लोगों से घिरा होने के बावजूद आप 'अकेलापन' क्यों महसूस करते हैं?

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- Author, मैट वारेन
- पदनाम, .
हम बहुत भीड़ वाली दुनिया में रहते हैं, फिर भी हमें कई बार अकेलापन महसूस होता है. आख़िर हममें से अधिकांश लोगों के साथ ऐसा क्यों होता है और इस तरह के अकेलेपन को कैसे दूर कर सकते हैं?
वैसे अकेलापन कई प्रकार का होता है. हर किसी को यह अलग-अलग तरह से महसूस होता है. लेकिन, आपके लिए यह क्या है?
शायद अकेलापन एक शहर है; जहां इसकी सड़कों पर, शोर-शराबा, भीड़, गपशप, हंसी-मज़ाक के बीच आप अनजान बने रहते हैं. या कहें कि इन सबसे अलग-थलग रहते हैं.
हो सकता है कि यह ऐसा रिश्ता है, जिसमें खटास आ चुकी है. जैसे एक ऐसी शादी या पार्टनरशिप, जिसमें कुछ अनसुने शब्द हैं और अधूरी रह गईं ज़रूरतें हैं. आप वहां हैं ज़रूर, लेकिन आपको कभी देखा नहीं गया.

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वैसे यह सामान्य बात है कि अगर आप अकेले रहते हैं, तो आपको अकेलापन महसूस हो सकता है. कुछ बातें आपको उतना दु:ख पहुंचा सकती हैं, जिनका अनुभव समाज के सबसे कमज़ोर लोगों ने भी किया है.
अगर आपने भी ऐसी किसी स्थिति का सामना किया है, जो ऊपर बताई गई है, तो आपको भी यह शंका हो सकती है कि हमेशा ही दूसरे लोग अकेलेपन का इलाज़ नहीं होते हैं.
बल्कि, वो लोग समस्या का हिस्सा भी हो सकते हैं. क्योंकि, हम भीड़ में भी अकेले हो सकते हैं. एक रुमानी रिश्ते में, दोस्तों के बीच भी अकेले हो सकते हैं.
'अकेलेपन की महामारी'
दरअसल, अकेलापन एक अनुभव है, जिसकी पुष्टि साल 2021 में किए गए एक अध्ययन के आधार पर की गई. इस अध्ययन में 756 लोग शामिल थे.
ये वो लोग थे, जिन्होंने दो साल तक इस अनुभव को नियमित तौर पर दर्ज किया था कि स्मार्टफ़ोन ऐप का इस्तेमाल करने के दौरान उनको कैसा महसूस हुआ था.
ऐसा लगता है कि अकेलेपन का अहसास ज़्यादा भीड़, घनी आबादी वाले इलाक़े या दूसरे शब्दों में कहा जाए तो आधुनिक शहरों में बढ़ता दिख रहा है.
क्या ऐसा हो सकता है कि बढ़ता शहरीकरण और हमारी जीवनशैली पर बढ़ता तकनीक का प्रभाव हमारे एक-दूसरे से कम जुड़ने की वजह बन रहा है?
और क्या इन निष्कर्षों के भीतर कोई समाधान भी छिपा है? इस विरोधाभास को समझना निश्चित तौर पर अहम है. हम कथित तौर पर 'अकेलेपन की महामारी' से गुज़र रहे हैं.
यह एक वैश्विक प्रकोप है, जिसकी कोई सीमा नहीं है. यह युवा और बुजुर्गों को प्रभावित करता है, और हमारे दिमाग़ पर भी असर डाल सकता है.
'अकेलापन' क्यों महसूस होता है?
बीबीसी लोनलिनेस एक्सपेरिमेंट में साल 2018 में दुनियाभर से 55 हज़ार लोगों को शामिल किया गया.
इसमें यह बात निकलकर आई कि 16 से 24 साल के लोगों में 40 फ़ीसदी ऐसे थे, जिन्हें अक्सर या बहुत बार अकेलापन महसूस होता था.
वहीं, अन्य अध्ययन बताते हैं कि दुनिया में 10 फ़ीसदी वयस्क ऐसे हैं, जो अलग-अलग तरह से अकेलापन महसूस करते हैं.
