फिर से दिल्ली की ओर कूच क्यों कर रहे हैं किसान

किसान आंदोलन

इमेज स्रोत, EPA

    • Author, दीपक मंडल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

अपने एक साल के लंबे आंदोलन की बदौलत नरेंद्र मोदी सरकार से कृषि कानूनों को निरस्त करवाने में कामयाब रहे किसानों ने एक बार फिर अपनी मांगों के समर्थन में मैदान में उतरने की तैयारी कर ली है.

किसानों के दो बड़े संगठनों, संयुक्त संयुक्त किसान मोर्चा (गैर राजनैतिक) और किसान मज़दूर मोर्चा ने अपनी मांगों को लेकर 13 फरवरी को 'दिल्ली कूच' का नारा दिया है.

वहीं संयुक्त किसान मोर्चा ने 16 फरवरी को एक दिन का ग्रामीण भारत बंद करने का आह्वान किया है.

दो साल पहले दिल्ली के बॉर्डर पर धरने पर बैठे किसानों का आंदोलन इतना मुखर था कि नरेंद्र मोदी सरकार को कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) कानून -2020, कृषक (सशक्तीकरण व संरक्षण) कीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर करार कानून 2020 और आवश्यक वस्तुएं संशोधन अधिनियम 2020 को रद्द करना पड़ा था.

किसानों को डर था कि सरकार इन कानूनों के ज़रिये कुछ चुनिंदा फसलों पर मिलने वाले न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का नियम खत्म कर सकती है और खेती-किसानी के कॉरपोरेटीकरण को बढ़ावा दे सकती है. इसके बाद उन्हें बड़ी एग्री-कमोडिटी कंपनियों का मोहताज होना पड़ेगा.

इन कृषि कानूनों के रद्द होने के बाद किसानों ने भी अपना आंंदोलन वापस ले लिया था. उस दौरान सरकार ने उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी देने का वादा किया था. इसके साथ ही उनकी कुछ और मांगों को भी पूरा करने का वादा किया गया था.

किसान अब इन मांगों को मानने के लिए दबाव बनाने की तैयारी में हैं. 13 फरवरी का 'दिल्ली चलो' का नारा उनकी इसी रणनीति का हिस्सा है.

क्या है किसानों की मांग

किसान आंदोलन

संयुक्त किसान मोर्चा (अराजनैतिक) के नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल ने बीबीसी से कहा, "हमने अपनी मांगें मनवाने के लिए ‘दिल्ली चलो’ का नारा नहीं दिया है. हम सरकार से सिर्फ यही मांग कर रहे हैं कि दो साल किसानों का आंदोलन वापस लेने की अपील करते हुए सरकार ने जो वादे किए थे उन्हें वो पूरा करे.’’

डल्लेवाल ने कहा, "सरकार ने उस समय न्यूनतम समर्थन मूल्य को गारंटी का वादा किया था. इसके साथ ही उसने कहा था किसान आंदोलन के समय किसानों के ख़िलाफ़ जो मुकदमे किए गए थे वे वापस लिए जाएंगे. साथ ही लखीमपुर-खीरी की घटना में मारे गए लोगों को परिवारों को नौकरी और घायलों को दस-दस लाख रुपये दिए जाएंगे.’’

2021 में उत्तर प्रदेश के लखीमपुरी खीरी में सरकार के कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ आंदोलन कर रहे चार सिख किसानों को कथित तौर पर गृह राज्य मंत्री अजय मिश्रा टेनी की एसयूवी ने कुचल डाला था.

डल्लेवाल ने कहा कि सरकार ने कहा था कि किसानों को प्रदूषण कानून से मुक्त रखा जाएगा. सबसे बड़ा वादा ये किया गया था कि किसानों को स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक़ फसल के दाम दिए जाएंगे. लेकिन इनमें से कोई भी वादा पूरा नहीं किया गया.

स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों में कहा गया है कि किसानों को उनकी फसल की लागत का डेढ़ गुना मूल्य दिया जाए.

आंदोलन की टाइमिंग सोच-समझ कर तय की गई?

