'एडोलसेंस' के ज़रिए भारतीय फ़िल्ममेकर्स की ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म से नाराज़गी कितनी सही?

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- Author, प्रियंका
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
नेटफ़्लिक्स पर आई एडोलसेंस सिरीज़ अपनी 'वन शॉट स्टोरीटेलिंग' के लिए इन दिनों ख़ूब वाहवाही बटोर रही है. लोग इसे अलग स्तर की वेब सिरीज़ करार दे रहे हैं जो दर्शकों को बांधने का माद्दा रखती है.
हालांकि, ये सिरीज़ भारतीय फ़िल्म निर्माता और निर्देशकों का ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर गु़स्सा भी फूटने का कारण भी बन गई है.
शेखर कपूर, हंसल मेहता, सुधीर मिश्रा और अनुराग कश्यप जैसी कई जानी-मानी हस्तियों ने अमेज़न प्राइम और नेटफ़्लिक्स जैसे बड़े ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स के भारत में भेदभाव भरे बर्ताव के लिए उन्हें निशाने पर लिया है.
इस बहस की शुरुआत फिल्ममेकर शेखर कपूर के उस सोशल मीडिया पोस्ट से हुई जिसमें उन्होंने अमेज़न प्राइम पर उनकी फ़िल्म में बिना रज़ामंदी के कांट-छांट करने का आरोप लगाया है. हालांकि, नेटफ़्लिक्स इंडिया की ओर से अभी तक इस बारे में कोई बयान सामने नहीं आया है.

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भारतीय निर्माता-निर्देशकों की नाराज़गी क्या है?

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सबसे पहले फ़िल्म निर्माता शेखर कपूर ने एक सोशल मीडिया पोस्ट में ये कहा कि नेटफ़्लिक्स की सिरीज़ एडोलसेंस ये परिभाषित करती है कि एक बढ़िया सिरीज़ क्या-क्या हासिल कर सकती है.ये कहानी बयां करने का अलग तरीका है.
इसपर फ़िल्ममेकर सुधीर मिश्रा ने लिखा, "हमें कोई भी ऐसा कुछ नहीं करने देगा."
इसके बाद शेखर कपूर ने साल 1994 में आई अपनी फ़िल्म बैंडिट क्वीन के एडिटेड वर्ज़न को प्राइम वीडियो पर रिलीज़ किए जाने के ख़िलाफ़ गुस्सा ज़ाहिर किया.
बैंडिट क्वीन फूलन देवी के जीवन पर आधारित फिल्म है, जिसमें सीमा बिस्वास लीड रोल में थीं.
शेखर कपूर ने एक अन्य सोशल मीडिया पोस्ट में ये दावा किया कि इस फ़िल्म में उनकी सहमति के बिना इतनी कांट-छांट कर दी गई कि वो अब पहचान में ही नहीं आती. फिर भी डायरेक्टर के तौर पर उन्हें ही क्रेडिट दिया गया है.
उन्होंने पूछा, "क्या हम पश्चिमी देशों के निर्देशकों से कमतर हैं? क्या इनमें इतनी हिम्मत है कि ये क्रिस नोलन की फ़िल्म से बिना उनकी मंज़ूरी कांटछांट कर दें?"
इस पर फ़िल्म निर्देशक और अभिनेता कुणाल कोहली ने हैरानी जताते हुए लिखा, "आपकी हॉलीवुड में सफलताओं को देखते हुए आज के शेखर कपूर को ऐसी फ़िल्में बनाने की इजाज़त होगी. लेकिन बैंडिट क्वीन से पहले के शेखर कपूर को निश्चित तौर पर कोई भी ओटीटी बैंडिट क्वीन उस तरह से नहीं बनाने देता, जैसा वह चाहते थे. आपकी फ़िल्म को बिना मंज़ूरी काटना, हैरानी भरा है."
फिल्म निर्माता हंसल मेहता ने भी कुछ ऐसे ही विचार साझा करते हुए लिखा, "अच्छी कहानियां, अनोखे अंदाज़ में कहानी बयां करना, धीरे-धीरे कहना, एक्सपेरिमेंट, बजट ये सब पश्चिम के महान लोगों पर छोड़ दो. गुलामी के दिनों में फिर से आपका स्वागत है."

