विदेशी सहायता के मामले में क्या अमेरिका की जगह ले पाएगा चीन

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- Author, शॉन युआन
- पदनाम, बीबीसी वर्ल्ड सर्विस, ग्लोबल चीन यूनिट
अमेरिकी विदेशी सहायता के अचानक ख़त्म करने से दुनिया भर की चिंताएं बढ़ गई हैं. सब एक ही सवाल पूछ रहे हैं कि इस कमी को कौन पूरा करेगा.
अमेरिकी सरकार अपनी विदेशी सहायता में कटौती कर रही है, जिसे वह लंबे समय से चलाती आ रही है. इस कारण, राजनीति और सहायता के क्षेत्र में काम करने वाले लोग सोच रहे हैं कि क्या चीन इस दिशा में अपने कदम रखेगा?
चीन ने पहले ही कंबोडिया की मदद करने पर ध्यान केंद्रित कर लिया था. कंबोडिया एक ऐसा देश है जहां पर पिछले कई सालों से अंतरराष्ट्रीय सहायता का इस्तेमाल पिछले युद्धों से बची हुई बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए किया जाता रहा है. इन बारूदी सुरंगों के कारण यहां के नागरिक मारे जा रहे हैं और घायल हो रहे हैं.
ट्रंप प्रशासन के विदेशी सहायता बंद करने के एक हफ्ते बाद, कंबोडिया में बारूदी सुरंगों को हटाने के लिए ज़िम्मेदार ग्रुप कंबोडियन माइन एक्शन सेंटर (सीएमएसी) ने कहा कि चीन ने उन्हें 44 लाख डॉलर देने का वादा किया है. ये रकम बारूदी सुरंगों को साफ करने के एक साल के काम के लिए दी जाएगी .

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यह स्थिति दिखाती है कि चीन अमेरिका के अचानक पीछे हटने के फ़ैसले का फ़ायदा उठाने का मौका देख रहा है.
मदद की पेशकश करके, चीन अपना प्रभाव बढ़ा सकता है और अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, एशिया और अन्य देशों के साथ अपने संबंधों को मजबूत बना सकता है.
सीएमएसी के अध्यक्ष, हेंग रेटाना ने बताया कि अमेरिका अपनी फंडिंग फिर से शुरू करेगा. जबकि सीएमएसी का कहना है, "अमेरिकी से मिलने वाली विदेशी मदद से जुड़ी नीतियों की समीक्षा होगी.''
हालांकि कंबोडिया में चीन की तात्कालिक प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि इसका मतलब यह नहीं है कि चीन अमेरिका के सभी विदेशी सहायता नीतियों को अपने हाथ में लेने की योजना बना रहा है.
फिर भी चीन पश्चिम के पतन का काफी समय से इंतजार कर रहा है. वहीं डोनाल्ड ट्रंप का प्रमुख विदेशी कार्यक्रमों में से एक में कटौती करने का फ़ैसला वास्तव में चीन की मदद ही कर रहा है.
अमेरिका से अलग है चीन का सहायता मॉडल?

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चीन, वैश्विक विकास में एक जाना-पहचाना नाम है.
वर्जीनिया में विलियम एंड मैरी कॉलेज की एक रिसर्च लैब एडडेटा के मुताबिक, चीन ने 2000 से 2021 तक वैश्विक विकास पर 1.34 ट्रिलियन डॉलर ख़र्च किए.
इसकी तुलना में अमेरिका ने 2001 से 2023 तक 1.24 ट्रिलियन डॉलर खर्च किए. यह चीन को दुनिया भर में विकास पर सबसे ज़्यादा ख़र्च करने वाला देश बनाता है.
2013 में बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) शुरू करने के बाद चीन का सहायता पर खर्च बहुत बढ़ा.
यह राष्ट्रपति शी जिनपिंग की एक प्रमुख विदेश नीति योजना है, जिसका मकसद बुनियादी ढांचे और विकास परियोजनाओं में निवेश करके चीन को अन्य देशों से जोड़ना है.
2018 में, चीन ने आधिकारिक तौर पर चाइना इंटरनेशनल डेवलपमेंट कोऑपरेशन एजेंसी (सीआईडीसीए) बनाकर अपने सहायता प्रयासों की शुरुआत की.
यह अमेरिका के यूएसएड का चीनी वर्ज़न है, जो विदेशी सहायता का प्रबंधन करने में मदद करता है.
हालांकि चीन का सहायता मॉडल अमेरिका से काफी अलग है.
एड डेटा के मुताबिक़ 2012 से 2021 तक, अमेरिका की लगभग 80 प्रतिशत सहायता ग्रांट के रूप में दी गई, जिसका मतलब यह है कि देशों को इसे वापस नहीं चुकाना पड़ा.
दूसरी तरफ़, चीन की सहायता का केवल 3 प्रतिशत ही ग्रांट के रूप में था. चीन ज़्यादातर लोन या एक्सपोर्ट लोन देता है, इससे चीन विकासशील देशों को सबसे बड़ा लोन देने वाले देश बन गया है.

