पाकिस्तान पर डोनाल्ड ट्रंप की नीति क्या भारत के लिए झटका है?

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26 अगस्त 2021 में जब अमेरिकी फौज अफ़ग़ानिस्तान से निकल रही थी तब काबुल एयरपोर्ट के बाहर एक आत्मघाती हमला हुआ था, जिसमें 13 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे और 100 से ज़्यादा अफ़ग़ान नागरिकों की जान गई थी.
अमेरिका का कहना है कि इस हमले के मास्टरमाइंड मोहम्मद शरीफ़ुल्लाह को पाकिस्तान की मदद से पकड़ लिया गया है.
शरीफुल्लाह की गिरफ़्तारी को लेकर ही मंगलवार को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान की सरकार को धन्यवाद कहा था.
अमेरिकी की ख़ुफ़िया एजेंसी सीआईए के निदेशक जॉन रैटक्लिफ ने बुधवार को फॉक्स बिज़नेस के साथ इंटरव्यू में कहा कि शरीफ़ुल्लाह मंगलवार की रात वॉशिंगटन डीसी आ गए हैं और अभी अमेरिकी हिरासत में हैं. अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार माइकल वॉल्ट्ज ने फॉक्स न्यूज़ से कहा कि शरीफ़ुल्लाह ने काबुल धमाके में अपना गुनाह स्वीकार कर लिया है.
सीबीएस न्यूज़ से अमेरिका के एक सीनियर रक्षा अधिकारी ने कहा कि शरीफ़ुल्लाह को 10 दिन पहले आईएसआई और सीआईए के साझा अभियान में पकड़ा गया था.
ट्रंप ने पाकिस्तान को जिस तरह से धन्यवाद कहा, उससे एक संदेश गया है कि पाकिस्तान आतंकवाद के ख़िलाफ़ वैश्विक लड़ाई में शामिल है और इसे हराने में मदद कर रहा है.
ट्रंप के इस धन्यवाद के बाद भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त रहे अब्दुल बासित ने एक्स पर लिखा, ''ट्रंप ने अमेरिकी संसद को संबोधित करते हुए एक अफ़ग़ान आतंकवादी को पकड़ने और अमेरिका को सौंपने के लिए पाकिस्तान की प्रशंसा की है. अमेरिका पर हमें यह दबाव बनाकर रखना चाहिए कि आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में पाकिस्तान के अहम योगदान को याद रखा जाए.''

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ट्रंप के 'धन्यवाद' के मायने
पाकिस्तान के मीडिया में ट्रंप के शुक्रिया की काफ़ी चर्चा हो रही है. समा टीवी पर चर्चा के दौरान वरिष्ठ पत्रकार नदीम मलिक ने कहा, ''अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से दोनों देशों के बीच एक अविश्वास का माहौल था. लेकिन ट्रंप ने जिस तरह से पाकिस्तान की प्रशंसा की है, उससे साफ़ हो गया है कि दोनों देश एक बार फिर से सहयोग की राह पर बढ़ने के लिए तैयार हैं.''
ट्रंप के धन्यवाद देते ही पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ ने एक्स पर एक लंबी पोस्ट लिखी. इस पोस्ट में शहबाज़ शरीफ़ ने ट्रंप को इस बात के लिए धन्यवाद दिया कि उन्होंने पाकिस्तान की भूमिका को स्वीकार किया है.
पिछले महीने जब पीएम मोदी ने अमेरिका का दौरा किया था तो दोनों देशों की ओर से एक साझा बयान जारी किया गया था. इस बयान में पाकिस्तान का नाम लेकर कहा गया था कि वह मुंबई में 26/11 के आतंकवादी हमले की साज़िश रचने वालों को न्याय के कटघरे में लाए.
भारत और अमेरिका ने अपने साझे बयान में कहा था, ''दोनों नेताओं ने वैश्विक आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई और दुनिया के हर कोने से आतंकवाद के सुरक्षित पनाहगाह को ख़त्म करने को लेकर प्रतिबद्धता जताई है. दोनों देशों ने आतंकवादी समूह अल-क़ायदा, आईएसआईएस, जैश-ए-मोहम्मद और लश्कर-ए-तैय्यबा के ख़िलाफ़ सहयोग बढ़ाने पर भी सहमति जताई है.''
अमेरिका और भारत के इस साझा बयान की पाकिस्तान में काफ़ी चर्चा हुई थी. पाकिस्तान में कहा जा रहा था कि भारत साझा बयान में पाकिस्तान का नाम शामिल करवाने में कामयाब रहा. इसे पाकिस्तान के लिए झटके के रूप में देखा जा रहा था.
एक महीना पहले जो अमेरिका पाकिस्तान को आतंकवाद के मामले में घेर रहा था, वही अमेरिका अब पाकिस्तान को आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई के लिए धन्यवाद दे रहा है. अमेरिका से पाकिस्तान को धन्यवाद कहना भारत के लिए क्या संदेश है?
इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन में अंतरराष्ट्रीय संबंध और अमेरिकी विदेश नीति के असिस्टेंट प्रोफ़ेसर डॉक्टर मनन द्विवेदी कहते हैं कि यही अमेरिका की दोहरी नीति है.

