ट्रंप के टैरिफ़ वॉर ने बोए अनिश्चितता के बीज, चीन के शी जिनपिंग को हो सकता है ये फ़ायदा

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- Author, लॉरा बिकर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, बीजिंग से
अमेरिका मे अपने सामान के आयात पर 10 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ से अगर चीन ग़ुस्सा भी है तो वो इसे ज़ाहिर नहीं होने दे रहा है.
कनाडा और मेक्सिको ने अमेरिकी टैरिफ़ के एलान के बाद जवाबी कार्रवाई का एलान किया था. कनाडाई पीएम जस्टिन ट्रूडो ने कहा कि उनका देश 'पीछे नहीं हटेगा'. उन्होंने भी अमेरिकी उत्पादों के आयात पर 25 फ़ीसदी अतिरिक्त टैरिफ़ लगाने का एलान किया था.
हालांकि, इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति मेक्सिको और कनाडा पर लगाए टैरिफ़ को फिलहाल 30 दिन के लिए टालने के लिए राज़ी हो गए हैं. दोनों देशों के साथ ट्रंप ने अलग-अलग समझौते की है. हालांकि, चीन पर टैरिफ़ मंगलवार से प्रभावी हो जाएगा.
अमेरिका की ओर से टैरिफ़ लगाने के बाद चीन ने जवाबी करते हुए अमेरिका आयातित सामानों पर 10 फ़ीसदी का टैरिफ़ लगा दिया है.

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चीन की जवाबी कार्रवाई

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चीन के टैरिफ़ से उसके यहां अमेरिका से आने वाले बड़े इंजनों वाली कारों, पिक ट्रक, एलएनजी, कच्चा तेल और खेती-बाड़ी की मशीनों के आयात पर असर पड़ेगा.
अमेरिका की ओर से चीन के ख़िलाफ़ टैरिफ लगाने की डेडलाइन मंगलवार को खत्म हो गई थी.
इसके बाद चीन के ख़िलाफ अमेरिका का दस फीसदी का टैरिफ़ लागू हो गया था. इसके तुरंत बाद चीन ने भी जवाबी टैरिफ़ का एलान कर दिया.
जवाबी टैरिफ़ की घोषणा करते हुए चीन के वित्त मंत्रालय ने ट्रंप प्रशासन पर अंतरराष्ट्रीय व्यापार के नियमों को तोड़ने का आरोप लगाया है.
चीन के वित्त मंत्रालय ने कहा है, "अमेरिका की ओर एकतरफ़ा टैरिफ़ लगाना विश्व व्यापार संगठन के नियमों का गंभीर उल्लंघन करता है. ये अमेरिका की अपनी समस्याओं का हल तो नहीं ही निकालता बल्कि ये चीन और अमेरिका के बीच सामान्य आर्थिक और कारोबारी सहयोग को भी कमज़ोर करता है."
चीन की घोषणा ने ये संकेत दिए हैं कि वह अमेरिका को जैसे का तैसा जवाब देने के मूड में है, जिससे कई विश्लेषक हैरान भी हैं.
हालांकि, अमेरिका की ओर से चीन से आयात किए जाने वाले हर सामान पर टैरिफ़ लगाया गया है लेकिन चीनी टैरिफ़ केवल कुछ अमेरिकी उत्पादों तक ही सीमित है.
टैरिफ़ के मुद्दे पर चीन ने क्यों साधी थी चुप्पी?

