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भारतीय कुश्ती संघ को चुनाव के तीन ही दिन बाद खेल मंत्रालय ने क्यों कर दिया 'चित', आगे क्या होगा
कुश्ती संघ के चुनाव में संजय सिंह के पैनल की जीत के बाद बृजभूषण शरण सिंह के घर पटाखों का शोर अभी थमा नहीं था कि खेल मंत्रालय ने खेल संघ को निलंबित कर दिया.
भारतीय ओलंपिक संघ को भी सरकार की तरफ से कह दिया गया है कि कुश्ती संघ से जुड़े कार्यों की देख रेख के लिए एक तदर्थ समिति का फिर से गठन किया जाए.
आखिर 21 दिसंबर और 24 दिसंबर के बीच ऐसा क्या हुआ कि सरकार ने इतना कड़ा कदम उठा लिया ?
सरकार का मानना है कि भारतीय कुश्ती संघ के नव-निर्वाचित सदस्यों ने निर्णय लेते समय नियमों का उल्लंघन किया है.
अध्यक्ष संजय सिंह ने चुनाव जीतने कुछ घंटो बाद ही ऐलान किया था कि अंडर 15 और अंडर 20 नेशनल प्रतियोगिताओं का आयोजन 28 दिसंबर से उत्तर प्रदेश के गोंडा में किया जायेगा. उन्होंने पिछली तदर्थ समिति के सभी निर्णयों को ख़ारिज कर दिया था.
प्रधान सचिव लोचब ने किया विरोध
ये निर्णय जिस बैठक में लिए गए उसमें नवनिर्वाचित प्रधान सचिव प्रेम चंद लोचब शामिल नहीं हुए थे.
लोचब ने इस निर्णय पर आपत्ति जताते हुए भारतीय ओलिंपिक संघ को पत्र लिख कर बताया था कि सचिव की जानकारी के बिना ये निर्णय लिए गए हैं जबकि कुश्ती संघ का संविधान कहता है कि सचिव की अनुपस्थिति में न तो निर्णय लिए जा सकते हैं और न ही कोई और अधिकारी इन निर्णयों की जानकारी प्रसारित कर सकता है.
सरकार की यह भी आपत्ति है कि कुश्ती संघ ने कार्यकारिणी समिति की बैठक के लिए 15 दिन का नोटिस दिए बगैर बैठक की और उसमें निर्णय भी लिए.
कुश्ती संघ का कहना है कि इतना समय नहीं था कि कार्यकारिणी समिति की बैठक बुलाई जाये क्योंकि वर्ष 2023 ख़त्म होने में केवल 9 दिन ही बाकी थे और अगर अंडर 15 और अंडर 20 के नेशनल 31 दिसंबर से पहले आयोजित नहीं किये गए तो सैंकड़ों जूनियर पहलवानों के करियर का एक साल बर्बाद हो जाता. कुछ ऐसे पहलवान हैं जिनका अपने ऐज ग्रुप में ये आखिरी साल है और संघ उनसे यह मौका नहीं छीनना चाहता था.
बृजभूषण के घर में दफ़्तर क्यों?
सरकार की यह भी आपत्ति है कि संघ का कामकाज अभी भी बृजभूषण के घर से चलाया जा रहा है और उनका दखल संघ के निर्णयों में अभी भी कायम है.
संघ का कहना है कि चुनाव के कुछ घंटो बाद ही उनको नया दफ्तर तो मिल नहीं सकता था इसलिए कुछ दिन तो उन्हें मिलने ही चाहिए थे नए दफ्तर में शिफ्ट होने के लिए.
निलंबन के फ़ौरन बाद बीजेपी के अध्यक्ष जेपी नड्डा ने बृजभूषण को तलब किया और बैठक के तुरंत बाद बृजभूषण ने एलान किया कि उन्होंने 'कुश्ती से संन्यास ले लिया है' और अब नए अधिकारी ही सारा कामकाज देखेंगे.
संजय सिंह ने समाचार एजेंसी पीटीआई से बातचीत में कहा था कि उन्होंने नियमों का उल्लंघन नहीं किया है क्योंकि संघ का संविधान अध्यक्ष को यह अधिकार देता है कि वे निर्णय ले सकते हैं और सचिव निर्णय को मानने के लिए बाध्य हैं. संजय सिंह यह भी कहा कि वह अपना पक्ष खेल मंत्रालय के सामने रखेंगे और अगर बातचीत से कोई हल नहीं निकला तो वह न्यायपालिका दरवाजा खटखटा सकते हैं.
दिलचस्प बात यह है कि प्रेम चंद लोचब और अनीता श्योराण ने जब चुनावों के लिए नामांकन भरा था तब भी कुश्ती संघ के संविधान को नहीं माना गया था.
नियम के अनुसार किसी भी व्यक्ति को नामांकन भरने के लिए कुश्ती की राज्य इकाई की कार्यकारिणी समिति का सदस्य होना आवश्यक है. अनीता खुद हरियाणा की हैं लेकिन नामांकन उन्होंने ओडिसा से भरा जहां से वो कार्यकारिणी समिति की सदस्य नहीं थी. लोचब ने अपना परचा गुजरात से भरा जबकि वह भी गुजरात के कुश्ती संघ के सदस्य नहीं थे.
पेचीदा है आगे की राह
कुश्ती संघ अब फिर से एडहॉक पैनल के अधीन होगा और सभी निर्णय निर्वाचित सदस्य नहीं जबकि भारतीय ओलंपिक संघ की ओर से मनोनीत किए गए लोग लेंगे.
अगर 31 दिसंबर से पहले अंडर15 और अंडर 20 नेशनल नहीं कराये गए तो निश्चित रूप से जूनियर खिलाडियों का नुकसान हो सकता है.
यह भी संभव है कि जब तक संसद के चुनाव नहीं हो जाते तब तक कुश्ती संघ को एडहॉक पैनल के अधीन ही रखा जाये.
अगर संजय सिंह सरकार को अपने स्पष्टीकरण से आश्वस्त नहीं कर पाए तो ये लड़ाई न्यायपालिका में जाएगी.
निश्चित रूप से कुश्ती संघ को नियमों का पालन करना होगा और किसी तरह की कोई कोताही बरतने से परहेज़ रखना होगा.
साल 2024 में ओलंपिक खेल होने हैं. ऐसे में ट्रायल्स, तैयारी, नीति और कम्पटीशन जरूरी हैं, अगर राजनीति ही चलती रही तो नुकसान केवल पहलवानों का होगा.
(पीटीआई के वरिष्ठ पत्रकार अमनप्रीत सिंह से बातचीत पर आधारित)
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