भारत के लिए क्या है संदेश?
डॉ द्विवेदी कहते हैं, ''आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में अमेरिका के रुख़ को लेकर हमेशा से सवाल उठता रहा है. भारत भी इस नीति की आलोचना करता रहा है कि अमेरिका आतंकवाद को गुड टेररिज़्म और बैड टेररिज़्म के चश्मे से देखता है. यानी जो अमेरिका को नुक़सान पहुँचाए वो आतंकवाद है और जिससे भारत को नुक़सान हो वो आतंकवाद नहीं है.''
मनन द्विवेदी कहते हैं, ''अब विदेश नीति में हर देश अपना-अपना हित देख रहे हैं. अमेरिका इस मामले में पहले से भी संदिग्ध था. भारत अब अमेरिका के ऐसे बयानों से न तो परेशान होता है और न ही बहुत उत्साहित होता है. पाकिस्तान हमेशा से अमेरिका के लिए एक फ़्रंटलाइन स्टेट रहा है. फ़्रंटलाइन स्टेट का मतलब वैसे देश से है, जिसकी सीमा उस देश से लगती हो, जो कई तरह के आंतरिक संघर्ष से जूझ रहा है.''
सबसे दिलचस्प है कि जिस भाषण में राष्ट्रपति ट्रंप ने पाकिस्तान को धन्यवाद कहा, उसकी भाषण में ज़्यादा टैरिफ के लिए भारत पर निशाना साधा.
थिंक टैंक द विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टिट्यूट के निदेशक माइकल कुगलमैन ने लिखा है, ''पाकिस्तान अफ़ग़ानिस्तान में आतंकवाद को लेकर अमेरिकी चिंता का फ़ायदा उठाना चाहता है. पाकिस्तान चाहता है कि इसी के दम पर अमेरिका के साथ उसकी सुरक्षा साझेदारी बढ़े. लेकिन यह इतना आसान नहीं होगा क्योंकि इसके लिए पाकिस्तान को कुछ ख़ास करना होगा. मोहम्मद शरीफ़ुल्लाह की गिरफ़्तारी को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए.''
माइकल कुगलमैन ने लिखा है, ''कुछ लोग उम्मीद कर रहे थे कि ट्रंप प्रशासन पाकिस्तान की सेना के ख़िलाफ़ सख़्ती से पेश आएगा, प्रतिबंध लगाएगा और इमरान ख़ान की रिहाई के लिए दबाव डालेगा, लेकिन शरीफ़ुल्लाह की गिरफ़्तारी में अमेरिका और पाकिस्तान के बीच सहयोग बताता है कि अमेरिका अब भी पाकिस्तान की सेना पर भरोसा करता है. अमेरिका को लगता है कि पाकिस्तान अब भी कुछ मोर्चों पर मददगार साबित हो सकता है.''