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अनुराग कश्यप का नेटफ़्लिक्स पर आरोप

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निर्माता-निर्देशक अनुराग कश्यप भी उन लोगों की फ़ेहरिस्त में हैं जिन्होंने भारतीय फ़िल्मों के प्रति ओटीटी प्लेटफॉर्म्स के अलग रवैये की बात उठाई है.
उन्होंने नेटफ़्लिक्स की सिरीज़ एडोलसेंस की सराहना करते हुए एक इंस्टाग्राम पोस्ट किया और इसी में उन्होंने ये भी कहा कि नेटफ़्लिक्स यूके ने जो चुना वैसा नेटफ़्लिक्स इंडिया नहीं चुनता. साथ ही उन्होंने नेटफ़्लिक्स के सीईओ टेड सैंरेंडोस को भी निशाने पर लिया.
उन्होंने ये भी लिखा कि सेक्रेड गेम्स के बाद ऐसे दो मौके रहे जब उन्हें कई तरह की परेशानियां झेली.
उन्होंने लिखा, "टेड सैरेंडोस ने हाल ही में एक पोस्ट डाली, जिसमें उन्होंने कहा- 'हर बार एक ऐसा शो आता है जो नए क्षेत्रों में प्रवेश करता है, क्रिएटिविटी की सीमाओं को चुनौती देता है और करियर की यादगार परफॉर्मेंस बनता है'. मुझे उम्मीद है कि वो ऐसा मानते भी हैं. क्योंकि नेटफ़्लिक्स इंडिया इससे पूरा उलट है. अगर उन्हें ये (सिरीज़) ऑफ़र किया गया होता, तो शायद इसे रिजेक्ट कर दिया गया होता. या तो इसे एक 90 मिनट की फ़िल्म में बदल दिया होता."
"हम लॉस एंजेलिस में बैठे अपने मालिकों का साथ पाने वाले नेटफ़्लिक्स इंडिया के सबसे बेईमान और भ्रष्ट लोगों के साथ कभी भी इतनी ताक़तवर और ईमानदार चीज़ें कैसे बना सकते हैं? टेड और बेला का ये पाखंड 1.4 अरब लोगों के भारतीय बाज़ार में है, जहां उन्हें सिर्फ़ सब्सक्रिप्शन बढ़ाने में रुचि है और कुछ नहीं. ये सब एडोलसेंस जैसे शो के प्रति मुझमें जलन और निराशा पैदा करता है."
आख़िर में अनुराग कश्यप ने ये उम्मीद जताई कि एडोलसेंस की सफलता से शायद नेटफ़्लिक्स इंडिया कुछ सीखे. उन्होंने ये भी कहा कि भारत में नेटफ़्लिक्स पर जो भी अच्छा कंटेंट है या तो वो एक्वायर किया गया है या फिर उसे रिलीज़ से पहले कमतर आंका गया.

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हालांकि, फ़िल्म समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज ओटीटी प्लेटफ़ॉर्म्स को लेकर किए गए इन दावों से सहमत नहीं हैं.
बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा ,"नेटफ़्लिक्स की ये सिरीज़ विदेश में बनी है, विदेश से प्रसारित हुई है और भारत में देखी जा रही है.जब नेटफ़्लिक्स और अमेज़न भारत में काम कर रहे होते हैं और भारतीय लोगों की चीज़ों, मेकर्स को लेकर आते हैं तो कहीं न कहीं यहां के कानून से डरे रहते हैं या सावधानी बरतते हैं. यहां जिस तरह की आपत्तियां होती हैं और कई बार शो या फिल्म के बैन तक की बात आ जाती है, उसे देखते हुए वो सतर्क रहते हैं. यही वजह कि वे भारतीय मेकर्स को उस तरह की आज़ादी नहीं देते हैं."
वो कहते हैं कि अभी जो भारत में राजनीतिक स्थिति है, सेंसर की स्थिति है उसमें ज़रूर भारतीय निर्माताओं के सामने मुश्किलें आई हैं. लेकिन अमेज़न या नेटफ़्लिक्स जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स को इसके लिए ज़िम्मेदार ठहराना सही नहीं है.
अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं, "मैं इस सिरीज़ को उत्पाद के तौर पर लेता हूं और भारतीय उत्पाद को बाज़ार में लाने के लिए ये देखना पड़ता है कि यहां किस तरह के मसलों पर लोग संवेदनशील है, कहां दिक्क़त हो जाती है. यहां आप किसी नेता का नाम नहीं ले सकते, पार्टी का नाम नहीं ले सकते...लेकिन जब आप एक क्रिएटिव फ़ील्ड में होते हैं तो आपको इस तरह की छूट मिलनी चाहिए."
"हमने नैतिकता की ऐसी चादर ओढ़ रखी है कि क्रिएटिव काम करने के दौरान जब भी पाँव उस चादर से बाहर जाता है, तो लोगों के कान खड़े हो जाते हैं."
सिरीज़ में क्या है ख़ास?

