You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनाव: राज्य की राजनीति में असली 'किंग मेकर' कौन?
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिन्दी के लिए
यह 1952 का किस्सा है, जब आज़ादी के बाद मध्यप्रांत में पहली बार विधानसभा चुनाव हो रहे थे. भोपाल से लेकर रायपुर और नागपुर भी इसी मध्यप्रांत का हिस्सा थे.
विधानसभा की 184 सीटों के लिए जब उम्मीदवारों की तलाश शुरु हुई तो आदिवासी इलाक़ों में राजनीतिक दलों के पसीने छूट गए.
इन 184 में से पांच सीटें ऐसी थीं, जहां केवल एक उम्मीदवार चुनाव में खड़ा हुआ था. ज़ाहिर है, इन उम्मीदवारों को निर्विरोध चुना गया.
इनमें दंतेवाड़ा से निर्दलीय प्रत्याशी बोडा, बीजापुर से कांग्रेस के हीरा शाह, सुकमा से निर्दलीय प्रत्याशी पीलू, केशकाल से निर्दलीय प्रत्याशी राजमन और नारायणपुर से कांग्रेस के प्रत्याशी रामेश्वर शामिल थे.
आज की तारीख़ में ये पांचों विधानसभा की सीटें, छत्तीसगढ़ के बस्तर का हिस्सा हैं और जिन सीटों पर कभी उम्मीदवार नहीं मिलते थे, वहां तस्वीर बदली हुई है.
लगभग 32 फ़ीसदी आदिवासी जनसंख्या वाले छत्तीसगढ़ में हर चुनाव में इन सीटों से बड़ी संख्या में आदिवासी उम्मीदवार खड़े होते हैं. विधायक और मंत्री भी बनते हैं.
आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग
1952 के बाद से समय-समय पर आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग भी होती रहती है. हालांकि, अविभाजित मध्यप्रदेश और अब छत्तीसगढ़ के इतिहास में केवल एक बार ही किसी आदिवासी विधायक को मुख्यमंत्री बनने का अवसर मिल पाया.
छत्तीसगढ़ की सारंगगढ़ विधानसभा के आदिवासी विधायक नरेश चंद्र सिंह मार्च 1969 में तेरह दिनों के लिए मुख्यमंत्री बने थे.
अलग छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद लगभग हर दो साल में आदिवासी मुख्यमंत्री की मांग उठती है लेकिन ऐसी आवाज़ें हमेशा अनसुनी रह जाती हैं.
अब पहली बार ऐसा हुआ है, जब सर्व आदिवासी समाज ने अपना संगठन बनाकर चुनाव लड़ने की घोषणा की. इस बार सर्व आदिवासी समाज की ‘हमर राज पार्टी’ चुनाव मैदान में है.
नई पार्टी क्या खेल बिगाड़ेगी?
‘हमर राज पार्टी’ के मैदान में उतरने के बाद राजनीतिक गलियारे में यह चर्चा शुरु हो गई है कि आदिवासियों का यह राजनीतिक दल, कितने और किसके वोट काटेगा?
क्या इसके उम्मीदवार जीत की दहलीज़ तक भी पहुंचेंगे या केवल पांच-दस हज़ार वोट हासिल कर के दूसरे राजनीतिक दलों का समीकरण बिगाड़ने का काम करेंगे?
ख़ास तौर पर आदिवासी बहुल इलाक़ों में, जहां 7 नवंबर को मतदान होना है, वहां ‘हमर राज पार्टी’ की क्या भूमिका होगी?
बस्तर यानी सत्ता की चाबी
छत्तीसगढ़ में विधानसभा की 90 सीटें हैं. इनमें से 10 सीटें अनुसूचित जाति के लिए और 29 सीटें आदिवासियों के लिए आरक्षित हैं.
आज भी इस पुरानी धारणा पर राजनीतिक दलों का भरोसा बना हुआ है कि छत्तीसगढ़ में सत्ता की चाबी आदिवासी बहुल बस्तर से निकलती है.
हालांकि, यह धारणा समय-समय पर टूटी भी है लेकिन अभी भी राजनीतिक दल, बस्तर के भरोसे अपनी नैया पार करना चाहते हैं.
