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प्रियंका गांधी ने क्यों छोड़ा यूपी का मैदान, सोची समझी रणनीति या नाकामी पर मुहर
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस संगठन में एक बड़े फेरबदल के तहत प्रियंका गांधी वाड्रा के उत्तर प्रदेश का प्रभार छोड़ने पर मुहर लगा दी गई है.
झारखंड के प्रभारी रहे अविनाश पांडे अब यूपी के प्रभारी होंगे.
ये कहा जा रहा है कि प्रियंका गांधी अब कांग्रेस के अखिल भारतीय प्रचार अभियान में जुटेंगीं.
प्रियंका गांधी ने अक्टूबर 2022 में ही कांग्रेस के प्रभारी महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया था. लेकिन इस पर अब मुहर लगी है.
पिछले साल ही इस्तीफे के बाद प्रियंका ने विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की कैंपेनिंग पर फोकस किया था.
कर्नाटक, तेलंगाना, राजस्थान, छत्तीसगढ़ से लेकर मध्य प्रदेश और उत्तर पूर्व के राज्यों में प्रियंका की कैंपेनिंग के बाद ये साफ हो गया कि वो अब लोकसभा चुनावों में पार्टी की स्टार प्रचारक के तौर पर दिखाई देंगी.
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की बुरी हार के बाद उन्होंने कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस के लिए प्रचार किया था.
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि दोनों जगह उनके प्रचार से पार्टी को फायदा हुआ और उसे जीत मिली.
एक कयास ये भी लगाया जा रहा है कि शायद अब वो ‘भारत जोड़ो’ यात्रा के दूसरे दौर में अपने भाई राहुल गांधी का साथ देंगीं.
हालांकि कांग्रेस के राजनीतिक फैसलों पर नजर रखने वालों का कहना है कि प्रियंका को प्रभार काफी पहले छोड़ देना चाहिए था. उत्तर प्रदेश में प्रभारी रहते वो कुछ ख़ास नहीं कर सकीं.
ऐसे में सवाल है कि प्रियंका गांधी से उत्तर प्रदेश का प्रभार लिया जाना राज्य की चुनावी राजनीति में उनकी नाकामी पर आधिकारिक मुहर है या फिर ये एक सोची समझी रणनीति है, जहां उन्हें यूपी की जगह उन राज्यों में ज़िम्मेदारी दी जाए जहां कामयाबी की संभावना ज़्यादा है.
प्रियंका की क्षमता पर सवाल
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक शरद गुप्ता बीबीसी से कहते हैं, '' जिस पार्टी ने 1947 से 1989 के बीच कुछ वर्षों तक छोड़ कर लगभग चार दशक तक यूपी में राज किया वो अब लोकसभा की एक सीट पर सिमट गई है. उस पार्टी के प्रभारी को तो बहुत पहले इस्तीफा दे देना चाहिए था.''
हालांकि प्रियंका के समर्थकों का कहना है कि यूपी में कांग्रेस काफी पहले से कमजोर हो गई थी ऐसे में महज तीन चार साल में उनसे चमत्कार की उम्मीद कैसे की जा सकती है.
लेकिन शरद गुप्ता कहते हैं, '' प्रियंका गांधी 1984 से राजीव गांधी के साथ अमेठी जाती रही हैं. भले सोनिया गांधी पूरे देश में प्रचार करने की वजह से वहां नहीं जा पाती हों लेकिन प्रियंका गांधी रायबरेली और अमेठी सीट के प्रचार में जरूर जाती थीं. इसका मतलब कम से कम दो सीटों पर तो कांग्रेस को जीतना चाहिए था. जब प्रियंका के प्रभारी रहते कांग्रेस अमेठी हार गई तो फिर उनके बने रहने का क्या तुक बनता है.''
ये कहा जा रहा है कि कांग्रेस के अंदर एक बड़ा तबका है जो प्रियंका गांधी के कामकाज के तरीके को पसंद नहीं करता है. पार्टी से जुड़े लोग दावा करते हैं कि पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी के बारे में कोई कुछ नहीं बोलता है लेकिन प्रियंका गांधी के सैकड़ों आलोचक हैं.
