प्रतिका रावल की कहानी, जिन्होंने वनडे में सबसे तेज़ हज़ार रन बनाने के रिकॉर्ड की बराबरी की

प्रतिका

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    • Author, सुमंत सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

प्रतिका रावल ने महिला वनडे विश्व कप 2025 में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ खेलते हुए नए विश्व रिकॉर्ड की बरा​बरी की है. वह अब उस सूची में शामिल हो गई हैं जहां इससे पहले तक ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ ही हुआ करते थे.

भारत की सलामी बल्लेबाज प्रतिका रावल गुरुवार को जब महिला वनडे विश्व कप के मुक़ाबले में न्यूज़ीलैंड के ख़िलाफ़ खेलने के लिए उतरीं, तब तक 22 वनडे मुक़ाबले खेलकर 988 रन बना चुकी थीं.

अपने 23वें मैच में ही प्रतिका ने अपने 1000 वनडे रन पूरे करने में कामयाबी हासिल कर ली. यह वर्ल्ड रिकॉर्ड की बराबरी है.

प्रतिका रावल से पहले ऑस्ट्रेलिया की लिंडसे रीलर ने 23 वनडे पारियां खेलकर 1000 वनडे रन पूरे किए थे. ऑस्ट्रेलिया की निकोल बोल्टन ने 25 और मेग लैनिंग ने भी 25 पारियों में ही वनडे में एक हजार रन बनाए हैं.

अ​ब प्रतिका रावल उनसे आगे निकल गई हैं. प्रतिका ने अपने वनडे करियर में अब तक एक शतक और 7 अर्धशतक लगाए हैं.

इससे पहले उन्होंने वनडे इंटरनेशनल के सिर्फ़ आठ मैचों में 500 रन का आंकड़ा पार कर सबसे तेज़ 500 रन बनाने का रिकॉर्ड अपने नाम किया था.

उन्होंने 28 साल पुराना वह रिकॉर्ड तोड़ा, जो इंग्लैंड की शार्लेट एडवर्ड्स ने 1997 में बनाया था.

प्रतिका के पिता प्रदीप रावल ने बीबीसी से कहा था, "अगर वह सबसे तेज़ एक हज़ार रन बनाने में कामयाब होती है, तो यह उसकी व्यक्तिगत उपलब्धि तो होगी ही, साथ ही यह हमारे परिवार, टीम और देश, सभी के लिए गौरव का पल होगा."

प्रतिका का करियर

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इमेज कैप्शन, प्रतिका रावल को बचपन से ही क्रिकेट में दिलचस्पी रही है
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प्रतिका ने साल 2021 में घरेलू क्रिकेट में दिल्ली की ओर से डेब्यू किया.

तीन साल तक दिल्ली से खेलने के बाद, 2024 के घरेलू सीज़न से पहले वह रेलवे टीम से जुड़ गईं.

घरेलू क्रिकेट में असम के ख़िलाफ़ 155 गेंदों में 161 रन की पारी खेलने के बाद वह चर्चा में आईं.

2023-24 के घरेलू सीज़न में उन्होंने अपने बल्ले से शानदार प्रदर्शन किया और आठ पारियों में 411 रन बनाए, जिनमें दो शतक शामिल थे.

इसके बाद दिसंबर 2024 में उन्हें भारत की ओर से वेस्ट इंडीज के ख़िलाफ़ वनडे में डेब्यू करने का मौक़ा मिला.

प्रतिका ने इस अवसर को भुनाने में देर नहीं की. अपने छठे वनडे मुक़ाबले में ही उन्होंने 129 गेंदों में 154 रन की पारी खेली, यह उनके अंतरराष्ट्रीय करियर का पहला शतक था.

इसके साथ ही उन्होंने स्मृति मंधाना के साथ पहले विकेट के लिए 233 रन की साझेदारी भी की.

इस मैच के बाद स्मृति मंधाना के साथ उनकी ओपनिंग जोड़ी को खूब पसंद किया जाने लगा.

मैच के बाद स्मृति मंधाना के साथ बातचीत में प्रतिका ने कहा था कि शतक के क़रीब आने पर वह थोड़ा दबाव महसूस कर रही थीं, इसलिए उन्होंने एक-दो रन लेकर काम चलाया.

लेकिन जैसे ही शतक पूरा हुआ, उन्होंने तेज़ी से रन बनाए और 100 को 150 में बदला.

क्रिकेट कमेंटेटर जतिन सप्रू ने गेंदबाज़ों को समझने की उनकी क्षमता की वजह से प्रतिका को 'क्रिकेट साइंटिस्ट' तक कहा है.

पढ़ाई में भी अव्वल

प्रतिका रावल

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इमेज कैप्शन, पिता प्रदीप रावल का कहना है कि प्रतिका का पहला प्यार क्रिकेट है

प्रतिका की कहानी इसलिए भी दिलचस्प है क्योंकि वह पढ़ाई में भी काफ़ी अच्छी रही हैं.

अक्सर खिलाड़ियों के बारे में ये सुनने को मिलता है कि वे स्कूल के दिनों से ही खेल को प्राथमिकता देते रहे हैं और पढ़ाई को साथ-साथ संभालते रहे हैं.

लेकिन प्रतिका के साथ ऐसा बिल्कुल नहीं था. उन्होंने पढ़ाई को उतनी ही प्राथमिकता दी, जितनी खेल को.

उनके पिता प्रदीप रावल बताते हैं कि इसके पीछे की वजह प्रतिका के दादा हैं.

वह कहते हैं, "प्रतिका के दादा ने हमेशा पढ़ाई को प्राथमिकता दी. उनका मानना था कि पढ़ाई हर फ़ील्ड में मदद करती है, चाहे वह क्रिकेट हो या कुछ और. इसी वजह से प्रतिका ने पढ़ाई में हमेशा ध्यान दिया."

