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हमास नेता की हत्या के बाद मध्य पूर्व में तनाव, भारत के लिए क्या है इसका अर्थ?
- Author, शिल्पा ठाकुर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
शुक्रवार को एयर इंडिया ने इसराइल के तेल अवीव के लिए अपनी सभी फ़्लाइटें रद्द कर दी हैं. अपने इस क़दम के लिए एयरलाइन ने मध्य-पूर्व में बिगड़ते हालात का हवाला दिया है.
क्षेत्र में ताज़ा तनाव तेहरान में हमास के नेता इस्माइल हनिया की मौत के बाद बढ़ता जा रहा है. भारत ने अब तक हनिया की मौत पर कोई प्रतिक्रिया नहीं दी है. बुधवार को तेहरान में हुए हमले में मारे गए हनिया पर अमेरिका समेत कई देशों ने बयान जारी किए हैं.
हमास ने बताया कि हनिया ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेज़ेश्कियान के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए तेहरान गए थे. हनिया क़तर में रहते थे और लंबे वक्त से ग़ज़ा नहीं गए थे.
भारत के केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भी ईरान में इस शपथ समारोह के लिए तेहरान में थे. हमास और ईरान ने हत्या के लिए इसराइल को जिम्मेदार ठहराया है. इसराइल और आईडीएफ ने इस पर कुछ नहीं कहा.
इस घटना के बाद से क्षेत्र में हालात बिगड़ने की आशंका तेज़ हो गई है. मध्य पूर्व में लाखों भारतीय नौकरी करते हैं अगर क्षेत्र में एक व्यापक जंग छिड़ी तो इसका असर उनके जीवन पर भी पड़ सकता है.
जंग फैली तो भारत की क्या होगी चिंता
इस्माइल हनिया की हत्या ऐसे वक्त पर हुई, जब इसराइल और हमास के बीच बीते साल 7 अक्टूबर से जंग जारी है. ईरान ने अपनी धरती पर हुई इस हत्या के बाद बदले की बात कही है.
अगर बदले की आग इस क्षेत्र के बाकी देशों तक फैली तो क्या भारत को भी चिंता करनी चाहिए?
इंडियन काउंसिल ऑफ वर्ल्ड अफेयर के फेलो और मध्य पूर्व मामलों के जानकार डॉ. फ़ज़्ज़ुर्रहमान सिद्दीकी कहते हैं, "हनिया का मामला हमास की आंतरिक राजनीति और इसराइल का मामला है.
इसका भारत से किसी तरह का संबंध नहीं है. उसने इस मसले में खुद को वैसे शामिल नहीं किया, जैसे अमेरिका समेत पश्चिमी देश करते हैं. भारत पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा."
दिल्ली की जामिया मिल्लिया इस्लामिया यूनिवर्सिटी में पश्चिमी एशिया अध्ययन विभाग की प्रोफेसर सुजाता ऐश्वर्या भी कुछ ऐसा ही मानती हैं.
उनका कहना है, "भारत की फ़लस्तीन को लेकर स्थिति स्पष्ट है. उसका हमास से सीधा रिश्ता नहीं है. भारत का वहां की स्थानीय सरकार फतह से संबंध रहा है. जबकि हमास ग़ज़ा में है. उसकी वेस्ट बैंक में कोई राजनीतिक भूमिका नहीं है. हमास भारत के लिए न दुश्मन है और न दोस्त."
मध्य पूर्व में रह रहे लाखों भारतीय
मध्य-पूर्वी देशों में रहने वाले भारतीयों की संख्या लाखों में हैं. इसका मतलब है कि अगर इन देशों में हालात नाज़ुक पड़ेंगे तो सीधा असर वहां रह रहे भारतीयों पर भी देखने को मिलेगा.
इसी का ज़िक्र करते हुए डॉ. फ़ज़्ज़ुर्रहमान सिद्दीक़ी कहते हैं, "पूरा क्षेत्र किसी न किसी परेशानी से जूझ रहा है. चाहे छोटा मसला हो या बड़ा. जैसे कि हम सीरिया, लेबनान, यमन और ईरान में देख रहे हैं. लेकिन जिस इलाके में भारतीय हैं, वहां अभी तक कुछ नहीं हुआ."