यही कारण है कि कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही बड़ी पार्टियां, मध्य छत्तीसगढ़ के मैदानी इलाक़ों की तुलना में, उत्तर और दक्षिण के आदिवासी इलाक़ों में मतदाताओं को लुभाने के लिए कहीं अधिक पसीना बहा रही हैं.
कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही दलों के शीर्ष नेता चुनाव की घोषणा से पहले ही आदिवासी बहुल इलाक़ों में कई चुनावी सभाओं को संबोधित कर चुके हैं.
प्रधानमंत्री समेत केंद्र सरकार के कई मंत्री तो कई-कई दौरे कर चुके हैं. चुनाव की घोषणा के बाद से लगातार सभाओं का सिलसिला जारी है.
2018 में कांग्रेस का दमदार प्रदर्शन
2018 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी ने 29 आदिवासी सीटों में से 25 पर जीत हासिल की थी. जबकि तीन सीटों पर भाजपा के उम्मीदवार और एक सीट पर छत्तीसगढ़ जनता कांग्रेस जोगी के उम्मीदवार को जनता ने चुना था.
लेकिन इस बार इन आदिवासी सीटों में से कुछ पर कांग्रेस, भाजपा के अलावा, आम आदमी पार्टी और ‘हमर राज पार्टी’ ने भी अपने उम्मीदवार उतारे हैं.
‘हमर राज पार्टी’ के अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय मंत्री अरविंद नेताम ने बीबीसी से कहा, “बरसों तक दोनों पार्टियों के पीछे चलते रहने के बाद आदिवासी समाज ने अपना संगठन बना कर चुनाव लड़ने की पहल की है. हम ये तो नहीं कह सकते कि हमारी पार्टी को कितनी सीटों पर जीत हासिल होगी लेकिन इतना तो तय है कि ‘हमर राज पार्टी’ के उम्मीदवार इस बार चुनाव का परिदृश्य बदल कर रख देंगे.”
अरविंद नेताम का कहना है कि राज्य में 'भ्रष्टाचार और दूसरी गड़बड़ियां' तो हैं ही, आदिवासियों के कुछ और मुद्दे भी हैं.
उनका कहना है कि आदिवासी इलाक़ों में 'पंचायत एक्सटेंशन इन शेड्यूल एरिया क़ानून' यानी 'पेसा' के अधिकार छीनने, ग्राम पंचायतों की सहमति के बिना खनन के लिए सड़क बनाने, पंचायत की अनुमति के बिना खनन करने, मानवाधिकारों का हनन, लघु वन उपज की कम ख़रीद और आदिवासी अधिकार के मुद्दों पर वोट पड़ेंगे.
अरविंद नेताम का कहना है कि उनकी पार्टी 50 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारेगी, जिनमें ग़ैर आदिवासियों को भी जगह दी जाएगी.
कांग्रेस नहीं मानती 'ख़तरा'
पिछले साल भानुप्रतापपुर उपचुनाव में सर्व आदिवासी समाज ने ऐन मौके पर अपना उम्मीदवार उतारा था, जिसे इस आदिवासी बहुल इलाक़े में ‘एयर कंडीशनर’ चुनाव चिह्न के बाद भी 23 हज़ार से अधिक वोट मिले थे.
ऐसे में भारतीय जनता पार्टी भी मान कर चल रही है कि ‘हमर राज पार्टी’ कुछ सीटों पर ‘कमाल’ कर सकती है.
भाजपा नेता और छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष नारायण चंदेल ने बीबीसी से कहा, “अरविंद नेताम जी पिछले 50 सालों से भी अधिक समय से राजनीति में रहे हैं. कांग्रेस सरकार में मंत्री रहे हैं और आदिवासियों के बीच उनका बहुत सम्मान है. ऐसे में बस्तर समेत दूसरे इलाक़ों में उनकी पार्टी का असर तो रहेगा ही.”
हालांकि कांग्रेस पार्टी इससे सहमत नहीं है.
राज्य में कांग्रेस पार्टी के मीडिया प्रभारी सुशील आनंद शुक्ला का मानना है कि ‘हमर राज पार्टी’ के चुनाव मैदान में उतरने से कांग्रेस को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.
