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महिला विधायक चुनने में आगे रहा है छत्तीसगढ़, अब कैसा है बीजेपी और कांग्रेस का रुख
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर दूर, पैरी टोला गांव की रहने वाली छन्नी साहू कभी गांव में खेती-बाड़ी और मज़दूरी का काम करती थीं. सामाजिक कार्यों में लगातार सक्रिय रहती थीं, इसलिए गांव के लोगों ने उन्हें चुनाव लड़ने की सलाह दी.
उन्होंने 2015 में 25 साल की उम्र में 13 हज़ार वोटों के अंतर से ज़िला पंचायत सदस्य का चुनाव जीता. इसके तीन साल बाद वो 2018 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर खुज्जी विधानसभा से भाजपा की प्रत्याशी को 27,497 वोटों से हरा कर विधानसभा पहुंचीं.
वे 90 सीटों वाली छत्तीसगढ़ विधानसभा की उन 16 महिला विधायकों में शामिल हैं, जिनकी जीत ने पूरे देश में एक रिकार्ड बनाया है.
छन्नी साहू कहती हैं, ''छत्तीसगढ़ विधानसभा में 18 प्रतिशत महिला विधायक हैं. यह पूरे देश में सर्वाधिक है. भारतीय समाज में एक महिला बेटी, बहन, पत्नी, मां जैसी तमाम भूमिका का निर्वाह करती है और इन भूमिकाओं के बाद घर की चारदीवारी से निकल कर राजनीतिक हस्तक्षेप करती है. लेकिन महिलाओं के लिए राजनीति का रास्ता अभी भी बहुत मुश्किल है.''
छन्नी साहू राज्य की उन विधायकों में शुमार हैं, जो लगातार चर्चा में रहती हैं.
पिछले साल छन्नी साहू का रेत माफ़िया के साथ विवाद हुआ.
उनका दावा है कि जब उनकी बात इस मामले में नहीं सुनी गई तो तो उन्होंने सरकारी सुरक्षा और गाड़ी लौटा दी और पहले की तरह अपने इलाके में, स्कूटी से आना-जाना शुरू किया. ख़ुद स्कूटी चला कर लगभग डेढ़ सौ किलोमीटर की दूरी तय करते हुए विधानसभा के सत्र में पहुंचीं तो हंगामा मच गया.
इसी साल उनके इलाके में अपना धान ले कर जा रहे एक किसान पर परिवहन विभाग ने 52 हज़ार रुपए का जुर्माना लगाया तो उन्होंने अधिकारी की टेबल पर अपना मंगलसूत्र ये कहते हुए रख दिया कि इसे बेच कर जुर्माना जमा कर लिया जाए और जो पैसा बचे, उसे वापस दे दिया जाए.
छन्नी साहू कहती हैं, ''लोग कहते हैं कि महिलाएं राजनीति में बिना पुरुषों के कुछ कर ही नहीं सकतीं. लेकिन यह सच नहीं है. मेरे पति मेरे काम में मदद ज़रूर करते हैं लेकिन हस्तक्षेप नहीं करते. हालांकि सभी जन प्रतिनिधियों के साथ ऐसी स्थिति नहीं है. इसके पीछे एक बड़ा कारण तो यही है कि महिलाओं को राजनीति में अवसर ही बहुत देर से मिला. धीरे-धीरे महिलाएं आगे आ रही हैं लेकिन महिला आरक्षण लागू हो जाता तो तस्वीर बदल जाती. वैसे, इस बार मुझे उम्मीद है कि छत्तीसगढ़ के चुनाव में अधिक से अधिक महिलाओं को टिकट मिलेगी.''
आधी आबादी का आधा-अधूरा प्रतिनिधित्व
देश में 1952 के पहले आम चुनाव में 489 सीटों वाली लोकसभा में 22 महिलाएं चुन कर आई थीं. यह कुल सदस्यों का 4.4 फ़ीसदी था. 71 साल बाद, 2019 में 543 सदस्यों वाली लोकसभा में महिलाओं की संख्या 78 तक पहुंच पाई. यह कुल सदस्यों का 14.4 फ़ीसदी है.
इससे भी बुरा हाल अलग-अलग राज्य की विधानसभाओं का है.
आज की तारीख़ में 40 सदस्यों वाले मिज़ोरम विधानसभा में एक भी महिला विधायक नहीं है.
पूर्वोत्तर के बाक़ी राज्यों में भी महिला विधायकों का प्रतिशत बहुत कम है. दक्षिण भारत के भी ज़्यादातर राज्यों में महिला विधायकों का आंकड़ा 10 फ़ीसदी से कम है.
हालांकि दिल्ली, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, ओडिशा, पंजाब, राजस्थान, त्रिपुरा, उत्तराखंड और पश्चिम बंगाल ऐसे राज्य हैं, जहां महिला विधायकों का प्रतिशत 10 से 14 फ़ीसदी के बीच है.
