बांग्लादेश: हिंदुओं को लुभाने की कोशिश क्यों कर रही है जमात-ए-इस्लामी?

खुलना में 'हिंदू सम्मेलन' में पार्टी का तराजू पकड़े एक आदमी
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    • Author, तफ़सीर बाबू
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़ बांग्ला

बांग्लादेश के झिनाईदह का उमेदपुर बाज़ार. यहां एक जगह बेंच पर 10-12 लोग एक साथ बैठे हुए हैं.

जमात-ए-इस्लामी पार्टी के एक स्थानीय नेता उन लोगों के बीच पर्चे बांट रहे हैं. इस बारे में पूछे जाने पर उनका कहना था, "पार्टी सनातन धर्म के समर्थकों को लेकर एक 'सभा' का आयोजन कर रही है."

उनके मुताबिक, इस सभा में आने वाले लोग जमात-ए-इस्लामी के 'समर्थक' हैं.

जमात-ए-इस्लामी के उमेदपुर यूनियन के अमीर मोहम्मद शौकत अली कहते हैं, "हम बीते कई महीनों से सनातन धर्म के समर्थकों के बीच काम कर रहे हैं. वह लोग राजनीतिक रूप से हमारा समर्थन कर रहे हैं. यह सब तराजू (पार्टी के चुनाव चिन्ह) के समर्थक हैं."

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उन्होंने बताया कि जमात के केंद्रीय नेतृत्व ने पार्टी की 'राजनीतिक' अपील को विभिन्न धर्मों के लोगों तक पहुंचाने का निर्देश दिया है.

जमात-ए-इस्लामी के नेता और कार्यकर्ता झिनाईदह में जिस तरह हिंदू धर्म के लोगों के बीच काम कर रहे हैं, वैसा ही देश के कई अन्य हिस्सों में भी किया जा रहा है.

कई जिलों से भी ऐसी ख़बरें मीडिया में आई हैं. इनमें कहा गया है कि कई हिंदू जमात-ए-इस्लामी में शामिल हो रहे हैं. कई जगहों से 'सनातनी समिति' के गठन की ख़बरें भी आ रही हैं.

करीब एक सप्ताह पहले देश के दक्षिणी हिस्से में स्थित खुलना ज़िले के डुमुरिया में जमात की ओर से एक 'हिंदू सम्मेलन' भी आयोजित किया गया था.

'सुरक्षा के भरोसे'

ढाका के एक मंदिर में पूजा करती एक हिंदू महिला

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इससे पहले बांग्लादेश में हिंदुओं का जमात जैसी इस्लामी पार्टी में शामिल होना असामान्य बात थी. ऐसा पहले कभी सुनने में नहीं आया था.

लेकिन अब हाल में ऐसी ख़बरें सामने आने के बाद सवाल उठ रहा है कि हकीकत में दूसरे धर्मों के अनुयायियों या समर्थकों के इस इस्लामी पार्टी में शामिल होने का कैसा मौका है? जमात अल्पसंख्यकों को पार्टी में शामिल करने के प्रति दिलचस्पी क्यों ले रही है?

झिनाईदह में जमात के नेता ने पार्टी के समर्थक के तौर पर जिनका परिचय दिया था, बीबीसी बांग्ला ने उनमें से कुछ लोगों से बात की. कुछ लोगों ने 'सुरक्षा के भरोसे' को ऐसी सभा में शामिल होने का कारण बताया. इस गांव के लिए यह अभूतपूर्व घटना है.

उन लोगों का कहना था कि बीते साल पांच अगस्त के बाद से ही हिंदू बस्तियों में डर और आतंक का माहौल पैदा हो गया है. बाद में जमात के नेताओं ने मौके पर जाकर उनको 'सुरक्षा का भरोसा' दिया था.

हिंदू समुदाय के अमल कुमार ने बीबीसी बांग्ला से कहा, "उन लोगों (जमात-ए-इस्लामी के नेताओं और कार्यकर्ताओं) ने हमसे कहा कि किसी भी मुसीबत की स्थिति में हमारी मदद करेंगे और साथ खड़े रहेंगे. उन्होंने हमारे मोबाइल नंबर भी लिए हैं. किसी दूसरी पार्टी ने तो ऐसा समर्थन कम ही दिया है. वह हमारा समर्थन कर रहे हैं और बदले में हम उनको समर्थन दे रहे हैं."

कई अन्य लोगों ने लगभग ऐसी ही बात कही.

उमेदपुर यूनियन के जमात नेता मोहम्मद शौकत अली का कहना था, "हमने उनसे इसलिए मेल-जोल बढ़ाया है कि वह हमारे पड़ोसी हैं और स्वतंत्र रूप से अपने धर्म का पालन करेंगे. लेकिन उनको सुरक्षा मुहैया कराना हमारी ज़िम्मेदारी है. हमने उनसे कहा है कि हमारी पार्टी का चुनाव चिह्न तराजू 'न्याय और निष्पक्षता' का प्रतीक है. उनको हमसे हमेशा निष्पक्ष व्यवहार मिलेगा."