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साल 2018 में जब ट्रंप ने पहली बार चीनी आयात को निशाना बनाते हुए टैरिफ़ लगाने के दौर की शुरुआत की थी. उस समय चीन ने कहा था कि 'वह ट्रेड वॉर से डरता नहीं है.'
इस बार चीन अमेरिका से बातचीत करने और मिल-बैठ कर एक समझौते पर पहुंचने की बात कही. कुछ मीडिया रिपोर्टों में ये संकेत मिलते हैं कि ट्रंप और शी के बीच इसी सप्ताह फ़ोन पर बात हो सकती है.
इसका मतलब ये नहीं है कि ट्रंप को घोषणा परेशान नहीं करेगी. ऐसा होगा, खासकर इसलिए क्योंकि 10% टैरिफ़ उन शुल्कों में शामिल है, जो उन्होंने अपने पहले कार्यकाल में अरबों डॉलर के सामान पर लगाया था.
चीनी सरकार की चुप्पी की वजह ये भी है कि शायद वह पहले से सुस्त अर्थव्यवस्था की वजह से चिंतित अपने देश की जनता को और चिंता में नहीं डालना चाहती.
लेकिन चीन की अर्थव्यवस्था अब अमेरिका पर उतनी निर्भर नहीं है, जितनी पहले थी. चीन ने अफ़्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण पूर्व एशिया में अपने कारोबारी समझोतों को मज़बूत किया है. चीन अब 120 से अधिक देशों का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है.
कार्नगी चाइना के चोंग जा आयन कहते हैं कि ये 10 फ़ीसदी अधिक शुल्क शायद ट्रंप को वह फ़ायदा न दें, जो वह चाहते हैं.
उन्होंने कहा, "चीन ये सोच रहा होगा कि संभवतः वो ये 10 फ़ीसदी सह सकता है. मुझे लगता है कि इसलिए चीन शांत दिख रहा है. क्योंकि अगर कोई बड़ी बात नहीं है, तो ट्रंप प्रशासन के साथ लड़ाई मोल लेने का कोई कारण नहीं है, जब तक इससे चीन को असल में कोई फ़ायदा न हो रहा हो."
शी के लिए हर तरह से जीत ही जीत

