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इसराइल में मारे गए सैनिकों के स्पर्म कौन चाह रहा है?
- Author, मिशेल शुवाल और आएशा ख़ैराल्लाह
- पदनाम, बीबीसी अरेबिक
इसराइल में ऐसे माता-पिता की संख्या बढ़ती जा रही है, जो मारे गए अपने सैनिक बेटों के शुक्राणुओं यानी स्पर्म को सुरक्षित करना चाहते हैं.
बीते साल सात अक्तूबर को हमास के हमले के बाद इस सिलसिले में नियमों को कुछ शिथिल बनाया गया है, लेकिन लंबी क़ानूनी प्रक्रियाओं की वजह से परिवारों में नाराज़गी और असंतोष है.
अवी हारुश जब अपने 20 साल के बेटे रीफ़ को याद करते हैं तो उनकी आवाज़ लड़खड़ाने लगती है. रीफ़ ग़ज़ा पट्टी में इस साल 6 अप्रैल को लड़ाई के दौरान मारे गए थे.
सेना के जो अधिकारी अवी के घर पहुंचे थे, वे अपने साथ एक विकल्प लेकर आए थे. उनके पास इतना समय था कि रीफ़ के शुक्राणुओं को सुरक्षित किया जा सके. उन्होंने पूछा था कि रीफ़ का परिवार क्या इसके लिए तैयार है.
रीफ़ के पिता अवी इसके लिए फ़ौरन तैयार हो गए. उन्होंने कहा, “रीफ़ ने अपनी ज़िंदगी को भरपूर जिया और इस क्षति के बावजूद हमने जीवित रहने का विकल्प चुना. रीफ़ को बच्चों से प्रेम था, वो अपने बच्चे चाहता था, इस बारे में कोई सवाल ही नहीं है.”
मिशन ज़िंदगी का
रीफ़ की कोई पत्नी या गर्लफ्रेंड नहीं थी. लेकिन पिता अवी ने जब अपने बेटे रीफ़ की कहानी शेयर की, तो कई महिलाएं आगे आईं और उन्होंने रीफ़ के बच्चे को जन्म देने की पेशकश की.
अवी कहते हैं कि ये आइडिया ही अब ‘उनकी ज़िंदगी का मिशन’ है.
अवी का परिवार ऐसे कई परिवारों में से एक हैं, जो बीते साल सात अक्तूबर के हमले के बाद अपने बेटों के शुक्राणुओं को सुरक्षित करना चाहते हैं. उस हमले में लगभग 1200 लोग मारे गए थे, जबकि लगभग 251 लोगों को बंधक बनाकर ग़ज़ा ले जाया गया था.
हमास के जवाब में इसराइल ने ग़ज़ा में बड़े पैमाने पर सैन्य ऑपरेशन शुरू किया था. हमास के स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, इसराइली कार्रवाई में तबसे 39,000 से अधिक फ़लस्तीनी मारे जा चुके हैं.
इसराइली स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, बीते साल सात अक्तूबर के हमले के बाद से, देश के लगभग 170 नौजवानों के शुक्राणुओं को सुरक्षित किया गया है, जिनमें सैनिक और आम नागरिक दोनों शामिल हैं. एक साल पहले के मुक़ाबले ये संख्या लगभग 15 गुना अधिक है.
इस प्रक्रिया में मृतक जवान के अंडाशय में चीरा लगाकर उसमें से कोशिकाओं का एक छोटा हिस्सा निकाला जाता है, जिसमें से जीवित शुक्राणु कोशिकाओं को प्रयोगशाला में अलग करके फ्रीज़ किया जा सकता है.
मौत के 24 घंटे के भीतर यदि इन कोशिकाओं को निकाल लिया जाए, तो उन्हें भविष्य में इस्तेमाल करने के लिए सफलता की दर सबसे अधिक रहती है. हालांकि ये कोशिकाएं 72 घंटे तक जीवित रह सकती हैं.
अक्तूबर में इसराइल के स्वास्थ्य मंत्रालय ने इस प्रक्रिया में माता-पिता के लिए कोर्ट के आदेश की अनिवार्यता में छूट दे दी थी.
