धरती को बचाने का एक पुराना जापानी तरीका

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- Author, लिली क्रॉसली-बैक्सटर
- पदनाम, बीबीसी ट्रैवल
सुंदर लिफाफे में पैक घर में बनी चावल की मठरी (जापानी भाषा में सेनबेई) देते हुए बुजुर्ग महिला दुकानदार ने लिफ़ाफ़े की रंगीन डिज़ाइन की तारीफ़ की.
हर पैकेट को पारंपरिक वाशी काग़ज से बनाया गया था. उनकी सलाह थी कि तोहफे़ पैक करने या नोटबुक पर जिल्द चढ़ाने में उसका दोबारा इस्तेमाल हो सकता है.
जब हम चलने लगे तो उन्होंने कहा- "मोत्ताइनाइ." उनकी आवाज़ में दादी मां वाली सख़्ती थी.
मोत्ताइनाइ सदियों से जापान के जीवन में रची-बसी है. यह किसी वस्तु के साथ उसके मालिक के रिश्तों को बयां करती है.
यह लोगों को फेंकने की संस्कृति से आगे देखने को प्रेरित करती है और हर चीज़ को महत्व देती है. रिड्यूस, रीयूज़, रीसाइकल के मंत्र में यह चौथे R यानी रिस्पेक्ट को जोड़ती है.
ऐसे समय में जब टिकाऊपन पर दुनिया का ध्यान कम होता जा रहा है, मोत्ताइनाइ इस दुनिया और हमारी चीज़ों के साथ जुड़ाव का एक वैकल्पिक ढांचा मुहैया कराती है.
दूसरे टिकाऊ प्रयासों में धरती के भविष्य पर फोकस होता है, मोत्ताइनाइ उस वस्तु को ही गहराई से देखने के लिए प्रेरित करती है. इसमें यह विश्वास होता है कि यदि आप किसी चीज़ की कद्र करते हैं तो उसके बर्बाद होने का कोई कारण नहीं है.

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पर्यावरण चेतना
पर्यावरण सक्रियता के वर्तमान युग में कचरे को कम करना- चाहे वह सिंगल यूज़ प्लास्टिक हो, खाना या ऊर्जा की खपत हो- हमारी सामूहिक चेतना के शीर्ष पर है.
जटिल रीसाइक्लिंग सिस्टम और साफ-सुथरे शहरों के लिए जापान का सम्मान है. ऐसा लगता है कि जापान ने 3 R (रिड्यूस, रीयूज़, रीसाइकल) की कला में महारत हासिल कर ली है.
लेकिन, इस धारणा ने एक ख़तरनाक आत्म-संतोष की मानसिकता पैदा की है. हक़ीक़त में, प्रति व्यक्ति सबसे ज़्यादा प्लास्टिक कचरा पैदा करने में जापान दुनिया में दूसरे नंबर पर है. पूरे यूरोपीय संघ में जितना प्लास्टिक कचरा निकलता है उससे ज़्यादा अकेले जापान में होता है.
इस वैश्विक संकट के सामने मोत्ताइनाइ की अहमियत को बड़ी आसानी से ख़ारिज किया जा सकता है, लेकिन जापानियों की दिनचर्या में इसकी निरंतरता को कुछ लोग एक ताक़तवर औजार के रूप में देखते हैं जिसे फिर से काम में लाया जा सकता है.
मोत्ताइनाइ कैंपेन की प्रमुख तात्सुओ ननाई कहती हैं, "इस अवधारणा की जड़ें जापानी संस्कृति में हैं, लेकिन हाल में इसकी परवाह नहीं करने की प्रवृत्ति बढ़ी है."
इस एनजीओ का गठन 2005 में केन्या की नोबेल-पुरस्कार विजेता पर्यावरणविद् वंगारी मथाई के दौरे के बाद हुआ था.
ननाई कहती हैं, "वह मोत्ताइनाइ के बारे में जानती थीं. वह इससे बहुत प्रभावित थीं क्योंकि एक ही शब्द में यह बहुत कुछ कह देता है."