लेकिन, यह ऐसे समय में आया है, जब हमारे पास दूसरों से जुड़ने के कई तरीके़ मौजूद हैं, जो इससे पहले तो कभी नहीं रहे; और इसका श्रेय तकनीक को जाता है.
तकनीक के ज़रिए हम एक फ़ोन घुमाकर दुनिया के दूसरे छोर पर बैठे अपने दोस्त या परिवार से बात कर सकते हैं. ऐसे लोगों से ऑनलाइन बातचीत कर सकते हैं, जिनसे हम कभी नहीं मिले.
और सोशल मीडिया अपडेट के ज़रिए यह भी जान सकते हैं कि आख़िर उनकी ज़िंदगी में क्या चल रहा है.
शहरी आबादी तेज़ी से बढ़ रही है. इस सदी के मध्य तक दुनिया की 68 फ़ीसदी आबादी शहरों में रह रही होगी.
तो, हमारी व्यस्त, और तकनीक से जुड़ी दुनिया में हमारे आसपास अन्य लोगों के होने के बावजूद हमें अकेलापन क्यों महसूस होता है?
क्या यह वाकई दूसरी महामारी है. या कुछ ऐसा है, जिसे हमेशा टाला जाना चाहिए या इसका इलाज किया जाना चाहिए. या फिर इसे बस बुरा बताया जाना चाहिए या क्या हम इससे भी कुछ सीख सकते हैं?
क्या कहते हैं विशेषज्ञ?

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अकेलापन एक अस्पष्ट, जटिल अवधारणा है. कुछ ऐसा, जिसे हम सभी अपनी तरह से महसूस करते हैं.
फ़े बाउंड अल्बर्टी, किंग्स कॉलेज लंदन में इतिहास की प्रोफ़ेसर हैं. उन्होंने एक किताब 'ए बायोग्राफ़ी ऑफ़ लोनलिनेस' भी लिखी है.
वो यह तर्क देती हैं कि अकेलापन दिमाग की एक अवस्था होने के बजाए भावनाओं का पूरा 'झुंड' है, जिसमें दुख, क्रोध, ईर्ष्या जैसी भावनाएं हो सकती हैं.
हालांकि, अब अकेलेपन को विज्ञान में वास्तविकता और सामाजिक रिश्तों को लेकर चाहत के अंतर को परिभाषित किया जाता है.
यह बताता है कि आपको 'अकेलापन' महसूस करने के लिए 'अकेला' रहने की ज़रूरत नहीं है.
सैम कैर, यूनिवर्सिटी ऑफ़ बाथ में एक मनोवैज्ञानिक हैं. वो मानवीय संबंधों पर शोध करते हैं. उनका मानना है कि 'सबसे बड़ा मिथक' यह है कि लोगों को हमेशा अकेलेपन का समाधान समझा जाता है.
कैर कहते हैं, "वास्तव में लोग इसकी वजह हो सकते हैं." कैर एक किताब 'ऑल द लोनली पीपल' के लेखक भी हैं. यह किताब लोगों द्वारा अकेलेपन में किए गए अलग-अलग अनुभवों के बारे में बताती है.
कैर कहते हैं, "हर कोई एक तरह की पहेली है, और हम यह महसूस करना चाहते हैं कि हम उसमें फिट बैठते हैं. और आमतौर पर दूसरे लोग वो वजह हो सकते हैं, जिनके कारण हम वैसा महसूस नहीं कर पाते हैं, जैसा हम महसूस करते हैं. यदि वो दोस्त या पार्टनर हों, तब भी."
वो कहते हैं, "शायद, वो यह नहीं पहचान पाते हैं कि हम कौन हैं. या फिर वो हमें ऐसा महसूस करवाते हैं कि हम हैं ही नहीं. या हमें ऐसा दिखावा करना पड़ता है कि हम उनकी कंपनी में कोई और हैं. कई लोगों के लिए उनके अकेलेपन का मूल कारण यही होता है."
'अकेलेपन' की वजह क्या है?

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बाउंड अल्बर्टी भी इस बात से सहमत हैं कि लोगों के अकेलेपन की वजह यह नहीं है कि वो अकेले रहते हैं.
वह कहती हैं, "लोगों को यह लगता है कि अकेलेपन का मतलब यह है कि जब आप अकेले रहते हैं."