वो कहते हैं, "तकरीबन 90 लाख भारतीय यूएई, सऊदी अरब, क़तर, कुवैत, बहरीन और ओमान जैसे खाड़ी के देशों में हैं. इन क्षेत्रों में बीते 9-10 महीने से कुछ नहीं हुआ. भारत को बस सतर्क रहने की ज़रूरत है. अगर ईरान भी कुछ करता है तो उसका असर इसराइल, लेबनान या सीरिया तक ही दिखेगा."
भारतीय विदेश राज्य मंत्री कीर्तिवर्धन सिंह ने बीते शुक्रवार संसद में बताया था कि खाड़ी देशों में रह रहे भारतीयों की संख्या 90 लाख से अधिक है.
गल्फ़ कॉरपोरेशन काउंसिल (जीसीसी) में सबसे अधिक 35 लाख 54 हज़ार 274 भारतीय यूएई में हैं. सऊदी अरब में 26 लाख 45 हज़ार 302, कुवैत 10 लाख 726, क़तर में 8 लाख 35 हज़ार, ओमान में 6 लाख 73 हज़ार और बेहरीन में 3 लाख 50 हज़ार भारतीय हैं.
ये आंकडे़ भारतीय विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर दिए गए हैं. इसके अलावा ईरान में 10 हज़ार 320, लेबनान में 3000 और इसराइल में करीब 20000 भारतीय रहते हैं.
ईरान में भारत का प्रोजेक्ट
भारत ईरान में चाबहार बंदरगाह विकसित कर रहा है. ये भारत, ईरान और अफ़ग़ानिस्तान को जोड़ता है. बंदरगाह अरब सागर में चीन की मौजूदगी को चुनौती देने के लिहाज़ से अहम है.
अगर ईरान की तरफ से कुछ किया गया और अमेरिका ने एक बार फिर प्रतिबंध लगा दिए, तो क्या इस प्रोजेक्ट पर कोई असर होगा?
इस पर डॉ. फ़ज़्ज़ुर्रहमान सिद्दीकी कहते हैं, "चाबहार बंदरगाह पर भारत ने हाल में अधिक काम किया है. इस पर अमेरिका का सकारात्मक रुख नहीं दिखा. मगर भारत फिर भी वहां लगातार काम कर रहा है. इसका मतलब है कि भारत इन सबसे ज़्यादा प्रभावित नहीं होता. उसकी स्थिति दुनिया में बहुत मज़बूत है."
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न विरोध न समर्थन
ताज़ा मसले पर भारत ने न किसी पक्ष का साथ दिया और न ही किसी का विरोध किया.
इसकी वजह बताते हुए सिद्दीकी कहते हैं, "भारत के अलावा कई अन्य देशों के भी बयान नहीं आए. भारत सीधा इससे प्रभावित नहीं हो रहा. जहां पहले से ही बहुत सी चीज़ें हो रही हैं.
वहां भारत का बयान देना ज़रूरी नहीं. दूसरी बात ये कि हमास के नेता की मौत हुई है. भारत ने हमास की विचारधारा को कभी समर्थन नहीं दिया."
प्रोफेसर सुजाता ऐश्वर्या का कहना है, "भारत बिना किसी स्पष्टता के कुछ नहीं बोलता. वो एक मज़बूत स्थिति में है. भारत का रुख हमेशा स्पष्ट होता है.
जब तक 1967 या 1973 की तरह युद्ध नहीं हो रहा, तब तक वहां रह रहे भारतीयों को कोई दिक्कत नहीं है. जब तक सऊदी अरब या क़तर जैसे देश इसमें शामिल नहीं होते, तब तक भारत के लिए चिंता करने की ज़रूरत नहीं है."
ईरान और इसराइल से भारत के रिश्ते
ईरान और इसराइल दोनों से ही भारत के अच्छे रिश्ते हैं.
डॉ. फ़ज़्ज़ुर्रहमान सिद्दीकी कहते हैं "एक वक्त पर सऊदी अरब और क़तर के रिश्ते खराब थे. लेकिन भारत के दोनों के साथ रिश्ते अच्छे रहे. भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है."
उन्होंने कहा कि "भारत द्विपक्षीय रिश्ते रखता है. अगर एक देश के दूसरे के साथ रिश्ते खराब हैं, तो उससे भारत से रिश्ते पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा. भारत किसी अलाइंस का हिस्सा नहीं बनता. वो अपने हितों के मुताबिक चलता है. भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को यूएई में सर्वोच्च नागरिक सम्मान मिला है. वो ईरान भी गए हैं."
हेलीकॉप्टर हादसे में जब ईरानी राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी और विदेश मंत्री हुसैन आमिर-अब्दुल्लाह की मौत हुई थी तब भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर ने एक्स पर पोस्ट किया था.
उन्होंने लिखा कि वो संवेदना व्यक्त करने के लिए दिल्ली स्थित ईरानी दूतावास गए थे.
अपने पोस्ट में उन्होंने लिखा था, "इन्हें हमेशा भारत के दोस्त के रूप में याद किया जाएगा. इन्होंने भारत-ईरान संबंधों के विकास में बहुत योगदान दिया है."
अपने ट्वीट में उन्होंने लिखा कि भारत सरकार इस मुश्किल घड़ी में ईरान के साथ खड़ी है.
इसी साल 14-15 फरवरी में जयशंकर ईरान दौरे पर थे. उन्होंने तब तत्कालीन राष्ट्रपति और विदेश मंत्री से मुलाकात की थी. दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंधों समेत कई मुद्दों पर बात की गई.
साल 2017 में नरेंद्र मोदी इसराइल की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे.
बीते साल 7 अक्टूबर को इसराइल पर हुए हमास के हमले के बाद पीएम मोदी ने इसे आतंकी हमला बताते हुए इसकी निंदा की थी.
उन्होंने कहा था, 'इसराइल पर हुए आतंकी हमलों की खबर से गहरा सदमा लगा है. हमारी संवेदना और प्रार्थनाएं निर्दोष पीड़ितों और उनके परिवारों के साथ हैं. हम इस मुश्किल समय में इसराइल के साथ एकजुटता से खड़े हैं.'
उन्होंने अपने संदेश में फ़लस्तीन का ज़िक्र नहीं किया था. हमले के करीब पांच दिन बाद भारतीय विदेश मंत्रालय ने कहा था कि फ़लस्तीनियों और इसराइल को लेकर भारत के रुख में कोई बदलाव नहीं आया है. भारत ने एक बार फिर इस संघर्ष के समाधान के लिए टू स्टेट सॉल्यूशन की बात कही.
मंत्रायल ने कहा कि भारत फ़लस्तीनियों के लिए स्वतंत्र और स्वायत्त देश फ़लस्तीन की मांग के समर्थन में है. ऐसे में अगर देखा जाए, तो भारत ने ईरान, इसराइल और फ़लस्तीन के मामले में अपना रुख स्पष्ट रखा है.
क्षेत्र में नहीं थम रही हिंसा
इसराइल और ईरान बीते कुछ वक्त से जंग की कगार पर हैं. इसी साल अप्रैल में सीरिया में ईरानी दूतवास पर हुए हमले के लिए तेहरान ने इसराइल को जिम्मेदार ठहराया था.
ईरान ने जवाबी कार्रवाई करते हुए हवाई हमले किए. बाद में दोनों देशों ने शांति बरत ली.
हालांकि अब इस्माइल हनिया की हत्या के बाद हालात फिर बिगड़ रहे हैं. दूसरे फ्रंट पर इसराइल हिज़बुल्लाह से भी जंग लड़ रहा है.
इसराइल के कब्ज़े वाले गोलान हाइट्स पर रविवार को रॉकेट हमला हुआ था. जिसमें 12 बच्चों और किशोरों की मौत हो गई. इसराइल का आरोप है कि हमला हिज़बुल्लाह ने किया है. तभी से दोनों पक्षों के बीच जंग छिड़ने की आशंका बढ़ गई.
प्रोफेसर सुजाता ऐश्वर्या का कहना है, "हालिया मामले में बड़े पैमाने पर युद्ध होने की संभावना कम है. इस घटना से पता चलता है कि ईरान के भीतर कुछ बाहरी ताकतों की कितनी मौजूदगी हो चुकी है. ईरान के राष्ट्रपति के शपथ समारोह में वहां आए मेहमान की हत्या होना बड़ी बात है. इससे पहले भी ईरान में हुए इस तरह के हमलों की खबर आई है."
वो कहती हैं, "हनिया की हत्या के बाद ईरान ने जवाब देने की बात कही है. लेकिन कुछ महीने पहले भी उसने ऐसा किया था. पहले मामलों को देखने से पता चलता है ईरान बड़े पैमाने पर युद्ध करने की स्थिति में नहीं हैं."
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