मोहम्मद दिएफ़: इसराइल का दावा- मारे गए हमास के कमांडर, दशकों से थी तलाश

इसराइली सेना ने दावा किया है कि बीती 13 जुलाई को ग़ज़ा के ख़ान यूनिस इलाक़े में हुए इसराइली हमले के निशाने पर हमास के मिलिट्री कमांडर मोहम्मद दिएफ़ थे. गुरुवार को इसराइली सेना ने इस हमले में उनकी मौत की पुष्टि कर दी है.

इसराइली सेना के हमले का टार्गेट ग़ज़ा के शहर ख़ान यूनिस का एक कंपाउंड था. माना जाता है कि दिएफ़ भी वहीं मौजूद थे.

इसराइली सेना ने उस समय बताया था कि हवाई हमले में एक और हमास कमांडर राफ़ा सलामाह भी मारे गए थे. उस वक्त इसराइली सेना ने दिएफ़ के मौत की पुष्टि नहीं की थी. सेना के मुताबिक सलामा सात अक्तूबर के हमले के मास्टरमाइंड्स में से एक थे.

हमास ने आरोप लगाया है कि इसराइल 'एक भयंकर जनसंहार पर पर्दा डालने का प्रयास' कर रहा है.

लेकिन समाचार एजेंसी एएफ़पी के मुताबिक़ इसराइली सेना ने दावा किया है कि उसकी सूचना के अनुसार उस जगह पर ‘सिर्फ़ हमास के आतंकवादी थे, कोई आम नागरिक नहीं.’

लेकिन ग़ज़ा में हमास संचालित स्वास्थ्य मंत्रालय ने दावा किया कि इसराइली बमबारी ख़ान यूनिस के अल-मवासी इलाक़े में हुई है. मंत्रालय ने बताया है कि इस हमले में करीब एक दर्जन लोग मारे गए हैं और ये लोग विस्थापितों के लिए बने एक कैंप में रहते थे.

दशकों से थी तलाश

मोहम्मद दिएफ़ अल-क़ासिम ब्रिगेड के प्रमुख थे.

वो लंबे अरसे से इसराइल की मोस्ट वांटेड की सूची में शामिल थे. इसराइल दिएफ़ पर कई सैनिकों और आम लोगों की मौत का आरोप लगाता था.

दिएफ़ का असली नाम मोहम्मद दियाब अल-मासरी था. उनका जन्म 1965 में ख़ान यूनिस के शरणार्थी शिविर में हुआ था.

दिएफ़ की परवरिश एक ग़रीब परिवार में हुई और वह अपने पिता के साथ कताई वगैराह जैसे काम करते थे. बाद में दिएफ़ ने एक पोल्ट्री फ़ार्म खोला और कुछ समय के लिए बतौर ड्राइवर भी काम किया.

दिएफ़ का अर्थ होता है मेहमान. ये नाम इस बात का संकेत था कि दिएफ़ इसराइली सेना से बचने के लिए कभी भी एक जगह पर नहीं टिकते थे.

उन्होंने इस्लामिक यूनिवर्सिटी ऑफ़ ग़ज़ा से विज्ञान में ग्रेजुएशन की डिग्री हासिल की थी. वह यूनिवर्सिटी के मनोरंजन समिति के प्रमुख थे और उन्होंने स्टेज पर कई कॉमेडी नाटकों में हिस्सा भी लिया था.

अपनी पढ़ाई के दौरान ही दिएफ़ ने मुस्लिम ब्रदरहुड को जॉइन कर लिया था.

जब 1987 में इसराइल के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए हमास की स्थापना की गई, दिएफ़ उनके साथ जुड़ गए.

साल 1989 में इसराइली अधिकारियो ने उन्हें गिरफ़्तार कर लिया था और वे 16 महीने जेल में रहे. उन पर हमास के मिलिट्री विंग के लिए काम करने का आरोप था.

दिएफ़ हमास के मिलिट्री विंग अल-क़ासिम के सह-संस्थापकों में से एक थे.

वह वेस्ट बैंक में मौजूद क़ासिम ब्रिगेड की ब्रांच को भी सुपरवाइज़ करते थे.

साल 2002 में हमास के संस्थापकों में से एक और उसकी मिलिट्री विंग के प्रमुख सलाह शेहदेह की एक इसराइली हवाई हमले में मौत के बाद दिएफ़ अल-क़ासिम ब्रिगेड के प्रमुख बन गए.

साल 2015 में दिएफ़ को अमेरिका ने अपनी अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों की सूची में शामिल किया था. यूरोपीय संघ ने भी दिसंबर 2023 में उन्हें आतंकवादियों की ब्लैकलिस्ट में शामिल कर लिया था.

हत्या के प्रयास

दिएफ़ पर आरोप था कि उन्होंने 1996 में इसराइल में बसों में हुए बम धमाकों की योजना को अंजाम दिया था. उन हमलों में कई लोगों की जान गई थी. उनपर नब्बे के दशक में तीन इसराइली सैनिकों को मारने का भी आरोप था.

इसराइल पर सात अक्तूबर को हुए हमलों के लिए उन्हें याह्या सिनवार के साथ मुख्य मास्टरमाइंड माना जाता था.

माना जाता है कि हमास के प्रमुख हथियार - क़ासिम रॉकेट के पीछे भी उन्हीं का दिमाग था.

ग़ज़ा के नीचे बिछे सुरंगों के मकड़जाल में भी उन्हीं की प्रमुख भूमिका थी.

ऐसा माना जाता है कि दिएफ़ ने अपनी ज़िंदगी का अधिकतर हिस्सा इन्हीं सुरंगों में बिताया है.

सात बार बची जान

दिएफ़ के व्यक्तित्व के बारे में कुछ भी स्पष्ट जानकारी मौजूद नहीं थी लेकिन फ़लस्तीनी उन्हें मास्टरमाइंड के तौर पर देखते थे. हालांकि, इसराइल की नज़र में वह ऐसे शख़्स थे जो बार-बार अपनी जान बचाने में कामयाब हो जाते हैं.

ऐसा माना जाता है कि साल 2001 से लेकर अब तक दिएफ़ को मारने की सात बार कोशिश हुई लेकिन वह हर बार मौत को चकमा दे गए.

इनमें से 2002 में हुए हमला उनकी ज़िंदगी के लिए सबसे घातक था. उस दिन दिएफ़ की जान तो बच गई लेकिन उनकी एक आंख चली गई.

इसराइल का कहना है कि दिएफ़ का एक पैर और एक हाथ भी नहीं था और उन्हें बोलने में भी दिक़्क़त आती थी.

साल 2014 में भी इसराइली सुरक्षाबलों ने दिएफ़ को मारने की कोशिश की थी. ग़ज़ा पट्टी में हुए इस हमले में दिएफ़ बच गए लेकिन उनकी पत्नी और दो बच्चों की जान इसमें चली गई.

इसके बाद से ही दिएफ़ के बारे अधिक जानकारी सामने नहीं आती थी. उनकी अब तक केवल तीन तस्वीरें हैं.

एक की तारीख़ के बारे में पता है, दूसरी में वह नक़ाब पहने हैं और तीसरी तस्वीर में उनकी सिर्फ़ परछाई दिखाई देती है.

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