"मगर, मेरी रिसर्च बताती है कि हमारा किसी से दूर होना, हमें उतना अकेलापन महसूस नहीं करवाता, जितना कि किसी से भावनात्मक तौर पर दूर होना, हमें अकेलेपन का अहसास करवाता है."
उन्होंने कहा, "रिश्तों में सबसे ज़्यादा अकेले वो लोग होते हैं, जो अपने रिश्तों में संतुष्ट नहीं होते हैं. जैसे मुझे सबसे ज़्यादा अकेलापन उस समय महसूस हुआ, जब मैं लोगों से घिरी हुई थी."
हाल ही में कैर को अमेरिका से एक पत्र मिला. इसे एक महिला ने लिखा था. उस महिला ने इस पत्र में बताया था कि उन्होंने पचास साल पहले शादी की थी.
उन्होंने बताया कि उनके पति ही उनके अकेलेपन का कारण थे. जबकि उनको उम्मीद थी कि शादी उनके अकेलेपन का इलाज बन पाएगी, लेकिन यह तो उनके अकेलेपन की वजह बन गई थी.
दरअसल, अगर एक पार्टनर की प्राथमिकता फ़िजिकल कनेक्शन है और दूसरा बौद्धिक जुड़ाव की तलाश में है, तो वो लोग साथ होकर भी अकेलेपन का शिकार हो सकते हैं.
ओलिविया रिमिस 'द इंस्टंट मूड फ़िक्स' की लेखक हैं. वो यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैम्ब्रिज में मेंटल हेल्थ रिसर्चर हैं. वो कहती हैं, "यह एक ऐसी धारणा हो सकती है. जहां आप सोचते हैं कि आपकी ज़रूरतें पूरी हों."
उन्होंने कहा, "कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जिनका यदि किसी एक व्यक्ति के साथ भी मज़बूत संबंध हो, तो वो अकेलापन महसूस नहीं करते हैं. जबकि दूसरे कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो कई लोगों से घिरे होने के बावजूद कुछ गहरे रिश्तों की चाहत रखते हैं."
दरअसल, जैसे जब हमें भूख लगती है तो हम खाना ढूंढते हैं. उसी तरह अकेलापन भी है, जो इसे दूर करने के विकल्प तलाश कर रहा होता है.
ओलिविया रिमिस कहती हैं, "हमारे सामाजिक माहौल के साथ कुछ दिक्कतें हैं, जिनके बारे में कुछ करने की ज़रूरत है."
वो बताती हैं कि हमारे पूर्वजों के लिए भी अकेलापन ख़तरनाक था. यह उनको कमज़ोर बना देता था, जिस कारण वो खूंखार जानवर और अन्य दिक्कतों का शिकार हो जाते थे.
ऐसे में वे खुद को उम्मीद से कम समय तक बचा पाते थे. और यही बात अगली पीढ़ी में चली जाती थी. मगर, अब समय बदल गया है. इसलिए, अकेलेपन को देखने का नज़रिया भी बदल गया है.
बाउंड अल्बर्टी की शोध यह कहती है कि 19वीं सदी के पहले "अकेलेपन" की जो परिभाषा थी, उसका इस्तेमाल हम आज करते हैं. मगर, वास्तव में आज इसका अस्तित्व नहीं है.
इससे पहले "अकेला" से मतलब इकलौता व्यक्ति हुआ करता था. इसे इतना बुरा भी नहीं माना जाता था. बल्कि, अकेले होने का मतलब यह माना जाता था कि यह आपको ईश्वर और प्रकृति के नज़दीक ले जाता है.
बाउंड अल्बर्टी कहती हैं, "इससे पहले 'अकेलेपन' की यह भाषा थी, जिसे मैं प्यार करती हूं. मैं चाहती हूं कि यह फिर से चलन में आए. जैसे- एक कवि विलियम वर्ड्स्वोर्थ ने लिखा था, 'एक बादल की तरह अकेला'."
"वो अकेले रहते हुए होने वाले अनुभव पर बात कर रहे थे. उनका यह मतलब बिल्कुल नहीं था कि वो भावनात्मक तौर पर कमज़ोर महसूस कर रहे हैं, जैसे आज हम इस शब्द को 'अकेलेपन' से जोड़ते हैं."
'अकेलेपन' से कैसे निपटा जाए?