किसान आंदोलन

इमेज स्रोत, SAMEER SEHGAL/HINDUSTAN TIMES VIA GETTY IMAGES

छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

किसान आंदोलन पर नज़र रखने वालों का कहना है कि पिछला आंदोलन अचानक खत्म नहीं हुआ था. सरकार ने कुछ वादे किए थे. अब किसान उन वादों को पूरा करने का दबाव डाल रहे हैं.

किसान अधिकार कार्यकर्ता और पत्रकार मनदीप पूनिया कहते हैं, ''किसानों को लगता है कि चार महीनों के बाद चुनाव होने हैं. ये उन वादों को पूरा करने के लिए दबाव बनाने का सही समय है. एक तरह से ये एक रणनीतिक कदम माना जा सकता है.''

बीबीसी से बातचीत में उन्होंने कहा, ''मौजूदा एमएसपी फॉर्मूला से किसानों को उनकी फसलों का जो मूल्य दिया जा रहा है उसमें उनकी लागत भी नहीं निकलती. वो स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के मुताबिक़ एमएसपी मांग रहे हैं यानी लागत का लगभग डेढ़ गुना. सरकार सिर्फ इनपुट लागत के हिसाब से ये तय कर देती है. इसमें मज़दूरी तक को शामिल नहीं करती.''

जबकि डल्लेवाल ने कहा, '' हम सरकार को उनके वादे की याद दिला रहे हैं. चुनाव आ गए हैं और अगर नई सरकार आ गई तो वो कहेगी तो हमने तो कोई वादा नहीं किया था, इसलिए ये सही समय है कि सरकार को उनके किए गए वादे याद दिलाए जाएं.''

डल्लेवाल ने कहा कि ये विडंबना है कि जिन एम.एस. स्वामीनाथन को सरकार ने भारत रत्न देने का एलान किया है उन्हीं के नाम पर बनी कमेटी की रिपोर्ट को लागू नहीं कर रही है. उन्होंने खेती के कॉरपोरेटीकरण न करने की सिफारिश की थी लेकिन सरकार इसकी कोशिश में लगी हुई है.

किसानों की तैयारी और सरकार की 'किलेबंदी'

किसान आंदोलन

इमेज स्रोत, ANI

पंजाब और हरियाणा समेत कई राज्यों में किसान आंदोलन की तैयारियों में लगे हैं. घर-घर जाकर राशन इकट्ठा किया जा रहा है. ट्रैक्टर ट्रॉलियां तैयार की जा रही हैं.

ऐसा लग रहा है अगर सरकार और किसानों के बीच 12 फरवरी को होने वाली बातचीत नाकाम रहती है तो 13 फरवरी को बड़ी तादाद में दिल्ली की ओर कूच कर सकते हैं.

दूसरी ओर, सरकार किसानों का मार्च रोकने की तैयारी में लगी है. मीडिया में ऐसी तस्वीरें आ रही हैं कि जिनमें दिख रहा है कि पंजाब और हरियाणा के बीच बने शंभू बॉर्डर को सीमेंट की बैरिकेडिंग और कंटीली तारें कर सील किया जा रहा है.

प्रशासन ने हरियाणा में घग्गर नदी के ऊपर बने ब्रिज को भी बंद कर दिया है. जहां ये सूख गई है वहां जेसीबी से खुदाई की जा रही है ताकि किसान इसके बीच से ट्रैक्टर निकाल कर हरियाणा से दिल्ली की ओर न चल दें.

पिछली बार किसान आंदोलन के दौरान जब ब्रिज के ऊपर नाकेबंदी की गई थी तो किसान यहीं से ट्रैक्टर निकाल कर दिल्ली बॉर्डर पर पहुंच गए थे.

किसान आंदोलन

डल्लेवाल और पूनिया दोनों ने बताया कि किसानों पर आंदोलन में हिस्सा न लेने का दबाव बनाया जा रहा है. ऐसे वीडियो भी सामने आए हैं, जिनमें पुलिस की गाड़ियां गांवों में जाकर लोगों को चेतावनी देती दिख रही हैं. किसानों से कहा जा रहा है कि आंदोलन में हिस्सा लिया तो उन्हें गंभीर नतीजे भुगतने होंगे. हालांकि बीबीसी ऐसे वीडियो की पुष्टि नहीं करता.

