सिक्किम में अचानक आई बाढ़, कारगर चेतावनी प्रणाली होती तो बच जातीं जानें

सिक्किम की तिस्ता नदी में अचानक आई बाढ़ में फंसी एक बस.

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इमेज कैप्शन, सिक्किम की तिस्ता नदी में अचानक आई बाढ़ में फंसी एक बस.
    • Author, नवीन सिंह खड़का
    • पदनाम, पर्यावरण संवाददात, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस

सिक्किम में बीते हफ्ते अचानक आई बाढ़ में फंसकर 70 लोगों की मौत हो गई थी. मृतकों में नौ सैनिक भी शामिल हैं. वहीं सौ लोग अभी भी लापता हैं. यह बाढ़ दक्षिण लोनाक झील के फटने की वजह से आई थी.

इस बाढ़ के बाद विशेषज्ञों ने कहा है कि सिक्किम में भारत को अपनी खतरनाक ग्लेशियल झीलों के लिए तत्काल उन्नत चेतावनी प्रणाली स्थापित करने की जरूरत है. जिससे समय रहते आपदा की चेतावनी जारी की जा सके.

इस तरह के विस्फोट या ग्लेशियल झीलों से अचानक पानी निकलने का कारण भारी बारिश, भूकंप या हिमस्खलन हो सकता है.

ऐसे में चेतावनी प्रणाली अधिकारियों को समय रहते लोगों को वहां से निकालने और नुकसान को कम करने के लिए बांधों के फाटक खोलने में मदद कर सकती है.

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण का दावा

तिस्ता नदी पर बनी एक बिजली परियोजना

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इमेज कैप्शन, बाढ़ की वजह से तिस्ता नदी पर बनी एक बिजली परियोजना को काफी नुक़सान पहुंचा है.

सिक्किम में अचानक आई बाढ़ के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने बताया है कि उसने सितंबर में हिमनद झील के विस्फोट की स्थिति में सही समय पर चेतावनी जारी करने वाली प्रणाली तैनात करने के लिए दो झीलों का सर्वेक्षण किया था.

एनडीएमए ने जिन दो झीलों का सर्वेक्षण किया था, उनमें से एक दक्षिण लोनाक थी. बीबीसी को पता चला है कि वहां चेतवानी प्रणाली स्थापित करने की पहल की गई थी.

इसके कुछ हफ्ते बाद आई बाढ़ के बाद लोग यह सवाल करने को मजबूर हैं कि वहां सही समय पर चेतावनी जारी करने वाली कोई प्रणाली क्यों नहीं लगाई गई थी. वह भी तब जब झील को काफी पहले से ही खतरनाक माना जा रहा था.

अभी यह पता नहीं चल पाया है कि दक्षिण लोनाक झील में यह आउटबर्स्ट कैसे हुआ. कुछ लोगों का कहना है कि यह बादल फटने का परिणाम हो सकता है.

वहीं कुछ लोगों का कहना है कि वहां इतनी अधिक बारिश नहीं हुई थी. वे इसका कारण हिमनद झील के किनारे मोरेन (ढीले पत्थरों, चट्टानों और मिट्टी ) की विफलता को मानते हैं. कुछ लोगों ने तो इसे भूकंप से भी जोड़ दिया है.

वहीं कई अध्ययनों में चेतावनी दी गई थी कि दक्षिण लोनाक झील में बाढ़ आने की बहुत अधिक आशंका है.

क्यों हो रहा है दक्षिण लोनाक झील का विस्तार

बाढ़ में हुआ नुक़सान.

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इमेज कैप्शन, सिक्किम में करीब 700 ग्लेशियल लेक हैं. इनमें से क़रीब 20 ख़तरनाक़ हैं.

ग्लेशियर के तेजी से पिघलने की वजह से पिछले तीन दशक में दक्षिण लोनाक झील का ढाई गुना विस्तार हुआ है.

अधिकारियों ने 2016 में झील को ओवरफ्लो होने से रोकने के लिए उसका कुछ पानी बाहर निकाला था. लेकिन समय रहते चेतावनी देने वाली नहीं स्थापित की गई थी.

इस बाढ़ में तीस्ता नदी पर बना चंगथांग बाँध टूट गया. वहां काम करने वाले लोगों ने स्थानीय मीडिया को बताया कि जब उन्हें बांध के गेट खोलने का आदेश मिला तब तक बहुत देर हो चुकी थी. उन्होंने बताया कि बाढ़ का पानी पहले ही बांध के ढांचे को प्रभावित करने लगा था.

विशेषज्ञों का कहना है कि ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं. इससे कई हिमालयी झीलों के जल स्तर में बढ़ोतरी हुई है.

इससे नई झीलें बनी हैं या पुरानी झीलें आपस में मिल गई हैं. ये झीलें अब खतरनाक हो गई हैं, क्योंकि चट्टानें गिरने, बादल फटने या हिमस्खलन होने की दशा में उनमें बाढ़ आ सकती है.