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वैसे दुनियाभर में समुदायों में बदलाव आ चुका है. बाउंड अल्बर्टी यह तर्क देती हैं कि जैसे-जैसे शहरीकरण का दायरा बढ़ता गया, लोग एक-दूसरे से ज़्यादा अनजान रहने लगे.
कुछ अध्ययन बताते हैं कि व्यक्ति केंद्रित व्यवस्था के बढ़ने ने भी इसमें अपनी भूमिका निभाई है.
वह कहती हैं, "जब कभी मैं अपने आसपास देखती हूं, तो मुझे सामाजिक देखभाल, और उसमें जुड़ाव की कमी नज़र आती है. इसलिए, मुझे यह हैरानी नहीं होती है कि हम 'अकेलापन' महसूस कर रहे हैं."
तो, यदि लोगों से घिरा होने के बाद भी हमें 'अकेलापन' महसूस होता है, तो हम क्या कर सकते हैं?
इस बारे में ओलिविया रिमिस कहती हैं, "यदि आपको ऐसे लक्षण महसूस हो रहे हैं, जो आपको आपकी ज़िंदगी आपके हिसाब से जीने में बाधा बन रहे हैं. आपको काम करने से रोक रहे हैं.
या फिर आपको किसी के साथ रिश्ता रखने से रोक रहे हैं. और आप पर दबाव बढ़ा रहे हैं, तो फिर आपको ये बातें किसी मेडिकल प्रोफ़ेशनल को बताने की ज़रूरत है कि आप किन दिक्कतों से जूझ रहे हैं."

बाउंड अल्बर्टी कहती हैं कि यह भी महत्वपूर्ण है कि आप सबसे पहले यह बात साफ़ कर लें कि यह वो अकेलापन है, जो आप पर थोपा गया है, या फिर वो अकेलापन है, जो आपने चुना है.
क्योंकि, हम सभी यह चुनाव कर सकते हैं कि हम अकेले रहना चाहते हैं या नहीं.
जैसे कई लोगों के साथ परिस्थितिवश ऐसा माहौल बन जाता है, जो उन पर अकेलापन थोप देता है. इसमें उम्र, स्वास्थ्य, ग़रीबी और भेदभाव से जुड़ी बातें हो सकती हैं.
ये वो बातें हैं, जिन पर सरकार और समाज को जल्द से जल्द कुछ कदम उठाना चाहिए.
अकेलेपन से निपटने के सुझाव पर ओलिविया रिमिस कहती हैं, "जब हम दूसरों की मदद करते हैं, तो यह बात हमें उन परिस्थितियों से ध्यान हटाने में कारगर साबित होती है, जिनसे हम गुज़र रहे होते हैं."
वह कहती हैं, "जब हम अपना ध्यान किसी दूसरे पर केंद्रित करते हैं, और यह सोचते हैं कि हम कैसे उनकी ज़िंदगी में बदलाव ला सकते हैं, तो यह हमें उनके साथ एक जुड़ाव महसूस करने में मदद करता है."
"यही बात हमारे 'अकेलेपन' को कम कर देती है."
साल 2020 में हुआ एक अध्ययन बताता है कि अकेलेपन और स्पर्श की कमी के बीच एक जुड़ाव है. यदि कोई आकर आपके कंधे पर छू देता है, तो आपको एक सामाजिक जुड़ाव महसूस होता है.
जैसे साल 2021 में हुआ अध्ययन यह बताता है कि जो लोग भीड़भाड़ वाले शहरी इलाक़े में रह रहे थे, वो ज़्यादा अकेलापन महसूस करते हैं. प्रकृति के साथ आपका संपर्क कम हो जाता है.
जैसे-जैसे दुनिया व्यस्त होती जाएगी, यह दूसरों से जुड़ने के और भी बेहतर तरीके ढूंढती जाएगी. यह कुछ ऐसा है, जिसका फ़ायदा हम सभी को मिलेगा.
मगर, जब कभी भी हम अकेलापन महसूस करे, तो हमें खुद को लेकर इतना ज़्यादा आलोचनात्मक रवैया भी नहीं अपनाना चाहिए.
यह मत भूलिए कि यह सामान्य प्रक्रिया है, जो कभी-कभी हमारे लिए फ़ायदेमंद हो सकती है, ज़रूरत है इसे ध्यान से सुनने की, बजाए इसे एक बुराई समझने की.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















