आपको कितनी बार शौच जाना चाहिए, क्या कहते हैं एक्सपर्ट्स?

शौच

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इमेज कैप्शन, हम कितनी बार शौच जाते हैं, यह हर किसी के लिए अलग-अलग हो सकता है

एक व्यक्ति में सबसे अच्छा शौच आमतौर पर 'टाइप 3' या 'टाइप 4' होता है. टाइप 3 का मतलब, ऐसा शौच जिसकी सतह पर दरारें होती है, वहीं टाइप 4 में शौच चिकना और मुलायम होता है.

दिन में एक बार इस तरह का शौच आना आमतौर पर अच्छे पाचन तंत्र का संकेत है.

लेकिन क्या आप दिन में तीन बार शौच जाते हैं या आपका शौचालय जाना बेहद कम होता है? वहीं सबसे ज़रूरी बात यह है कि आप कितनी बार शौच जाते हैं और यह आपके सेहत के बारे में क्या बताता है?

आइए इन सभी सवालों के जवाब और शौच के विज्ञान के बारे में और अधिक जानते हैं.

लाल लाइन

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हम कितनी बार शौच जाते हैं, यह हर किसी के लिए अलग-अलग हो सकता है. हर बार जब हम खाना खाते हैं, तो हमारी बड़ी आंत खाने को निचोड़ती है और पाचन तंत्र की मदद से इसे आगे बढ़ाती है.

इस प्राकृतिक प्रक्रिया को "गैस्ट्रो-कोलिक रिफ्लेक्स" कहा जाता है. यह प्रक्रिया उस हार्मोन को जारी करती है, जो हमारे शरीर के भीतर शौच करने की इच्छा पैदा करते हैं. लेकिन हम में से ज़्यादातर लोगों ने अपनी इस इच्छा को दबाना सीख लिया है, इसलिए दिन में एक बार या उससे भी कम बार बाथरूम जाना आम बात हो गई है.

अब तक के रिसर्च क्या कहते हैं?

आपको कितनी बार शौच जाना चाहिए

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इमेज कैप्शन, वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को सुलझा लिया है कि लोग आमतौर पर कितनी बार शौच करते हैं

मार्टिन वेसी, ऑस्ट्रेलिया के कैनबरा अस्पताल में पाचन तंत्र के रोगों का इलाज करने वाले डॉक्टर हैं. वह कहते हैं, "हम अक्सर इतने व्यस्त रहते हैं कि शौच के लिए समय नहीं निकाल पाते".

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लोग अक्सर यह दावा करते रहे हैं कि दिन में एक बार शौच करने का मतलब है कि आपकी आंत स्वस्थ है. लेकिन पहले इस बारे में कोई जानकारी नहीं थी कि शौच जाने के मामले में क्या "सामान्य" माना जाता है. एक स्टडी में तो यह भी कहा गया है कि हर कुछ हफ़्तों या महीनों में एक बार से लेकर दिन में 24 बार शौच करना सामान्य माना जा सकता है.

ब्रिटेन में ब्रिस्टल रॉयल इनफ़र्मरी के डॉक्टर केन हीटन जैसे वैज्ञानिकों के महत्वपूर्ण रिसर्च की बदौलत अब हम इस बारे में बेहतर जानते हैं.

1980 के दशक के आख़िर में हीटन और उनकी टीम ने ईस्ट ब्रिस्टल में रहने वाले लोगों से एक निजी सवाल पूछा कि "आप कितनी बार शौच करते हैं?"

इस स्टडी से पता चला कि लोग कई अलग-अलग तरीकों से शौच करते हैं. जबकि दिन में एक बार शौच करना सबसे आम था लेकिन केवल 40 प्रतिशत पुरुष और 33 प्रतिशत महिलाएं ही वास्तव में ऐसा करती थीं. कुछ लोग हफ़्ते में एक बार से भी कम शौच करते थे जबकि कुछ लोग दिन में तीन बार शौच जाते थे.

कुल मिलाकर, इस स्टडी से यह निष्कर्ष निकला कि आधी से भी कम आबादी में "सामान्य" शौच जाने की आदतें थीं और वहीं विशेष रूप से युवा महिलाएं अनियमित शौच जाने की समस्या से परेशान थीं.