छत्तीसगढ़ सबसे आगे
1952 से 2000 यानी छत्तीसगढ़ के अलग राज्य बनने तक, इस इलाके से 48 सालों में महज 46 महिलाएं जीत कर विधानसभा पहुंची थीं.
इनमें भी अधिकांश ऐसी महिलाएं थीं, जिनका ताल्लुक किसी राज परिवार या ज़मींदार परिवार से था. लेकिन तस्वीर बदली और आम घरों की महिलाएं भी चुनावी मैदान में उतरीं.
छत्तीसगढ़ अलग राज्य बनने के बाद महिला विधायकों का प्रतिनिधित्व बढ़ रहा है. साल 2003 से अब तक राज्य की विधानसभा में 42 महिलाएं पहुंच चुकी हैं.
छत्तीसगढ़ में 2018 में हुए 90 सीटों के लिए हुए विधानसभा चुनाव में कुल 1269 उम्मीदवार मैदान में थे. इनमें महिला उम्मीदवारों की संख्या 132 यानी 10 फ़ीसदी थी.
इनमें कांग्रेस ने जिन 13 महिलाओं को टिकट दी थी, उनमें से दस महिलाएं जीत कर विधानसभा पहुंचीं. इसी तरह भाजपा की चौदह में से एक, बसपा की पांच में से एक और जनता कांग्रेस जोगी की तीन में से एक महिला उम्मीदवार जीत कर विधानसभा पहुंचीं. इन 13 विधायकों के साथ विधानसभा में महिलाओं का प्रतिशत 14 फ़ीसदी था.
बाद के साल में दंतेवाड़ा, खैरागढ़ और भानुप्रतापपुर में हुए चुनाव में तीनों ही सीटों पर कांग्रेस की महिला उम्मीदवारों की जीत हुई. इससे विधानसभा में महिलाओं की संख्या 16 हो गई.
इस तरह पूरे देश में, छत्तीसगढ़ विधानसभा में महिलाओं का आंकड़ा सर्वाधिक 18 फ़ीसदी हो गया.
टिकट देने का बीजेपी का फार्मूला
भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और राज्यसभा सदस्य सरोज पांडेय कहती हैं, ''हमारे छत्तीसगढ़ के लिए यह गौरव का विषय है कि यहां महिलाओं को मौका मिला और उन्होंने एक नया रिकार्ड बनाया. अब जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं को 33 फ़ीसदी आरक्षण देने का क़ानून बना दिया है तो महिलाओं को और अवसर मिलेगा.''
क्या इस क़ानून का सम्मान करते हुए भारतीय जनता पार्टी नवंबर में होने वाले छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में 33 फ़ीसदी महिलाओं को उम्मीदवार बनाएगी?
सरोज पांडेय का कहना है कि पार्टी ने 21 उम्मीदवारों की जो पहली सूची जारी की, उसमें पांच महिलाएं भी शामिल हैं, लेकिन केवल महिला होने को आधार बना कर किसी को भी टिकट नहीं दिया जा सकता.
उन्होंने बीबीसी से कहा, ''चुनाव में कई समीकरण होते हैं. पहली शर्त तो यही होती है कि उम्मीदवार जीत कर आए. जहां-जहां वो जीत कर आ सकती हैं, वहां ज़रुर उन्हें टिकट दिया जाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हो सकता कि जहां उनके जीतने की उम्मीद नहीं है, वहां केवल इसलिए टिकट दे दी जाए कि वो महिला हैं.''
कांग्रेस कैसे देगी टिकट
उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में 'लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ' का नारा देते हुए कांग्रेस पार्टी ने 40 फ़ीसदी महिलाओं को टिकट दिया था. उस चुनाव का पूरा प्रबंधन छत्तीसगढ़ के कांग्रेसी नेताओं ने संभाला था.
लेकिन छत्तीसगढ़ में होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी इस बात के लिए तैयार नहीं है कि यहां भी 40 फ़ीसदी महिलाओं को टिकट दी जाए. वह 33 फ़ीसदी महिलाओं को भी टिकट देने का वादा नहीं करना चाहती.
छत्तीसगढ़ में कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष और सांसद दीपक बैज का कहना है कि ऐसा कोई फ़ार्मूला पार्टी ने अभी नहीं बनाया है.
उन्होंने बीबीसी से कहा, ''हम अधिक से अधिक महिलाओं को टिकट देने की कोशिश करेंगे. लेकिन यह कितना प्रतिशत होगा, यह तय नहीं है. अभी से कह पाना भी मुश्किल है. हमारी पार्टी राजनीति में अधिक से अधिक महिलाओं को प्रतिनिधित्व देती रही है और यह परंपरा कायम रहेगी.''
मतलब साफ़ है कि राजनीतिक दलों ने संसद में भले महिला आरक्षण की वक़ालत की हो लेकिन ताज़ा विधानसभा चुनाव में उसे अमल में लाने में कुछ झिझक बाक़ी है.
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