बेटे की मौत का दर्द
रेचेल और याकोव कोहेन ऐसे पहले इसराइली माता-पिता हैं, जिन्होंने अपने सैनिक बेटे के शुक्राणुओं को सुरक्षित किया. इसराइली डिफ़ेंस फोर्स के मुताबिक, उनके बेटे केविन को साल 2002 में ग़ज़ा पट्टी में फलस्तीनी स्नाइपर ने निशाना बनाया था.
उन शुक्राणुओं की मदद से रेचेल और याकोव कोहेन को एक पोती मिली, जिसका नाम ओशेर है.
केविन की मौत के बाद रेचेल पर जो बीती, उन्होंने इस बारे में कहा, “मैंने उसकी अलमारी खोली. मैं उसकी ख़ुशबू खोजना चाहती थी. यहां तक कि मैंने उसके जूते सूंघकर देखे. केविन की तस्वीर ने मुझसे बात की. केविन ने मुझसे ये सुनिश्चित करने के लिए कहा कि उसके बच्चे हों.”
रेचेल कहती हैं, “उन्हें काफ़ी विरोध का सामना करना पड़ा, लेकिन एक ऐतिहासिक क़ानूनी फ़ैसले के बाद उन्होंने अपने बेटे के बच्चे के लिए संभावित मां की खोज में विज्ञापन निकाला.”
अपने परिवार की निजता को ध्यान में रखते हुए इरिट अपना पूरा नाम नहीं बताती हैं. वो उन कई महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने इस विज्ञापन के बाद रेचेल से संपर्क किया.
इरिट भी सिंगल थीं. वो बताती हैं कि एक मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कार्यकर्ता ने उनकी अच्छे से जांच-पड़ताल की और कोर्ट की इजाज़त मिलने पर उनका फर्टिलिटी ट्रीटमेंट शुरू किया गया.
इरिट ने बताया, “कुछ लोगों ने कहा कि हम भगवान के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं. लेकिन मुझे ऐसा नहीं लगा. वो बच्चा जो अपने पिता को जानता है और वो बच्चा जो स्पर्म बैंक डोनेशन से पैदा हुआ, उन दोनों में फ़र्क होता है.”
ओशर को पता है कि उसके पिता फ़ौज में मारे गए थे. उसके कमरे को डॉल्फिंस से सजाया गया है. ओशर को पता है कि उसके पिता को डॉल्फिंस से प्यार था.
वो कहती हैं, “मुझे पता है कि उनके स्पर्म निकाले गए थे और मुझे इस दुनिया में लाने के लिए एक बेहतरीन मां की तलाश की गई थी.”
इरिट कहती हैं कि ओशर को दादा-दादी, अंकल और दोनों तरफ़ से कज़िंस भी मिले हैं.
वो कहती हैं कि ओशर को किसी आम बच्चे की तरह पाला-पोसा जा रहा है, ताकि ऐसा ना लगे कि वो एक जीवित-स्मृति बन गई है.
सवाल सहमति का
शामीर मेडिकल सेंटर में स्पर्म बैंक के डायरेक्टर डॉक्टर इटाई गट का कहना है कि बेटे के शुक्राणुओं को सुरक्षित रखने के उसके माता-पिता के लिए बड़े मायने हैं.
वो कहते हैं, “ये भविष्य में प्रजनन के विकल्प को सुरक्षित रखने का आख़िरी मौका होता है.”
वो बोले- कल्चर के हिसाब से इसमें बड़ा उल्लेखनीय बदलाव आया है, समाज में इसकी प्रक्रिया के प्रति स्वीकृति बढ़ी है. लेकिन मौजूदा नियमों ने सिंगल आदमी के मामले में टकराव की स्थिति पैदा कर दी है.
डॉक्टर गट का कहना है कि कई बार इसके लिए सहमति का स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं होता. इससे उन परिवारों की तकलीफ़ और भी बढ़ जाती है, जिन्होंने अपने बेटे के शुक्राणुओं को सुरक्षित तो रखवा लिया है, लेकिन बच्चे पैदा करने के लिए उनका इस्तेमाल नहीं कर सकते हैं.
