इसराइल में प्रदर्शन क्या प्रधानमंत्री नेतन्याहू का सियासी करियर ख़त्म कर देंगे?

    • Author, जेरेमी बोवेन
    • पदनाम, बीबीसी इंटरनेशनल एडिटर, यरूशलम

इसराइल में प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की मुश्किलें एक बार फिर बढ़ती नज़र आ रही हैं.

बीते साल सात अक्तूबर को हमास के हमले के बाद ये विरोध प्रदर्शन कुछ वक़्त के लिए शांत हो गए थे लेकिन छह महीनों बाद अब फिर इसराइल की सड़कों पर हज़ारों प्रदर्शनकारी उतरे हैं.

इसराइल में सबसे लंबे वक़्त तक प्रधानमंत्री रहने वाले बेन्यामिन नेतन्याहू को हटाने के लिए ये प्रदर्शन शुरू हुए थे. मगर इसराइल-हमास युद्ध के कारण ये प्रदर्शन कुछ वक़्त के लिए ठंडे बस्ते में चले गए थे.

यरूशलम में पुलिस बदबूदार पानी की तेज़ बौछारों के ज़रिए इन प्रदर्शनकारियों को हटाने की कोशिशें की गईं. इन प्रदर्शनकारियों ने शहर के उत्तर-दक्षिण हाईवे को ब्लॉक किया.

ये प्रदर्शनकारी नेतन्याहू के इस्तीफ़े और जल्दी चुनाव करवाए जाने की मांग कर रहे हैं. इन लोगों की मांग ये भी है कि हमास के क़ब्ज़े में अब भी जो 130 इसराइली बंधक हैं, उन्हें छुड़वाने के लिए जल्द से जल्द डील की जाए. इनमें से कुछ लोगों के बारे में माना जा रहा है कि वो मारे जा चुके हैं.

बंधकों के परिवारों, दोस्तों और प्रदर्शनकारियों का डर ये है कि जंग जितने ज़्यादा दिन चलेगी, उतने ज़्यादा लोगों की जान जाएगी.

प्रदर्शनकारी क्या कह रहे हैं?

तारीख़- 31 मार्च 2024. इसराइल की संसद के बाहर हज़ारों लोगों की भीड़ थी. इसी भीड़ में मौजूद कातिया अमोर्ज़ा का बेटा इसराइली सेना में है और ग़ज़ा में तैनात है.

कातिया कहती हैं, ''आज सुबह आठ बजे से मैं यहां हूं और नेतन्याहू से मेरा कहना है कि मैं उनकी एक तरफ़ की फर्स्ट क्लास टिकट करवाकर देती हूं ताकि वो यहां से जाएं और फिर कभी ना लौटें.''

वो बोलीं, ''मैं नेतन्याहू से कहूंगी कि वो सरकार में बारी-बारी से बैठाए अपने लोगों को भी साथ ले जाएं. ये हमारे समाज के सबसे बदतर लोग हैं.''

यरूशलम इस्लाम का तीसरा सबसे पवित्र स्थान है, जहां अल-अक़्सा मस्जिद है. यरूशलम यहूदी धर्म का भी सबसे पवित्र स्थान है. उसे टेम्पल माउंट के नाम से जाना जाता है.

इसी टेम्पल माउंट इलाक़े में येहुदाह ग्लिक यहूदी प्रार्थनाओं का प्रसार करते हैं. कातिया के बाद हम इन्हीं रेबी ग्लिक से मिले.

रेबी ग्लिक कहते हैं कि प्रदर्शनकारी ये भूल गए हैं कि उनका असली दुश्मन हमास है प्रधानमंत्री नेतन्याहू नहीं.

वो कहते हैं, ''मुझे लगता है कि वे बहुत लोकप्रिय हैं और ये लोग इसी बात से गुस्साए हुए हैं. इन लोगों को ये बात नहीं पच रही कि वे इतने लंबे समय से नेतन्याहू का विरोध कर रहे हैं पर वे अब भी पीएम की कुर्सी पर बने हुए हैं.''

वो बोले, "मैं भी चाहता हूं कि आगे आएं और विरोध जारी रखें. अपनी आवाज़ बुलंद करें. लेकिन इस बात का ख़्याल रखें कि लोकतंत्र और अराजकता की बीच के पतले धागा न टूटे.''

नेतन्याहू का विरोध करने वाले क्या बोले?

प्रदर्शनकारियों और विदेशों में नेतन्याहू का विरोध करने वालों का मत है कि इसराइल की सरकार में लोकतंत्र के दुश्मन घुस गए हैं क्योंकि उन्हें गठबंधन चलाने के लिए धुर दक्षिणपंथी दलों का साथ लेना पड़ रहा है.

इनमें धर्म को आधार बनाकर चलने वाली पार्टी ज़ियोनिज़्म पार्टी भी है. इस पार्टी के नेता सरकार के वित्त मंत्री बेज़ालेल स्मोत्रिच हैं. इसी पार्टी के एक संसद ओहाद ताल ने कहा है कि बंधकों को छुड़ाने के लिए हमास पर सैन्य कार्रवाई के अलावा और कोई विकल्प नहीं है.