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बौद्ध परंपरा
"मोत्ताई शब्द बौद्ध परंपराओं से आया है, जिसका संदर्भ है चीज़ों का सार. यह भौतिक दुनिया की हर चीज़ पर लागू हो सकता है. यह बताता है कि वस्तुओं का अस्तित्व अकेले में नहीं होता, बल्कि वे एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं."
"नाइ नकारात्मकता है. इस तरह मोत्ताइनाइ दो चीज़ों- सजीव या निर्जीव के संबंध टूटने पर उदासी की अभिव्यक्ति है."
वस्तु और उसके मालिक का रिश्ता जापानी संस्कृति का मूल तत्व है. यह पारंपरिक मरम्मत की कला किंतसुगी से लेकर मैरी कोन्डो के न्यूनतमवाद में खुशी की तलाश तक सबकुछ में दिखाई देता है.
चाय समारोहों में मेहमान करीने से मरम्मत किए गए कटोरे देख सकते हैं या वे इस्तेमाल की हुई चीज़ों को धन्यवाद कहने के सालाना समारोहों में जाने का मौका पा सकते हैं.
ननाई कहती हैं, "जब कोई चीज़ इस्तेमाल होने लायक नहीं रह जाती है तब हम हमेशा उसकी सेवा के लिए उसका शुक्रिया कहते हैं."
हारि-कुयो समारोह में सिलाई की टूटी हुई सुइयों को मुलायम टोफ़ू (सोया पनीर) में रखकर रिटायर किया जाता है और उनका शुक्रिया कहा जाता है.

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उपभोक्तावाद की हक़ीक़त
बड़े पैमाने पर उत्पादन और उपभोक्तावाद की दुनिया में भौतिक वस्तुओं के साथ इस तरह का संबंध बनाए रखना मुश्किल है. पर्यावरण के साथ हमारी बढ़ती दूरी के पीछे यही सचाई है.
ननाई कहती हैं, "लोग सोचते हैं कि हम जंगल और समुद्र से अलग हैं और हम कुदरत से बेहतर हैं, लेकिन पर्यावरण संकट ने हमारी चेतना को हक़ीक़त के प्रति जगा दिया है कि हम कुदरत के हिस्से हैं."
लगातार और बार-बार गंभीर प्राकृतिक आपदाओं का सामना करने वाले देश में इस अलगाव की गंभीरता को गहराई से महसूस किया जाता है.
धरती के साथ इस जुड़ाव को मथाई बार-बार सामने रखती थीं. वह दुनिया भर में घूमती थीं और मोत्ताइनाइ का संदेश साथ ले जाती थीं.
2006 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार परिषद में उन्होंने मानवाधिकारों और पर्यावरण संरक्षण के संबंध को सामने रखा था. मथाई ने धरती के सीमित संसाधनों के लिए बढ़ती भूख को "सभी संघर्षों की जड़" करार दिया था.
उन्होंने मोत्ताइनाइ का जिक्र करके कहा था कि सीमित संसाधनों के प्रति आभारी रहिए और उनकी बर्बादी मत कीजिए.
मथाई, ननाई की कैंपेन टीम और विदेशों में काम करने वाले जापानियों की बदौलत मोत्ताइनाइ धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैल रही है.
वियतनाम में हर साल एक मोत्ताइनाइ फेस्टिवल होता है. लॉस एंजेल्स के जापानी मोहल्ले में 2016 के रीजेनेरेशन प्रोजेक्ट में इसे थीम बनाया गया था.
इसी साल टोक्यो में होने वाले ओलंपिक और पैरालंपिक खेलों में टिकाऊ विकास पर जोर दिया जा रहा है और मोत्ताइनाइ को अपनाया गया है.
अक्षय ऊर्जा स्रोतों के इस्तेमाल के अलावा मौजूदा स्टेडियमों और परिवहन व्यवस्था को तवज्जो दी गई है. कार्बन स्तर कम करने वाली पहले की योजनाएं भी लागू हैं.