ट्रंप की रणनीति क्या है?
इससे पहले, अमेरिका ने पाकिस्तान को 3.97 करोड़ डॉलर उसके एफ-16 प्रोग्राम को मेंटेन करने के लिए देने की घोषणा की थी. जब ट्रंप ने 90 दिनों के लिए सभी तरह की विदेशी मदद रोकने की घोषणा की थी, तब पाकिस्तान के लिए ट्रंप ने यह नरमी दिखाई. ट्रंप ने इसी दिन भारत की चार कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया था. अमेरिका कहना था कि भारत की इन चार कंपनियों से ईरान को मदद मिल रही थी.
एक ही दिन में पाकिस्तान को 40 करोड़ डॉलर की मदद और भारत की चार कंपनियों पर प्रतिबंध के मायने क्या हैं? अमेरिका के डेलावेयर यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंध के प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान ने अपने यूट्यूब चैनल पर एक टिप्पणी में कहा है, ''पाकिस्तान ने अमेरिका के एफ़-16 का इस्तेमाल 2019 में इंडिया के ख़िलाफ़ किया था जबकि पाकिस्तान को यह लड़ाकू विमान अमेरिका ने आतंकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई में इस्तेमाल के लिए दिया था. इसके बावजूद अमेरिका ने पाकिस्तान के ख़िलाफ़ कोई क़दम नहीं उठाया था.''
मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, ''पिछले तीन सालों में पाकिस्तान को अमेरिका से एक अरब डॉलर की मदद मिली है. ट्रंप प्रशासन में भारत से जुड़े कई लोग हैं. ऐसे में कहा जा रहा था कि ट्रंप की नीति भारत के पक्ष में होगी. लेकिन विदेश नीति ऐसे नहीं चलती है. ट्रंप ने जो शुरुआती संदेश दिए हैं, उनमें साफ़ है कि भारत को लेकर कहीं से भी उदारता नहीं दिखा रहे हैं. यहां तक कि ट्रंप ईरान में भारत के चाबहार पोर्ट को भी रोकने की बात कह चुके हैं.''

आख़िर अमेरिका पाकिस्तान को लेकर नरमी क्यों दिखा रहा है?
प्रोफ़ेसर मुक़्तदर ख़ान कहते हैं, ''अमेरिका अब भी पाकिस्तान को कई मोर्चों पर मददगार के रूप में देखता है. अमेरिका नहीं चाहता है कि पाकिस्तान पूरी तरह से चीन के पाले में चला जाए. जैसे भारत चीन से काउंटर करने के मामले में अमेरिका से फ़ायदा उठा रहा है, वैसे ही पाकिस्तान भी कर रहा है. बाइडन ने जब पाकिस्तान को मदद दी थी तो भारत ने कड़ी आपत्ति जताई थी, लेकिन ट्रंप के हर फ़ैसले पर भारत चुप है, भले उसके ख़िलाफ़ फ़ैसले लिए जा रहे हैं. पाकिस्तान के पास एफ-16 रहना भारत की सुरक्षा के लिए ख़तरा है. अभी भारत की वायु सेना बहुत अच्छी स्थिति में नहीं है.''
पाकिस्तान शुरू से ही अमेरिकी खेमे में था. शीत युद्ध के दौरान पाकिस्तान अमेरिका के साथ था, जबकि भारत ने गुटनिरपेक्षता की राह चुनी थी. गुटनिरपेक्ष नीति के बावजूद भारत सोवियत संघ के क़रीब था. पाकिस्तान के साथ भारत की जंग में भी अमेरिका का रुख़ भारत के ख़िलाफ़ रहा है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़ रूम की ओर से प्रकाशित