जिन लोगों को हफ्ते में चार बार नरम शौच होता था, उनकी पांच सालों के भीतर मरने की संभावना उन लोगों की तुलना में 1.78 गुना ज़्यादा थी, जो हफ्ते में सात बार सामान्य रूप से शौच जाते थे.

संयोग से यह स्टडी, शौच के विज्ञान में हीटन का एकमात्र योगदान नहीं थी. बाद में उन्होंने ब्रिस्टल स्टूल फॉर्म स्केल को तैयार करने में मदद की. यह स्केल एक मददगार चार्ट है जिसका इस्तेमाल डॉक्टर पेट और पाचन संबंधी समस्याओं को समझने और उनका इलाज करने के लिए करते हैं.

इस स्केल में अलग-अलग तरह के शौच के चित्र और विवरण दिए गए हैं.

यूके की नेशनल हेल्थ सर्विस और दूसरी स्वास्थ्य इकाई का मानना है कि दिन में तीन बार और हफ्ते में तीन बार शौच के लिए जाना एक सामान्य बात है.

लेकिन सामान्य और स्वस्थ होना एक जैसी बात नहीं है. वैज्ञानिकों ने इस रहस्य को सुलझा लिया है कि लोग आमतौर पर कितनी बार शौच करते हैं, लेकिन इससे इस सवाल का जवाब नहीं मिलता कि हमें कितनी बार शौच करना चाहिए? रिसर्चर्स को लगता है कि हम कितनी बार शौचालय जाते हैं, इससे हमारे पूरी सेहत के बारे में संकेत मिलते हैं.

शौचालय से जुड़ी आदतों पर स्टडीज़ क्या कहती हैं?

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इमेज कैप्शन, शोधकर्ताओं ने अमेरिका में 14,573 वयस्कों की शौचालय की आदतों की जांच की

2023 के एक स्टडी में, शोधकर्ताओं ने अमेरिका में 14,573 वयस्कों की शौचालय की आदतों की जांच की. इनमें से ज़्यादातर लोग (50.7 प्रतिशत) हफ्ते में सात बार शौच करते थे और सबसे आम प्रकार का शौच चिकना और मुलायम होता था. फिर रिसर्चर्स ने इन लोगों को पांच साल से ज़्यादा समय तक ट्रैक किया ताकि यह देखा जा सके कि उनके कितनी बार शौच जाने में और उनके मरने की संभावना में कोई संबंध है या नहीं.

उन्होंने पाया कि जो लोग हफ्ते में चार बार नरम शौच करते थे, उनमें पांच साल के भीतर मरने की संभावना उन लोगों की तुलना में 1.78 गुना अधिक थी, जो हफ्ते में सात बार सामान्य रूप से शौच करते थे. जो लोग कम बार शौच करते थे, उनमें कैंसर और हृदय रोग से मरने की संभावना 2.42 और 2.27 प्रतिशत थी.

अमेरिका के सिएटल के एक माइक्रोबायोलॉजिस्ट सीन गिबन्स यह पता लगाने चाहते थे कि कितनी बार शौच करना अच्छा है. 2024 में, उन्होंने 1,400 स्वस्थ वयस्कों के साथ एक स्टडी की. उन्होंने उन्हें इस आधार पर चार समूहों में विभाजित किया कि वे कितनी बार शौच करते हैं.

इसके बाद उन्होंने यह देखने की कोशिश की कि वे कितनी बार शौच करते हैं और उनकी पेट की सेहत के बीच कोई संबंध है.

गिबन्स ने पाया कि जो लोग दिन में एक से तीन बार शौच करते हैं, उनके पेट में 'अच्छे' बैक्टीरिया का अनुपात उन लोगों की तुलना में ज़्यादा होता है जो शौचालय कम बार जाते हैं. दूसरी तरफ, गिबन्स ने पाया कि जो लोग हफ्ते में तीन बार से कम शौच करते हैं, उनके खून में ज़हरीले पदार्थ होने की संभावना ज़्यादा होती है. इन जहरीले पदार्थों को किडनी की बीमारियों और अल्जाइमर (याददाश्त का कम होना) रोग जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं से जोड़ा गया है.