प्रतिका रावल ने दिल्ली के बाराखंभा स्थित मॉडर्न स्कूल से पढ़ाई की है. उन्होंने 12वीं में 92.5 प्रतिशत अंक हासिल किए. इसके बाद उन्होंने जीसस एंड मैरी कॉलेज से साइकोलॉजी में बैचलर्स की डिग्री ली.

क्रिकेट में शुरुआत: 'इंडिया लेवल की खिलाड़ी'

अपने पिता प्रदीप रावल के साथ प्रतिका रावल

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इमेज कैप्शन, अपने पिता प्रदीप रावल के साथ प्रतिका रावल

प्रतिका के पिता प्रदीप रावल भी क्रिकेटर रहे हैं. उन्होंने यूनिवर्सिटी लेवल तक क्रिकेट खेला है और वर्तमान में अंपायर हैं.

वह बताते हैं कि घर में एथलीट होने की वजह से प्रतिका का शुरू से ही खेलों के प्रति झुकाव रहा.

वह कहते हैं, "तीन साल की उम्र में ही मैंने इसे बैट पकड़ना सिखा दिया था. फिर छह साल की उम्र में क्रिकेट एकेडमी लेकर गया."

प्रदीप रावल कहते हैं, "उस समय एकेडमी में कोई लड़कियां नहीं होती थीं, यह पहली लड़की थी. और अब देखिए, लड़कियां कहां पहुंच गई हैं. देश का नाम रोशन कर रही हैं."

वह बताते हैं कि जब वह क्रिकेट खेला करते थे, तब पैरेंट्स खेल को अधिक तवज्जो नहीं देते थे. उस दौर में पैरेंट्स का मानना था कि पढ़ाई ही सब कुछ है, लेकिन आज के समय में खेल को भी प्राथमिकता दी जा रही है.

वह कहते हैं, "हमने प्रतिका को पूरा सपोर्ट किया. हमें पता था कि पैरेंट्स के तौर पर हमें क्या करना है, तो हमने वही किया और उसे पूरा सहयोग दिया."

प्रदीप रावल बताते हैं, "जब प्रतिका नौ साल की थी, तब उसने लक्ष्मीबाई कॉलेज में अपना पहला मैच खेला था. यूनिवर्सिटी की टीम थी, उसमें पांच-छह खिलाड़ी सीनियर थे, जो रणजी खेलते थे. उस मैच में इसने 50 रन बना दिए."

"इसका प्रदर्शन देख सब ने तारीफ़ की. तब से मुझे लगा कि इसमें कुछ टैलेंट है. सबको अपना बच्चा अच्छा ही लगता है, लेकिन जब लोगों ने कहा कि यह इंडिया लेवल की खिलाड़ी है, तब से मैंने उसे उसी लेवल के हिसाब से ट्रेनिंग दी."

बास्केटबॉल या क्रिकेट, कैसे चुना?

प्रतिका नेशनल लेवल की बास्केटबॉल खिलाड़ी भी रही हैं. उन्होंने नेशनल गेम्स में गोल्ड मेडल जीता है.

तो सवाल यह है कि जब दोनों खेलों में वह शानदार थीं, तो फिर उन्होंने क्रिकेट को क्यों चुना?

प्रदीप रावल कहते हैं कि इसमें चुनने जैसा कुछ था ही नहीं, दरअसल प्रतिका का पहला प्यार क्रिकेट ही है.

वह कहते हैं, "उसका फ़र्स्ट लव तो क्रिकेट ही है. वह बास्केटबॉल सिर्फ़ इसलिए खेलती है, ताकि उसकी फ़िटनेस बनी रहे. यह उसके लिए सेकेंडरी था."

वह आगे बताते हैं, "प्रतिका को बास्केटबॉल पसंद है और फ़ुटबॉल के बाद यह ऐसा खेल है जिसमें सबसे ज़्यादा ताक़त लगती है. वह फ़िटनेस बनाए रखने के लिए बास्केटबॉल खेलती थी. जब कभी क्रिकेट मैच नहीं होते थे, तो वह बास्केटबॉल खेलती रहती थी."

'इंडिया के लिए सेलेक्शन होना भावुक पल'

प्रदीप रावल का बयान

जब प्रदीप रावल से पूछा गया कि प्रतिका से जुड़ा वह कौन-सा पल उन्हें सबसे ज़्यादा भावुक करता है, तो उन्होंने कहा,

"इंडिया के लिए सेलेक्शन होना, मेरे लिए सबसे भावुक पल था."

वह बताते हैं, "मैं उस वक्त रांची में एक शादी में गया हुआ था. इसका फ़ोन आया और इसने कहा, 'पापा, मेरा इंडिया में सेलेक्शन हो गया!' मैं इन शब्दों को सुनने के लिए 20-22 साल से इंतज़ार कर रहा था. जब सुना, तो आंखों में आंसू आ गए. मैं और मेरी वाइफ़ दोनों रो पड़े. यह हमारे जीवन का सबसे बड़ा पल था."

वह आगे कहते हैं, "देश के लिए खेलना बहुत बड़ा गौरव होता है. जैसे एक सिपाही बॉर्डर पर जाकर अपनी जान की बाज़ी लगाता है, वैसे ही जब कोई खिलाड़ी इंडिया के लिए मैदान में उतरता है, तो अपना सब कुछ झोंक देता है."

"यह हमारे लिए, हमारे पैरेंट्स के लिए और देश के लिए गर्व की बात है. हमें बहुत अच्छा लगता है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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