'मुस्लिमों जैसी कोई शर्त नहीं'

बांग्लादेश में हिंदुओं के ख़िलाफ़ हिंसा के विरोध में अगस्त 2024 में कोलकाता में भी प्रदर्शन किया गया था. (फ़ाइल फ़ोटो)

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बांग्लादेश के विभिन्न इलाकों में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न का एक लंबा इतिहास रहा है. बीते पांच अगस्त के बाद भी विभिन्न मानवाधिकार संगठनों ने देश के विभिन्न इलाकों में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न और सुरक्षा के खतरे से संबंधित घटनाओं की जानकारी दी थी.

देखने में आया है कि जमात के नेता स्थानीय तौर पर हिंदुओं से नज़दीकी बढ़ाने के लिए 'सुरक्षा के इस ख़तरे' का ही इस्तेमाल कर रहे हैं.

क्या हिंदुओं के लिए जमात में शामिल होने या उसका नेतृत्व करने का मौका है?

जमात एक इस्लामिक राजनीतिक दल है उसमें मुस्लिम धार्मिक विश्वास और धार्मिक रीति-रिवाज महत्वपूर्ण हैं. पार्टी में शीर्ष पर पहुंचने या नेतृत्व हासिल करने में धार्मिक मुद्दों की अहम भूमिका होती है.

ऐसे में इस बात पर बहस हो सकती है कि ऐसी किसी पार्टी में शामिल होने के बावजूद दूसरे धर्म के लोगों को कोई सार्थक भूमिका निभाने का मौका मिलेगा या नहीं. इसके अलावा यह भी साफ़ नहीं है कि अगर दूसरे धर्म का कोई व्यक्ति ऐसी पार्टी में शामिल होता है तो पार्टी में उसकी भूमिका या ज़िम्मेदारियां क्या होंगी.

इस बारे में पूछने पर जमात-ए-इस्लामी के केंद्रीय महासचिव मिया गुलाम परवार ने बीबीसी बांग्ला को बताया, "जमात के संविधान के अनुरूप ही हम सनातन धर्म के अनुयायियों के बीच से वैसे लोगों को ही समर्थकों के रूप में पार्टी में शामिल कर रहे हैं जो 'हमारी पार्टी में शामिल होने के इच्छुक' हैं."

वह कहते हैं, "हमारे संविधान में गैर-मुस्लिमों को सदस्य के तौर पर शामिल करने का प्रावधान है. लेकिन उनके लिए मुस्लिमों जैसी कोई शर्त नहीं रखी गई है. पार्टी के संविधान के मुताबिक, जमात के अनुशासन का पालन करने, राजनीतिक फैसलों को लागू करने को अहमियत देने, देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता की रक्षा में भूमिका निभाने और धन कमाने के अवैध तरीकों का सहारा न लेने जैसी चार शर्तों का पालन करने की स्थिति में दूसरे धर्मों के लोग भी हमारी पार्टी का सदस्य बन सकते हैं."

मिया गुलाम परवार

'अपने फ़ोरम के नेता'

इसके बाद भी सवाल उठ रहे हैं. इस फैसले की यह कह कर आलोचना की जा रही है कि प्राथमिक सदस्य के तौर पर पार्टी में शामिल होने के बावजूद अलग धर्म के लोगों की पार्टी में कोई प्रभावी भूमिका नहीं है.

इसकी वजह यह है कि जमात-ए-इस्लामी में सदस्य के तौर पर शामिल होने के बावजूद पार्टी का संविधान दूसरे धर्म के किसी व्यक्ति को पार्टी में नेतृत्व या नीति-निर्धारण के किसी भी स्तर पर शामिल होने की अनुमति नहीं देता है.

नतीजतन यह साफ़ नहीं है कि पार्टी सभी धर्मों के अनुयायियों को वास्तव में किस हद तक पार्टी में शामिल होने की अनुमति दे रही है.

लेकिन जमात की निगाहों में इसमें कोई समस्या नहीं है.

जमात के केंद्रीय महासचिव मिया गुलाम परवार कहते हैं, "वह लोग अपने फ़ोरम के नेता होंगे. हमारे संविधान के मुताबिक उनके लिए जमात के मूल नेतृत्व में आने का कोई मौका नहीं है. वह अपने समुदाय के नेता होंगे. वह उस समुदाय के भीतर काम करेंगे और विभिन्न कर्तव्यों का पालन करेंगे. इसके साथ ही अगर स्थानीय स्तर पर उनकी किसी समिति का गठन होता है है तो वह उसका नेतृत्व करेंगे."