गिबन्स कहते हैं, "शौच के गोल्डीलॉक्स ज़ोन (बिल्कुल सही मात्रा) में, हमने बैक्टिरिया को बढ़ते हुए देखा, जो शॉर्ट चेन फैटी एसिड नाम के केमिकल को बनाते हैं. इनमें से एक केमिकल को ब्यूटिरेट कहा जाता है, जो शरीर में सूजन को कम करने के लिए जाना जाता है. यह महत्वपूर्ण है क्योंकि माना जाता है कि लंबे समय तक सूजन हृदय रोग, टाइप 2 डायबिटीज और अल्जाइमर रोग जैसी गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती है" .

गिबन्स कहते हैं, "आपके शरीर में ज़्यादा ब्यूटिरेट होने से आप अपने खून में ग्लूकोज़ के लेवल को बेहतर तरीके से कंट्रोल कर सकते हैं. इससे आपकी इंसुलिन सेंसिटिविटी बेहतर हो जाती है. ब्यूटिरेट आपके पेट की कोशिकाओं से चिपक जाता है और उन्हें ऐसे हार्मोन जारी करने के लिए प्रोत्साहित करता है जो आपके पेट को भरा हुआ महसूस कराते हैं".

गिबन्स का मानना ​​है कि कब्ज़ से पीड़ित लोगों के खून में ज़्यादा ज़हरीले पदार्थ होते हैं क्योंकि उनका शौच बहुत लंबे समय तक पेट में रहता है.

इससे पेट में मौजूद बैक्टीरिया सभी मौजूद फाइबर को खा जाते हैं और इसे एसएफए नाम के स्वस्थ केमिकल में बदल देते हैं. हालांकि समस्या यह है कि एक बार जब सारा फाइबर ख़त्म हो जाता है, तो बैक्टीरिया इसकी जगह प्रोटीन को तोड़ना शुरू कर देते हैं. इस प्रक्रिया से खून में जहरीले पदार्थ निकलते हैं, जो किडनी और हृदय जैसे अंगों को नुकसान पहुंचा सकते हैं. इनमें से जहरीले पदार्थ को फेनिलएसिटाइलग्लूटामाइन कहा जाता है, जो हृदय रोग के जोखिम को बढ़ाता है.

गिबन्स कहते हैं, "अगर आपके खून में लंबे समय तक यह जहरीला पदार्थ बहुत ज़्यादा मात्रा में है, तो इससे एथेरोस्क्लेरोसिस नामक स्थिति पैदा हो सकती है. इसका मतलब है कि इससे आपकी आर्टरीज़ (शरीर में खून को बांटने वाली ट्यूब) सख्त हो जाती है, जो आपके दिल और ब्लड वैसल्स को नुकसान पहुंचा सकती है".

गिबन्स का कहना है कि जबकि डॉक्टर आमतौर पर कहते हैं कि दिन में तीन बार से लेकर हफ़्ते में तीन बार तक शौच करना स्वस्थ है. लेकिन उनकी स्टडी से पता चला है कि जो लोग इस सीमा से कम शौच करते थे, उनके खून में ज़्यादा ज़हरीले पदार्थ थे.

गिबन्स कहते हैं, "निश्चित रूप से यह कहना कठिन है, क्योंकि हमारे पास यह जानने के लिए कोई भी डेटा मौजूद नहीं है कि ये लोग भविष्य में बीमार हुए या नहीं. लेकिन उन्होंने जो देखा, उससे ऐसा लगता है कि हर दूसरे दिन या दिन में दो बार शौच करना सेहत के लिए ज़्यादा अच्छा तरीका है".

सिर्फ इसलिए कि दो चीज़े आपस में जुड़ी हुई है, इसका मतलब यह नहीं है कि एक चीज़ दूसरे की वजह से हो रही है. यह मुमकिन है कि जो लोग पहले से ही दूसरे कारणों से स्वस्थ नहीं है, वे लोग शौच कम बार जा सकते हैं. हालांकि, गिबन्स ने केवल उन वयस्कों की स्टडी करके इस समस्या से बचने की कोशिश की, जिन्होंने कहा कि उन्हें कोई स्वास्थ्य समस्या नहीं है.