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एडोलसेंस चार एपिसोड वाली एक सिरीज़ है, जिसमें स्टीफ़न ग्राहम अहम किरदार निभा रहे हैं. ये सिरीज़ बीती 13 मार्च को रिलीज़ हुई है.
इस सिरीज़ की अनोखी अप्रोच इसे बाकियों से अलग करती है. इसका हर सीन एक शॉट में शूट किया गया है. सिरीज़ के निर्देशक फिलिप बैरंटिनी हैं.
इस फ़िल्म को शूट करने का तरीका हालांकि, उतना भी आसान नहीं है जितना ये सुनने में लग सकता है.
अजय ब्रह्मात्मज कहते हैं, "ये बहुत मुश्किल काम होता है. हमारे यहां भी कई बार ऐसी कोशिश की गई है, ख़ासकर गानों में. सैफ़ अली ख़ान की फ़िल्म एजेंट विनोद का गाना राब्ता भी ऐसे ही शूट किया गया था. इसके लिए एक साथ सारा रिहर्सल कर लिया जाता है. उसके बाद शूट करते हैं. कैमरा कब घूमेगा, कलाकार कब बाहर जाएगा, अंदर आएगा सब कुछ का रिहर्सल होता है. ये बहुत टाइम लेने वाली चीज़ है. उस धैर्य की भारत में कमी है.ये ज़्यादातर हाथ में कैमरा लेकर या बॉडी में कैमरा फ़िट कर के होता है. कैमरामैन बहुत एक्सपर्ट होते हैं, जिनके हाथ से कैमरा हिलता तक नहीं है."
ये साइकोलॉजिकल ड्रामा एक अपराध की जांच के इर्द-गिर्द बुना गया है. इसकी शुरुआत होती है 13 साल के जेमी मिलर (ओवेन कूपर) की गिरफ़्तारी से. मिलर पर अपनी क्लास की एक छात्रा को जान से मारने का आरोप है.
हालांकि, जेमी के पिता और मां इन आरोपों पर विश्वास नहीं करते और फिर इस मामले की जांच में कई पहलुओं से पर्दा उठता है.
स्टीफ़न ग्राहम इस फ़िल्म के सह निर्माता भी हैं. उन्होंने बीबीसी रेडियो फ़ोर के कार्यक्रम में बताया कि उन्हें इस कहानी का ख़्याल इससे जुड़ी एक ख़बर से आया था.
उन्होंने नेटफ़्लिक्स से इस सिरीज़ के बारे में कहा, "मैंने एक ऐसे ही मामले की ख़बर अख़बार में पढ़ी थी. ख़बर ये थी कि एक लड़के ने चाकू घोंपकर एक लड़की की जान ले ली. इसके कुछ ही दिन बाद मैंने एक और ऐसी ही ख़बर टीवी पर देखी, जो देश के एकदम अलग हिस्से से जुड़ी थी. ईमानदारी से कहूं तो ये मामले में मन में कहीं अटक गए थे. इसने मुझे सोचने के लिए मजबूर किया कि ये सब क्या चल रहा है और क्यों हो रहा है. हमारे समाज के युवा लड़कों के साथ ये क्या हो रहा है?"
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.















