पुतिन पर ट्रंप की नरमी के पीछे का वो कारण जिसकी हो रही है ख़ूब चर्चा

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- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
रिचर्ड निक्सन 1969 से 1974 तक अमेरिका के राष्ट्रपति थे. निक्सन के कार्यकाल को शीत युद्ध की मानसिकता से निकल कम्युनिस्ट शासन वाले देशों से संबंध ठीक करने के रूप में भी देखा जाता है.
रिचर्ड निक्सन ने हेनरी किसिंजर को विदेश मंत्री बनाया था. किसिंजर चीन से संबंध सामान्य करने के हिमायती थे. तब किसिंजर को लगता था कि चीन से संबंध सामान्य कर सोवियत यूनियन और चीन के बीच दरार का फ़ायदा उठाना चाहिए.
यह वही समय था, जब चीन और सोवियत संघ में सीमा पर तनाव चल रहा था. दोनों देशों के सैनिक आपस में भिड़ रहे थे. सोवियत यूनियन के बिखर जाने के बाद भी चीन और रूस के बीच 4300 किलोमीटर लंबी सीमा लगती है. यह लंबाई लगभग यूरोप की लंबाई के बराबर है.
रिचर्ड निक्सन अमेरिका के पहले राष्ट्रपति थे, जिन्होंने 1972 में 21 से 28 फ़रवरी तक चीन का दौरा किया था. इसी दौरे में रिचर्ड निक्सन ने माना था कि ताइवान चीन का हिस्सा है.
अमेरिका ने मान लिया था कि ताइवान कोई स्वतंत्र देश नहीं है. लेकिन चीन इतने भर से तैयार नहीं था. माओ ने निक्सन से कहा था कि जब तक अमेरिका ताइवान से राजनयिक संबंध ख़त्म नहीं कर लेता है, तब तक चीन अमेरिका से संबंध सामान्य नहीं करेगा. रिचर्ड निक्सन के दौरे की बुनियाद पर ही 1979 में अमेरिका और चीन के बीच राजनयिक संबंध कायम हुआ.
दिलचस्प है कि निक्सन ने चीन के दौरे के तीन महीने बाद 22 मई 1972 को सोवियत संघ का भी दौरा किया था. इसी दौरे में निक्सन ने सोवियत संघ के साथ स्ट्रैटिजिक आर्म्स लिमिटेशन ट्रीटी पर हस्ताक्षर किए थे. इस समझौते को दोनों देशों के बीच हथियारों की होड़ रोकने में अहम माना जाता है.

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रिवर्स किसिंजर
निक्सन के दौर में सोवियत यूनियन और चीन के बीच दरार को मौक़े के रूप में देखा जा रहा था और अब रूस-चीन की दोस्ती इतनी मज़बूत हो गई है कि ट्रंप इसे तोड़कर अमेरिका के लिए मौक़े के रूप में देख रहे हैं.
निक्सन और ट्रंप में कई समानताएं हैं. रिचर्ड निक्सन भी रिपब्लिकन पार्टी से थे और ट्रंप भी इसी पार्टी से हैं. निक्सन भी हार्डलाइनर दक्षिणपंथी थे और ट्रंप भी ऐसे ही हैं. निक्सन भी रूस और चीन के बीच दरार का फ़ायदा उठाना चाहते थे और ट्रंप भी यही करने की कोशिश कर रहे हैं.
घोर कम्युनिस्ट विरोधी होने के बावजूद निक्सन ने पीपल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता दी थी. ट्रंप अभी रूस के साथ जैसी नीति अपना रहे हैं, उसे 'रिवर्स किसिंजर' कहा जा रहा है.
हेनरी किसिंजर ने ट्रंप को पहले कार्यकाल में सलाह दी थी कि चीन को अलग-थलग करने के लिए रूस से संबंध सुधारना चाहिए. कहा जाता है कि ट्रंप अपने पहले कार्यकाल में रूस के साथ ऐसा नहीं कर पाए थे क्योंकि डेमोक्रेटिक पार्टी ने ट्रंप को पुतिन की कठपुतली कहना शुरू कर दिया था.
डोनाल्ड ट्रंप ने पिछले साल अक्तूबर में टकर कार्लसन को दिए इंटरव्यू में कहा था कि एक चीज़ जो आप कभी नहीं चाहेंगे कि हो, वो है रूस और चीन का एक साथ आना.
ट्रंप ने कहा था, ''मैं दोनों को अलग करने जा रहा हूँ और मुझे लगता है कि मैं ये कर सकता हूँ. यह हमारी मूर्खता है कि हमने चीन और रूस को एक साथ कर दिया.''
टकर कार्लसन अमेरिका के कंजर्वेटिव राजनीतिक टिप्पणीकार हैं और उन्होंने यह इंटरव्यू राष्ट्रपति चुनाव के कैंपेन के दौरान किया था. अपने कैंपेन में ट्रंप ने यह भी कहा था कि राष्ट्रपति बनते ही वह यूक्रेन-रूस जंग को 24 घंटे में ख़त्म कर देंगे. साथ में यह भी कहा था कि चीन के मामले में वह बाइडन की तुलना में ज़्यादा सख़्त होंगे.