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गट ट्रांज़िट टाइम

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इमेज कैप्शन, स्टडी में सामने आया कि गोल्डीलॉक्स ज़ोन (शौच जाने की आदर्श रेंज) वाले लोग अधिक फल और सब्ज़ियां खाते थे, अधिक हाइड्रेटेड थे और शारीरिक रूप से भी ज़्यादा एक्टिव थे

आपके पेट की सेहत को मापने का एक तरीका खाने को आपके पाचन तंत्र से गुजरने में लगने वाला समय है. इसे गट ट्रांज़िट टाइम कहा जाता है. आप घर पर स्वीटकॉर्न जैसे रंगीन चीज़ों को खाकर और यह देखकर इसकी जांच कर सकते हैं कि जब आप शौच करते हैं तो इसे बाहर आने में कितना समय लगता है.

आमतौर पर, किसी इंसान का गट ट्रांज़िट टाइम जितना लंबा होता है, उतनी ही कम बार वे शौच जाते हैं और उन्हें कब्ज़ होने की संभावना उतनी ही ज़्यादा होती है.

2020 में, किंग्स कॉलेज लंदन के रिसर्चर्स ने 863 लोगों को उनके गट ट्रांज़िट टाइम को मापने के लिए ब्लू मफिन (खाने की सामग्री) दिए. यह प्रेडिक्ट 1 स्टडी का हिस्सा था. यह एक ऐसा रिसर्च प्रोजेक्ट होता है, जो यह देखता है कि जेनेटिक्स, आंत के बैक्टिरिया और दूसरे कारणों में अंतर शरीर में ब्लड शुगर और फैट के लेवल को कैसे प्रभावित करती है.

इस स्टडी में पाया गया कि गट ट्रांज़िट टाइम हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकता है. यह समय अलग-अलग व्यक्ति में 12 घंटे से लेकर कई दिनों तक हो सकता है.

जो लोग अधिक बार शौच करते थे, उनका ट्रांज़िट टाइम तेज़ था और उनके आंत के बैक्टीरिया धीमें ट्रांज़िट टाइम वाले लोगों से स्पष्ट रूप से अलग थे. कम ट्रांज़िट टाइम का संबंध स्वस्थ आंत बैक्टीरिया से जुड़ा था.

किंग्स कॉलेज लंदन की वैज्ञानिक एमिली लीमिंग कहती हैं, "हमने पाया कि जिन लोगों का गट ट्रांज़िट टाइम लंबा था, उनमें ज़्यादा खराब बैक्टीरिया होते हैं. इन बैक्टीरिया को खराब हृदय स्वास्थ्य और मेटाबोलिक हेल्थ (आपका शरीर खाने के एनर्जी के लिए कितनी अच्छी तरह से प्रोसेस करता है) से जोड़ा गया है".

यह समस्या उन लोगों में सबसे ज़्यादा देखी गई जिनके शरीर से भोजन को गुजरने में 58 घंटे या उससे ज़्यादा का समय लगता था. ये लोग हफ्ते में तीन बार से भी कम शौच करते थे.

गिबन्स की तरह लीमिंग का भी मानना ​​है कि जब शौच लंबे समय तक पेट में रहता है, तो बैक्टीरिया के पास खाने के लिए फाइबर और कार्बोहाइड्रेट नहीं रह जाते. इसलिए, वे प्रोटीन खाना शुरू कर देते हैं. इससे ऐसे पदार्थ आपके शरीर में बनना शुरू कर देते हैं, जो आपकी सेहत को नुकसान पहुंचा सकते हैं.

लीमिंग की स्टडी से पता चला है कि जिन लोगों के शरीर से भोजन तेजी से गुजरता है, उन्हें सेहत के कुछ लाभ मिलते हैं. उनमें आंत की चर्बी कम थी, जो एक हानिकारक प्रकार की फैट है जो पेट में अंगों को घेर लेती है.