ओहाद ताल कहते हैं, "आपको क्या लगता है कि हमास आसानी से बंधकों को रिहा कर देगा और हमें सारे आतंकवादियों को रिहा करने देगा? ये इतना आसान नहीं है.”

"अगर ऐसा कोई बटन होता जिसे दबाते ही सारे बंधक लौट आते और सारी समस्या का हल हो जाता, तो हर इसराइली वो बटन दबा देता. लेकिन आपको जितना ये आसान लगता है उतना है नहीं.”

नेतन्याहू अक्सर कहते हैं कि सिर्फ़ वही इसराइल को सुरक्षित रख सकते हैं. बहुत से इसराइली उनकी इस बात पर यक़ीन भी करते थे.

उनका दावा था कि वे बिना किसी शर्त या क़ुर्बानी के फ़लस्तीनियों को काबू में रख सकते हैं, अधिकृत भूमि पर यहूदियों को बसा सकते हैं. लेकिन पिछले साल सात अक्तूबर को हमास के हमले ने सब बदल दिया.

बहुत सारे इसराइली उस दिन हुई सुरक्षा चूक के लिए नेतन्याहू को ज़िम्मेदार ठहराते हैं.

नेतन्याहू ने अब तक नहीं मांगी माफ़ी

उस हमले के लिए इसराइल की सुरक्षा के लिए ज़िम्मेदार कई अधिकारी माफ़ी मांग चुके हैं लेकिन नेतन्याहू ने अब तक सात अक्तूबर को हुई सुरक्षा चूक की कोई ज़िम्मेदारी नहीं ली है.

इसकी वजह से ग़ुस्साए हज़ारों लोगों ने रविवार की शाम को यरूशलम की सड़कें ब्लॉक कर दीं.

नेतन्याहू बीते 40 वर्षों में इसराइल की सियासत की एक ताकतवर शख़्सियत रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र में इसराइल का पक्ष मज़बूती से रखने के बाद नेतन्याहू 1996 में ओस्लो शांति समझौते के विरोध के मुद्दे पर पहली बार देश के प्रधानमंत्री बने थे.

ओस्लो समझौते के तहत फ़लस्तीनियों के लिए एक अलग स्वतंत्र देश का प्रावधान था. लेकिन नेतन्याहू अलग फ़लस्तीन देश के हमेशा से विरोधी रहे हैं. वे इस दिशा में अमेरिकी प्रयासों को भी रद्द करते रहे हैं.

नेतन्याहू के आलोचकों का कहना है कि वे जो बाइडन की युद्ध के बाद ग़ज़ा पर नीति का विरोध इसलिए करते हैं ताकि उन्हें धुर दक्षिणपंथी इसराइलियों का समर्थन मिलता रहे.

नेतन्याहू का सियासी करियर दांव पर?

इसराइल संसद नेसेट के बाहर प्रदर्शन करने वालों में डेविड अगमॉन भी थे. अगमॉन इसराइल सेना से ब्रिगेडियर के पद से रिटायर हुए हैं. वे नेतन्याहू के पहले कार्यकाल में उनके दफ़्तर में कार्यरत थे.

डेविड अगमॉन कहते हैं, ''ये 1948 के बाद सबसे बड़ा संकट है. मैं आपको एक बात और बताऊं. 1996 में मैं नेतन्याहू का चीफ़ ऑफ़ स्टाफ़ था. इसलिए में उन्हें जानता हूं. मैंने तीन महीनों के भीतर वो नौकरी छोड़ दी थी. क्योंकि मैं समझ गया था कि वे इसराइल के लिए ख़तरनाक़ हैं.''

वो बोले, "उन्हें फ़ैसले लेने नहीं आते. वे डरते हैं. उन्हें बस भाषण देना आता है. मैंने ये भी देखा है कि वे अपनी पत्नी पर निर्भर हैं. मैंने उनके झूठ भी पकड़े थे. तीन महीने बाद मैंने उन्हें बताया था - बीबी आपको सहायक नहीं चाहिए, देश को नया पीएम चाहिए. उसके बाद मैं वहाँ से चला आया.''

अभी सड़कों पर प्रदर्शन चल ही रहे थे कि नेतन्याहू ने समय से पहले चुनावों की मांग को रद्द करते हुए कहा था कि रफ़ाह क्रॉसिंग पर हमास के ख़िलाफ़ नया अभियान छेड़ा जाएगा.

नेतन्याहू चुनावों में एक सफल अभियान चलाने के एक्सपर्ट हैं. उनके लगातार कम होते कुछ समर्थक कहते हैं कि वे जीत भी सकते हैं.

उनका कहना है कि हमास के ख़ात्मे के मकसद पर सारे इसराइली एकमत हैं. लगभग सभी इसराइली युद्ध का समर्थन करते हैं.

लेकिन जिस तरह से ये युद्ध लड़ा जा रहा है और जैसे अब तक सभी बंधकों को नहीं छुड़ाया गया है, उससे नेतन्याहू का सियासी करियर दांव पर लग गया है.

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