उन्होंने बीबीसी से कहा, “हमारी पार्टी और सरकार ने आदिवासी समाज के लिए जो काम किया है, वह सबके सामने है. चुनाव मैदान में सबको उतरने का अधिकार है लेकिन जनता जानती है कि उसका असली शुभचिंतक कौन है.”
सुशील आनंद शुक्ला का कहना है कि इस बार पहले की तुलना में आदिवासी इलाक़ों में मतदाता और अधिक मतदान करेंगे और इसका लाभ भी कांग्रेस को होगा.
मतदान में आदिवासी आगे, शहरी पीछे
भारतीय जनता पार्टी को 2013 के विधानसभा चुनाव में 41.6 फ़ीसदी वोट मिले थे, जबकि 2018 में यह 8.6 फ़ीसदी घट कर 33.0 फ़ीसदी रह गए थे.
इसके उलट कांग्रेस पार्टी को 2013 में मिले 39.0 फ़ीसदी वोटों में 6.4 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई और 2018 में यह आंकड़ा बढ़कर 45.4 प्रतिशत हो गया.
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि कांग्रेस के वोट प्रतिशत बढ़ने के पीछे आदिवासी इलाक़ों की सबसे बड़ी भूमिका रही. हालात ये हैं कि माओवादी हिंसा के माहौल में भी पिछले चुनाव में कई सीटों पर 80 फ़ीसदी तक मतदान हुआ है.
क्या कहते हैं आंकड़े?
पिछले चुनाव में 20 आदिवासी सीटों पर 80 से 86 फ़ीसदी मतदान हुआ, जबकि छह सीटों पर 70 से 80 फ़ीसदी के बीच मतदान हुआ.
हालांकि, तीन सीटों पर कम मतदान के भी आंकड़े हैं. दंतेवाड़ा में 60 फ़ीसदी, कोंटा में 55 फ़ीसदी और बीजापुर में 48 फ़ीसदी ही मतदान हुआ था.
लेकिन इसके उलट शहरी इलाकों में मतदान के हालत का अनुमान राजधानी रायपुर से लगाया जा सकता है.
पिछले विधानसभा चुनाव में रायपुर ग्रामीण में 60 फ़ीसदी, रायपुर पश्चिम में 59 फ़ीसदी, रायपुर उत्तर में 62 फ़ीसदी और रायपुर दक्षिण में 62.20 फ़ीसदी मतदान हुआ.
बिलासपुर के केंद्रीय विश्वविद्यालय में राजनीति शास्त्र विभाग की अध्यक्ष और जानी-मानी शिक्षाविद् डॉक्टर अनुपमा सक्सेना का कहना है कि शहरी इलाकों में अलग-अलग कारणों से पलायन अधिक होता है, इसलिए मतदान का प्रतिशत कम होता है.
वह कहती हैं, "इसके अलावा शहरी मतदाता के लिए मतदान का दिन छुट्टी और आराम के दिन की तरह होता है. मतदान अगर साप्ताहिक अवकाश के आगे-पीछे वाले दिन में हो तो फिर क्या कहना !"
"इसके उलट आदिवासी इलाक़ों में मतदान उत्सव की तरह होता है. मतदान के लिए महिलाएं, युवा, बुज़ुर्ग, मोहल्ला और लगभग पूरा गांव मतदान के लिए जाता है.”
डॉ. अनुपमा सक्सेना का कहना है कि अगर आदिवासी अपने हितों की रक्षा के लिए, अपने मुद्दों पर मतदान करें तो उनके चुने हुए जनप्रतिनिधि भी उनकी सुनने के लिए तैयार रहेंगे और उनकी आवाज़ अनसुनी नहीं रहेगी.
वोट देने में आगे रहने वाले आदिवासी अपने समाज के नाम पर बनाई गई पार्टी के साथ जाएंगे या पहले की तरह पुराने राजनीतिक दलों में से अपनी पसंद का विधायक चुनेंगे, इसके लिए 3 दिसंबर तक प्रतीक्षा करनी होगी, जिस दिन चुनाव परिणाम सामने आएंगे.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)