डल्लेवाल ने बीबीसी को बताया, ''हरियाणा में पुलिस की गाड़ियों से ये ऐलान हो रहा है कि किसान आंदोलन का हिस्सा न बनें. घरों पर चेतावनी देते हुए पोस्टर चिपकाए जा रहे हैं. लोगों से उनके बैंक अकाउंट और ज़मीनों का रिकॉर्ड मांगा जा रहा है. पेट्रोल पंप मालिकों को कहा जा रहा है कि किसानों को डीज़ल न दिया जाए. किसान अगर ट्रैक्टर लेकर निकलेंगे तो उन्हें ज़ब्त कर लिया जाएगा. उनके पासपोर्ट ज़ब्त कर लिए जाएंगे.''

डल्लेवाल कहते हैं, ''प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कहते हैं कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और दूसरी तरफ लोकतांत्रिक तरीके से आंदोलन कर रहे किसानों को धमकाया जा रहा है. हम नई मांगों को लेकर नहीं आ रहे हैं. हम तो सरकार से उसके ही पुराने वादे को निभाने की मांग कर रहे हैं.''

बातचीत की कोशिश

सरकार की ओर से किसानों से बातचीत के लिए कृषि और किसान कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय की कमेटी बनाई गई है.

डल्लेवाल ने कहा कि 12 फरवरी को चंडीगढ़ में इन मंत्रियों की किसानों से बातचीत हो रही है लेकिन अगर ये नाकाम रही तो 13 फरवरी को किसान दिल्ली की ओर कूच करेंगे.

डल्लेवाल ने बताया कि 8 फरवरी को सरकार की ओर से इन मंत्रियों ने किसानों से पहले दौर की बातचीत की थी. 12 तारीख को दोबारा बातचीत होगी.

लेकिन किसान नेताओं ने कहा है कि बातचीत से पहले सरकार किसानों के ख़िलाफ़ सख्ती का माहौल बनाने से बाज़ आए ताकि किसानों के बीच शांति का माहौल बने.

उन्होंने कहा, ''जिस समय मौजूदा प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी गुजरात के सीएम थे उस समय वो उपभोक्ता मामलों के कमेटी के चेयरमैन भी थे. 2011-12 की इसी कमेटी की रिपोर्ट में किसानों के लिए जो सिफारिशें की गई थीं वही अब लागू नहीं हो रही हैं.''

डल्लेवाल कहते हैं कि 'जब सरकार के मंत्रियों ने किसानों से 8 फरवरी को पहली बार बात की तो कहा कि उनके साथ सरकार ने क्या वादा किया है ये उन्हें नहीं पता. ये तो हास्यास्पद है कि सरकार के मंत्रियों को ही सरकार के वादे के बारे में पता नहीं है.'

किसान आंदोलन

इमेज स्रोत, ANI

पिछली बार क्या थी मांगें?

  • किसानों को उनकी उपज के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) दिए जाने की नीति तो जारी रखा जाए. इसके लिए एक समिति का गठन किया जाए जिसमें संयुक्त किसान मोर्चे के प्रतिनिधि को भी शामिल किया जाए.
  • आंदोलन के दौरान जिन किसानों की मौत हुई है उनके परिवार को सरकार मुआवज़ा दे.
  • विरोध प्रदर्शन के दौरान राज्य या केंद्र की एजेंसियों के किसानों के ख़िलाफ़ दर्ज सभी मामले वापिस लिए जाएं.
  • पराली जलाने के मामले में किसानों को आपराधी नहीं ठहराया जाना चाहिए.

सरकार ने क्या दिया था आश्वासन?