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ट्रंप की योजना क्या है?
हालांकि ट्रंप ने वो योजना नहीं बताई थी, जिसके तहत वह चीन और रूस को अलग करेंगे. लेकिन अब जो चीज़ें सामने आ रही हैं, उनसे संकेत मिल रहा है कि ट्रंप अमेरिका और रूस के बीच तनाव इसी लक्ष्य से कम कर रहे हैं. ज़ेलेंस्की से सख़्ती और पुतिन से नरमी की रणनीति को इसी लक्ष्य के आईने में देखा जा रहा है.
ट्रंप की टीम में ऐसा सोचने वाले कई लोग हैं, जिन्हें लगता है कि अब पूरा ध्यान यूक्रेन और मध्य-पूर्व के बदले चीन पर लगाना चाहिए. ट्रंप ने माइकल वाल्ट्ज को राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार बनाया है.
वाल्ट्ज चीन को लेकर काफ़ी आक्रामक रहते हैं. वाल्ट्ज ने पिछले साल दो नवंबर को अमेरिका के राजनीतिक विज्ञानी मैथ्यु कोरेइंग के साथ द इकनॉमिस्ट में एक लेख लिखा था. इस लेख में इन्होंने कहा था, ''ट्रंप को मध्य-पूर्व और यूक्रेन में जंग जल्दी ख़त्म कर पूरा ध्यान चीन पर लगाना चाहिए. इन दोनों जंगों में अमेरिका को अपना संसाधन बर्बाद नहीं करना चाहिए.''
यूक्रेन और रूस की जंग ख़त्म कराने के लिए ट्रंप की योजना से यूरोप परेशान है तो दूसरी तरफ़ चीन की चुप्पी है. चीन ने पूरे मामले से दूरी बनाकर रखी है और कोई भी आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है. हमास और इसराइल की जंग में चीन शांति प्रक्रिया को अंजाम तक पहुँचाने के लिए दिलचस्पी दिखा रहा था लेकिन यूक्रेन और रूस के मामले में चुप है.
चीन और रूस के बीच संबंधों में गर्मजोशी कोई छुपी बात नहीं है. यूक्रेन पर हमले के कुछ हफ़्ते पहले रूस और चीन ने अपने संबंधों को सीमाओं से परे बताया था.
युद्ध के दौरान जब रूस पश्चिम के कड़े प्रतिबंधों का सामना कर रहा था तो चीन से पुतिन को मदद मिलती रही. लेकिन ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद अमेरिका ने यूक्रेन के मामले में अपनी नीति में जो यू-टर्न लिया है, उसे चीन को असहज करने वाला बताया जा रहा है. यूक्रेन-रूस जंग में चीन, ईरान और उत्तर कोरिया की क़रीबी बढ़ी है. ट्रंप को लगता है कि अमेरिका की ग़लत नीतियों के कारण ऐसा हुआ है.