शरद गुप्ता इसकी तस्दीक करते हैं.
वो कहते हैं,'' पंजाब में कांग्रेस की जो दुर्दशा हुई उसके लिए पूरी तरह प्रियंका गांधी जिम्मेदार थीं. उन्होंने अमरिंदर सिंह को हटा कर चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम बनवाया. नवजोत सिंह सिद्धू को काफी तवज्जो दी गई. और आखिरकार पंजाब कांग्रेस के हाथ से निकल गया. इसके लिए प्रियंका गांधी जिम्मेदार हैं क्योंकि पंजाब का सारा कामकाज वही देख रही थीं. वही सारे फैसले ले रही थीं.''
वो कहते हैं कि राजस्थान में भी प्रियंका ने ऐसा ही किया. वहां सचिन पायलट पर कोई कार्रवाई न होने का नुकसान पार्टी को झेलना पड़ा.
शरद गुप्ता कहते हैं, ''सचिन पायलट अशोक गहलोत के पूरे कार्यकाल में खुलेआम विद्रोह करते रहे. बीजेपी के साथ मिल कर सरकार बनाने की धमकी देते रहे. इस बार दौसा-भरतपुर बेल्ट में कांग्रेस को गुर्जरों के वोट नहीं मिले तो सिर्फ इसलिए की सचिन पायलट गहलोत के खिलाफ खड़े थे. इसकी वजह से कांग्रेस ने 20 सीटें गंवाई. अगर कांग्रेस को ये सीटें मिल जातीं तो वो सरकार बना सकती थी. इसके बावजूद सचिन पायलट को छत्तीसगढ़ का प्रभारी बना कर पुरस्कृत किया गया.''
कौन लेता है प्रियंका के फ़ैसले?
प्रियंका गांधी के विरोधी उन पर जमीन पर काम करने वालों की जगह ड्राइंगरूम पॉलिटिक्स करने वालों को तवज्जो देने का आरोप लगाते रहे हैं.
शरद गुप्ता का कहना है कि प्रियंका गांधी को फिलहाल अपने करीबी सलाहकारों से छुटकारा पाना होगा. जिस दिन वो ये कर लेंगी उनकी राजनीति सुधर जाएगी. ये लोग उनके फैसलों पर हावी हैं.
ये कहा जा रहा है कि यूपी का प्रभार छोड़ कर वो लोकसभा चुनाव में पूरे देश में स्टार प्रचार के तौर पार्टी की लिए कैंपेनिंग करेंगीं. इससे कांग्रेस को फायदा होगा.
शरद गुप्ता कहते हैं, "ये ठीक है कि पूरे देश भर में उनके प्रति एकआकर्षण है. लोग सभाओं में उन्हें देखने जाते हैं. कुछ लोग उनकी बात सुनते भी हैं. लेकिन वो कांग्रेस को वोट दिला पाएंगी इसमें संदेह है. वो किसी भी सीट से खड़े होकर ये नहीं कह सकतीं कि वो चुनाव लड़ेंगी और जीत जाएंगीं."
वो कहते हैं, "जो शख्स कभी चुनाव न लड़ा हो कैसे किसी को जिता सकता है. जबकि उनके भाई राहुल गांधी और मां चुनाव लड़ चुकी हैं. वो राज्यसभा में जाने वाले उम्मीदवारों की तरह ड्राइंग रूम पॉलिटिक्स करती हैं. सिर्फ वो गांधी परिवार के नाम पर पार्टी में प्रेशर बनाने का काम करती हैं."
शरद गुप्ता कहते हैं, "प्रियंका गांधी से पूछा जाना चाहिए कि पार्टी में उनका योगदान क्या है. उनकी मां सोनिया गांधी मनरेगा, सूचना का अधिकार और भोजन का अधिकार का कानून लेकर आईं. उन्होंने इतने काम किए. राहुल गांधी ने पूरे देश की पदयात्रा की. लेकिन प्रियंका ने क्या किया? उन्होंने सिर्फ सचिन पायलट, ज्योतिरादित्य सिंधिया और नवजोत सिंह सिद्धू जैसे नेताओं को बढ़ावा दिया."