  • सरकार ने कहा कि वो तीनों कृषि क़ानूनों को वापिस लेगी.
  • सरकार ने कहा कि किसान आंदोलन और पराली जलाने से जुड़े मामले अगर दर्ज किए गए हैं तो उन्हें वापस लिया जाएगा.
  • एमएसपी के एक नए ढांचे पर काम किया जाएगा जिसके लिए एक समिति बनाई जाएगी. इसमें राज्यों और केंद्र के अधिकारियों के अलावा कृषि विशेषज्ञों और किसानों के प्रतिनिधियों को शामिल किया जाएगा.
  • आंदोलन के दौरान मारे गए किसानों के परिजनों को पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश राज्य सरकारें पांच लाख प्रति परिवार मुआवज़ा देंगी. परिवार के एक व्यक्ति को नौकरी देने की बात पर भी सहमति हुई.
किसान आंदोलन

इमेज स्रोत, ANI

सरकार के आश्वासनों का क्या स्टेटस है

किसान संगठनों का कहना है कि सरकार ने उनसे जो वादे किए वो पूरे नहीं किए गए, इसलिए वो फिर से दिल्ली कूच कर रहे हैं.

किसानों की एक बड़ी मांग ये है कि सरकार डॉ स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार एमएसपी के लिए क़ानून बनाए.

इसके अलावा वो कर्ज़ माफ़ी और पहले हुए आंदोलन के दौरान जान गंवाने वाले किसानों के परिवारों को मुआवज़े और परिवार के एक सदस्य के रोज़गार की भी मांग कर रहे हैं.

कब-कब क्या-क्या हुआ?

  • 5 जून, 2020 को मोदी सरकार तीन कृषि बिल अध्यादेश के ज़रिए लेकर आई. इसी साल 14 सितंबर को केंद्र सरकार ने इन अध्यादेशों को संसद में पेश किया.
  • 17 सितंबर, 2020 को ये तीनों कृषि बिल लोकसभा से पारित हुए. तीन दिन बाद 20 सितंबर को विपक्ष के भारी विरोध के बाद राज्यसभा में भी ये पारित हो गए.
  • 27 सितंबर तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस पर मुहर लगाकर इसे क़ानून की शक्ल दे दी.
  • इस बीच किसानों का विरोध शुरू हुआ. नवंबर के आख़िरी सप्ताह में किसान संगठनों ने दिल्ली चलो का नारा दिया और दिल्ली की सीमाओं पर जुटने लगे. प्रशासन के साथ उनकी टक्कर हुई और उन्होंने सीमा के पास ही अपने डेरा डाल दिया.
  • इसके बाद सरकार और किसान नेताओं के बीच बातचीत शुरू हुई जो कई दौर तक जारी रही. कृषि क़ानूनों में संशोधन के सरकार के प्रस्ताव को किसानों ने खारिज कर दिया.
  • दिबंबर 2020 में ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा जिसने जनवरी 2021 में तीनों कृषि कानूनों को स्थगित कर दिया.
  • लेकिन मामला थमा नहीं. पंजाब विधानसभा में इसके ख़िलाफ़ प्रस्ताव पारित हुआ, वहीं केंद्र इसे लेकर विपक्षी दलों की बैठक हुई.
  • किसानों ने एक बार फिर विरोध प्रदर्शन के लिए कमर कसी, इसे लेकर हरियाणा और उत्तर प्रदेश में किसान संगठनों की बैठकें शुरू हुईं. इस बीच उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में विरोध प्रदर्शन के दौरान कुल आठ लोगों की मौत गाड़ी से कुचले जाने से हो गई.
  • 19 नवंबर 2021 को मोदी ने तीनों कृषि क़ानून वापिस लेने का ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा, "महीने के अंत में शुरू होने जा रहे संसद सत्र में इन तीनों कृषि क़ानूनों को रद्द करने की संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा किया जाएगा."
  • 2 दिसंबर को क़ानून मंत्रालय ने कृषि क़ानून निरस्तीकरण क़ानून, 2021 को अधिसूचित किया जिसके बाद किसानों ने अपना विरोध प्रदर्शन वापिस लिया और वापिस लौटने लगे. इसके बाद 9 फ़रवरी 2022 को सरकार ने तीनों कृषि क़ानूनों को वापिस ले लिया.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)