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क्या पुतिन अमेरिका पर भरोसा करेंगे?
डॉ राजन कुमार दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में रूसी और मध्य एशिया अध्ययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर हैं. डॉ राजन कुमार कहते हैं, ''रूस के मामले में ट्रंप की नरमी से चीन ज़रूर असहज है, लेकिन मुझे नहीं लगता है कि चीन और रूस की दोस्ती को ट्रंप तोड़ पाएंगे. ट्रंप के बयान भी कई बार बहुत कन्फ्यूजिंग होते हैं. जैसे ट्रंप का ताइवान को लेकर जो रुख़ है, वह तो पूरी तरह से चीन के हक़ में है. ऐसे में चीन ट्रंप से क्यों परेशान होगा?''
अमेरिका को लगता है कि चीन, ईरान और उत्तर कोरिया में एक तरह की सरकार हैं क्योंकि यहाँ चुनाव नहीं होते हैं. ऐसे में इनका गठजोड़ किसी भी लिहाज़ से अमेरिका के लिए ठीक नहीं है.
अमेरिकी अख़बार वाल स्ट्रीट जर्नल से यूक्रेन में ट्रंप के विशेष राजदूत रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जर्नल कीथ केलॉग ने कहा, ''इसे आपको वैश्विक युद्ध के रूप में देखना चाहिए. हम जो अभी सामना कर रहे हैं, उसे चार साल पहले सामना नहीं कर रहे थे. अभी ये चारों देश एकजुट हो गए हैं और इनकी अर्थव्यवस्था के साथ सेना का सीधा संबंध है.''
लेकिन रूस को अपने पाले में करने के लिए यूक्रेन को अमेरिका अकेला छोड़ देता है तो रूसी आक्रामकता को एक तरह से स्वीकार्यता मिल जाएगी. ऐसे में चीन इसे एक संकेत के रूप में लेगा कि ताइवान के मामले में वो भी आक्रामक हो सकता है और अमेरिका कुछ नहीं करेगा.
डॉ राजन कुमार कहते हैं कि रूस और चीन की साझेदारी स्थायी है जबकि अमेरिका की नीति हर चार साल में बदलती रहती है. अगर पुतिन ट्रंप पर भरोसा कर भी लेते हैं तो चार साल बाद क्या होगा? चार साल बाद अमेरिका का राष्ट्रपति कोई और होगा. अगर रिपब्लिकन पार्टी के बदले डेमोक्रेट्स की जीत होती है तो रूस को लेकर पूरी नीति बदल सकती है.

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यूक्रेन को अकेले छोड़ना
कहा जा रहा है कि मामला केवल चीन और रूस की दोस्ती तुड़वाने का नहीं है. ट्रंप रूस-यूक्रेन जंग ख़त्म करवाकर रूस से कारोबार को फिर से बहाल करना चाहते हैं. सऊदी अरब में रूस और अमेरिका के बीच जो बात हुई, उसमें रूसी प्रतिनिधिमंडल के हिस्सा किरिल दमित्रिव भी थे. दमित्रिव ने कहा था कि 2022 के बाद से अमेरिकी कंपनियों को रूसी मार्केट से बाहर होने के कारण 300 अरब डॉलर का नुकसान हुआ था.
यहां तक कि 2024 में सीनेट में एक सुनवाई के दौरान मार्को रुबियो ने कहा था कि अमेरिका को यूक्रेन में इसलिए जंग नहीं ख़त्म करानी चाहिए कि हज़ारों लोगों की जान गई है बल्कि इसलिए करानी चाहिए कि इससे चीन मज़बूत हो रहा है.
रुबियो ने कहा था, ''यूक्रेन युद्ध के कारण चीन को फ़ायदा हो रहा है. अमेरिका को जो पैसा और समय चीन पर ख़र्च करना चाहिए, वो समय और पैसा यूक्रेन पर खर्च करना पड़ रहा है.''
1979 के बाद चीन ने कोई युद्ध नहीं किया है. चीन की विदेश नीति किसी भी देश के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना है, चाहे वहाँ लोकतंत्र हो या राजतंत्र.
ट्रंप को भी अब यह नीति रास आ रही है. ट्रंप कारोबार चाहते हैं न कि मानवाधिकार और लोकतंत्र के लिए व्यापार ख़त्म कर लें. ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल में अमेरिका को किसी नई जंग में शामिल नहीं किया था और दूसरे कार्यकाल में अमेरिका को यूक्रेन की जंग से निकाल रहे हैं. लेकिन अमेरिका जिस तरह से यूक्रेन की जंग से निकल रहा है, उससे कई चीज़ें पहले की तरह नहीं रहेंगी.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित












