You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
कांग्रेस संगठन में फेरबदल: खड़गे के फ़ैसले में क्यों देखी जा रही है सोनिया - राहुल गांधी की छाप, चुनाव में होगा फ़ायदा?
- Author, दीपक मंडल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राजस्थान,छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में हार और विपक्षी दलों के गठबंधन ‘इंडिया’ की अब तक की चाल ने कांग्रेस की चुनौतियां बढ़ा दी है.
जानकारों की राय है कि हार ने पार्टी का मनोबल कमजोर किया है और इस वजह से वो ‘इंडिया’ गठबंधन में भी मजबूत स्थिति में नहीं दिख रही है.
अगले कुछ महीनों में आम चुनाव हैं और सभी राजनीतक दलों की नज़रें वहीं टिकी हैं.
लिहाजा कांग्रेस ने एक बार फिर खुद को चाक-चौबंद करने की कोशिश शुरू कर दी है.
पार्टी ने बड़े संगठनात्मक फेरबदल किए हैं. राहुल गांधी की बढ़ती चुनौतियों को देखते हुए प्रियंका गांधी को यूपी के प्रभार से मुक्त किया गया है.
ये माना जा रहा है कि उनको कोई और बड़ी भूमिका दी जाएगी. सचिन पायलट को छत्तीसगढ़ का प्रभारी महासचिव बनाया गया है.
अशोक गहलोत को नेशनल अलायंस कमेटी का सदस्य बनाया गया है. इससे लगता है कि पार्टी राजस्थान में विपक्ष के नेता के तौर पर कोई नया चेहरा खोज रही है.
झारखंड के प्रभारी रहे अविनाश पांडे को अब यूपी में कांग्रेस का प्रभारी महासचिव बनाया गया है.
कांग्रेस पर नज़र रखने वाले विश्लेषकों की राय है कि प्रियंका गांधी अब इस भूमिका को जारी रखने में दिलचस्पी नहीं रखतीं.
पिछले विधानसभा चुनाव में प्रियंका गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस ने यहां काफी आक्रामक कैंपेन चलाया था.
प्रियंका ने महिला सशक्तिकरण को केंद्र बना कर चुनाव अभियान चलाया था लेकिन कांग्रेस को विधानसभा की सिर्फ दो सीटें मिल पाईं.
मुकुल वासनिक और कुमारी शैलजा जैसे पार्टी के पुराने चेहरों के केवल राज्य बदले गए हैं. दीपा दासमुंशी को तीन राज्यों का प्रभार दिया गया है.
कांग्रेस की चुनौती
सवाल है कि क्या इस फेरबदल के बावजूद लोकसभा चुनाव में कांग्रेस बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए को माकूल चुनौती दे पाएगी.
दूसरा सवाल ये है कि राहुल गांधी कांग्रेस को लोकसभा चुनाव तक बीजेपी को कड़ी टक्कर देने के लिए कितना तैयार कर पाएंगे.
क्योंकि अभी भी इंडिया गठबंधन को कोई ठोस दिशा मिलती नहीं दिख रही है. इसके नेता न तो प्रधानमंत्री का कोई चेहरा तय कर पाए हैं और न ही अभी ये तय है कि गठबंधन में आखिर तक कौन रहेगा और कौन नहीं. कांग्रेस चूंकि गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी है इसलिए लोग राहुल गांधी से बड़ी भूमिका निभाने की उम्मीद कर रहे हैं
क्या अगला लोकसभा चुनाव कांग्रेस और राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता के लिए ज्यादा बड़ी चुनौती साबित होगा.
क्या कांग्रेस ने लोकसभा चुनाव से पहले संगठन में जो फेरबदल किया है उसका उसे कोई चुनावी लाभ मिल पाएगा.
ये सवाल भी उठ रहा है कि पार्टी में बदलाव के बावजूद भी राहुल गांधी इसे चुनावी सफलता क्यों नहीं दिला पा रहे हैं.
बीबीसी हिंदी ने वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक अंबरीश कुमार से इन सवालों के जवाब जानने की कोशिश की.
अंबरीश कुमार कहते हैं,''फेरबदल तो पार्टी का अंदरुनी मामला होता है. इससे चुनावी प्रदर्शन पर असर नहीं पड़ता. असली चीज है राजनीतिक रणनीति.कांग्रेस को इस पर विचार करना पड़ेगा.''