बहुत अधिक आंत की चर्बी हृदय रोग, डायबिटिज़ और कुछ कैंसर के जोख़िम को बढ़ा सकती है. इन लोगों में खाने के बाद भोजन के प्रति स्वस्थ प्रतिक्रिया भी थी, जिसे पोस्टप्रैंडियल रिस्पॉन्स कहा जाता है. इसका मतलब है कि भोजन के बाद उनके खून में शुगर और फैट का लेवल कम था, जिससे हृदय रोग का ख़तरा कम हो गया.

यह नतीजा वैज्ञानिकों के कब्ज़ और इससे जुड़ी बीमारी से संबंध के बारे में दी गई जानकारी से मेल खाता है. अगर किसी व्यक्ति को लगातार कब्ज की समस्या है, तो उसे आंत के कैंसर जैसी बीमारियों का ख़तरा ज़्यादा हो सकता है. हालांकि इस बात को समर्थन करने वाले मिले-जुले थे.

एक मेटा-विश्लेषण ने पाया कि कब्ज़ वाले व्यक्तियों में आंत के कैंसर का ख़तरा ज़्यादा मौजूद नहीं था.

लीमिंग कहती हैं, "कब्ज़ का संबंध दूसरी स्वास्थ्य समस्याओं से भी हो सकता है. उदाहरण के लिए, पार्किंसन रोग से पीड़ित लोगों में संतुलन को प्रभावित करने वाले लक्षण दिखने से 20 साल पहले तक कब्ज़ की समस्या हो सकती है".

वेसी ने बताया कि जब भोजन धीरे-धीरे आंत से होकर गुजरता है, तो इससे गॉलब्लैडर में पथरी जैसी स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती है, जो गॉलब्लैडर में बनने वाली सख्त गांठे होती है. इससे आंत में पॉलीप्स होने का जोखिम बढ़ सकता है. जो बाद में कैसर बन सकता है.

आपका शौच आपके बारे में क्या बताता है?

लीमिंग ने कहा कि आप हर हफ़्ते कितनी बार शौच जाते हैं, इस पर ध्यान देने के बजाय, अपने शौचालय की आदतों में किसी भी अचानक या असामान्य बदलाव पर नज़र रखना ज़्यादा ज़रूरी है.

वह आपके नियमित शौच की दिनचर्या पर नज़र रखने की भी सलाह देती हैं ताकि आपको पता चले कि आपके लिए क्या सामान्य है.

लीमिंग कहती हैं, "हम सभी को अपने शौच पर नज़र रखनी चाहिए क्योंकि यह आपके पेट की सेहत की जांच करने का आसान तरीका है. यह सिर्फ़ इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आप कितनी बार शौच जाते हैं, बल्कि आपके शौच का रंग और आकार भी मायने रखता है. सबसे आदर्श शौच टाइप3 या टाइप 4 (ब्रिस्टल स्टूल फॉर्म स्केल) पर होता है".

रंग के लिहाज़ से, अगर आपको अपने शौच में कोई काला या लाल रंग दिखाई देता है, तो इसका मतलब यह है कि उसमें खून की मौजूदगी है. हालांकि कभी-कभी इससे हमें कोई नुकसान नहीं होता, लेकिन यह कोलोरेक्टल कैंसर का संकेत भी हो सकता है, इसलिए तुरंत डॉक्टर को दिखाना ज़रूरी है. अगर आपको अक्सर दस्त होता है, अचानक शौच जाने की इच्छा होती है, या खाने के बाद अक्सर ऐंठन, सूजन या गैस का अनुभव होता है, तो भी आपको डॉक्टर को दिखाना चाहिए.

यदि आप नियमित रूप से शौच जाना चाहते हैं, तो गिबन्स इसके लिए आपको तीन आसान टिप्स सुझाते हैं.

वह कहते हैं, "हमारी स्टडी में, गोल्डीलॉक्स ज़ोन (शौच जाने की आदर्श रेंज) वाले लोग अधिक फल और सब्ज़ियां खाते थे, अधिक हाइड्रेटेड थे और शारीरिक रूप से भी ज़्यादा एक्टिव थे".

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