एनडीएमए ने कहा है कि उसकी योजना भारत में अधिक जोखिम वाली 56 हिमनद झीलों में से अधिकांश पर समय रहते चेतावनी देने वाली प्रणाली लगाने की है.

हिमालय के कितने ग्लेशियर ख़तरनाक़ हैं

सिक्किम में मदद के लिए पहुंची सेना.

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दी इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट हिमालयी खतरों में विशेषज्ञता रखने वाला एक गैर सरकारी संगठन (एनजीओ) है.

इस सेंटर का अनुमान है कि हिमालय के इलाके में करीब 200 तक ग्लेशियल लेक खतरनाक अवस्था में हैं. दूसरे शब्दों में इसे यह कह सकते हैं कि ये झीलें दक्षिण लोनाक झील की तरह कभी भी फट सकती हैं.

अकेले सिक्किम में ही छोटी-बड़ी 700 ग्लेशियल हिमनद झीलें हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि इनमें से करीब 20 के फटने का खतरा है.

धीरेन श्रेष्ठ सिक्किम के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के निदेशक हैं. उन्होंने पुष्टि की कि लोनाक झील की निगरानी की जा रही थी. उसकी पहचान खतरनाक झील के रूप में की गई थी.

उन्होंने बीबीसी के इस सवाल का जवाब नहीं दिया कि झील में पूर्व चेतावनी प्रणाली क्यों नहीं थी और झील में बाढ़ आने के बाद नीचे की बस्तियों और वहां की प्रमुख इमारतों के लिए चेतावनी कैसे जारी की गई थी.

श्रेष्ठ के अलावा एनडीएमए, केंद्रीय जल आयोग या जल संसाधन मंत्रालय समेत भारत की किसी भी अन्य संघीय एजेंसी ने भी इन सवालों का जवाब नहीं दिया.

स्विट्ज़रलैंड एनडीएमए को दक्षिण लहोनक में एक पूर्व-चेतावनी प्रणाली स्थापित करने में मदद कर रहा है. दिल्ली में इसके दूतावास ने बीबीसी को कोई विवरण नहीं दिया या यह नहीं बताया कि काम में इतना समय क्यों लग रहा है.

दक्षिण लोनाक झील में चेतावनी प्रणाली लगाने में एनडीएमए की स्विट्जरलैंड मदद कर रहा है.

दिल्ली स्थिति स्विट्जरलैंड के दूतावास ने बीबीसी को इस बारे में कोई जानकारी नहीं दी कि इस काम में इतना समय क्यों लग रहा है.

चेतावनी प्रणाली लगाने में क्यों हो रही है देरी

सिक्कम में तिस्ता नदी में आई बाढ़ से मची तबाही.

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राजीव रजक सिक्किम विश्वविद्यालय में ग्लेशियोलॉजी के छात्र हैं.

वो कहते हैं, "शायद प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली की कमी का संबंध नौकरशाही से है. तथ्य यह भी है कि ​​इस काम में कई राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय एजेंसियां शामिल हैं."

हिमालय से निकलने वाली नदियों पर बांध बनाने का कई लोग विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि दक्षिण लोनाक झील रणनीतिक नजरिए से भी संवेदनशील है, इस वजह से चेतावनी प्रणाली लगाने की रफ्तार धीमी हो सकती है.

नाम न प्रकाशित करने की शर्त पर एक कार्यकर्ता ने कहा, "झील उस इलाके में है जो चीन के स्वायत्त क्षेत्र तिब्बत की सीमा से लगता है. निश्चित रूप से इसमें सैन्य संवेदनशीलता शामिल है, इसका मतलब यह हुआ कि किसी भी गैर सैन्य काम में समय लगेगा."

ग्लेशियरों का अध्ययन करने वालों का कहना है कि हिमालय में ग्लोबल वार्मिंग से प्रेरित परिवर्तन बहुत तेजी से हो रहे हैं. इसलिए वहां निरंतर निगरानी और जोखिम कम करने वाले काम किए जाने की जरूरत है.

इंटरनेशनल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलेपमेंट में जमें हुए पानी के विशेषज्ञ मरियम जैकसन ने कहा, हम समय से आगे भाग रहे हैं.

उन्होंने कहा कि अभी और भी बहुत किया जाना है, जिसमें झीलों की निगरानी, ​शुरुआती चेतावनी प्रणाली लगाना, स्थानीय समुदायों को इसमें शामिल करना और यह जांचना कि क्या निगरानी और प्रारंभिक चेतावनी जारी करने वाले उपकरण ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं.

जलवायु के गर्म होने के साथ ग्लेशियल झीलों को खतरनाक बनाने वाले कारकों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि बढ़ते तापमान के कारण ऊंचाई वाले स्थानों पर बारिश हो रही है, जहां पहले ज्यादातर बर्फबारी होती थी. इससे हिमालय सहित दुनिया भर के पर्वतीय इलाकों में भूवैज्ञानिक अस्थिरता पैदा हो रही है.

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