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आंखें बंद, हाथ बांधे और फिर लाठी से पिटाई, इसराइल में फ़लस्तीनी क़ैदियों के साथ बर्बरता की दास्तां
- Author, पॉल एडम्स
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, यरूशलम
इसराइल और हमास के बीच संघर्ष जारी है. इस बीच इसराइल के मानवाधिकार समूह बेत्सेलम ने बड़ा दावा किया है.
बेत्सेलम ने कहा है कि फ़लस्तीनी लोगों को रखने वाली इसराइली जेलों के अंदर के हालात किसी यातना के बराबर है.
मानवाधिकार समूह ने ये दावा हिरासत में लिए गए 55 फ़लस्तीनी लोगों के बयान के अधार पर तैयार की गई 'वेलकम टू हेल' यानी 'नरक में स्वागत है' शीर्षक नाम से जारी रिपोर्ट में किया है.
बेत्सेलम की कार्यकारी निदेशक यूली नोवाक ने कहा, ''सभी लोगों ने हमें एक ही बात बार-बार कही. जेल में अपशब्द बोले जा रहे हैं, शारीरिक हिंसा, मानसिक प्रताड़ना और अपमान हो रहा है.''
यूली ने आगे कहा कि फ़लस्तीनी लोगों के लिए इसराइल जेल सिस्टम यातना देने के नेटवर्क के रूप में बदल चुका है.
जेल में क्षमता से ज़्यादा क़ैदी
इसराइल पर 7 अक्टूबर को हमास के हमले के बाद 1200 इसराइली और अन्य नागरिक मारे गए थे. तब से फ़लस्तीनी बंदियों की संख्या दोगुना होकर लगभग 10 हज़ार हो गई है.
इसराइल में जेल का प्रबंधन देश की जेल सर्विस और कुछ हद तक सेना मिलकर देखती है.
इसमें क्षमता से अधिक क़ैदी भर दिए गए हैं. छह लोगों की जगह कई सेल में 12 लोगों को रखा जा रहा है. ऐसे में कई क़ैदियों को ज़मीन पर सोना पड़ रहा और कई बार तो बिस्तर और कंबल भी नहीं मिलता.
दरअसल, हमास के हमले के तुरंत बाद कुछ क़ैदियों को पकड़ा गया तो कुछ को ग़ज़ा में घेरने के बाद जेल में बंद किया गया.
इसके अलावा कई लोगों को इसराइल के क़ब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में हिरासत में लिया गया. कुछ दिन बाद कई क़ैदियों को रिहा भी किया गया है.
'प्रशासनिक हिरासत' के तहत हमास के हमले से पहले जेल में क़ैद फ़िरास हसन ने कहा कि 'मैंने अपनी आंख से देखा है कि सात अक्टूबर के बाद कैसे स्थिति बदल गई.'
वेस्ट बैंक में बीबीसी संवाददाता पॉल एडम्स से बातचीत के दौरान फ़िरास हसन ने कहा, ''ज़िंदगी पूरी तरह से बदल गई है. जो हुआ उसे मैं सुनामी कहता हूं.''
फ़िरास हसन 90 के दशक के शुरुआती सालों से जेल के अंदर और बाहर रहे हैं. हसन पर दो बार फ़लस्तीनी इस्लामिक जिहाद का सदस्य होने का आरोप लगा है.
पीआईएल को इसराइल और कई पश्चिमी देशों ने आतंकी संगठन घोषित किया हुआ है. हसन ने भी माना कि वो इस संगठन में पहले एक्टिव थे.
जेल में जीवन की कठिनाइयों से परिचित हसन ने कहा कि 7 अक्टूबर के बाद जब अधिकारी उनके सेल में दाखिल हुए तो जो हुआ वो उसके लिए वो तैयार नहीं थे.
उन्होंने कहा, "हमें 20 अधिकारियों और नक़ाबपोश लोगों ने लाठियों से बुरी तरह से पीटा. पीछे से बांध दिया गया और हमारी आंख पर पट्टी थी. इतना मारा गया कि मेरे चेहरे से खून बह रहा था. वे हमें 50 मिनट तक मारते रहे और मैंने उन्हें इस दौरान आंख पर बंधी पट्टी के नीचे से देखा तो वो हमारा वीडियो भी बना रहे थे.''
हसन को इस साल अप्रैल में बिना किसी आरोप के रिहा कर दिया गया और इस दौरान उन्होंने कहा था कि मेरा 20 किलो वज़न कम हो गया. जेल छोड़ने के दौरान हसन का एक वीडियो सामने आया था और इसमें हसन शारीरिक रूप से काफ़ी कमज़ोर दिख रहे थे.
हसन ने बेत्सेलम की रिसर्च टीम को कहा कि 'मैं 13 साल इससे पहले जेल में रहा हूं, लेकिन पहले कभी ऐसा अनुभव नहीं किया.'
हालांकि, ग़ज़ा और वेस्ट बैंक के लोगों के अलावा इसराइल के एक नागरिक ने भी जेल में यातना की बात कही है.