वो कहते हैं,''कांग्रेस को गठबंधन की राजनीति पर ध्यान देना होगा. जब दलों का गठबंधन होता है तो एक दूसरे के कार्यकर्ताओं की बदौलत ज्यादा मतदाता आपके पास आते हैं.बीएसपी, समाजवादी पार्टी और लोकदल जैसी पार्टियों के अपने कैडर हैं. अगर कांग्रेस बेहतर तरीके से गठबंधन करेगी तो उसे यूपी में इसका फायदा मिलेगा. यही फायदा दूसरे राज्यों में मजबूत पार्टियों के साथ गठबंधन से मिलेगा.''
गठबंधन में नाकामी से नुकसान
कांग्रेस हाल के विधानसभा चुनावों में गठबंधन न करने की खमियाजा भुगत चुकी है और उसे अब इसका इसका अहसास हो रहा है.
अंबरीश कुमार कहते हैं, ''तीन राज्यों में अकेले चुनाव लड़ने के बाद कांग्रेस के सामने ये साफ हो गया है कि अकेले लड़ने का कोई फायदा नहीं है. यूपी में इसके पास एक मात्र सीट है और अगर कांग्रेस ने यहां ठीक से गठबंधन नहीं किया तो मैं ये कह सकता हूं कि ये सीट से भी उसके हाथ से निकल जाएगी. यहां न तो इसके उम्मीदवार हैं और न कैडर. ऐसे में पहली रणनीति होनी चाहिए गठबंधन.''
अंबरीश कुमार कांग्रेस के गठबंधन न करने की कमजोरी के कई उदाहरण गिनाते हैं.
वो कहते हैं, ''उत्तराखंड में कांग्रेस ने गठबंधन नहीं किया और उपचुनाव हार गई. इसके बाद वो दूसरे दलों को दोष देने लगी.लेकिन गठबंधन के लिए तो कांग्रेस को ही बात करनी पड़ती. मध्य प्रदेश में समाजवादी पार्टी से कई दौर की बातचीत के बाद कांग्रेस ने गठबंधन नहीं किया. समाजवादी पार्टी एक या दो सीटों से संतुष्ट थी लेकिन कांग्रेस ने बातचीत ही तोड़ दी.''
अंबरीश कुमार कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में कांग्रेस हर तरह के प्रयोग कर चुकी है. यहां सलमान खुर्शीद, रीता बहुगुणा जोशी से लेकर राज बब्बर तक कांग्रेस अध्यक्ष बनाए जा चुके हैं. लेकिन असली सवाल कैडर का है. जब किसी पार्टी के पास कैडर न हों तो उसे रणनीति बदलनी पड़ती है. उसे साझा रणनीति अपनानी पड़ती है. कांग्रेस ये नहीं कर पा रही है.''
फेरबदल से कितना फायदा?
विश्लेषकों का कहना है कि कांग्रेस के संगठन में फेरबदल हुआ लेकिन इसमें नया जैसा कुछ भी नहीं है. कांग्रेस संगठन के अंदर पिछले दिनों थोड़ा बहुत जो लोकतांत्रिकरण शुरू हुआ था उसको भी झटका लगा है.
‘द प्रिंट’ के राजनीतिक संपादक डीके सिंह कहते हैं, '' खड़गे ने कांग्रेस के माहौल में धीरे-धीरे सुधार करना शुरू किया था. तेलंगाना में रेवंत रेड्डी के पक्ष में वो आखिर तक खड़े रहे. क्षेत्रीय नेताओं को फैसले लेने की आजादी दी. लेकिन राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश की हार के बाद पार्टी में यथास्थितिवाद के समर्थक फिर से हावी हो गए हैं. वो इस हार को खड़गे के खिलाफ़ इस्तेमाल कर रहे हैं.''
आखिर कांग्रेस कहां गलती कर रही है. क्या उसे पदाधिकारियों के बदलने के बजाय रणनीति बदलने की जरूरत है?
डीके सिंह कहते हैं, ''ममता बनर्जी और अरविंद केजरीवाल ने इंडिया गठबंधन की बैठक में जिस तरह से पीएम पद के उम्मीदवार को लेकर खड़गे का नाम आगे किया वो कांग्रेस के लिए ये संदेश था कि उन्हें उससे कोई दिक्कत नहीं है लेकिन वो बस ‘गांधी’ को नहीं चाहते. लेकिन सोनिया और राहुल गांधी को ये अच्छा नहीं लगा और उन्होंने कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में इसकी चर्चा तक नहीं की.''
वो कहते हैं, ''कांग्रेस ये चाहती रही कि गठबंधन का नेतृत्व वो करे. यहां तो पीएम का पद उनकी पार्टी को तोहफे में दिया जा रहा था और सोनिया,राहुल ने इसका कोई जिक्र तक नहीं किया. इसका मतलब ये है कि कांग्रेस में जो लोकतांत्रिकरण की जो प्रक्रिया शुरू हुई थी वो अब लौट कर पीछे चली गई है.''
