा रहा है.
कंपनी ने कहा कि इसलिए सींथिया ने ये आरोप क्वालिटी के मुद्दे की वजह से नहीं बल्कि भेदभाव और बदले के आरोप में लगाए थे, जिसे ख़ारिज़ कर दिया गया था.

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हाल ही में एक तीसरे व्हिसलब्लोअर ने पिछले साल अमेरिकी सीनेट की एक समिति के सामने गवाही देते हुए सुर्खियाँ बटोरी थीं.
सैम सालेहपॉर नाम के एक कर्मचारी ने साल 2024 में कहा कि विमानों को बनाने की प्रक्रिया में शॉर्टकट तरीक़े अपनाने से उत्पादन की गति बढ़ाने में मदद मिली.
उन्होंने अमेरिकी सांसदों को बताया कि सामने आकर गवाही क्यों दी. उन्होंने कहा, "बोइंग में जिन सुरक्षा खामियों को मैंने देखा है, अगर उन्हें ठीक नहीं किया गया तो वे किसी व्यावसायिक विमान के भीषण हादसे का कारण बन सकती हैं, जिससे सैकड़ों लोगों की जान जा सकती है."
सैम क्वालिटी इंजीनियर के तौर पर साल 2020 के आख़िर तक 787 विमान के निर्माण पर काम कर रहे थे.
उन्होंने कहा कि 787 के बेड़े में ऐसे पुर्जे लगाए गए जिनमें ख़राबी होने की आशंका थी.
उन्होंने यह भी बताया कि जिन अधिकांश विमानों की उन्होंने जांच की उनमें ऐसी खामियां थीं, जो विमान के लिए काफ़ी गंभीर हो सकती थीं.
उन्होंने कहा कि 'एक हज़ार से अधिक विमानों' में खामियां हो सकती हैं.
बोइंग का कहना है कि "787 के निर्माण में इसके स्ट्रक्चर में ख़ामियों को लेकर जो दावे किए गए हैं और जो मुद्दे उठाए गए हैं, उन्हें एफ़एए की निगरानी में कठोर जांच के दायरे में लाया गया है. इस विश्लेषण ने पुष्टि की है कि यह विमान आने वाले कई दशकों तक अपनी मज़बूती और सेवा बनाए रखेगा, और ये समस्याएं कोई सुरक्षा जोखिम पैदा नहीं करतीं."
'अगर गंभीर समस्याएं होतीं, तो अब तक सामने आ जातीं'

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इस बात में कोई शक नहीं कि पिछले कुछ साल में बोइंग पर उसकी कॉरपोरेट संस्कृति और मैन्युफ़ैक्चरिंग स्टैंडर्ड्स को लेकर भारी दबाव पड़ा है.
इसकी सबसे ज्यादा बिकने वाली 737 मैक्स से जुड़े दो जानलेवा हादसों और पिछले साल एक और गंभीर घटना के बाद कंपनी पर यह आरोप बार-बार लगा कि उसने आर्थिक लाभ के लिए यात्रियों की सुरक्षा से समझौता किया.
इस धारणा को बदलने के लिए पिछले साल कार्यभार संभालने वाले कंपनी के नए सीईओ केली ऑर्टबर्ग ने काफी प्रयास किए हैं.
उन्होंने कंपनी की आंतरिक प्रक्रियाओं में बदलाव किए हैं और एफ़एए जैसे रेग्युलेटर के साथ मिलकर एक व्यापक सुरक्षा और गुणवत्ता नियंत्रण की योजना पर काम शुरू किया है.
लेकिन क्या 787 की सुरक्षा पहले ही पुरानी वजहों से प्रभावित हो चुकी है, जिसकी वजह से ख़तरा बना हुआ है?
रिचर्ड आबुलाफ़िया ऐसा नहीं मानते. वो कहते हैं, "सोचिए, यह विमान 16 साल से चल रहा है. क़रीब 1200 विमान और एक अरब से ज़्यादा यात्री, और अब तक कोई दुर्घटना नहीं हुई. सुरक्षा के लिहाज से यह एक शानदार रिकॉर्ड है."
उनका मानना है कि अगर विमान में कोई बड़ी समस्या होती, तो अब तक सामने आ चुकी होती.
उनका कहना है, "मुझे लगता है कि उत्पादन से जुड़ी समस्याएं एक छोटे से समय से जुड़ी हैं. पिछले कुछ साल में 787 के उत्पादन पर काफी सख़्त निगरानी रही है. पुराने विमानों में अगर कोई गंभीर समस्या होती, तो अब तक वह दिख चुकी होती."
अहमदाबाद में एयर इंडिया का जो विमान हादसे का शिकार हुआ था वह ग्यारह साल से ज़्यादा पुराना था. उसने पहली बार साल 2013 में उड़ान भरी थी.
हालाँकि अमेरिका की एक संस्था फ़ाउंडेशन फ़ॉर एयर सेफ़्टी का कहना है कि हालिया हादसे से पहले भी उसे 787 को लेकर कुछ चिंताएं थीं.
फ़ाउंडेशन फ़ॉर एयर सेफ़्टी की स्थापना बोइंग के ही एक पूर्व व्हिसलब्लोअर एड पियर्सन ने की थी.
पियर्सन कहते हैं, "हां, इसमें सुरक्षा जोखिम संभावना थी. हम किसी भी घटना और रेग्युलेटर के दस्तावेजों पर नज़र रखते हैं. जब उड़ानों की योग्यता के निर्देश जारी होते हैं, तो वे कई मुद्दों का ज़िक्र करते हैं और यह सोचने पर मजबूर करते हैं."
उनका कहना है कि वाशरूम के नलों से पानी के रिसकर इलेक्ट्रिकल इक्विपमेंट बे में जाने की संभावना भी ऐसा ही एक मुद्दा था.
पिछले साल एफ़एए ने कुछ 787 मॉडलों में इस तरह की लीक की शिकायतें मिलने के बाद नियमित निरीक्षण के आदेश दिए थे.
हालाँकि पियर्सन यह भी स्पष्ट करते हैं कि अहमदाबाद में हुए हादसे की वजह का अब तक पता नहीं है और यह बेहद ज़रूरी है कि जांच तेज़ी से आगे बढ़े ताकि यह स्पष्ट हो सके कि समस्या विमान में है, एयरलाइन में या कहीं और.
फिलहाल के लिए, 787 का सुरक्षा रिकॉर्ड मज़बूत बना हुआ है.
एविएशन कंस्लटिंग फ़र्म लीहम कंपनी के मैनेजिंग डायरेक्टर स्कॉट हेमिल्टन कहते हैं, "हम इस समय नहीं जानते कि एयर इंडिया हादसे का कारण क्या था. लेकिन हम इस विमान के बारे में जितना जानते हैं, उसके आधार पर मैं 787 में बैठने से बिल्कुल नहीं झिझकूंगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