लेकिन ऐसी स्थिति में पार्टी प्रभावी रूप से कितनी 'समावेशी' हुई?

इस सवाल पर उनका कहना था, "हमारी पार्टी में शामिल होते ही ऐसे लोग सहयोगी हो जाएंगे. समावेशी का मतलब है कि वह पार्टी में शामिल हैं. फिर उसकी योग्यताएं, और कार्य कुशलता क्या और कितनी हैं, यह एक अलग अध्याय है."

'वोट बैंक नहीं नागरिक'

बांग्लादेश में एक रैली
इमेज कैप्शन, बांग्लादेश के कई निर्वाचन क्षेत्रों में चुनाव जीतने और हारने में अल्पसंख्यक वोट की भूमिका होती है.

बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की आबादी करीब 10 प्रतिशत है. देश के विभिन्न इलाकों में चुनावों में जीत-हार तय करने में अल्पसंख्यक वोटर काफी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं.

अवामी लीग पर पाबंदी लगने के बाद अब यह सवाल पूछा जा रहा है कि अल्पसंख्यक वोट किस ओर जाएंगे.

हालांकि कई लोगों का मानना है कि अल्पसंख्यकों के बीच बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की स्थिति अच्छी है. इस्लामी पार्टी होने और कई अन्य ऐतिहासिक वजहों से इस मामले में जमात-ए-इस्लामी फ़ायदे की स्थिति में नहीं है.

माना जा रहा है कि जमात के शीर्ष नेतृत्व की ओर से पार्टी में गैर-मुस्लिम समर्थकों की संख्या बढ़ाने पर जोर देने की एक प्रमुख वजह इन अल्पसंख्यक मतदाताओं को आकर्षित करना ही है.

करीब एक सप्ताह पहले खुलना में जमात के बैनर तले आयोजित 'हिंदू सम्मेलन' मुख्य रूप से एक चुनावी रैली ही थी. इसमें लोग जमात उम्मीदवार के समर्थन में प्रतीक के रूप में तराजू के साथ हिस्सा लेते नजर आए थे.

इसके अलावा जमात ने अल्पसंख्यक बहुल चुनाव क्षेत्रों में अल्पसंख्यकों को चुनाव अभियान में शामिल करने और चुनाव समितियों में भी जगह देने की भी रणनीति तैयार की है.

इस बारे में पूछने पर परवार ने बीबीसी बांग्ला से कहा कि पार्टी अल्पसंख्यक या हिंदू वोटरों को वोट बैंक के तौर पर नहीं बल्कि नागरिक के तौर पर ही देखती है.

वह कहते हैं, "इस बात से तो इनकार नहीं किया जा सकता कि वह लोग वोटर हैं. लेकिन यही सब कुछ नहीं है. हम उनको वोट बैंक नहीं मान रहे हैं. हम उनके साथ खड़े रहना चाहते हैं."

संदेह और हिचकिचाहट

जमात-ए-इस्लामी के केंद्रीय महासचिव मिया गुलाम परवार
इमेज कैप्शन, जमात-ए-इस्लामी के केंद्रीय महासचिव मिया गुलाम परवार

बहरहाल जमात चाहे जो भी कहे, पार्टी की विभिन्न शाखाओं में पारंपरिक समितियों के गठन और पार्टी में हिंदुओं को शामिल करने के मुद्दे पर हिंदू समुदाय में संदेह और हिचकिचाहट है.

बांग्लादेश हिंदू, बौद्ध, क्रिश्चियन एकता परिषद के कार्यवाहक महासचिव मनींद्र कुमार नाथ मानते हैं कि प्रभावी भूमिका का मौका दिए बिना पार्टी में दूसरे धर्म के लोगों को शामिल करने की स्थिति में कोई ज़मीनी बदलाव नहीं आएगा.

वह कहते हैं, "एक धर्म-आधारित पार्टी होने की वजह से उनकी सोच और संरचना दूसरे धर्मों के लोगों को इसमें शामिल करने की अनुमति नहीं देती है. यह एक चुनावी राजनीति और वोटों की संख्या बढ़ाने की रणनीति है. विभिन्न धर्म के लोगों को पार्टी में शामिल करने के बाद उनको कोई प्रभावी भूमिका नहीं देने की स्थिति में यह बदलाव अस्थायी होगा. इसका कोई स्थायी प्रभाव नहीं पड़ेगा."

मनींद्र कुमार नाथ मानते हैं कि जमात या उसके जैसे दूसरे राजनीतिक दल अल्पसंख्यकों के खिलाफ उत्पीड़न या धमकियों को रोकने के लिए वैसा काम नहीं कर रहे हैं जैसा उनको करना चाहिए था.

अल्पसंख्यकों को सिर्फ किसी पार्टी का सदस्य बनाने से समान मर्यादा, समान अधिकार और सुरक्षा के संकट का मुद्दा हल नहीं होगा.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.