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ओलंपिक में मोत्ताइनाइ
ओलंपिक पदक विजेताओं के पोडियम पूरे जापान से इकट्ठा किए गिए रीसाइकिल्ड प्लास्टिक से बनाए जाएंगे.
ओलंपिक के 5,000 पदक भी जनता से दान में मिले पुराने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों से सावधानी से निकाले गए 100 फीसदी रीसाइकिल्ड धातुओं से बनाए जाएंगे.
मोत्ताइनाइ की अवधारणा के प्रति जापान में हर कोई संवेदनशील नहीं है. बुजुर्गों और युवाओं की सोच में स्पष्ट अंतर है.
क्योटो यूनिवर्सिटी की एसोसिएट प्रोफेसर मिसिज़ु असारी कहती हैं, "कई बुजुर्ग लोगों ने विश्व युद्ध के दौरान और उसके बाद की गरीबी देखी है. मोत्ताइनाइ को उन्होंने अपने अनुभव से सीखा है. युवा पीढ़ी के लोगों को बचपन से ही सब कुछ मिला है. इसलिए बुजुर्गों और युवाओं की सोच में बड़ा अंतर है."
पीढ़ियों का अंतर
वस्तुओं के साथ युवा पीढ़ी कोई संबंध महसूस नहीं करती. इससे बड़े पैमाने पर खपत को बढ़ावा मिलता है. चीज़ों की कद्र नहीं होती और उनको आसानी से बदल लिया जाता है.
मोत्ताइनाइ अभियान का फ़ोकस बच्चों पर है. टोक्यो में सेकेंड हैंड सामान बेचने के लिए मोत्ताइनाइ बाजार लगते हैं.
अभियान के सदस्य उनके साथ बच्चों का बाजार लगाते हैं, जहां बच्चे अपने खिलौने और कपड़े बेच और खरीद सकते हैं.
माता-पिता को यहां आने की अनुमति नहीं होती और बच्चों के लिए 500 येन (3.50 डॉलर) से ज़्यादा लाने की मनाही होती है.
यहां बच्चे न सिर्फ़ पैसे की कीमत समझते हैं, बल्कि यह भी सीखते हैं कि पुरानी चीज़ों को फेंकने की बजाय उनको किसी काम में लाया जा सकता है.
मोत्ताइनाइ की भावना का एक चरम रूप जापान के चौथे सबसे बड़े द्वीप शिकोकू में देखा जा सकता है.
यहां एक छोटे शहर कामिकात्सु को 2020 तक ज़ीरो-वेस्ट बनाने का मिशन चालू है जिसमें बच्चे केंद्र में हैं. कामिकात्सु ने 2003 में इस लक्ष्य की घोषणा की थी.
बोर्ड की अध्यक्ष अकिरा सकानो ने मुझे स्थानीय बच्चों के लिए बनाए गए कार्ड का एक खेल दिखाया.
बच्चों को कचरा ख़त्म करने के 5 विकल्प दिए जाते हैं- दोबारा इस्तेमाल, मरम्मत, दूसरा इस्तेमाल, रीसाइक्लिंग और अंत में सड़ना-गलना.
सकानो कहती हैं, "स्वाभाविक है कि आप हमेशा किसी चीज़ को बचा नहीं सकते. इसलिए हमारे पास दो विकल्प और हैं- कूड़े में डालना या उस चीज़ से इंकार करना."

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नये से इंकार
आख़िरी विकल्प उनके संदेश की कुंजी है, "इंकार करना मोत्ताइनाइ जैसा ही है, लेकिन इसमें ज़्यादा गुंजाइश है कि आप शुरुआत से ही उस चीज़ का इस्तेमाल न करने का मन बना सकते हैं."
फ़ास्ट फ़ूड के साथ मिलने वाले खिलौनों से इंकार से लेकर दोबारा इस्तेमाल वाले बोतलों का सुझाव देने तक, स्थानीय बच्चों ने उनके संदेश को दिल में बसा लिया है.
कामिकात्सु में 45 चरणों वाला जटिल रिसाइक्लिंग सिस्टम है और एक कुरु-कुरू स्वैप-शॉप है. अब तक यहां से 11 टन फालतू चीज़ों से क्राफ्ट बनाकर नये घरों में भेजा गया है.
यह शहर अपने 80 फ़ीसदी से ज़्यादा कचरे को रिसाइकिल करता है और ज़ीरो कचरे के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है.
असारी कहती हैं, "आबादी बढ़ने और दुनिया भर में संसाधनों की कमी होने से, बुद्धिमानी, संस्कृति और टेक्नोलॉजी ज़िंदा रहने के लिए ज़रूरी होगी."
मेरी नोटबुक पर चढ़ी ख़ूबसूरत जिल्द से लेकर प्लास्टिक के पोडियम पर दिए जाने वाले रीसाइकिल्ड मेडल तक, इंसान, वस्तुओं और दुनिया के बीच संबंध कभी इतने इतने महत्वपूर्ण नहीं रहे.
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