‘जेल में इसराइली नागरिक के अनुभव’
इसराइल के नागरिक सारी खौरीह ने कहा कि उनके साथ भी ऐसा ही हुआ था. सारी पिछले साल नवंबर में मगीदो में दस दिन तक जेल में रहे थे. पुलिस ने कहा था कि सारी ने अपने दो फेसबुक पोस्ट में हमास के हमले की तारीफ़ की थी. इसके बाद तुरंत आरोप ख़ारिज कर दिए गए थे.
सारी ने कहा कि जेल ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया था. क़ैदियों के अंदर कोई क़ानून नहीं था. वह सबसे बुरे दुर्व्यवहार से बच गए, लेकिन अपने साथी क़ैदियों के साथ हो रहे व्यवहार से वो स्तब्ध थे. बिना कारण के जेल में बंद लोगों को मारा जा रहा था. वो चिल्लाते हुए कह रहे थे कि हमने कुछ नहीं किया. ऐसे में हमें नहीं मारना चाहिए.
अन्य बंदियों से बात करते हुए सारी को पता चला कि वह जो देख रहे थे वह सामान्य नहीं था.
उन्होंने कहा कि अन्य क़ैदियों ने मुझसे कहा कि 7 अक्टूबर से पहले भी सब अच्छा नहीं था, लेकिन बाद में सब कुछ अलग हो गया.
सारी ने बताया कि मैंने सुना कि एक क़ैदी मेडिकल हेल्प के लिए गुहार लगा रहा था, लेकिन डॉक्टर भी उसे बचा नहीं सके और उसकी जान चली गई.
पिछले हफ्ते जारी की गई यूएन की रिपोर्ट के अनुसार, ''इसराइल जेल सर्विस (आईपीएस) की घोषणा और क़ैदियों से जुड़े संगठनों से संकेत मिलता है कि आईपीएस की क़ैद में 17 फ़लस्तीनी क़ैदियों की जान चली गई.''
वहीं, इसराइली सेना के वकील ने 26 मई को कहा था कि हिरासत में जान गंवाने वाले ग़ज़ा के 32 लोगों के मामले की जांच कर रहे हैं.
सारी ने बिना आरोप के रिहा होने के बाद कहा, ‘’मैं इसराइल का नागरिक हूं. मैं वकील हूं. मैंने जेल के बाहर से दुनिया देखी है. अब मैं अंदर हूं तो दूसरी दुनिया देखता हूं.’’
उन्होंने कहा कि उनका नागरिकता और कानून के शासन में विश्वास टूट गया है.
इसराइली सेना का इनकार
वहीं, इसराइल की सेना ने ऐसे सभी दावों को ख़ारिज कर दिया है. सेना ने कहा, "ठोस शिकायतें आईडीएफ से जुड़े निकायों को भेज दी जाती हैं और फिर इसे निपटाया जाता है.''
साथ ही इसराइल जेल सर्विस ने कहा कि उन्हें ऐसे किसी भी दावे को लेकर जानकारी नहीं है और जहां तक हमें पता है ऐसा कुछ नहीं हुआ है.
सात अक्टूबर के बाद से इसराइल इंटरनेशनल कमेटी ऑफ रेड क्रॉस को फ़लस्तीन के क़ैदियों से मिलने की इजाज़त नहीं दे रहा. इसको लेकर इसराइल ने कोई कारण नहीं बताया है.
वहीं, प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ग़ज़ा में बंधक बनाए गए इसराइल के नागरिकों और अन्य लोगों तक इसराइल इंटरनेशनल कमेटी ऑफ रेड क्रॉस की पहुंच नहीं होने को लेकर कई बार नाराज़गी ज़ाहिर कर चुके हैं.
द एसोसिएशन फॉर सिविल राइट्स इन इसराइल ने सरकार पर जानबूझकर अंतरराष्ट्रीय क़ानून की अवहेलना करने का आरोप लगाया है.
पिछले सप्ताह फ़लस्तीनी क़ैदियों के साथ किए गए व्यवहार ने एक सार्वजनिक विवाद को जन्म दे दिया. ऐसा इसलिए क्योंकि इसराइल के कई सांसदों सहित प्रदर्शन कर रहे लोगों ने एसडीई तेमन मिलिट्री बेस पर ग़ज़ा के एक क़ैदी का यौन शोषण करने के आरोपी सैनिक को गिरफ्तार करने से रोकने की कोशिश की.
इनमें से कई प्रदर्शनकारी इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतामार बेन-ग्वीर के प्रशंसक हैं. बेन-ग्वीर ही जेल सर्विस देख रहे हैं. वो बार-बार दावा करते हैं कि उनकी देखरेख में फ़लस्तीनी बंदियों की स्थिति तेजी से खराब हो गई है.
ग्वीर ने जुलाई में हंगामेदार रहे संसद सत्र के दौरान कहा था, "मुझे गर्व है कि मेरे समय में हमने सभी स्थितियां बदल दीं."
बेत्सेलम की कार्यकारी निदेशक ने बीबीसी से कहा कि जेल सर्विस की ज़िम्मेदारी अब तक के सबसे बड़े दक्षिणपंथी शख़्स के हाथ में दी गई है. उन्होंने कहा कि जो भी हो रहा वो मानवता के ख़िलाफ़ है.
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