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के पास ये रुख अपनाने का एक और कारण है. शायद वो इस पूरी स्थिति में अपने लिए कोई फ़ायदा देख रहे हैं.
दरअसल, ट्रंप राष्ट्रपति के तौर पर अपने कार्यकाल के पहले ही महीने में यूरोपीय संघ तक पर टैरिफ़ लगाने की धमकी दे चुके हैं. ट्रंप के इन क़दमों से शायद अमेरिका के दूसरे सहयोगी देशों में ये चिंता पैदा हो सकती है कि उनपर भी क्या ऐसा कोई फ़ैसला हो सकता है. ऐसा करके ट्रंप अपने ही आस-पास के देशों में विभाजन जैसी स्थिति को जन्म दे रहे हैं.
इसके उलट चीन अपने आप को एक शांत देश के तौर पर दिखाना चाहता है. जो स्थिर है और इसलिए संभवतः एक अच्छा कारोबारी साझेदार भी.
स्टिमसन सेंटर में चाइना प्रोग्राम के डायरेक्टर युन सुन का कहना है, "ट्रंप की अमेरिका-फ़र्स्ट पॉलिसी से चुनौतियां बढ़ेंगी और दुनिया के लगभग हर देश के लिए इससे ख़तरा पैदा होगा."
उनका कहना है, "अगर अमेरिका-चीन सामरिक प्रतिद्वंद्विता के परिप्रेक्ष्य में इसे देखा जाए तो अमेरिकी नेतृत्व और उसपर भरोसे के कमज़ोर होने का सीधा फ़ायदा चीन को होगा. हालांकि, ये द्विपक्षीय स्तर पर चीन को शायद ही फ़ायदा दे लेकिन चीन पक्का इस मौके का भरपूर फ़ायदा उठाने की कोशिश करेगा."
दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के नेता के तौर पर शी ने चीन को एक वैकल्पिक वैश्विक व्यवस्था का नेतृत्व देने की अपनी महत्वाकांक्षा को कभी नहीं छिपाया है.
कोविड महामारी के ख़त्म होने के बाद शी ने कई देशों का दौरा किया है. उन्होंने विश्व बैंक और पेरिस क्लाइमेट अकॉर्ड जैसे बड़े-बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठनों और समझौतों के प्रति समर्थन दिखाया है.
चीनी स्टेट मीडिया ने इसको ऐसे प्रस्तुत किया जैसे चीन अब दुनिया भर के देशों को अपना रहा है और अपने कूटनीतिक संबंधों को भी गहरा कर रहा है.
इससे पहले जब ट्रंप ने साल 2020 में विश्व स्वास्थ्य संगठन की फंडिंग रोकी थी, चीन ने उस वक्त डब्लूएचओ को अतिरिक्त फंड देने की बात कही थी. इस बार भी अमेरिका के डब्लूएचओ से हटने के बाद ये उम्मीदें बढ़ी हैं कि चीन एक बार फिर से अमेरिका की जगह लेगा.
यही उम्मीद सहायता राशि को अमेरिका की ओर से रोकने के बाद भी की जा रही है. इस रोक से कई ऐसे देशों और संगठनों में अफ़रा-तफ़री जैसा माहौल है, जो अमेरिकी फंडिंग पर लंबे समय से आश्रित रहे हैं. अमेरिका के कदमों से पैदा हुए खालीपन को शायद चीन आर्थिक सुस्ती के बावजूद भी भरना चाहेगा.
अपने दूसरे कार्यकाल के पहले ही दिन ट्रंप ने दुनिया भर के देशों को दिए जाने वाले सहयोग पर रोक लगा दी थी. अमेरिका मदद देने वाले देशों की सूची में सबसे अव्वल रहा है.
उनके इस फ़ैसले के बाद यूएस एड नाम की अमेरिकी एजेंसी द्वारा दिए जाने वाली सहायता थम गई थी. कुछ मामलों में ये मदद बहाल तो हुई है पर सहायता पहुँचाने वाली संस्थाएं कह रही हैं कि मौजूदा अफ़रा-तफ़री से एजेंसी के भविष्य पर ही सवालिया निशान लग गया है.
सोल विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर जॉन डेलुरी कहते हैं कि ट्रंप का 'सर्वप्रथम अमेरिका' वाला सिद्धांत, वैश्विक स्तर पर अमेरिका की लीडरशिप को कमज़ोर करेगा.
उन्होंने कहा, "उनके क़दमों से ग़रीब मुल्कों को ये संदेश गया है कि अमेरिका अंतरराष्ट्रीय पार्टनरशिप में यक़ीन नहीं रखता. इसके विपरित चीन के राष्ट्रपति शी लगातार ये संदेश दे रहे हैं कि वैश्वीकरण सबके फ़ायदे की बात है. अमेरिका के दुनिया की मदद से क़दम पीछे खींचने से परिदृश्य बदल रहा है."
ग्लोबल स्तर पर अपना रुतबा कायम करने के लिए चीन मौक़े की तलाश में था.
50 वर्षों से दुनिया में अमेरिका की अगुवाई वाला 'वर्ल्ड ऑर्डर' चल रहा है लेकिन ट्रंप के दूसरे कार्यकाल के अंत तक क्या होगा, इसपर अनिश्चितता बनी हुई है.
नए गठबंधन

