You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
महिला आरक्षण विधेयक पर सवाल, कहीं ये मर्दाना चालाकी तो नहीं?: ब्लॉग
- Author, नासिरुद्दीन
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
128वाँ संविधान संशोधन विधेयक पारित हुआ 2023 में. लागू कब होगा, यह पक्का नहीं है. कम से कम छह साल तो लागू होने की उम्मीद नहीं दिख रही है.
एक लाइन में लोकसभा और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षित होने की फ़िलहाल यही कहानी है. लेकिन इससे कई सारे सवाल भी उठ रहे हैं-
- अगर अभी इसे लागू नहीं होना है तो इसके लिए संसद का एक विशेष सत्र नए भवन में बुलाए जाने की क्या ज़रूरत थी?
- इसे लागू करने के लिए जनगणना की क्यों ज़रूरत है?
- इसे अमलीजामा पहनाने के लिए परिसीमन करना क्यों ज़रूरी है?
- इसके तहत सामाजिक-राजनीतिक रूप से पिछड़े समूहों की महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की क्या योजना है?
- इसे राज्यसभा या विधानपरिषदों में क्यों नहीं लागू किया जाएगा?
लेकिन सबसे पहले, नीयत का भी सवाल है.
किसी भी काम को करने के लिए नीयत एक बहुत अहम चीज़ है.
ये अच्छी बात है कि मौजूदा सरकार ने यह समझा कि महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में आरक्षण के लिए संविधान संशोधन किया जाए. लेकिन बात सिर्फ़ संशोधन से बन जाती तो क्या कहना था?
यह सही है कि महिलाओं के लिए एक तिहाई आरक्षण के वास्ते संशोधन ज़रूरी पायदान है. मगर यह संशोधन किस काम का, जब यह अभी लागू ही न हो पाए.
पिछले ढाई दशकों से जिस चीज़ का इंतज़ार था, वह इंतज़ार तो जस का तस बरकरार है.
इसलिए यह सवाल तो बना ही रहेगा कि अगर इसे अभी यानी अगले लोकसभा या आने वाले विधानसभा चुनावों में लागू नहीं होना था तो संसद के नए भवन में विशेष सत्र बुलाने और शुभ मुहूर्त में इसे पेश करने का क्या फ़ायदा? यह काम तो किसी सामान्य सत्र में भी हो सकता था.
यह तो ऐसी मिठाई है, जिसे देखा जा सकता है. जिसके सामान और गुणों का विश्लेषण किया जा सकता है लेकिन मिठाई खाई नहीं जा सकती.
तब ज़ाहिर सवाल है, ऐसी मिठाई किस काम की? तब नीयत पर शक उठना लाज़िमी है. यानी क्या नीयत महिलाओं को सशक्त करने और उनका वाजिब हक़ देने की है?
कहीं यह मर्दाना चालाकी तो नहीं?
यह पूरी प्रक्रिया मर्दाना चालाकी का उदाहरण लगती है. पितृसत्तात्मक व्यवस्था कैसे काम करती है, यह उसका जीता-जागता नमूना भी है.
यही नहीं, पितृसत्ता कैसे महिलाओं में भी अपने सहयोगी तलाश कर लेती है, यह इसका भी उदाहरण है.
आरक्षण के ज़रिए महिलाएँ सत्ता में हिस्सेदारी, साझीदारी और भागीदारी माँग रही हैं. क्यों? क्योंकि हमारे देश की राजनीतिक सत्ता का चरित्र मर्दाना है. संसद और विधानसभाओं में पुरुषों का संख्या बल बहुत ही ज़्यादा है. आबादी के लगभग आधे हिस्से की भागीदारी बेहद कम है. जेंडर असमानता यही है.
इस असमानता में पुरुषों के पास काफ़ी शक्ति और सुविधाएँ हैं. यानी संख्या बल है. महिलाएँ कमज़ोर हालत में हैं. यानी उनकी तादाद, उनकी संख्या के अनुपात में काफ़ी कम है. यह ऐतिहासिक असमानता है. यह भेदभाव है.
अब सवाल है कि यह सूरत बदलेगी कैसे? यह सूरत तब ही बदल सकती है, जब संतुलन बदले. तराज़ू का एक पलड़ा बहुत भारी बल के साथ नीचे न झुका हो.
इसके लिए ज़रूरी है कि भारी बल को कम किया जाए. वह बल समता और समानता के सिद्धांत के आधार पर दूसरे पलड़े पर रखा जाए. बराबर लाने की कोशिश की जाए.
क्या पुरुष अपनी सत्ता और सुविधा छोड़ने के लिए तैयार हैं?
यह अहसान नहीं बल्कि ऐतिहासिक सामाजिक-राजनीतिक नाइंसाफ़ियों और ग़ैरबराबरियों को दुरुस्त करने की संवैधानिक पहल है.
इसीलिए ऐसी हालत में जेंडर समानता तब ही मुमकिन है, जब पुरुष अपनी कुछ सुविधाएँ और सत्ता छोड़ें. कुछ सुविधाएँ और सत्ता साझा करें.
यानी पुरुषों को अपने मौजूदा हिस्से में से कुछ छोड़ना होगा. यानी उन्हें लोकसभा और विधानसभाओं की मौजूदा सीटों से ही यह हिस्सेदारी देनी होगी तब ही वह जेंडर समानता के दायरे में आएगा. वरना, ये बातें हैं, बातों का क्या?
यह मुद्दा यानी महिला आरक्षण बड़ी चालाकी से जनगणना और परिसीमन के सिर पर डाल दिया गया है. जनगणना होगी. कब? पता नहीं?
ज़ाहिर है, जब जनगणना होगी तब देश की आबादी आज से ज़्यादा होगी.
आबादी के लिहाज़ से चुनाव क्षेत्रों की संख्या बढ़ेगी और मौजूदा चुनाव क्षेत्रों के आकार-प्रकार में बदलाव हो सकता है यानी परिसीमन की प्रक्रिया होगी. जैसी उम्मीद है, लोकसभा और विधानसभा के कुछ चुनाव क्षेत्र बढ़ सकते हैं.
तो यह कहा जा रहा है कि जब सीटें बढ़ेंगी तब महिलाओं को आरक्षण मिलेगा. वैसे यह परिसीमन की प्रक्रिया भी कब होगी, पता नहीं? यही मर्दाना चालाकी है.
जनगणना या परिसीमन की ज़रूरत ही क्यों है?
मर्दाना समाज अपनी मौजूदा राजनीतिक ताक़त, सत्ता, सुविधाएँ साझा नहीं करना चाहता है.
वह उसमें से महिलाओं को उनका वाजिब हिस्सा देने को तैयार नहीं है. यह जेंडर समानता या महिलाओं का वंदन नहीं है.
यह उन्हें छलावा देना है. सोचने वाली बात है कि इसे लागू करने के लिए किसी जनगणना या परिसीमन की ज़रूरत ही क्यों है?
इसलिए है कि अभी जो केक मर्दों के पास है, वह उसमें से हिस्सा देने को क़तई तैयार नहीं हैं. वे पहले केक का आकार बड़ा कर लेना चाहते हैं.
जब यह हो जाएगा तो बड़े आकार की वजह से बढ़े हुए हिस्से को वह महिलाओं से साझा करना चाहते हैं. उसे ही महिलाओं पर उपकार के रूप में पेश कर रहे हैं. उसे ही वे नारी का वंदन कह रहे हैं.
महिलाओं को चुप कराने वाला तो नहीं?
संसद में जो हुआ, वह असलीयत में महिलाओं की आवाज़ को कमज़ोर करने वाला कदम साबित होगा.
जो महिलाएँ मुखर रूप से राजनीतिक आरक्षण के लिए लड़ रही थीं, यह उन्हें चुप कराने की कोशिश है.
उनकी माँग, मान भी ली गई और कुछ मिला भी नहीं. दूसरी ओर, यह मुद्दा ख़ास मक़सद के लिए इस्तेमाल होता रहेगा.
दावे किए जाते रहेंगे. फ़ायदा उठाया जाता रहेगा. हाँ, सामान्य ज्ञान का एक सवाल बढ़ गया कि संविधान का 128वाँ संशोधन क्या है?
स्त्री इंसान है… उसे इंसान का सम्मान और दर्जा चाहिए
‘स्त्री महान है.’ ‘शक्ति है.’ ‘स्त्री देवी है.’ ‘स्त्री पूजनीय है.’ ‘वह मातृ शक्ति है.’ ‘वह वंदनीय है’… महिला आरक्षण के लिए संविधान संशोधन विधेयक पर चर्चा के दौरान ऐसे मिलते-जुलते अनेक शब्द संसद में सुनाई पड़े.
सदियों से महिलाओं को यही कह-कहकर हक़ों से वंचित रखा गया है. ग़ैरबराबरी को महानता बताया गया है.
ये शब्द स्त्री को समता और समानता के मूल्य नहीं दे सके. उनके साथ सदियों की ग़ैरबराबरी और भेदभाव नहीं कम कर सके.
भारत का संविधान स्त्री को बराबर का नागरिक मानता है. लिंग के आधार पर किसी तरह की ग़ैरबराबरी और भेदभाव को नकारता है.
इसलिए पुरुषों के लिए स्त्री को सबसे पहले अपनी ही तरह आम इंसान और बराबर का नागरिक मानना ज़रूरी है.
बराबर का नागरिक, बराबर के हक़ का अधिकारी होता है.
अगर इतिहास में उसके साथ सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक ग़ैरबराबरी हुई तो वह समता का हक़दार बनता है.
उसे अपनी पूजा नहीं बल्कि बराबर के सम्मान का हक़ चाहिए. उसे वंदना नहीं बल्कि भागीदारी और साझीदारी चाहिए.
वंदना और पूजा, उसे कुछ और बना देते हैं, इंसान नहीं. हम अपने आसपास के समाज में स्त्रियों की ज़िंदगी पर नज़र डालकर देखें. क्या पूजनीय और वंदनीय व्यक्ति की ज़िंदगी ऐसी ही होनी चाहिए?
लेकिन नज़रिए में बदलाव कैसे होगा?
इसीलिए यह तो तय है कि महज यह आरक्षण महिलाओं को समानता नहीं देने वाला.
समानता के लिए राजनीति में महिलाओं के लिए प्रति पूरे नज़रिए में बदलाव की ज़रूरत है.
यह नहीं हो सकता है कि एक तरफ़ तो राजनेता यह मानें कि महिलाएँ दिमाग़ से कमज़ोर होती हैं, फ़ैसले नहीं ले पातीं या यौन हिंसा के झूठे आरोप लगाती हैं और दूसरी तरफ़ राजनीतिक आरक्षण देकर उन्हें शक्ति देने का दावा करें. महिलाओं को सशक्तीकरण की ज़रूरत है.
यही नहीं, महिलाएँ कोई एक समान समूह नहीं हैं. उनमें भी कई तरह की ग़ैरबराबरियाँ हैं. किसी समाज की महिलाएँ ज़्यादा वंचित हैं. किसी की कम.
जो ज़्यादा वंचित है, उस समूह को वाजिब हिस्सेदारी कैसे मिलेगी? क्या उसके लिए आरक्षण या कोई और इंतज़ाम नहीं होना चाहिए? यह ठीक वैसा ही होगा, जैसा पुरुषों के मुक़ाबले, महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएँगी. इस संशोधन में इस पर कोई बात नहीं है.
क्या गारंटी है कि 2029 के चुनाव में यह लागू हो ही जाएगा?
अभी तो मर्दों को लग रहा है कि यह जब होगा तब होगा. उस वक़्त देखा जाएगा.
मुमकिन है, बहुत सारे उस वक़्त देखने के लिए हों भी नहीं. यह आरक्षण अभी उनके केक से हिस्सेदारी नहीं माँग रहा है. 2029 में क्या होगा, किसने देखा है?
इस हक़ के लिए लड़ने वाली महिलाओं की पूरी मौजूदा पीढ़ी भी इस ख़्वाब की तामीर होते देख पाएगी या नहीं, कहना मुश्किल है. यह फ़िलहाल मृगमरीचिका है. छलावा है.
इसलिए इतना तो तय है कि अगर मर्द अपनी मौजूदा सुविधाएँ और सत्ता छोड़ने को तैयार नहीं हैं तो समानता मुमकिन नहीं.
कल्पना कीजिए उस क्षण की, जब यह होता कि आरक्षण तुरंत लागू होगा.
अगले लोकसभा चुनाव में 33 फ़ीसदी सीटें महिलाओं के लिए आरक्षित हो जाएँगी. यानी 543 सीटों में 180 सीटें महिलाओं के पास होतीं. 2019 के लोकसभा चुनाव में 78 महिलाएं लोकसभा के लिए चुनी गईं थीं. अगर एक तिहाई महिला आरक्षण का बिल तुरंत लागू हो जाता तो महिलाओं को लगभग सौ सीटें और मिल जातीं.
इन सीटों पर अभी पुरुष सांसद हैं. ज़ाहिर है, मौजूदा कम से कम सौ पुरुष सांसदों के लिए उनकी सीटें अगले चुनाव में नहीं होतीं. ये सौ सांसद कौन होते, किस पार्टी के होते, अभी पता नहीं था.
अब सोचिए, संसद और ख़ासकर लोकसभा में कितने पुरुष इस बात के लिए दिल से तैयार होते?
तब कितने दिल से वे नारी का वंदन करते? इसलिए इसे भविष्य के लिए छोड़ दिया गया. भविष्य जो अनजाना है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)