डॉक्टर गट कहते हैं, “हम प्रजनन के बारे में बात कर रहे हैं, किसी लड़के या लड़की को इस दुनिया में ला रहे हैं....हम जानते हैं कि पिता के बिना वो अनाथ रहेगा.”
वो कहते हैं कि ज़्यादातर मामलों में मृतक व्यक्ति को उसके स्पर्म से होने वाले वाले बच्चे की मां के बारे में पता नहीं होता है. बच्चे के शिक्षा और भविष्य से जुड़े सारे फ़ैसले मां को लेने होते हैं.
डॉक्टर गट कहते हैं कि मृतक की ओर से स्पष्ट सहमति नहीं होने पर उसके स्पर्म सुरक्षित करने का वो पहले विरोध करते थे, लेकिन मौजूदा जंग में मारे गए जवानों के माता-पिता से मिलने के बाद उनका रुख़ थोड़ा बदल गया है.
वो कहते हैं, “मैंने इस बात को समझा कि ये उनके लिए कितना सार्थक है, कई बार उन्हें इससे बड़ी तसल्ली मिलती है.”
अलग-अलग राय
तेल अवीव में यहूदी मूल्यों की पैरवी करने वाले एक जाने-माने रब्बी युवाल शेर्लो का भी कहना है कि मृतक की मंज़ूरी एक महत्वपूर्ण पहलू है.
वो दो महत्वपूर्ण यहूदी सिंद्धातों का भी उल्लेख करते हैं, जिसमें किसी व्यक्ति की विरासत को जारी रखना और पूरे शव को दफ़नाना शामिल है.
कुछ रब्बी ऐसे भी हैं जो मानते हैं कि परिवार को आगे बढ़ाना ज़रूरी है, इसलिए मृतक के शव से कोशिकाओं को निकालने में कोई हर्ज़ नहीं है. लेकिन कुछ रब्बी ऐसे भी हैं जो इस पूरी प्रक्रिया के ही ख़िलाफ़ हैं.
इस मामले में मौजूदा नियम साल 2003 में एटॉर्नी जनरल से प्रकाशित गाइडलाइंस में दिए गए हैं, लेकिन उन्हें क़ानूनन मज़बूती हासिल नहीं है.
इसराइली सांसदों ने इस मामले में अधिक स्पष्ट और व्यापक नियमों के साथ एक बिल का ड्राफ्ट बनाने की कोशिश की थी, लेकिन उनकी कोशिशें आगे नहीं बढ़ पाईं.
इस प्रक्रिया को क़रीब से जानने-समझने वाले लोगों ने बीबीसी को बताया कि मृतक की सहमति को लेकर मतभेद रहे हैं. इस बारे में भी मतभेद रहे हैं कि इस प्रक्रिया से जन्मे बच्चे को वो लाभ मिलेंगे या नहीं, जो सर्विस के दौरान मारे गए बाकी सैनिकों के बच्चों को मिलते हैं.
इसराइली मीडिया में इस बारे में भी ख़बरें आई हैं कि मारे गए सैनिक की विधवा और उसके माता-पिता में बच्चे की ज़रूरत को लेकर मतभेद रहे हैं.
इस बारे में मतभेद रहे हैं कि मृतक बेटे के स्पर्म पर उसके माता-पिता का कितना अधिकार होना चाहिए, ख़ासतौर पर तब, जब बेटे की विधवा अपने पति के स्पर्म का इस्तेमाल बच्चे के लिए नहीं करना चाहती हो.
जो माता-पिता अपने दिवंगत बेटे के स्पर्म को सुरक्षित करवा चुके हैं, उन्हें चिंता है कि क़ानून पर सहमति बन भी गई, तो भी इससे केवल सहमति का मुद्दा हल होगा. इससे उन्हें कोर्ट में लंबी क़ानूनी लड़ाई से छुटकारा नहीं मिलेगा.
लेकिन रीफ़ के पिता अवी अपने इरादे पर अडिग हैं. अवी कहते हैं कि रीफ़ के बच्चे का जन्म होने तक वो चैन से नहीं बैठेंगे.