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चोंग कहते हैं, "लेकिन अमेरिका के पीछे हटने से क्या चीन को फ़ायदा होगा? मैं इस बारे में यक़ीन से कुछ नहीं कह सकता."
"प्रशांत महासागर इलाके में अमेरिका के कई सहयोगियों के पास चीन के साथ मिलकर काम करने की वजहें हैं. लेकिन उनकी चिंताएं भी हैं. यही वजह है कि जापान, दक्षिणी कोरिया, फ़िलीपींस और ऑस्ट्रेलिया एक दूसरे के करीब आते जा रहे हैं. इसकी एक वजह चीन को लेकर चिंताएं भी हैं."
ऑस्ट्रेलियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफ़ेयर्स के मुताबिक़ ऑस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया त्रिपक्षीय संबंधों की ओर बढ़ रहे हैं.
ये तीनों देश और फ़िलीपींस दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती आक्रामकता से चिंतित हैं.
ये देश ताइवान और चीन के बीच संभावित जंग से भी फ़िक्रमंद हैं. ताइवान अरसे से अमेरिका-चीन संबंधों के बीच सबसे पेचीदा मुद्दा रहा है.
लेकिन ऐसे वक्त में जब ट्रंप ख़ुद कनाडा और ग्रीनलैंड पर कब्ज़े की बात कर रहे हैं, अमेरिका के लिए ताइवान में हस्तक्षेप करना मुश्किल होगा.
प्रशांत सागर इलाके में कई देशों ने अमेरिका के साथ सैन्य गठबंधन किए हैं ताकि वो चीन के साथ आर्थिक रिश्तों में संतुलन कायम कर सकें.
लेकिन अब चीन का डर और अमेरिकी नीतियों के प्रति अनिश्चितता के कारण ये देश एक नए एशियाई अलायंस की ओर बढ़ सकते हैं, जिसमें दुनिया की दोनों ही बड़ी ताक़तें शामिल नहीं होंगी.
तूफ़ान से पहले की शांति

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ट्रंप ने जब टैरिफ़ की घोषणा की तो चीन में लोग चीनी नववर्ष का जश्न मना रहे थे.
बीजिंग की सुनसान सड़कें लाल लालटेनों से चमक रही थीं. ये चीन का सबसे बड़ा त्योहार है और अधिकतर कामगार अपने गांवों और शहरों को लौट चुके हैं.
अब तक टैरिफ़ के बारे में मेक्सिको और कनाडा की तुलना में चीन का जवाब काफ़ी सधा-सा रहा है. चीन के वाणिज्य मंत्रालय ने कहा है कि वो इसके ख़िलाफ़ विश्व व्यापार संघ (डब्ल्यूटीओ) में कानूनी कार्यवाही शुरू करेगा.
लेकिन इससे अमेरिका को कोई ख़तरा नहीं होगा क्योंकि जब पिछली बार ट्रंप सत्ता में आए थे तो उन्होंने इस संस्था की विवाद सुलझाने की क्षमता को लगभग ख़त्म कर दिया था. उन्होंने जजों की नियुक्ति तक बंद करवा दी थी.
लेकिन नए साल की छुट्टियों के बाद चीनी अधिकारियों को टैरिफ़ के बारे में कुछ फ़ैसले करने होंगे.
फ़िलहाल तो चीन बिल्कुल शांत है. उसे उम्मीद है कि वो अमेरिका के साथ कोई न कोई डील कर लेगा ताकि दुनिया की दो सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के बीच संबंध पटरी से न उतर जाएं.
लेकिन कुछ लोगों का मानना है कि ये संभव नहीं है क्योंकि अमेरिका में सियासतदान चीन को देश की फ़ॉरेन पॉलिसी और इकोनॉमी के लिए सबसे बड़ा ख़तरा मानते हैं.
फ़ुडान यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर वु शिन्बो कहते हैं, "ट्रंप की लापरवाही अनिवार्य रूप से द्विपक्षीय संबंधों को हिलाकर रख देगी."
"ट्रंप की टीम में कई गरम विचार वाले लोग हैं. इसलिए लगता है कि आने वाले चार वर्षों में चीन के साथ द्विपक्षीय संबंधों में तनाव को टाला नहीं जा सकेगा.
एक बात तो निश्चित है कि चीन अमेरिका के साथ संबंधों के बारे में चिंतित है और उसे डर है कि ट्रेड वॉर उसकी धीमी पड़ती जा रही अर्थव्यवस्था की और नुकसान पहुँचा सकता है.
लेकिन चीन मौजूदा राजनीतिक अनिश्चितता का इस्तेमाल करके अंतरराष्ट्रीय समुदाय को अपने तरीके से और अपने प्रभाव क्षेत्र में लाने के अवसर भी तलाश रहा होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित
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