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अमेरिका ने स्वास्थ्य और मानवीय राहत पर बहुत ज़्यादा ध्यान केंद्रित किया है, वहीं इसके विपरीत चीन ने बड़े पैमाने पर इंफ्रास्ट्रक्चर, एनर्जी और माइनिंग प्रोजेक्ट्स में निवेश को प्राथमिकता दी है.
बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) इस नज़रिए का एक बेहतरीन उदाहरण है. जो सीधे पैसे देने की जगह, इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण में निवेश करके देशों की अर्थव्यवस्थाओं को बढ़ाने में मदद करता है.
चीन इस नज़रिए को साउथ ग्लोबल को किया जाने वाला सहयोग कहता है, जिसका उद्देश्य यहां के देशों के बीच संसाधनों और ज्ञान को साझा करना है. चीन अपने सहायता मॉडल में खुद को पश्चिम से अलग रखता है और पश्चिम पर अन्य देशों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करने के लिए सहायता का इस्तेमाल करने का आरोप लगाता है.
हालांकि, आलोचकों का तर्क है कि चीन की सहायता अक्सर मानवाधिकार मुद्दों की अनदेखी करती है, जबकि अमेरिका किसी देश की सहायता का फ़ैसला लेते समय किसी देश के मानवाधिकार रिकॉर्ड को एक महत्वपूर्ण कारण मानता है.
उदाहरण के लिए, यूक्रेन पर आक्रमण के कारण रूस को पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों से दंडित किया जा रहा है, लेकिन फिर भी उसे चीन से विकास के लिए बहुत सारा पैसा मिलता है.
इसी तरह, चीन ने श्रीलंका में अपना निवेश करना जारी रखा, तब भी जब अमेरिका ने देश के हिंसक गृहयुद्ध के दौरान सहायता देना बंद कर दिया था.
क्या चीन अमेरिका की जगह लेने के लिए तैयार है?

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कई विशेषज्ञों का मानना है कि चीन यूएसएआईडी की भूमिका को पूरी तरह से नहीं बदल पाएगा.
एडडेटा में पॉलिसी एनालिसिस की डायरेक्टर सामंथा कस्टर ने कहा, "चीन, उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करके पश्चिमी देशों की जगह नहीं ले पाएगा. इस मामले में चीन और पश्चिमी सरकारों के विचार और दृष्टिकोण बहुत अलग-अलग हैं."
इसके अलावा एक बड़ी चुनौती लॉजिस्टिक्स है. अमेरिका ने सहायता देने के लिए एक बड़ा नेटवर्क बनाने में दशकों बिताए. एनजीओ, सरकारों और दुनिया भर के स्थानीय समुदायों के साथ काम किया.
चीन के पास इसी इंफ्रस्ट्रक्चर की कमी है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट के डॉ. जिंगदोंग युआन ने कहा, "इस नेटवर्क को बनाने में कई साल या दशकों का समय लगता है."
एक और चुनौती है, वो है पैसा. 2016 में, चीन ने अपनी मज़बूत अर्थव्यवस्था की बदौलत सहायता पर काफ़ी खर्च किया, जो 125 बिलियन डॉलर तक पहुंच गया.
हालांकि तब से चीन के सहायता खर्च में गिरावट आई है, जो 2021 में 2008 के स्तर पर वापस आ गई है. आंशिक रूप से इसका कारण चीन की अर्थव्यवस्था में आई मंदी है.
घरेलू आर्थिक संकट के कारण, चीन को अपने लोगों को यह समझाने में कठिनाई हो सकती है कि जब चीन में बहुत से लोग मुश्किल दौर से गुज़र रहे हैं, तो उसे दूसरे देशों की मदद पर ज़्यादा ख़र्च क्यों करना चाहिए.

जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की प्रोफ़ेसर डेबोरा ब्रॉटिगम ने कहा, "इस समय इस तरह के खर्च के लिए कोई घरेलू दबाव नहीं है."
वैश्विक सहायता में चीन और अमेरिका की भागीदारी कोई आसान स्थिति नहीं है, जहां एक के पीछे हटने पर दूसरा तुरंत अपना समर्थन बढ़ा देता है.
वास्तव में, हाल की घटनाओं से पता चलता है कि चीन शायद निकट भविष्य में अपनी मानवीय सहायता में बहुत अधिक वृद्धि नहीं करने जा रहा है.
2023 में जब यूएसएआईडी ने भ्रष्टाचार की चिंताओं के कारण इथियोपिया को खाद्य सहायता देना बंद कर दिया था, तब चीन ने इथियोपिया की मदद करने के लिए अपनी खाद्य सहायता में बढ़ोतरी नहीं की थी. भले ही इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के माध्यम से इथियोपिया के साथ उसके मजबूत संबंध हैं.
लाइडेन यूनिवर्सिटी के एसोसिएट प्रोफ़ेसर साल्वाडोर सैंटिनो रिगिल्म ने कहा, "चीन को कदम उठाने के कई मौके मिले हैं. लेकिन यह ज़्यादातर बयानबाजी ही रही है. जब बात ज़मीन पर होने वाले प्रोजेक्ट की आती है, तब चीन ने वास्तव में कभी भी कोई बड़ा कदम नहीं उठाया है."
चीन की रणनीति क्या है?