उत्तर प्रदेश की गांठ कैसे खुलेगी?
उत्तर प्रदेश की गांठ खोलना कांग्रेस के लिए बहुत ही मुश्किल साबित होता जा रहा है. क्या कांग्रेस प्रियंका से बहुत ज्यादा उम्मीद कर रही थी?
इस सवाल के जवाब में वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक नीरजा चौधरी कहती हैं, "2003 में जब कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं से बात होती थी तो वो लोग खुद को लाचार महसूस करते थे. आज भी वही बात है. 20 साल गुजर गए लेकिन कांग्रेस यूपी में मजबूत नहीं हो सकी. वहीं 2013 में अमित शाह को बीजेपी का प्रभारी बनाया गया. उस समय पार्टी के पास दस सीटें थीं और जब 11 महीने बाद लोकसभा चुनाव के नतीजे आए तो उसके पास 75 सीटें थीं."
वो कहती हैं, "प्रियंका जब यूपी संभालने आई थीं तो ऐसा लग रहा था कि शायद ये पार्टी कुछ संभल जाए लेकिन लगता है कि उन्होंने भी अब हथियार डाल दिया है. पार्टी अब शायद नहीं चाहती कि यूपी में कांग्रेस की कमजोरी के लिए उन्हें निशाना बनाया जाए."
कांग्रेस की राजनीति पर नज़र रखने वालों का दावा है कि आने वाले लोकसभा चुनाव में प्रियंका गांधी चुनाव मैदान में उतर सकती हैं. इसे भी उनके यूपी प्रभार छोड़ने की एक वजह माना जा रहा है.
लेकिन नीरजा चौधरी कहती हैं, "ऐसा लगता है कि प्रियंका इस बार चुनाव लड़ेंगीं. कुछ लोगों का कहना है कि उनको वाराणसी से मोदी के खिलाफ लड़ाया जा सकता है. वो सीट रायबरेली या अमेठी भी हो सकती है. लेकिन ऐसा होने पर वो यूपी में सीमित हो जाएंगीं. पूरे देश में कैंपेनिंग नहीं कर पाएंगीं.’’
नीरजा चौधरी कहती हैं, "प्रियंका दक्षिण भारत से चुनाव लड़ सकती है. हो सकता है वो चिकमंगलूर सीट से लड़ें जहां से कभी उनकी दादी इंदिरा गांधी चुनाव लड़ीं थीं. चूंकि इनकी तुलना इंदिरा गांधी से की जाती है इसलिए उनके कर्नाटक की चिकमंगलूर सीट से लड़ने की संभावना है.’’
यूपी से उम्मीद नहीं?
प्रियंका के यूपी का प्रभार छोड़ने के बाद क्या कांग्रेस को किस रणनीति पर काम करना चाहिए जिससे इसे मजबूती मिल सके.
नीरजा चौधरी कहती हैं, "देखिये,योगी और मोदी की जोड़ी यूपी में मंदिर की राजनीति के इर्द-गिर्द काम कर रही है. 2024 में अयोध्या के मंदिर की राजनीति की छाई रहेगी. कांग्रेस बीजेपी की इस हिंदू राजनीति का काट नहीं खोज पा रही है. खास कर यूपी में. लेकिन ये आज की चुनौती नहीं है पिछले 20 साल ये बरकरार है. ये देख कर लगता है कि कांग्रेस ने मेहनत करना बंद कर दिया है."
वो कहती हैं, "कांग्रेस को कम से पांच साल की रणनीति बनानी होगी. उन लोगों को अहम जिम्मेदारियां दी जानी चाहिए जिनमें जमीन पर मेहनत करने की क्षमता है. इसके साथ ही उसे जातिगत समीकरणों को भी ध्यान में रखना होगा. कोशिश करने पर मुस्लिमों और दलितों का एक बड़ा हिस्सा कांग्रेस के पास आ सकता है. लेकिन ये अभी भी कांग्रेस ओबीसी का राग अलाप रही है. जबकि ओबीसी यूपी में कांग्रेस का वोट बैंक कभी नहीं रहा है."
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