डीके सिंह कहते हैं कि अगर खड़गे को कांग्रेस पीएम कैंडिडेट के तौर पर स्वीकार कर लेती तो उसे इसका बड़ा फायदा मिलता. अकेले यूपी में ही दलित 20 फीसदी हैं. दूसरी बात ये है कि अभी देश के दलित नेतृत्व में संकट का दौर है. ऐसे में दलित कांग्रेस की तरफ आ सकते थे लेकिन उसने इसका मौका गंवा दिया.
उनका कहना है कि कांग्रेस के मौजूदा फेरबदल सिर्फ नाम के लिए है. इसमें वही लोग हैं जो गांधी परिवार के पुराने वफादार हैं और वर्षों में पार्टी पदों पर बन हुए हैं.
वो कहते हैं,''कांग्रेस ने उदयपुर अधिवेशन में नव संकल्प प्रस्ताव पारित किया था. इसमें कहा गया था कि पार्टी के किसी भी पदाधिकारी को पांच साल से ज्यादा समय तक अपने पद पर नहीं रहना चाहिए. लेकिन आप लिस्ट उठा कर देख लीजिये, वही पुराने नाम दोहरा दिए गए हैं.''
राहुल गांधी के लिए हालिया हार कितना बड़ा झटका
भारत जोड़ो यात्रा ने राहुल गांधी की एक अलग छवि बनाई है. इस यात्रा के बाद लोगों को उम्मीद थी कि उनकी ये छवि कांग्रेस को चुनावी फायदा दिलाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ.
कर्नाटक और तेलंगाना को छोड़ दें तो पार्टी उत्तर भारत में चुनावी सफलता से दूर ही रही.
क्या राहुल गांधी में कांग्रेस को चुनावी जीत दिलाने की क्षमता नहीं है या फिर वो इस ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं और या फिर एक स्टेट्समैन की छवि गढ़ने में व्यस्त हैं.
अंबरीश कुमार कहते हैं, ''हो सकता है कि राहुल गांधी चुनावी रणनीति में कमजोर पड़ रहे हों लेकिन वो तेजी से एक जननेता के तौर पर उभर रहे हैं. वो ऐसे नेता के तौर पर उभर रहे हैं जो रोजगार,अर्थव्यवस्था और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बात कर रहा है. आखिर मंदिर-मस्जिद की राजनीति कितने दिनों तक चलेगी, 10 साल या 20 साल. इसके बाद असली मुद्दों पर तो बात करनी होगी.''
वो कहते हैं, ''राहुल गांधी एक जननेता बनने की प्रक्रिया में हैं. उनकी रणनीति साफ है. बगैर लाग-लपेट के बात करते हैं. दिल से बात करते हैं. लेकिन राजनीतिक चालाक लोगों का खेल है. राहुल में अभी नरेंद्र मोदी जैसी चालाकी नहीं आई है.लेकिन उनके पास अभी काफी वक्त है. राहुल गांधी एक ऐसी बड़ी पार्टी के नेता हैं जिसकी अपनी विरासत है. लोग अब उन्हें समझने लगे हैं.''
वो कहते हैं कि तीन राज्यों में हार से राहुल के राजनीति में फ्लॉप हो जाने का निष्कर्ष नहीं निकाला जाना चाहिए. राजनीति में नेता और राजनेता में फर्क होता है. राहुल गांधी एक राजनेता की छवि बनाते नजर आ रहे हैं.
राहुल की छवि का कांग्रेस को चुनावी फायदा न मिलने के सवाल पर डीके सिंह की राय कुछ अलग है.
वो कहते हैं, ''सोनिया गांधी और राहुल गांधी में एक फर्क है. सोनिया गांधी को अपनी सीमाओं के बारे में पता था इसलिए अपने इर्द-गिर्द के लोगों की सलाह वो मानती थीं. लेकिन राहुल को लगता है वो राजनीति को अच्छी तरह समझते हैं. इसलिए या तो वो आसपास के लोगों की सलाह ज्यादा नहीं मानते या फिर वो लोग इसलिए चुप रहते हैं कि राहुल उन्हें वहां से हटा सकते हैं. वो वही कहते हैं तो जो राहुल को अच्छा लगे''
उनका कहना है कि राहुल का ‘लेफ्ट ऑफ द सेंटर’ वाला रुझान रहा है. इसलिए उनके नजदीकी लोगों में लेफ्ट रुझान वाले लोग हैं. फैसले लेने में ऐसे लोगों की भूमिका बढ़ती जा रही है. इसका पार्टी के चुनावी प्रदर्शन पर असर दिख रहा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)