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भले ही चीन यूएसएआईडी से मानवीय सहायता की जगह को नहीं भर सकता है, फिर भी वह दीर्घकालिक रणनीतियों की मदद से दुनिया भर में अपने असर को लगातार बढ़ा रहा है.
यूएसएआईडी ने चीन के बढ़ते प्रभाव को पहचाना था और चीन के प्रभाव का मुकाबला करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए एक विशेष टीम बनाई थी.
चीन के मामलों पर यूएसएआईडी के पूर्व वरिष्ठ सलाहकार फ्रांसिस्को बेनकोस्मे ने चेतावनी दी कि सहायता बंद करने के दीर्घकालिक प्रभाव पड़ सकते हैं.
उन्होंने कहा कि इससे पूरी व्यवस्था बाधित हो गई है और चीन ने पहले ही यूएसएआईडी के नेपाल और कंबोडिया जैसे पार्टनर के साथ संबंध बनाना शुरू कर दिया है.
उन्होंने कहा, "यह कोई लाइट स्विच नहीं है, जिसे आप चालू और बंद कर सकते हैं".
उनकी चिंताएं पूरे अमेरिका में महसूस की जा रही हैं. विशेषज्ञों का कहना है कि दुनिया में बहुत से लोग जिस महत्वपूर्ण सहायता पर निर्भर हैं, उसे अचानक निलंबित करना, चीन की मदद कर रहा है.
यह चीन को अपने इस कथन को मजबूत करने का मौका देता है कि चीन कोई ऐसा-वैसा पार्टनर नहीं है, बल्कि वह दुनिया का पसंदीदा पार्टनर है.

एडडेटा की सामंथा कस्टर ने कहा, "चीन ने कुछ न करके इसका फायदा पहले ही उठा लिया है. कुछ न करके चीन अपनी सकारात्मक छवि बनाने में कामयाब रहा है, जिसका निर्माण अमेरिका की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करके हुआ है."
पिछले 20 सालों में, इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण में चीन के बड़े निवेश ने ग्लोबल साउथ के कई देशों का दिल जीता है. चीन ने ख़ुद को एक ऐसे पार्टनर के रूप में पेश किया है, जो किसी पार्टनर देश के फ़ैसले में हस्तक्षेप नहीं करता. इससे चीन ने कई देशों में अपने विकास मॉडल को सफलतापूर्वक बेचा है.
चीन ने अफ्रीका में स्टेडियमों और लैटिन अमेरिका में बड़े बंदरगाहों का निर्माण तेजी से करके ख़ुद को बड़े डेवलपमेंट प्रोजेक्ट्स के लिए एक अहम पार्टनर बनाने की कोशिश की है.
चीन देशों को वित्तीय मदद देने के लिए एक महत्वपूर्ण शर्त यह रखता है कि देशों को चीन की "एक चीन" नीति का समर्थन करना होगा, जिसका अर्थ है ताइवान पर चीन के दावे को मान्यता देना.
हाल ही में किए गए एक सर्वे के मुताबिक, 70 देशों ने चीन की इस नीति का समर्थन किया है. इनमें से ज़्यादातर देश ग्लोबल साउथ में आते हैं.
विशेषज्ञों का मानना है कि चीन के वित्तीय समर्थन ने इन देशों के गठबंधनों को बदलने में भूमिका निभाई है, जिससे वे अपना समर्थन ताइवान से हटाकर चीन की ओर कर रहे हैं.
प्रोफ़ेसर ब्रॉटिगम ने कहा, "चीनी नेता लंबे समय से जिस बहुध्रुवीय दुनिया की चाहत रखते हैं, वह अब हकीकत बन रही है और ट्रंप प्रशासन इस प्रक्रिया को और तेज कर रहा है."
यूएसएआईडी के निलंबन के बाद चीन को दुनिया की सहायता करने वाले देश के रूप में अमेरिका की जगह लेने की कोशिश पर गंभीरता से सोचने में कई साल लग सकते हैं.
हालांकि, इस बीच, चीन की स्थिर और दीर्घकालिक रणनीति उसे कुछ फायदा उठाने में मदद कर रही है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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